Maharaja Suraj Mal Ka Jiwan Parichay

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महाराजा सूरजमल
For information in English see Maharaja Suraj Mal

महाराजा सूरजमल: एक श्रेष्ठ शख्सियत

लेखक - प्रोफेसर हनुमानाराम ईसराण: पूर्व प्राचार्य ,कॉलेज शिक्षा ,राजस्थान पूर्व सिंडिकेट सदस्य, राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर

जन्म: 13 फरवरी 1707

ताजपोशी : 22 मई 1755, डीग में

वीर गति: 25 दिसम्बर 1763

sketch of Maharaja Surajmal by Painter Pawan Thakan

अट्ठारवीं शताब्दी को भारतीय इतिहास की सबसे अस्थिर, उथल-पुथल से भरी और डांवाडोल शताब्दी माना जा सकता है। इस शताब्दी के जिस रियासती शासक में वीरता, धीरता, गम्भीरता, उदारता,सतर्कता, दूरदर्शिता, सूझबूझ,चातुर्य और राजमर्मज्ञता का सुखद संगम सुशोभित था, वह था महाराजा सूरजमल। मेल-मिलाप और सह-अस्तित्व तथा समावेशी सोच को आत्मसात करने वाली भारतीयता का वह सच्चा प्रतीक था।

भरतपुर जहां स्थित है, वह इलाका सोघरिया जाट सरदार रुस्तम के अधिकार में था। यहां पर सन 1733 में भरतपुर नगर की नींव डाली गई। सन 1732 में बदनसिंह ने अपने 25 वर्षीय पुत्र सूरजमल को डीग के दक्षिण-पश्चिम में स्थित सोघर गांव के सोघरियों पर आक्रमण करने के लिए भेजा। सूरजमल ने सोघर को जीत लिया। वहाँ राजधानी बनाने के लिए किले का निर्माण शुरू कर दिया। भरतपुर में स्थित यह किला लोहागढ़ किला ( Iron fort ) के नाम से जाना जाता है। यह देश का एकमात्र किला है, जो विभिन्न आक्रमणों के बावजूद हमेशा अजेय व अभेद्य रहा। बदन सिंह और सूरजमल यहां सन 1753 में आकर रहने लगे।

भरतपुर के किले का निर्माण- कार्य शुरू करने के कुछ समय बाद बदनसिंह की आंखों की ज्योति क्षीण होने लगी। अतः उसने विवश होकर राजकाज अपने योग्य और विश्वासपात्र पुत्र सूरजमल को सौंप दिया। वस्तुतः बदनसिंह के समय भी शासन की असली बागडोर सूरजमल के हाथ में रही।

मुगलों, मराठों व राजपूतों से गठबंधन का शिकार हुए बिना ही सूरजमल ने अपनी धाक स्थापित की। घनघोर संकटों की स्थितियों में भी राजनीतिक तथा सैनिक दृष्टि से पथभ्रांत होने से बचता रहा। बहुत कम विकल्प होने के बावजूद उसने कभी गलत या कमजोर चाल नहीं चली। उसने यत्न किया कि संघर्ष का पथ अपनाने से पहले सब शांतिपूर्ण उपायों को अवश्य आज़माया जाए।

नवजात जाट राज्य की रक्षा करने और उसे सुरक्षित बनाए रखने के लिए उसने साहस तथा सूझबूझ का परिचय दिया।

रण-कौशल और चतुराई में अव्वल:

1.बागड़ू की लड़ाई - सन 1743 में जयपुर-नरेश सवाई जयसिंह की मृत्यु के बाद राजगद्दी पर आसीन होने के मसले पर उसके पुत्रों ईश्वरी सिंह और माधो सिंह में भ्रातृघाती युद्ध हुआ। माधो सिंह की मां उदयपुर की होने के कारण मेवाड़ के राणा ने अपने पद और प्रभाव का प्रयोग करके अपने भांजे के लिए प्रबल समर्थक जुटा लिया। मराठों तथा जोधपुर, बूंदी और कोटा के शासकों ने भी माधोसिंह का साथ दिया। केवल भरतपुर के सिनसिनवार बदन सिंह ने जयसिंह को दिए अपने वचन को निभाते हुए ईश्वरी सिंह को सक्रिय सहयोग प्रदान करने के लिए अपने वीर पुत्र सूरजमल को जयपुर भेजा। सूरजमल ने दस हज़ार घुड़सवार ,दो हज़ार पैदल सैनिक और दो हज़ार बर्छेबाज को साथ लेकर कुम्हेर से जयपुर की ओर कूच किया। उसकी सेना में जाट, गुर्जर, अहीर, राजपूत और मुसलमान थे। ईश्वरी सिंह ने सूरजमल को बराबरी का सम्मान देते हुए उसका स्वागत किया।

ईश्वरीसिंह और माधोसिंह की सेनाओं का आमना- सामना 21 अगस्त 1748 को जयपुर से 18 मील दूर दक्षिण-पश्चिम में स्थित बागड़ू में हुआ। बेशक युद्ध बेमेल था। माधोसिंह के पक्ष में शामिल नामी योद्धाओं में मल्हारराव होलकर, गंगाधर टांटिया ,मेवाड़ के महाराणा, जोधपुर नरेश तथा कोटा व बूंदी के राजा थे। उसकी सहायता करने के लिए महाराणा, राठौड़, सिसोदिया, हाड़ा, खींची व पंवार सब शासक शामिल थे। ईश्वरी सिंह के साथ लड़ने वाला सूरजमल अप्रसिद्ध- सा था। सूरजमल के सैनिक संख्या में अवश्य कम थे, परन्तु भली -भांति प्रशिक्षित थे। उनका सेनापति सूरजमल परखा हुआ शूरवीर था। ईश्वरी सिंह की सेना के अग्र भाग का नेतृत्व संभालने वाला सीकर का सरदार शिव सिंह युद्ध के दूसरे दिन युद्ध के मैदान में ढेर हो गया। तब तीसरे दिन हरावल (अग्रभाग) का नेतृत्व सूरजमल को सौंपा गया। मराठा सरदार मल्हारराव होलकर ने गंगाधर टांटिया को एक शक्तिशाली सैन्य दल के साथ ईश्वरी सिंह की तैनाती वाले सेना के पृष्ठ भाग पर अचानक धावा बोल देने के लिए भेज दिया। युवा सूरजमल ने आगे बढ़ते हुए शत्रु-सेना के पार्श्व भाग पर धावा बोल दिया। दो घंटे तक भीषण युद्ध हुआ। अंत में गंगाधर को पीछे धकेल दिया। सूरजमल ने छिन्न-भिन्न पृष्ठभाग को फिर व्यवस्थित किया। उस घोर संकट के समय सूरजमल ने लड़ाई में जबरदस्त शौर्य दिखाया। सूरजमल की वीरता ने हारती बाजी को पलट दिया। ईश्वरीसिंह को राजगद्दी पर आसीन करवाने में वह सफ़ल हो गया। रण-भूमि में इस जीत ने सूरजमल को विख्यात कर दिया।

"सूरजमल की नेतृत्व शक्ति और उसके सैनिकों के पराक्रम की ख्याति तेजी से फैल गई, और देश के उच्चतम शासकों की ओर से बार-बार उसके पास सैनिक सहायता की मांग आने लगी।"( गंगासिंह, यदुवंश ,पृष्ठ 156)

2 . मुगलों से मुकाबला - 20 जून 1749 को जोधपुर नरेश महाराजा अभयसिंह की मृत्यु के बाद महाराजा की गद्दी पर आसीन हुए रामसिंह को उसके मामा बख़्त सिंह ने चुनौती दी। रामसिंह ने आमेर के तत्समय राजा ईश्वरीसिंह से सहायता मांगी। मुगल सम्राट अहमदशाह ने बख़्त सिंह का समर्थन करते हुए नवंबर में मीर बख्शी सलाबतजंग को 18000 सैनिकों के साथ उसकी सहायता के लिए भेजा। मीर बख्शी ने जाट राजा के अधीन मेवात के रास्ते जोधपुर जाने का निश्चय किया। योजना यह थी कि मीर बख्शी जाटों से आगरा और मथुरा सूबे के उन भागों को भी वापस छीन लेगा, जिन पर उन्होंने कब्जा कर लिया था। जाटों से निपटने के बाद मीर बख्शी को मारवाड़ पहुँचकर बख़्तसिंह से जा मिलना था। मीर बख्शी ने जाट-राज्य में मेवात को लूटा और नीमराना के मिट्टी से बने किले पर 30 दिसम्बर 1749 को अधिकार कर लिया। अभिमान से चूर हो चुके मीर बख्शी ने सूरजमल को सबक सिखाने की ठान ली और सराय शोभचंद आ धमका। सूरजमल ने अपने छ हज़ार सैनिकों का नेतृत्व करते हुए सन 1750 के नववर्ष के दिन मुगल-सेना को चारों ओर से घेर लिया। सूरजमल के साथ जाट सरदार थे। मीर बख्शी चारों तरफ से घिर गया था। आक्रमण में सैनिकों के साथ दो प्रमुख मुगल सेनाध्यक्ष अली रुस्तम खां और हकीम खां भी मारे गए। मीर बख़्शी अब सूरजमल के वश में था। तीन दिन बाद उसने लड़ाई की जिद्द छोड़कर सूरजमल से संधि की याचना की। सूरजमल ने संधि के लिए निम्नलिखित चार शर्तें रखीं और मीर बख्शी ने इन्हें स्वीकार कर लिया:

1. सम्राट की सरकार पीपल के वृक्षों को न कटवाने का वचन देगी;

2. इस वृक्ष की पूजा में कोई बाधा नहीं डालेगी;

3 . इस प्रदेश के हिंदू मंदिरों का अपमान या नुकसान नहीं करेगी;

4. सूरजमल अजमेर प्रांत की मालगुजारी के रूप में राजपूतों से 15 लाख रुपए लेकर शाही खजाने में दे देगा, बशर्ते मीर बख्शी नारनोल से आगे न बढ़े ...।

