Mahabalipuram

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Author:Laxman Burdak, IFS (R)

Mahabalipuram (महाबलीपुरम्), also known as Mamallapuram, is a town in Chengalpattu district in the southeastern Indian state of Tamil Nadu. It was designated a UNESCO World Heritage site in 1984. [1]

Origin

Variants

History

Mamallapuram was one of two major port cities by the 7th century within the Pallava kingdom. The town was named after Pallava king Narasimhavarman I, who was also known as Mahamalla. Along with economic prosperity, it became the site of a group of royal monuments, many carved out of the living rock. These are dated to the 7th and 8th centuries: rathas (temples in the form of chariots), mandapas (cave sanctuaries), the giant open-air rock relief the Descent of the Ganges, and the Shore Temple dedicated to Shiva, Durga, Vishnu, Krishna and others.[2]

Mamallapuram is also known by other names such as Mamallapattana and Mahabalipuram. Another name by which Mamallapuram has been known to mariners, at least since Marco Polo’s time is "Seven Pagodas" alluding to the Seven Pagodas of Mamallapuram that stood on the shore, of which one, the Shore Temple, survives.[3]

महाबलीपुरम्

विजयेन्द्र कुमार माथुर[4] ने लेख किया है ...महाबलीपुरम् (AS, p.723): एक ऐतिहासिक नगर है जो 'ममल्लपुरम्' भी कहलाता है। यह पूर्वोत्तर तमिलनाडु राज्य, दक्षिण भारत में स्थित है। यह नगर बंगाल की खाड़ी पर चेन्नई (भूतपूर्व मद्रास) से 60 किलोमीटर दूर स्थित है.

मद्रास से लगभग 40 मील दूर समुद्र तट पर स्थित वर्तमान ममल्लपुर. इसका एक अन्य प्राचीन नाम बाणपुर भी है. यह पल्लव नरेशों के समय (सातवीं सदी ई.) में बने सप्तरथ नामक विशाल मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है. ये मंदिर भारत के प्राचीन वास्तुशिल्प के गौरवमय उदाहरण माने जाते हैं. पल्लवों के समय में दक्षिण भारत की संस्कृति उन्नति के सर्वोच्च शिखर पर पहुंची हुई थी. इस काल में बृहत्तर भारत, विशेषकर स्याम, कंबोडिया, मलाया और इंडोनेशिया में दक्षिण भारत से बहुसंख्यक लोग जाकर बसे थे और वहां पहुंच कर उन्होंने नए-नए भारतीय उपनिवेशों की स्थापना की थी. महाबलीपुर के निकट एक पहाड़ी पर स्थित दीपस्तंभ समुद्र-यात्राओं की सुरक्षा के लिए बनवाया गया था. इसके निकट ही सप्तरथों के परम विशाल मंदिर विदेश यात्राओं पर जाने वाले यात्रियों को मातृभूमि का अंतिम संदेश देते रहे होंगे. [p.724] दीपस्तंभ के शिखर से शिल्पकृतियों के चार समूह दृष्टिगोचर होते हैं.

पहला समूह:पहला समूहएक ही पत्थर में से कटे हुए पाँच मन्दिरों का है, जिन्हें रथ कहते हैं। ये कणाश्म या ग्रेनाइट पत्थर के बने हुए हैं। इनमें से विशालतम धर्मरथ हैं जो पाँच तलों से युक्त हैं। इसकी दीवारों पर सघन मूर्तिकारी दिखाई पड़ती है। भूमितल की भित्ति पर आठ चित्रफलक प्रदर्शित हैं, जिनमें अर्ध-नारीश्वर की कलापूर्ण मूर्ति का निर्माण बड़ी कुशलता से किया गया है। दूसरे तल पर शिव, विष्णु और कृष्ण की मूर्तियों का चित्रण है। फूलों की डलिया लिए हुए एक सुन्दरी का मूर्तिचित्र अत्यन्त ही मनोरम है। दूसरा रथ भीमरथ नामक है, जिसकी छत गाड़ी के टाप के सदृश जान पड़ती है। तीसरा मन्दिर धर्मरथ के समान है। इसमें वामनों और हंसों का सुन्दर अंकन है। चौथे में महिषासुर मर्दिनी दुर्गा की मूर्ति है। पाँचवां एक ही पत्थर में से कटा हुआ है और हाथी की आकृति के समान जान पड़ता है।