इस सफलता से सूरजमल और जाटों में नया आत्मविश्वास भर गया। जाटों का सैनिक सामर्थ्य प्रमाणित हो गया। इस संधि की शर्तों में स्पष्ट रूप से ब्रज- मंडल में भरतपुर के शासकों की उत्कृष्ट स्थिति को मान्यता दी गई थी, जिससे 'बृजराज'उपाधि का औचित्य सिद्ध होता है। सूरजमल के अलावा दूसरा कोई राजा नहीं हुआ जो ऐसी शर्तें मुस्लिम शासकों से मनवा सका।

3. दिल्ली में सूरजमल की धमक - सन 1748 में मुगल सम्राट मुहम्मदशाह की मृत्यु के बाद शहज़ादा अहमदशाह शाहंशाह और अवध का सूबेदार सफ़दरजंग वजीर बना। मुगल दरबार में आपसी कलह से घोर अव्यवस्था का दौर शुरू होना लाज़िम था। सफदरजंग को उसकी निजी जागीर बल्लभगढ़ व रुहेलखंड में विद्रोह का सामना करना पड़ा। इनमें से पहले संग्राम में सूरजमल ने उसका विरोध किया और दूसरे में उसका समर्थन किया। मुगल दरबार में सफदरजंग के काफी शत्रु थे और रुहेलों ने भी उसके खिलाफ मोर्चा खोल दिया। ऐसी स्थिति में उसने सूरजमल का नाम अपने विरोधियों की सूची में जोड़ना ठीक नहीं समझा। दोनों में हुए समझौते के तहत झगड़ा खत्म हो गया। रुहेले जब सफदरजंग के प्रभुत्व को खुली चुनौती देने लगे तो बंगश पर चढ़ाई करने के अभियान में सफदरजंग के साथ सूरजमल था। उसने अहमद बंगश की राजधानी फर्रुखाबाद पर अधिकार कर लिया।

रुहेलों के विरुद्ध संग्राम में जाटों ने जो सराहनीय वीरता दिखाई उससे बल्लभगढ़ की समस्या का हल सूरजमल ने अपनी इच्छा के अनुकूल करवा लिया। रुहेलों का दमन करने के लिए दूसरी बार प्रस्थान करने से पहले सफदरजंग ने मराठों से मैत्री- संधि कर ली। जाट और मराठा सैनिकों ने रुहेला प्रदेश को तहस-नहस कर डाला। दिल्ली लौटकर सफदरजंग ने रुहेलों के विरुद्ध अपने दो संग्रामों में सूरजमल द्वारा दी गई सहायता को कृतज्ञतापूर्वक याद रखा। 20 अक्टूबर 1752 को जब वज़ीर सफ़दरजंग के साथ सूरजमल दरबार में उपस्थित हुआ तो सम्राट ने सूरजमल को 'राजेंद्र' की उपाधि देकर 'कुंवर बहादुर' और उसके पिता बदनसिंह को 'महेंद्र' की उपाधि देकर 'राजा' बना दिया।

कालांतर में मुग़ल दरबार में कलह का खेल कुछ ऐसा चला कि सफदरजंग और सम्राट के बीच तनातनी चरम पर पहुंच गई। सम्राट ने सफदरजंग को पदच्युत कर उसकी जागीरें ज़ब्त कर लीं। सफदरजंग ने अपने अहसान फ़रामोश बादशाह को सबक सिखाने के लिए दिल्ली पर घेरा डाल दिया और सूरजमल से सहायता की गुहार की। मार्च से नवंबर 1753 तक दिल्ली में गृह- युद्ध के हालात बने रहे। सफदरजंग की पुकार पर सूरजमल मई के पहले सप्ताह में विशाल सेना तथा 15 हज़ार घुड़सवार लेकर दिल्ली जा धमका। तत्कालीन नवाब गाजीउद्दीन( इमाद ) से जोरदार लड़ाई लड़ी। 9 मई और 4 जून1753 के बीच जाटों ने पुरानी दिल्ली में अपनी मनमर्जी चलाई। 16 मई को तो उन्होंने वहाँ खूंखार तरीके से उधम मचाई। बादशाह की सेना लाचार बनी रही; कुछ नहीं कर सकी।

'तारीख़-ए- अहमदशाह' के लेखक ने यह लिखा है: "जाटों ने दिल्ली के दरवाजे तक लूटपाट की ; लाखों- लाख लूटे गए; मकान ढहा दिए गए; और सब उपनगरों ( पुरों ) में और चुरनिया और वकीलपुरा में तो कोई दीया ही नहीं दीखता था।" उसी समय से 'जाट- गर्दी' शब्द प्रचलन में आया। परंतु यह भी याद रखना होगा कि इसके तत्काल बाद अहमदशाह अब्दाली की 'शाह-गर्दी' और मराठों की 'भाऊ-गर्दी' के सामने सूरजमल के सैनिकों द्वारा की गईं ज्यादतियां फीकी पड़ गई थीं।

सूरजमल ने जब तक अपनी तलवार म्यान में रखने से इंकार कर दिया जब तक कि उसके मित्र सफदरजंग को अवध और इलाहाबाद के उपराजत्व वापस न दे दिए जाएं। अंत में इन शर्तों पर संधि हो गई। सूरजमल ने सफ़दरजंग से मित्रता-धर्म निभाते हुए उसे विनाश से बचा लिया, चाहे इसके कारण उसे गाजीउद्दीन की कट्टर शत्रुता मोल लेनी पड़ी। दिल्ली की हार का बदला लेने एवं सूरजमल को डराने के लिए नवाब गाजीउद्दीन (इमाद ) ने दक्षिण से मराठा मल्हारराव होलकर को सूरजमल पर आक्रमण करने के लिए न्योता दिया।

4. मुग़ल-मराठा संयुक्त सेना से मुकाबला - सूरजमल सतर्क एवं चतुर पुरुष था। वह संघर्ष के रास्ते पर आगे बढ़ने से पहले सब शांतिपूर्ण उपायों को आजमाए जाने के पक्ष में रहता था। वह अपने पांव रखने से पहले जमीन को जांच लेता था। साहस और धैर्य दोनों ही गुण उसमें थे। मराठों के विपरीत, सूरजमल अपनी चादर से बाहर पांव पसारने या अपने सामर्थ्य से अधिक जिम्मेदारी अपने सिर लेने से बचता था।

सूरजमल मराठों के साथ तनातनी से बचने का प्रयास करता रहा। परंतु मराठों के मन में संधि नहीं, लूट का लालच भरा था। फलता-फूलता जाट- राज्य उनकी खीझ व लोभ का कारण बन गया था। मराठों द्वारा सूरजमल को नीचा दिखाने की कुटिल चालें चली जा रहीं थीं। सन 1753 के दिसंबर के अंत में खांडेराव ने दिल्ली में मुगल सम्राट तथा इमाद के सम्मुख यह बात स्पष्ट कर दी थी --'मैं अपने पिता के आदेश से यहां सूरजमल के विरुद्ध आपके अभियान में सहायता देने आया हूं... ।'

सूरजमल के राज्य के केंद्र में स्थित सामरिक महत्व के कस्बे कुम्हेर में मुगल- मराठा की सम्मिलित सेना ( 80 हजार से अधिक सैनिक जिनमें जयपुर-नरेश द्वारा मल्हारराव के साथ भेजी गई छोटी-सी सेना भी शामिल थी। ) ने जनवरी 1754 में घेरा डाल दिया। कुछ समय बाद मीर बख्शी अर्थात मुग़ल सम्राट की सेनाओं के प्रधान सेनापति गाजीउद्दीन खां शाही सेनाओं के साथ मराठों की सहायता के लिए आ पहुंचा। इस विशाल सेना के सम्मुख भी सूरजमल ने हिम्मत नहीं हारी और उसने मई 1754 तक चार माह तक डटकर मुकाबला किया।

सूरजमल संकट और संग्राम की स्थिति में काल और परिस्थिति के हिसाब से चाल चलने में माहिर था। कुम्हेर पर चढ़ाई के दौरान मल्हारराव का रूपवान वीर पुत्र खंडेराव जाटों की एक हल्की तोप के गोले से 15 मार्च 1754 को मारा गया। खाँडेराव का पिता मल्हारराव 'शोक से बिल्कुल पागल सा हो गया और उसने प्रतिज्ञा की कि वह इसका बदला जाटों का समूल नाश करके लेगा।'

मल्हारराव ने आक्रमण का दबाव बढ़ाया। सूरजमल की सहायता के लिए कोई नहीं आया। रानी हंसिया ने मराठा शिविर की फूट और गुटबंदियों की जानकारी प्राप्त कर जियाजीराव सिंधिया के पास एक पत्र भिजवाया। सिंधिया और सिनसिनवार शासकों के मध्य हुए इस संपर्क के समाचार का पता चलते ही मल्हारराव होल्कर के हौसले टूट गए। उसने परिस्थितियों का मूल्यांकन करते हुए 18 मई 1754 को सूरजमल से संधि कर ली। इस घेरे की समाप्ति के समय सूरजमल का राज्य ज्यों का त्यों था और उसकी प्रतिष्ठा में भी वृद्धि हुई।

"सूरजमल की धाक इस घेरे के दिनों में और भी बढ़ गई थी और सारे हिंदुस्तान भर छा गई थी; अब उसे यह यश और प्राप्त हो गया कि वह उन दो सरदारों से, जो अपनी -अपनी सेनाओं में उसके पद के समकक्ष थे, सौदेबाजी करने में और उनसे अपनी मनचाही शर्तें मनवाने में सफल हुआ।"( फ़ादर वैन्देल , और्म की पांडुलिपि )

कुम्हेर के घेरे से सूरजमल के कुशल और अक्षत बच जाने में चरित्र बल एवं सौभाग्य के साथ-साथ रानी हंसिया के साहसपूर्ण प्रयत्न और उनके सुयोग्य सलाहकार/विश्वसनीय मंत्री रुपाराम कटारिया के संधि वार्ता कौशल से भी बहुत सहायता मिली।

5. अहमदशाह अब्दाली से मुकाबला: 18 वीं शताब्दी के मध्य में मुगल साम्राज्य दुर्बलता, अराजकता और दरिद्रता की चपेट में आ चुका था। अफगानी आक्रांता अहमदशाह अब्दाली ने सन 1756 में पंजाब को जीतकर दिल्ली की ओर कूच कर दिया। 27 जनवरी 1757 को अब्दाली आतंक मचाने की नीयत से दिल्ली के बाहरी अंचल में आ धमका। 29 जनवरी को मुगल सम्राट आलमगीर द्वितीय अब्दाली के समक्ष नतमस्तक हो कर उपस्थित हो गया। क्रूर स्वभाव के लिए कुख्यात अब्दाली ने एक महीने तक दिल्ली में आतंक मचाए रखा। 22 फरवरी 1757 को 'दिल्ली में अपना काम निपटा कर और आलमगीर द्वितीय को उसका राजसिंहासन दुबारा देकर अहमदशाह दुर्रानी ने जाट राजा से राज-कर वसूल करने के लिए दक्षिण की ओर कूच किया'।( जदुनाथ सरकार, 'फॉल ऑफ द मुगल एंपायर', खंड 2 पृष्ठ 80 ) अब्दाली के मन में उस समय हिंदुस्तान में सबसे धनी शासक सूरजमल का धन हड़पने की इच्छा बलवती हो चली। उसने सूरजमल के पास संदेश भिजवाया कि वह राज-कर देने के लिए उसके पास हाजिर हो, उसके झंडे के नीचे रहकर सेवा करे और जिन इलाकों को उस ने हाल ही में हथियाया है, उन्हें लौटा दे। सूरजमल ने इस बुलावे की परवाह नहीं की। मथुरा की रक्षा का भार अपने पुत्र जवाहर सिंह को सौंपकर वह डीग लौट गया। जवाहरसिंह ने उतावलापन दिखाया। फरीदाबाद और बल्लभगढ़ के आसपास लूटमार कर रही एक अफ़ग़ान टुकड़ी पर आक्रमण कर उसे हरा दिया। यह सुनकर अब्दाली का गुस्सा और फूट पड़ा। उसने अपने वरिष्ठ सेनापति अब्दुस्समद खां को जवाहर सिंह पर घात लगाकर हमला करने का आदेश दिया। परन्तु जवाहर सिंह मामूली सा नुकसान उठाकर किसी तरह बच निकला और बल्लभगढ़ पहुंच गया।

जब अब्दाली ने जाट इलाके की ओर प्रस्थान किया, तब सम्राट आलमगीर ने उसे विदाई दी। 25 फरवरी को वह बदरपुर में था; वहां अब्दुस्समद खां ने उसे बताया कि जवाहर सिंह बच निकला है। अब्दाली ने बल्लभगढ़ के घेरे का संचालन ख़ुद करते हुए कत्लेआम किया परन्तु राजकुमार जवाहर सिंह वहाँ से चकमा देकर निकल चुका था। क्रोध से तिलमिलाए अब्दाली ने नजीबुद्दौला और जहान खां को बीस हज़ार सैनिकों के साथ जाट-राज्य में अलग भेजकर यह हुक़्म दिया:

" उस अभागे जाट के राज्य में घुस जाओ; उसके हर शहर और हर जिले को लूटकर उजाड़ दो। मथुरा नगर हिंदुओं का तीर्थ है। मैंने सुना है कि सूरजमल वहीं है। इस पूरे शहर को तलवार के घाट उतार दो। जहां तक बस चले, उसके राज्य में और आगरा तक कुछ मत रहने दो; कोई चीज खड़ी नहीं रह पाए ।"( के. आर. कानूनगो , 'हिस्ट्री ऑफ द जाट्स',पृ.99)

अब्दाली के आदेशों को क्रियान्वित करने में नजीब और जहान खां ने अति उत्साह दिखाया परंतु मथुरा पहुंचने से पहले उन्हें इस नगर से आठ मील दूर उत्तर की ओर चौमुहां में दस हज़ार लड़ाकू जाटों का सामना करना पड़ा। प्रसिद्ध इतिहासकार सर जदुनाथ सरकार ने इसका वृतांत इन शब्दों में प्रस्तुत किया है:

"यह सत्य है कि दिल्ली- आगरा प्रदेश और यमुना के परले किनारे के दोआब को तीन बरस तक बुरी तरह चूसते रहने के बाद मराठे भाग गए थे। इन पवित्रतम वैष्णव तीर्थों की रक्षा में एक भी मराठे का खून नहीं बहा। परंतु जाट किसानों ने दृढ़ निश्चय किया था कि विनाशकारी लुटेरा उनकी लाशों के ऊपर से गुजर कर ही ब्रज की पवित्र राजधानी तक पहुंच सकेगा।" (जदुनाथ सरकार, फॉल ऑफ द मुगल एम्पायर, खंड 2 पृ.82 )

महान प्रामाणिक लेखक नीरद सी .चौधरी ने चौमुहां की लड़ाई पर प्रकाश डालते हुए लिखा है : "सन 1757 में अफगानिस्तान के शाह अहमदशाह अब्दाली ने मथुरा पर चढ़ाई की और आदेश दिया--- 'मथुरा नगर हिंदुओं का पवित्र स्थान है। इसे तलवार के घाट उतार दिया जाए। आगरा तक एक भी इमारत खड़ी न रहने पाए।"

अफगानों की शक्ति को भली -भांति जानते हुए भी ब्रजभूमि के किसान, राजकुमार जवाहर सिंह (सूरजमल का पुत्र) के नेतृत्व में रास्ते में अड़ गए। मथुरा से आठ मील दूर चौमुहां में दस हज़ार जाट नौ घंटे तक लड़े जब तक कि वे पराजित न कर दिए गए। ( नीरद सी. चौधरी, 'द कॉन्टिटेंट ऑफ सर्स् पृ.101 )

राजपुताना व अन्य राज्यों के राजा अपनी रियासतों में ही बैठे रहे, तुनुक मिज़ाजी और निठल्लेपन में डूबे हुए; रखैलों और सनकी लोगों से घिरे; दिन में मदिरा में मदमस्त और रात्रि में श्रान्त- क्लान्त। 1 मार्च 1757 को मथुरा की जो लाज लुटनी शुरू हुई, उससे दूसरी रियासतों के शासकों को कोई वास्ता ही नहीं था। पुजारियों से भरे नगर की नींद तोपों की गर्जन की आवाज से खुली। दो दिन पूर्व संपन्न होली के उत्सव पर मथुरा में हिंदुस्तान के सभी भागों से तीर्थयात्री आए हुए थे। वे सब नजीब और जहान खां की तोपों के शिकार हो गए। एक विभत्स रक्त-रंजित होली खेली गई। यह था अफगानी आक्रांताओं की पाशविकता तथा उग्रता का एक नमूना।

अफगानी लुटेरों ने 6 मार्च को अपना रुख वृंदावन की ओर किया और वहां भी कत्लेआम मचाया। उसके बाद अब्दाली की सेनाएं आगरा की ओर बढ़ी। अब्दाली ने पहले आगरा में लूटमार करके सुरजमल के किलों-- भरतपुर ,डीग या कुम्हेर-- को जीतने की योजना बना ली थी। वह सूरजमल से बड़ी राशि भेंट के रूप में ऐंठने का ख़्वाब देख रहा था। 21 मार्च को जहान खां ने 15 हज़ार घुड़सवारों के साथ आगरा पर धावा बोल दिया और निर्दयता से लूट मार की। इसी दौरान हैजे की महामारी की चपेट में आने से अब्दाली के सैकड़ों सैनिक मौत के मुँह में समाने लगे। सूरजमल को पत्र भेजकर अब्दाली ने धमकी दी कि यदि वह कर ( नज़र ) देने में आनाकानी करता रहा तो इसके परिणाम भयंकर होंगे। उसने पत्र में संकेत किया था कि भरतपुर, डीग और कुम्हेर के किलों को भूमिसात कर दिया जाएगा। सूरजमल ने दृढ़ता के साथ चतुराई का,अप्रतिम साहस के साथ खिझाने वाली स्पष्टवादिता का, अभिमान के साथ विनय का मिश्रण दर्शाते हुए बड़ी धीरता से भरा पत्र अब्दाली को भेजा, जिससे अब्दाली को यह बात समझ में आ गई कि सूरजमल अकर्मण्य राजा नहीं है। मार्च 1757 में सूरजमल द्वारा लिखे पत्रों का उल्लेख दिल्ली के तत्कालीन वज़ीर इमाद ने अपनी पुस्तक 'तजि्करा-ए-इमादुल्मुल्क' में किया है। इतिहास की अमूल्य धरोहर इस पत्र में राजमर्मज्ञ सूरजमल ने यह लिखा था:

" ...यह अचरज़ की बात है कि इतने बड़े दिलवाले हुज़ूर ने इस छोटी-सी बात पर विचार नहीं किया और इतनी सारी भीड़ और इतने बड़े लाव-लश्कर के साथ इस साधारण तुच्छ-से अभियान पर स्वयं आने का कष्ट उठाया। जहाँ तक मुझे और मेरे प्रदेश को कत्ल करने और बरबाद कर देने की धमकी-भरे आदेश का प्रश्न है, वीरों को इस बात पर कोई भय नहीं हुआ करता। सभी को मालूम है कि कोई भी समझदार व्यक्ति इस क्षण-भंगुर जीवन पर तनिक भी भरोसा नहीं करता। जहाँ तक मेरी बात है, मैं जीवन की पचास सीढियां पहले ही पार कर चुका हूँ और अभी कितनी और पार करनी बाकी हैं, यह मुझे कुछ पता नहीं। मेरे लिए इससे बढ़कर कोई वरदान नहीं हो सकता कि मैं शहादत/बलिदान के अमृत की घूंट का पान करूँ--यह देर-सवेर बहादुर सैनिकों को युद्ध के मैदान में करना ही पड़ेगा--और यादगार के रूप में युग के इतिहास के पृष्ठों पर मेरा और मेरे पूर्वजों का नाम रह जायेगा कि एक साधारण किसान ने एक इतने बड़े शक्तिशाली सम्राट से, जिसने बड़े -बड़े राजाओं को जीतकर अपना दास बना लिया था, उससे बराबरी से लड़ा और लड़ते- लड़ते वीर-गति को प्राप्त हुआ। ऐसा ही शुभ संकल्प मेरे निष्ठावान अनुयायियों और साथियों के हृदय में विद्यमान है...