दूसरा समूह: दूसरा समूह दीपस्तम्भ की पहाड़ी में स्थित कई गुफ़ाओं के रूप में दिखाई पड़ता है। वराह गुफ़ा में वराह अवतार की कथा का और महिषासुर गुफ़ा में महिषासुर तथा अनंतशायी विष्णु की मूर्तियों का अंकन है। वराहगुफ़ा में जो अब निरन्तर अन्धेरी है, बहुत सुन्दर मूर्तिकारी प्रदर्शित है। इसी में हाथियों के द्वारा स्थापित गजलक्ष्मी का भी अंकन है। साथ ही सस्त्रीक पल्लव नरेशों की उभरी हुई प्रतिमाएँ हैं, जो वास्तविकता तथा कलापूर्ण भावचित्रण में बेजोड़ कही जाती है।

तीसरा समूह: तीसरा समूह सुदीर्घ शिलाओं के मुखपृष्ठ पर उकेरे हुए कृष्ण लीला तथा महाभारत के दृश्यों के विविध मूर्तिचित्रों का है। जिनमें गोवर्धन धारण, अर्जुन की तपस्या आदि के दृश्य अतीव सुन्दर हैं। इनसे पता चलता है कि स्वदेश से दक्षिण पूर्व एशिया के देशों में जाकर बस जाने वाले भारतीयों में महाभारत तथा पुराणों आदि की कथाओं के प्रति कितनी गहरी आस्था थी। इन लोगों ने नए उपनिवेशों में जाकर भी अपनी सांस्कृतिक परम्परा को बनाए रखा था। जैसा ऊपर कहा गया है, महाबलीपुर समुद्रपार जाने वाले यात्रियों के लिए मुख्य बंदरगाह था और मातृभूमि छोड़ते समय ये मूर्तिचित्र इन्हें अपने देश की पुरानी संस्कृति की याद दिलाते थे।

चौथा समूह: चौथा समूह समुद्र तट पर तथा सन्निकट समुद्र के अन्दर स्थित सप्तरथों का है, जिनमें से छः तो समुद्र में समा गए हैं और एक समुद्र तट पर विशाल मन्दिर के रूप में विद्यमान है। ये छः भी पत्थरों के ढेरों के रूप में समुद्र के अन्दर दिखाई पड़ते हैं।[p.725]

महाबलीपुरम के रथ: महाबलीपुरम के रथ जो शैलकृत्त हैं, अजन्ता और एलौरा के गुहा मन्दिरों की भाँति पहाड़ी चट्टानों को काट कर तो अवश्य बनाए गए हैं किन्तु उनके विपरीत ये रथ, पहाड़ी के भीतर बने हुए वेश्म नहीं हैं, अर्थात ये शैलकृत होते हुए भी संरचनात्मक हैं। इनको बनाते समय शिल्पियों ने चट्टान को भीतर और बाहर से काट कर पहाड़ से अलग कर दिया है। जिससे ये पहाड़ी के पार्श्व में स्थित जान नहीं पड़ते हैं, वरन् उससे अलग खड़े हुए दिखाई पड़ते हैं। महाबलीपुरम दो वर्ग मील के घेरे में फैला हुआ है। वास्तव में यह स्थान पल्लव नरेशों की शिल्प साधना का अमर स्मारक है। महाबलीपुरम के नाम के विषय में किंवदन्ती है कि वामन भगवान ने जिनके नाम से एक गुहामन्दिर प्रसिद्ध है दैत्यराज बलि को पृथ्वी का दान इसी स्थान पर दिया था।

External links

References

  1. Mamallapuram, Encyclopedia Britannica
  2. Mamallapuram, Encyclopedia Britannica
  3. Sundaresh, A. S. Gaur, Sila Tripati, K. H. Vora (10 May 2004). "Underwater investigations off Mamallapuram" (PDF). Current Science. 86 (9).
  4. Aitihasik Sthanavali by Vijayendra Kumar Mathur, pp.723-725