मेरे इन तीन किलों (भरतपुर ,डीग और कुम्हेर ) के बारे में, जिन पर हुज़ूर का रोष है और जिन्हें हुज़ूर के सरदारों ने मकड़ी के जाले- सा कमजोर बतलाया है, सच्चाई की परख असली लड़ाई के बाद ही हो पाएगी। भगवान ने चाहा तो वे सिकंदर के गढ़ जैसे हीअजेय ही रहेंगे ।" प्रोफेसर गंडासिंह ने अहमदशाह अब्दाली की सूरजमल हुई समझौता- वार्ता की चर्चा का संक्षिप्त विवरण इन शब्दों में प्रस्तुत किया है:

" धन से भरपूर राजकोष, सुदृढ़ दुर्गों, बहुत बड़ी सेना और प्रचुर मात्रा में युद्ध- सामग्री के कारण सूरजमल ने अपना स्थान नहीं छोड़ा और वह युद्ध की तैयारी करता रहा। उसने अहमदशाह अब्दाली के दूतों से कहा, 'अभी तक आप लोग भारत को नहीं जीत पाए हैं... अगर आपमें सचमुच कुछ दम है, तो मुझ पर चढ़ाई करने में इतनी देर किसलिए?"

अब्दाली जितना समझौते की कोशिश करता गया, उतना ही सूरजमल का अभिमान और धृष्टता बढ़ती गई। उसने कहा," मैंने इन किलों पर बड़ी धनराशि खर्च की है। यदि अहमद शाह अब्दाली मुझसे लड़े तो यह उसकी मुझ पर कृपा होगी, क्योंकि तब दुनिया भविष्य में यह याद रख सकेंगे कि एक बादशाह बाहर से आया था और उसने दिल्ली जीत ली थी, पर वह एक मामूली से जमींदार के मुकाबले में आकर लाचार हो गया।"

सूरजमल के अभेद्य किलों की भनक मिलने पर अब्दाली वापस कंधार लौट गया। इस प्रकार अब्दाली का संग्राम सैनिक दृष्टि से असफल रहा। सूरजमल ने बाजी जीत ली थी। उसके किलों को हाथ तक नहीं लगाया गया। दोआब में उसे नगण्य से राज्य-क्षेत्र की हानि हुई। चौमुंहा में सूरजमल के पुत्र जवाहर सिंह ने जो वीरता दिखाई, उससे यह साबित हो गया कि हिंदुस्तान में केवल भरतपुर के जाट ही ऐसे लोग हैं, जो अपने धर्म-स्थानों की रक्षा के लिए प्राण न्योछावर करने को उद्यत रहते हैं।

जनवरी 1760 के प्रथम सप्ताह में अहमदशाह अब्दाली दिल्ली फिर पहुंच गया और सम्राट- विहीन तथा वजीर- विहीन राजधानी का मालिक बन बैठा। 14 जनवरी को उसने सूरजमल तथा राजपूताना के अन्य राजाओं को पत्र भेजकर राज-कर देने और उसके सामने पेश होने का फ़रमान भिजवाया। सूरजमल की टालमटोल की चालों से विचलित हो उठे अब्दाली ने फरवरी के शुरू में डीग पर घेरा भी डाला परंतु सूरजमल की कूटनीतिक चाल के कारण घेरा उठाकर उसने अपना ध्यान मराठों की ओर फेर लिया।

6. सूरजमल और पानीपत की तीसरी लड़ाई - पानीपत की तीसरी लड़ाई 14 जनवरी 1761 को मराठों और अहमदशाह अब्दाली के बीच हुई। सदाशिव भाऊ इस लड़ाई के मैदान में बिना किसी गैर- मराठा हिंदू राजा या जागीरदार की सहायता के उतर गया। पेशवा ने राजपूताना के प्रत्येक प्रमुख शासक के पास दूत भेजे परंतु सभी राजपूत राजाओं ने टालमटोल के उत्तर दिए और यह तय किया कि "वे तटस्थ रहकर दोनों पक्षों का खेल तब तक देखते रहें ,जब तक की किसी बड़ी लड़ाई में यह सिद्ध न हो जाए कि दोनों शक्तियों में से कौन- सी निश्चित रूप से अधिक प्रबल है।"(जदुनाथ सरकार, 'फॉल ऑफ द मुगल एंपायर', खंड 2, पृष्ठ 171) राजपूत राजा पानीपत की इस लड़ाई में बिल्कुल तटस्थ रहे। अतीत का भावुकतापूर्ण स्मरण ही उनका प्रधान मनोरंजन रहा।

सूरजमल की धार्मिक सहिष्णुता की अनुपम मिसाल:- महाराजा सूरजमल के व्यक्तित्व में गुरुत्व था। वह शासन चलाने में अपनी सहायता के लिए अच्छे और योग्य व्यक्तियों का चयन करता था। वह अपने विलक्षण राजनीतिक सलाहकार व दक्ष मंत्री पंडित रुपाराम कटारिया और सुयोग्य खज़ाना/वित्त मंत्री मोहनराम बरसनियां पर पूरा भरोसा करता था। रुपाराम कटारिया बरसाना का बुद्धिमान, सुसंस्कृत तथा निष्ठावान कटारा ब्राह्मण था।

महाराजा सूरजमल उतना धर्मनिरपेक्ष था जितना उस काल में हो पाना संभव था। उसने मस्जिदे नहीं तोड़ी और बिना भेदभाव के मुसलमानों को ऊंचे पदों पर नियुक्त किया। वह विवादों का फैसला बातचीत और समझौते के जरिए करना पसंद करता था न कि इस बात से कि ' किसकी तलवार ज्यादा लंबी है।'

महाराजा सूरजमल का हर निर्णय दूरदर्शितापूर्ण एवं मेलजोल की भारतीय संस्कृति के अनुरूप होता था। वह भाऊ से मिलने मराठा- शिविर में गया और आगरा से मथुरा तक वे दोनों साथ ही आए। वहां भाऊ की दृष्टि नबी मस्जिद पर पड़ी और झल्लाहट में उसने सूरजमल को ताना दिया-- "आप हिंदू होने का दम भरते हैं, फिर आपने इस मस्जिद को इतनी देर खड़ा क्यों रहने दिया?" किसी छिछले मूढ़ व्यक्ति के सिवाय और कौन ऐसी नासमझी का प्रश्न कर सकता है? भाऊ भूल गया था कि कुछ समय पूर्व जब अब्दाली के धर्मांध सैनिकों ने मथुरा पर आक्रमण किया था तब उसकी रक्षा करने के लिए हजारों जाटों ने अपने प्राणों की आहुति दी थी। उस समय तो उस मराठा सरदार भाऊ ने कुछ नहीं किया था। सूरजमल व्यावहारिक और परिपक्व राजमर्मज्ञ था, उसने नपे-तुले शब्दों में शिष्टाचारपूर्वक अर्थगर्भित उत्तर दिया: " बहुत समय से हिंदुस्तान की राजलक्ष्मी वेश्या की भांति बहुत चंचल रही है। आज रात वह किसी की बाहों में है, तो कल किसी और के आलिंगन में बंधी होती है। यदि मुझे यह पक्का भरोसा होता कि मैं जीवन भर इन प्रदेशों का स्वामी बना रहूंगा, तो मैंने इस मस्जिद को कभी का मिट्टी में मिला दिया होता। पर यदि मैं आज इस मस्जिद को ढहा दूँ और कल मुसलमान आकर बड़े-बड़े मंदिरों को तोड़े और एक ही जगह चार मस्जिदें बना दें, तो उसका क्या लाभ? अब आप हुजूर इस ओर आए हैं, तो यह मामला आपके ही हाथों में है।" भाऊ ने डींग हांकते हुए कहा --"इन अफ़ग़ानों को हराने के बाद मैं सब जगह मस्जिदों के खंडहरों पर एक- एक मंदिर बनवा दूंगा।"

अब्दाली के भयंकर आक्रमण के बाद जिनके पास माया और मान कुछ खोने के लिए था, वे भाग कर भरतपुर आ गए। उस समय भरतपुर पीड़ित हिंदू और मुसलमान, हर जाति वाले के लिए शरणस्थली बन गया। सूरजमल ने किसी भी शरणार्थी को उसने घर की ड्योढ़ी से वापस नहीं मोड़ा। यहां तक कि उसने अपने सबसे बड़े शत्रु इमाद- उल -मुल्क गाजीउद्दीन, जो कि मुग़ल सम्राट का वज़ीर था, को भी शरण दी, जब वह सम्राट आलमगीर द्वितीय और इन्तिज़ाम की नृशंसतापूर्वक हत्या करवाने के बाद अपने कुछ आश्रितों और घुड़सवारों के साथ भागकर सूरजमल के पास चला आया। इस प्रकार उसने महान मुग़लों का वजीर होने का अपना गौरव जाटों को अर्पित कर दिया।

उदारमना: पानीपत की तीसरी लड़ाई में उदार हृदय सूरजमल ने सैनिक तथा आर्थिक साधन भाऊ की सेवा में प्रस्तुत कर दिए थे, परंतु उन्हें ग्रहण करने की बजाय उसने उनके प्रति तिरस्कार प्रकट किया। उसने सूरजमल की बुद्धिमतापूर्ण सलाह को अनसुना किया और अपने उजड़ बरताव द्वारा उसे अत्यधिक रुष्ट कर दिया। अयोग्य एवं सामरिक कला से अनभिज्ञ सेनानायक भाऊ और उसकी सेना की पानीपत की तीसरी लड़ाई (14 जनवरी 1761) में शर्मनाक शिकस्त हो गई। मराठों के एक लाख सैनिकों में से आधे से ज्यादा मारे गए। यह पूरी पराजय थी और युद्ध से बचे हुए मराठा सैनिक बिना वस्त्र, बिना वस्त्र और बिना भोजन सूरजमल के राज्य- क्षेत्र में पहुंचे। सूरजमल और रानी किशोरी ने उन्हें शरण दी व उन्हें आतिथ्य प्रदान किया। घायलों की तब तक देखभाल की गई जब तक कि वे आगे यात्रा करने योग्य हो गए। उल्लेखनीय है कि एक और तो घायल और पीड़ित मराठों को सूरजमल हर संभव मदद कर रहा था, दूसरी ओर आमेर के माधोसिंह और मारवाड़ के विजयसिंह आदि राजा थे, जो विदेशी आक्रांता अब्दाली की विजय का स्वागत कर रहे थे।

सर जदुनाथ सरकार के अनुसार मराठा शरणार्थियों की संख्या 50 हज़ार थी ,जबकि वैन्देल ने यह संख्या एक लाख लिखी है। शरणार्थियों के साथ सूरजमल के बर्ताव के बारे में इतिहासज्ञ ग्रांट डफ ने यह लिखा है---"जो भी भगोड़े उसके राज्य में आए ,उनके साथ सूरजमल ने अत्यंत दयालुता का बरताव किया और मराठे उस अवसर पर किए गए व्यवहार को आज भी कृतज्ञता तथा आदर के साथ याद करते हैं।" (ग्रांट डफ़,'ए हिस्ट्री ऑफ द मराठाज'पृ. 30 )

वैन्देल कहता है---" जाटों के मन में मराठों के प्रति इतनी दया थी कि यदि सूरजमल चाहता, तो एक भी मराठा लौटकर दक्षिण नहीं जा सकता था। लोग शायद कहें कि भाग्य को इस जाट पर असाधारण कृपा करने में आनंद आता था।"

सदाशिवराव अगर महाराजा सूरजमल से छोटी सी बात पर तकरार न करके उसे भी पानीपत की तीसरी लड़ाई में साझेदार बनाता, तो आज भारत की तस्वीर कुछ और ही होती।

7. आगरा पर अधिकार: पानीपत की तीसरी लड़ाई में हुए महाविनाश ने हिंदुस्तान की लगभग प्रत्येक महत्वपूर्ण शक्ति को नष्ट कर डाला था। सूरजमल इसका एक मात्र अपवाद था। अब्दाली के सामने उसने न तो सिर झुकाया, न ही घुटने टेके। दोआब इलाक़े में अपना दबदबा क़ायम करने की नीयत से महाराजा सूरजमल आगरा-किले पर कब्ज़ा करना चाहता था। 3 मई 1761 को सूरजमल की विशाल सेना ( चार हज़ार जाट सैनिक) आगरा की ओर बढ़ी। लक्ष्य था आगरा का लाल किला। यह सचमुच ही शानदार इमारत है। एक महीने के घेरे के बाद 12 जून 1761 को आगरे का लाल किला जाटों के कब्ज़े में आ गया तथा यह सन 1744 तक भरतपुर-शासकों के अधिकार में रहा। इससे सूरजमल को नई शक्ति और प्रभुत्व प्राप्त हो गया तथा वह अब यमुना के इलाक़े का शासक हो गया।

जाटों के लिए आगरा पर अधिकार भावुकता भरा क्षण था। लगभग 90 वर्ष पहले इस किले के फाटक से कुछ ही दूर गोकला की बोटी- बोटी काट कर फेंकी गई थी। अब उसका बदला ले लिया गया था। सूरजमल का स्वप्न था कि ब्रज तथा यमुना प्रदेश के जाटों को पंजाब के जाटों से मिलाकर एक कर दिया जाए। इस स्वप्न को साकार करने के लिए सूरजमल ने हरियाणा और दोआब की ओर जाने वाली सेनाओं की कमान क्रमशः जवाहर सिंह और नाहरसिंह को सौंपी। जवाहरसिंह के अधिकार में रिवाड़ी, झज्जर और रोहतक एक के बाद एक आते गए। फर्रुखनगर में मसावी खां बलोच से कड़ा मुकाबला हुआ। आखिकार 12 दिसम्बर 1763 के असपास फर्रुखनगर पर भी जाटों ने कब्जा कर लिया। फर्रुखनगर में मसावी खां की हार और उसके बाद उसे भरतपुर में कैद किए जाने का मामला पराकाष्ठा पर पहुंच गया। अब नजीब के सामने सूरजमल को चुनौती देने के सिवाय कोई विकल्प नहीं बचा था। सूरजमल की विजय-यात्रा के अंतिम दौर में उसकी सुविचारित सावधानी और अभ्यास द्वारा अर्जित लचीलापन ग़ायब हो गया।

8. वीर-गति: वीर की सेज़ समर भूमि होती है। जब आगरा से लेकर दिल्ली के नजदीक तक सूरजमल की तूती बोलने लगी तो वह दुस्साहसी और महत्वाकांक्षी हो गया। उस समय शक्तिहीन मुगल सम्राट का सरंक्षक उसका शक्तिशाली रुहेला वजीर नजीबुद्दौला था, जिसे अहमदशाह अब्दाली का भी समर्थन प्राप्त था। सूरजमल ने कुछ घुड़सवारों के साथ शत्रु सेना के क्षेत्र में घुसने का दुस्साहसपूर्ण कदम उठाया। 25 दिसंबर 1763 को क्रिसमस के दिन शाहदरा में हिंडन नदी (यमुना की एक सहायक नदी ) के किनारे मुग़ल सेना के नवाब नजीबुद्दौला की सैन्य टुकड़ी के साथ मुठभेड़ में महाराजा सूरजमल 56 वर्ष की आयु में वीर-गति को प्राप्त हुआ। एक विवरण के अनुसार सूरजमल अपने कुछ घुड़सवारों के साथ युद्ध-स्थल का निरीक्षण कर रहा था कि अचानक शत्रु सेना से घिर गया। एक अन्य वृत्तान्त के अनुसार सूरजमल को थोड़े से आदमियों के साथ खड़ा देखकर सैयद मुहम्मद खां बलोच, जिसे लोग 'सैयदु' नाम से अधिक जानते थे, व उसके सैनिक सूरजमल पर टूट पड़े। शव का क्या हुआ, किसी को निश्चित जानकारी नहीं। जवाहरसिंह ने कृष्ण की पवित्रभूमि गोवर्धन में अपने पिता की प्रतीकात्मक अंत्येष्टि की। इसके लिए रानी ने सूरजमल के दो दांत ढूंढ निकाले थे। अंतिम संस्कार की रस्म पूरी करने के बाद जवाहरसिंह राजगद्दी पर बैठा।

9.मूल्यांकन - "जाट जाति की आंख और ज्योति महाराजा सूरजमल अपने काम को अधूरा छोड़कर जीवन के रंगमंच से लुप्त हो गया। वह एक महान व्यक्तित्व और एक लोकोत्तर प्रतिभाशाली पुरुष था, जिसे 18 वीं शताब्दी के प्रत्येक इतिहासकार ने श्रद्धांजलि अर्पित की है।"( के .आर .कानूनगो, 'हिस्ट्री ऑफ द जाट्स', पृष्ठ 153)

मुगलों व अफगानों के आक्रमण का प्रतिकार करने में उत्तर भारत मे जिन राजाओं की प्रमुख भूमिका रही है, उनमें भरतपुर के महाराजा सूरजमल का नाम बड़ी श्रद्धा एवं गौरव से लिया जाता है। ब्रज के जाट राजाओं में सूरजमल सबसे प्रसिद्ध शासक ,कुशल सेनानी, साहसी योद्धा, कुशल प्रशासक, दूरदर्शी व कूटनीतिज्ञ था। उसने जाटों में सबसे पहले राजा की पदवी धारण की थी। सूरजमल और उसके पिता बदन सिंह शुरू में सिनसिनी और थून के मामूली जमींदार थे। महाराजा सूरजमल की उपलब्धि थी कि उसने आपस में लड़ने वाले जाट- गुटों में मेल-मिलाप करवाया। उसने जाटों के रक्त एवं धन का न्यूनतम नुकसान करके विस्तृत भू भाग पर जाट- राज्य खड़ा किया। उसका राज्य विस्तृत था, जिसमें डीग, भरतपुर के अतिरिक्त मथुरा, मेरठ, आगरा, धौलपुर, मेवात, हाथरस, अलीगढ़, ऐटा, मैनपुरी,गुड़गांव, रोहतक, रेवाड़ी,बल्लभगढ़, झज्जर, फर्रुखनगर जिले थे। एक ओर यमुना से गंगा तक और दूसरी तरफ चंबल तक का सारा प्रदेश उसके राज्य में सम्मलित था। जिस दौर में अन्य राजा तो मुग़लों से अपनी बहन-बेटियों के विवाह करके रियासतें व जागीरें बचा रहे थे, उस दौर में महाराजा सूरजमल अकेला मुग़लों से लोहा ले रहा था।

18 वीं शताब्दी के इतिहासकारों तथा वृत्तांत लेखकों ने महाराजा सूरजमल की विशिष्ट योग्यता, प्रतिभा तथा चरित्र की दृढ़ता को स्वीकार किया है। सैयद गुलाम नक़वी ने अपने ग्रंथ इमाद-उस-सादात में लिखा है : "नीतिज्ञता में और राजस्व तथा दीवानी मामलों में प्रबंध की निपुणता तथा योग्यता में हिंदुस्तान के उच्च पदस्थ लोगों में से आसफ़ज़ाह बहादुर, निजाम के सिवा कोई भी उसकी बराबरी नहीं कर सकता था। उसमें अपनी जाति के सभी श्रेष्ठ गुण-- ऊर्जा, साहस, चतुराई, निष्ठा और कभी पराजय स्वीकार नहीं करने वाली अदम्य भावना सबसे बढ़कर विद्यमान थे। परंतु किसी भी उत्तेजनापूर्ण खेल में, चाहे वह युद्ध हो या राजनय, वह कपटी मुगलों और चालाक मराठों को समान रुप से मात देता था। संक्षेप में कहें तो वह एक ऐसा होशियार पंछी था जो हर एक जाल में से दाना तो चुग लेता था पर उसमें फंसता नहीं था।"

महाराजा सूरजमल 18 वीं शताब्दी के हिंदुस्तान में व्याप्त उन पतनकारी दुर्गुणों से पूर्णतय मुक्त था जिन्होंने बड़े -बड़े राजपूत घरानों को बर्बाद कर दिया, स्वास्थ्य और बल को नष्ट कर दिया और बुद्धि को क्षीण कर दिया। राजनीतिक कौशल, संगठन ,प्रतिभा और नेतृत्व के गुणों की दृष्टि से सिर्फ शिवाजी और महाराजा रणजीत सिंह ही सूरजमल से बढ़कर थे।

संदर्भ:

1. कानूनगो, के.आर ;हिस्ट्री ऑफ द जाट्स; कलकत्ता, 1925

2.पांडे, राम ; भरतपुर अप टू 1826 ;जयपुर, 1970

3. जाटों का नवीन इतिहास खंड 1; उपेंद्रनाथ शर्मा; जयपुर, 1977

4. जाट इतिहास ;ठाकुर देशराज; आगरा ,1934

5. कुंवर नटवरसिंह ;महाराजा सूरजमल; दिल्ली ,2006

6. जाटलैंड विकी

महाराज सूरजमल: ठाकुर देशराज

ठाकुर देशराज [1] ने लिखा है ... महाराजा सूरजमल - उनकी आंखों से तेज टपकता था। राजनीतिक योग्यता, सूक्ष्म दृष्टि तथा निश्चल बुद्धिमता उनमें एक बड़े अंश में विद्यमान थी। इमादुस्सादत ने उनके संबंध में लिखा है "यद्यपि वह कृषक जैसा पहनावा पहनता और अपनी ब्रज भाषा ही बोलता था परंतु वास्तव में वह जाट जाति का प्लेटो था। चतुराई, बुद्धिमता और लगान तथा अन्य माल के महकमे के कार्यों की जानकारी में आशिफजाह निजाम के सिवा भारत के प्रसिद्ध पुरुषों में और कोई उस की बराबरी नहीं कर सकता था। जोश, साहस, चतुराई और अटूट दृढ़ता तथा अजय और न दबने वाला स्वभाव आदि सभी अपनी जाति के अच्छे-अच्छे गुण सूरजमल में पाए जाते थे।"

उन्हें मुगल मराठा और राजपूत सभी से लड़ना पड़ा था। सभी युद्धों में वे विजई हुए। एक मुसलमान यात्री ने उनके संबंध में कहा था, सूरजमल वास्तव में हिंदुस्तान का आखिरी सम्राट है। इसमें कोई संदेह भी नहीं। उनके पास उस समय के तमाम शासकों से बड़ा राज्य था। जिस समय उनका स्वर्गवास हुआ था उस समय उनके राज्य की लंबाई 200 मील और चौड़ाई 150 मील थी। आगरा, इटावा, मैनपुरी, एटा, अलीगढ़,


[पृ.170]: हाथरस, फरूखनगर, रोहतक, रेवाड़ी, गुड़गांव, मथुरा और अलवर उनके राज्य के मातहत और अंतर्गत थे। फादर वेंडिल ने उनके राज्य वैभव के बारे में इस प्रकार लिखा है:- "खजाने और माल के विषय में जो कि सूरजमल ने अपने वारिस के लिए छोड़ा है भिन्न-भिन्न मत हैं कुछ इसे 9 करोड़ और दूसरे कुछ कम बताते हैं। मैंने इसका पता लगाया है। उसका (महाराज सूरजमल का) खर्च 65 लाख से अधिक और 60 लाख से कम न था। और उसके राज्य की आमदनी 1 करोड़ 75 लाख से कम नहीं थी। उसकी सेना में 5000 घोड़े, 60 हाथी, 15000 सवर, 25000 से अधिक पैदल, 300 से अधिक तौपें, और काफी बारूद खाना तथा युद्ध की सामग्री थी।" 1763 में उनका देहांत हो गया।

जाट इतिहास:ठाकुर देशराज

ठाकुर देशराज लिखते हैं कि महाराज सूरजमल एक लम्बे-तगड़े और सुदृढ़ शरीर के योद्धा थे। उनके चेहरे को देखने से ऐसा मालूम होता था, मानो अग्नि निकल रही है। वे नेक मिजाज और सादे चाल-चलन के व्यक्ति थे। उसमें राजनैतिक योग्यता, सूक्ष्म-दृष्टि तथा निश्चल बुद्धिमत्ता एक बड़े अंश में विद्यमान थी। ‘इमादुस्सादत’ का लेखक लिखता है कि-

“यद्यपि वह (सूरजमल) एक कृषक जैसा पहनावा पहनता था और कमवल अपनी ब्रज भाषा ही बोल सकता था, परन्तु वास्तव में वह जाट-जाति का प्लेटो था। चतुराई, बुद्धिमत्ता और लगान तथा अन्य माल के महकमे में आसिफजाह बहादुर निजाम के सिवाय भारत के प्रसिद्ध पुरुषों में और कोई उसकी समानता नहीं कर सकता था। जोश, साहस, चतुराई, अटूट दृढ़ता तथा अजय और न दबने वाला स्वभाव आदि अपनी जाति के अच्छे-अच्छे गुण सूरजमल में एक विशेष अंश में पाये जाते थे।”


महाराजा सूरजमल का चालबाज मराठे और धोखेबाज मुगल दोनों से ही पाला पड़ा था, किन्तु उन्होंने दोनों ही को असफल बना दिया था। अपनी शक्ति और राज का विस्तार दोनों ही के जाल के होते हुए भी बढ़ा लिए थे। सबसे पहले सन् 1732 ई. में महाराज सूरजमल जी ने भरतपुर को रात के समय खेमकरन सोगरिया पर चढ़ाई करके विजय किया। तब से भरतपुर की राज्यश्री की उत्तरोत्तर वृद्धि होने लगी। इन्होंने राजा जयसिंह जयपुर नरेश से मित्रता पैदा कर ली। वह भी इनको पुत्रवत् प्यार करते थे। जब सवाई जयसिंह के बाद ईश्वरीसिंह और माधौसिंह में झगड़ा हुआ तो सूरजमलजी ने उनके बड़े


1. मथुरा मेमायर्स


जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठान्त-640


ईश्वरीसिंह जी को सहायता दी और माधौसिंह के हिमायतियों को जिनमें मल्हार होल्कर, गंगाधर तांतियां और मेवाड़, मारवाड़ और कोटा, बूंदी के राजा शामिल थे, एक साथ ही परास्त किया। इस युद्ध में पचास शत्रुओं को स्वयं महाराज सूरजमल ने अपने हाथ से काट डाला और एकसौ आठ को घायल किया था।1 यह घटना सन् 1749 की है। बूंदी के कवि सूदन ने इस समय की महाराज की वीरता का इस भांति वर्णन किया है-

“सह्यो भले ही जट्टिनी, जाए अरिष्ट अरिष्ट।

जाठर तस रवि मल्ल हुव, आमेरन को इष्ट।।

बहुरि जट्ट मलहार सन्, लरर लग्यो हर बल्ल।

आंगर है हुलकर, जाट मिहिर, मल्ल प्रति मल्ल।।’’


अर्थात्-जाटिनी ने व्यर्थ ही प्रसूति की पीड़ा नही सही। उसके गर्भ से शत्रु का संहारक और आमेर के राजा का हितैषी सूरजमल उत्पन्न हुआ। फिर जाट सेना के आगे के भाग में मल्हारराव से युद्ध करने लगा (क्योंकि पीछे का भाग उसने जीत लिया) होलकर (रात्रि की) छाया और जाट सूर्य था। दोनों वीर अच्छी तरह युद्ध में भिड़े।

इस युद्ध के पश्चात् महाराज सूरजमल की कीर्ति सारे भारत में फैल गई, क्योंकि उन्होंने शिशोदियों, राठौरों, चौहानों और मराठों को एक ही साथ हरा दिया था। यह बात राजस्थान क्या भारत के इतिहास में एकदम विचित्र और अपूर्व थी।

सन् 1748 ई. में पलवल के स्थान पर महाराज सूरजमलजी ने सआदत अलीखां को और 1752 ई. में घासहरे के ठाकुर रावबहादुरसिंह बड़गूजर को परास्त किया। मेवों को तो अपने पिता के आगे ही परास्त कर चुके थे। सआदत-अलीखां ने महाराज की इन दो शर्तो को मान लिया था कि उसके अधीन मनुष्यों में से कोई न तो पीपल का पेड़ काटेगा, न हिन्दू-मन्दिरों का अपमान करेगा

महाराज सूरजमल ने वैवाहिक-सम्बन्धों द्वारा भी अपना राज्य विस्तृत किया। उन्होंने अपनी शादी होडल के मुखिया चौ. काशीरामजी, जो एक समृद्धिशाली जाट सरदार था, की सुपुत्री रानी किशोरी से की थी। इसी भांति अपने पुत्र नवलसिंह की शादी कोटमणि के शक्तिशाली सरदार सीताराम की लड़की से की थी।

आपने वल्लभगढ़ के राजाओं की मुगलों से सहायता की । उन्होंने 1831 ई. में अहमद बंगश की राजधानी फर्रुखाबाद को भी लूट लिया। 1752-53 ई. में


1. हिस्ट्री आफ जाट्स, कालिकारंजन कानूनगो कृत


जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठान्त-641


इन्हें मराठों के साथ दुबारा युद्ध करना पड़ा। गाजीउद्दीन इमादुलमुल्क ने अहमदशाह के पुराने मन्त्री सफदरजंग को महाराजा सूरजमल के खिलाफ लड़ने के लिए निमन्त्रित किया। सन् 1753 ई. में रघुनाथ राव पेशवा, होल्कर, इमाद की अध्यक्षता में मराठा और कुछ राजपूत राजाओं ने मिलकर हमला कर दिया। जनवरी सन् 1754 में इनकी सेनाओं ने कुम्हेर को घेर लिया। तीन महीने तक लगातार युद्ध होता रहा। इसी बीच महाराजा सूरजमल ने देहली के बादशाह और ग्वालियर के सिन्धिया से मित्रता कर ली, इसलिए मराठों को कुम्भेर का घेरा उठा लेना पड़ा। 1


सन् 1757 ई. में अहमदशाह अब्दाली ने अपने तमाम साथियों को यह आज्ञा दी कि भरतपुर के समस्त शहरों को नष्ट कर डालो और जो जितने जाटों के सिर को इकट्ठा करेगा, उसे उसका पंचगुना रुपया इनाम में दिया जाएगा। सबसे पहले बल्लभगढ़ पर धावा हुआ। यहां उस समय जवाहरसिंह अपने थोड़े से साथियों के साथ ठहरे हुए थे। दिन भर लड़ने के पश्चात् रात के समय उन्होंने भरतपुर की ओर कूंच कर दिया। 28 फरवरी सन् 1757 को दुर्रानी की सेना ने मथुरा पर आक्रमण किया। यहां महाराज सूरजमल की तरफ से 5000 सैनिक थे। अचानक घिर जाने पर भी उन्होंने बड़ी बहादुरी के साथ पठानों का सामना किया और तीन हजार जाट धर्म की रक्षा करते हुए शहीद हो गए।

मथुरा को तबाह करने के बाद अब्दाली आगरे की तरफ बढ़ा, क्योंकि उसने सुना था कि उधर की तरफ बड़े-बड़े मालदार जाट हैं। किन्तु इसी बीच उसकी फौज में बीमारी फैल गई और उसके 150 सैनिक प्रतिदिन मरने लगे। वह महाराज से सिर्फ अपने खर्चे के लिए पहले एक करोड़ और फिर दस लाख रुपया मांगता रहा, किन्तु महाराज ने उसे कानी कौड़ी भी न दी। वह जाट-राज्य को धूल में मिला देने के इरादे से आया था, किन्तु अपना-सा मुंह लेकर उसे लौट जाना पड़ा।2


अब्दाली के आक्रमणों के समय भयंकर परिस्थितियों में महाराज सूरजमल के लिए बड़ा कठिन था कि वह मराठा और अब्दाली में से किस के साथ मैत्री स्थापित करें । एक और देश को मराठे तबाह कर रहे थे और दूसरी और अब्दाली। अब्दाली यदि विधर्मी था तो मराठे चंचल मनोवृत्ति वाले और अविश्वासी थे।


1. घेरा उठाने का मुख्य कारण मल्हार राव के पुत्र खांडेराव की मृत्यु और महाराज सूरजमल की राजनीतिक चतुरता थी - सम्पादक
2. अब्दाली के लौटने के कारण थे - भरतपुर की सेना की छापामार लड़ाई , महाराज सूरजमल का खरा जवाब, उसके सैनिकों में बैठा जाटों की तलवार का भय और आने वाले गर्मी के मौसम का डर - संपादक


जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठान्त-642


लेकिन आदर्श इसी में था जो कि स्वयं महाराज सूरजमल ने पसन्द किया था कि वह स्वदेश हित के लिए मराठों में मिल गए। देहली के मंत्रित्व पद के लिए उस समय गाजीउद्दीन और नजीबुद्दौला दोनों ही दांत गड़ाए हुए थे। गाजीउद्दीन के पक्ष में रघुनाथराव जो मराठों का उस समय सबसे बड़ा सरदार था झुका हुआ था। उसने पंजाब से लौट करके देहली को जीत लिया और गाजीउद्दीन को वजीर बना दिया था। नजीबुद्दौला होल्कर की शरण में पहुंचा। लेकिन महाराज सूरजमल देहली का मंत्रि-पद शुजाउद्दौला को दिलाने के पक्ष में थे। वह चाहते थे कि नजीबुद्दौला को खतम कर दिया जाए क्योंकि वह धोखेबाज है और गाजीउद्दौला का इसलिए हटा दिया जाय कि उसका कोई प्रभाव नहीं है। इस तरह महाराज सूरजमल उस भावी भय को मिटा देना चाहते थे, जिसकी आशंका अब्दाली के आक्रमण के समय से ही हुई थी। दत्ताजी सिंधिया और रघुनाथराव महाराज सूरजमल के विचार का समर्थन करते थे, किन्तु मल्हारराव होल्कर ने इमाद क्रे प्रति अपने मोह के कारण इस समय भंयकर भूल की।

होल्कर की इस भूल का परिणाम दो ही वर्ष आगे चलकर के स्पष्ट हो गया। कुछ समय पहले रघुनाथराव ने पंजाब से अब्दाली के लड़के और हाकिमों को खदेड़ दिया था। इसलिए एक तो स्वयं उसकी इच्छा थी कि मराठों से वह बदला ले, दूसरे नजीबुद्दौला और देहली के बादशाह ने उसे भारत आने के लिए निमन्त्रण भी भेजा। अब्दाली के इस भंयकर आक्रमण से सारे उत्तरी-भारत में आतंक छा गया। जिनके पास धन और मान कुछ खोने के लिए था, वे जाट रियासत भरतपुर में भाग आये जो कि हिन्दू व मुसलमान प्रत्येक पीड़ित व्यक्ति और जाति के लिए शरणस्थल बन गया था। मराठा सरदारों ने भी अपनी स्त्री और बाल-बच्चों को महाराजा सूरजमल की रक्षा में भेज दिया। यहां तक कि हिन्दुस्तान के उस वजीर गाजीउद्दीन ने भी, जो कि महाराज का परम शत्रु था, अपने स्त्री-बच्चों को उन्हीं की शरण भेजना उचित समझा। महाराजा सूरजमल की इच्छा थी कि सिंधिया सरदार की वह किसी आपत्ति के समय में सहायता करे। क्योंकि वह सिंधिया के उस अहसान से उऋण होना चाहते थे, जो कि उसने कुम्हेर पर चढ़ाई के समय किया था।

अब्दाली और दत्ताजी में देहली के समीप बादली नामक स्थान पर घोर युद्ध हुआ। मराठे दिल तोड़कर लड़े। किन्तु विजय अब्दाली की हुई। वजीर गाजीउद्दीन भय के मारे देहली छोड़कर भाग गया। भाग्य ने उसका साथ जब कहीं न दिया तो लाचार होकर उसे भी भरतपुर की शरण लेनी पड़ी, जिसे कि वह कुछ दिन पहले नष्ट कर देने के लिए आतुर था। महाराज ने उसके पूर्व कुटिल व्यवहार को भुलाकर उसे शरण दी और यथोचित स्वागत-सत्कार के साथ रहने की व्यवस्था कर दी।


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अब्दाली से हारने के बाद घायल और पीड़ित मराठों का भरतपुर में पूरी तरह से उपचार किया गया। अब्दाली महाराज सूरजमल के इस व्यवहार से चिढ़ गया कि उन्होंने उसके शत्रुओं को आश्रय दिया है इसलिए उसने दण्ड-स्वरूप महाराज से एक करोड़ रुपया मांगा । लेकिन महाराज शत्रु को इतनी बड़ी रकम देकर और अधिक बलवान बनाने के पक्ष में न थे, अतः उन्होंने उस धन को शत्रु से युद्ध करने में व्यय करना उचित समझा।

एक ओर तो महाराज सूरजमल थे कि अपने कट्टर शत्रु मराठों को इसलिए मदद दे रहे थे कि वे स्वदेशवासी और स्वधर्मी हैं। दूसरी ओर आमेर के माधौसिंह और मारवाड़ के विजयसिंह आदि राजपूत राजा थे, जो विदेशी और विधर्मी अब्दाली की विजय का स्वागत कर रहे थे।

2 फरवरी सन् 1760 को अहमदशाह अब्दाली ने महाराज सूरजमल के विरुद्ध भरतपुर की ओर प्रस्थान किया और तारीख 7 फरवरी को उसने डीग को घेर लिया। इस समय महाराज सूरजमल ने एक चाल चली। मराठा सेना की एक टुकड़ी उन्होंने रेवाड़ी की ओर, दूसरी बहादुरगढ़ की ओर भेज दी और जाट-सेना का तीसरा दल अलीगढ़ की तरफ भेज दिया। 17 मार्च को जाट-सेना ने अलीगढ़ को लूट लिया और वहां के किले को नष्ट कर दिया। अब्दाली को डीग का घेरा उठा लेना पड़ा। उसने मेवात में मराठों का पीछा किया। होल्कर भी इस समय महाराज सूरजमल का मित्र बन गया था। सिकन्दरा नामक स्थान पर अब्दाली ने जनरल साहबपसन्दखां से पराजित होने पर उसने भी भरतपुर में शरण ले रखी थी।

सन् 1760 ई. के पूरे साल, महाराज सूरजमल को केवल शस्त्रों से ही लड़ाइयां नहीं लड़नी पड़ीं, बल्कि राजनैतिक चालों से भी अब्दाली का सामना करना पड़ा।

आखिर सन् 1761 ई. में उस युद्ध के आसार प्रकट होने लगे जो भारतवर्ष के इतिहास में पानीपत के दूसरे युद्ध के नाम से पुकारा जाता है। पेशवा बालाजी बाजीराव ने अपने भाई सदाशिव और लड़के विश्वासराव को एक बड़ी सेना देकर भारतवर्ष के भाग्य के अन्तिम निपटारे के लिए रवाना किया। पेशवा ने राजपूताने के समस्त राजाओं के पास हिन्दू-धर्म की रक्षा के नाते युद्ध में सम्मिलित होने का निमन्त्रण दिया। किन्तु किसी भी राजपूत राजा ने पेशवा के इस आह्वान को स्वीकार नहीं किया। चम्बल के किनारे पहुंचकर जब भाऊ ने महाराजा सूरजमल को, एक लंबा पत्र लिखकर, धर्म के नाम पर सहायता करने के लिए भेजा, तब महाराजा ने एक सच्चे हिन्दू की भांति मराठों के निमन्त्रण को स्वीकार किया और वह 20,000 जाट सैनिकों के साथ मराठों के कैम्प में पहुंच गए।


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मराठा कमाण्डर-इन-चीफ ने आगरे में एक सभा की और उसमें युद्ध-विषयक परामर्श किया गया। उस समय महाराज ने मराठों को बड़ी उत्तम राय दीं और कहा कि हमें लड़ाई किसी छोटे-मोटे सरदार से नहीं लड़नी है । यह युद्ध तमाम मुसलमानों से है और बड़ा भंयकर युद्ध है। इसलिए इसके पूर्व स्त्रियों को किसी सुरक्षित दुर्ग में भेज देना चाहिए। हमारे साथ पैदल सेना, तोपें अत्यधिक हैं और मैदान में हैं। रसद तक का यथोचित प्रबन्ध नहीं है। इसलिए मेरी समझ से अगर कोई दूसरा स्थान न हो सके, तो मेरे यहां किले में पैदल सेना के साथ स्त्रियों,बालबच्चों और सामान को रखना चाहिए। नहीं तो शत्रु सेना कभी भी नष्ट करने में सफल हो सकती है।1 यद्यपि होल्कर वगैरह ने इस बात का समर्थन किया, परन्तु भाऊ ने इसे उचित सलाह न बताकर ऊट-पटांग बातें कीं, जिससे महाराज सूरजमल ने दूसरी बार भी विवेचनापूर्ण एक-एक पहलू को समझाने की कोशिश की, परन्तु सब बेकार हुई। ठीक कहते हैं ‘विनाशकाले विपरीत बुद्धिः’। अर्थात् नाश होने का वक्त आ जाने पर बुद्धि विपरीत हो जाती है।

एक दूसरी बात सूरजमल के रुष्ट होने की यह और हुई कि भाऊ ने लालकिला देहली के आमखास की चांदी की छत को उनकी इच्छा के विरुद्ध तुड़वा दिया। महाराज उस छत के एवज में पांच लाख रुपया देने को तैयार थे। पर लालची भाऊ को कहीं उससे भी अधिक का माल उसमें दिखाई दे रहा था। वह अपने हठी और लालची स्वभाव होने के कारण महाराज सूरजमल से बिगाड़ बैठा। छत तुड़वा देने पर भी उसे जब 3 लाख रुपये का ही माल मिला तो महाराज सूरजमल ने फिर कहा कि

“आप इस छत को फिर बनवा दीजिए जिससे देहली की प्रजा और आपके प्रति सरदारों का बढ़ा हुआ असन्तोष दूर हो जाए। सहयोगियों की सलाह से राज्य-कार्य कीजिए जिससे शासन के प्रति प्रेम उत्पन्न हो और मैं अब भी कहता हूं कि स्त्रियों को मेरे यहां के किले में भेज दीजिए। क्योंकि भरतपुर के आस-पास में जमींदार खुशहाल हैं इसलिए वहां रसद भी इकट्ठी हो जाएगी। आपको रसद और सैनिकों से मैं पूरी सहायता देता रहूंगा।”

महाराज सूरजमल ने यह बात मार्मिक शब्दों में कही थी, परन्तु भाऊ के पत्थर-हृदय पर कुछ भी असर न हुआ। महाराज ने देख लिया कि इस समय इसके सिर पर दुर्भाग्य सवार है और वह बिना कुछ कहे अपने शिविर को लौट आया।

भाऊ इतने ही से सन्तुष्ट नहीं हुआ, किन्तु उसने निश्चय किया कि सूरजमल


1. महाराज ने एक परामर्श यह भी दिया था कि लम्बी मार की तोपों को मैदान में न ले जाया जाये और अब्दाली का सामना मैदान में जमकर नहीं, छापामार लड़ाई से किया जाय - संपादक

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के डेरों को लूट लिया जाय और उसे गिरफ्तार कर लिया जाय। किन्तु महाराज सूरजमल को होल्कर के द्वारा सूचित किए जाने पर षड्यंत्र का पता लग गया और वह उसी रात अपने लश्करे समेत भरतपुर की ओर रवाना हो गये। भाऊ के सैनिकों ने सुरक्षित उनका पीछा किया, लेकिन वह बल्लभगढ़ के किले में पहुंच चुके थे।

पानीपत के मैदान में वही हुआ, जिसकी कि आशंका की जा रही थी। मराठों को बुरी तरह से परास्त होना पड़ा, क्योंकि इस्लाम के नाम पर मुसलमान सब संगठित हो चुके थे। शुजाउद्दौला भी उनकी सेना में मिल गया था। इस लड़ाई में मराठों को भारी हानि उठानी पड़ी। उनके बड़े योद्धा इस युद्ध में मारे गए। शेष जो बचे वे बड़ी बुरी दशा में पड़ते-गिरते भरतपुर पहुंचे। महाराज सूरजमल ने मराठों की पुरानी बातों को भूल करके उनकी बड़ी आवभगत की। ब्राह्मण सैनिकों को दूध और पेड़ा खिलाया जाता था। घायल सैनिकों की सेवा-सुश्रूषा और इलाज किया गया। महारानी किशोरी ने स्वयं उनकी आवभगत में बड़ी दिलचस्पी ली। उस समय महाराज ने प्रजा में मुनादी करवा दी थी कि जो कोई दुखी सैनिक जिसके यहां पहुंचे उसकी यथोचित सहायता की जाये। इस आवभगत में महाराज का दस लाख रुपया खर्च हुआ। बाजीराव पेशवा की मुसलमान स्त्री से जंग बहादुर नाम का एक लड़का था। महाराज ने उसके उपचार का पूरा प्रबन्ध किया, किन्तु वह बच न सका । उस समय महाराज के यहां बड़े-बड़े सरदारों ने आश्रय लिया था। सदाशिव भाऊ की स्त्री पार्वती बाई भी दुर्दिनों के फेर से वहां पहुंच गई थी। महाराज ने उन सबका उचित सम्मान योग्य प्रबन्ध किया और पार्वती बाई और सरदारों को एक-एक लाख रुपया देकर अपनी अधिरक्षता में दक्षिण की ओर भिजवा दिया। अन्य सभी महाराष्ट्रीय ब्राह्मणों को महारानी किशोरी ने पांच-पांच रुपया और वस्त्र वगैरह देकर विदा किया।


नाना फड़नवीस ने महाराजा सूरजमल के इस सद्व्यवहार के सम्बन्ध में इस प्रकार लिखा था -

“अब हम ग्वालियर में होल्कर के साथ ठहरे हुए हैं। भरतपुर में हमें सूरजमल ने आराम देने में कोई कसर नहीं रखी। हम 15-20 दिन तक वहां रहे, उन्होंने हमारा बड़ा आदर सम्मान किया और हाथ जोड़कर कहा-मैं तुम्हारे ही घर का हूं, मैं तुम्हारा एक सेवक हूं तथा ऐसे ही शिष्टाचार के अन्य शब्द भी कहे। उन्होंने हमें ग्वालियर तक बड़ी हिफाजत के साथ पहुंचा दिया है। अफसोस है कि उस जैसे बहुत थोड़े मनुष्य होते हैं।”

पेशवा यह पत्र पढकर सूरजमल के लिए बड़ा प्रसन्न हुआ।

जब पानीपत की लड़ाई के पश्चात् अब्दाली देहली आया तो वह मराठों को शरण देने के कारण सूरजमल पर चढ़ाई करने की सोचने लगा। नागरमल


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नाम के व्यक्ति को सूरजमल के पास इसलिए भेजा कि यदि सूरजमल कुछ भेंट दे दे तो लड़ाई स्थगित कर दी जाए। महाराज खूब जानते थे कि पठान अभी जल्दी कोई नई लड़ाई नहीं लड़ सकते हैं। इसलिए मार्च सन् 1761 ई. तक सन्धि के भुलावे में ही अब्दाली को डाले रहे और इसी बीच में आगरे पर अधिकार जमा लिया। शहर और किले की लूट से उन्हें 5,00000 रुपये मिले। ऐसे मौके पर एक लाख रुपया शाह को दे दिया। 21 मई सन् 1761 ई. को अब्दाली अपने देश के लिए प्रस्थान कर गया। अब महाराज सूरजमल को अपने राज्य को बढ़ाने का पूरा अवसर मिल गया।

महाराज ने हरयाणे के प्रदेश पर जहां कि जाटों की अधिक आबादी थी और अनेक छोटे-छोटे मुसलमान जागीरदार राज्य कर रहे थे, को विजय करने के लिए जवाहरसिंह की अध्यक्षता में सेना भेजी। छोटे लड़के नाहरसिंह की अध्यक्षता में द्वाबा में अधिकार स्थापित करने और पूर्वी रुहेला सरदारों की चाल का निरीक्षण करने के लिए दूसरी सेना भेजी। जवाहरसिंह ने फर्रुखनगर पर जो कि एक बिलोची सरदार मुसाबीखां के अधिकार में था, चढ़ाई की। यह किला बड़ा मजबूत था, इसलिए महाराज स्वयं तोपखाना लेकर जवाहरसिंह की सहायता को पहुंचे। दो महीने के घेरे के पश्चात् मुसाबीखां ने किले को खाली कर दिया। उसे कैद करके भरतपुर भेज दिया गया। फर्रुखनगर जाट-राज्य में मिला लिया गया। रेवाड़ी, गढ़ी-हरसरू और रोहतक तो पहले ही जाटों के अधिकार में आ चुके थे और वे नवलसिंह तक उनके अधिकार में रहे थे। कहा जाता है कि गढ़ी हरसरू की चढ़ाई में सूरजमल का हाथी जो कि किले के बड़े फाटक को तोड़ने के लिए जुटाया गया था, थककर बिना फाटक तोड़े लौट आया। तब सरदार सीता राम ने जो कि जाट (Ajaz) था, यह देखा तो कुल्हाड़ी लेकर बाहर आया और बड़ी वीरतापूर्वक फाटक को काट डाला। इसके बाद सूरजमल ने दूसरे सरदार बहादुरखां के किले पर चढ़ाई कर दी। इसी समय जाट सेना का एक दूसरा भाग नाहरसिंह और बलरामसिंह तथा अन्य प्रसिद्ध सेनानायकों की अध्यक्षता में मुगल सरकार के अफसरों के हाथ से अनेक स्थानों को जीतते हुए जल्दी से जल्दी नजीबुद्दौला से भिडने के लिए तैयार हो रहा था । लेकिन नजीबुद्दौला इस मौके को टालना चाहता था और सूरजमल इस मौके से लाभ उठाना चाहते थे। इससे पहले सूरजमल के अधिकार में इतना प्रदेश आ गया था कि पूर्व में उनके राज्य की सीमा रुहेला राज्य तक पहुंच गई थी। कोल, जलसेर, एटा के जिले उन्ही के राज्य में थे। जमुना के इस किनारे पर देहली के फाटकों से लेकर चम्बल तक उनके सिवाय और किसी का राज्य नहीं था और गंगा की ओर भी करीब-करीब यही हालत थी। आगरे का किला ले लेने के पश्चात् उन्हें दक्षिण में अपने राज्य का फैलाने के लिए


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बहुत कुछ नहीं करना था। उनका ध्यान देहली के पश्चिम की ओर लगा हुआ था। इसलिए उन्होंने नजीबुद्दौला के सामने दिल्ली के आसपास के जिलों की गर्वनरी देने का प्रस्ताव रखा। पहले तो नजीबुद्दौला संधि की चर्चा चलाता रहा। लेकिन आखिर जब उसने समझ लिया कि सूरजमल से बिना लड़ाई लड़े अथवा गर्वनरी दिए तीसरी युक्ति से काम नहीं चल सकता तो दस-बारह हजार घुड़सवार और पैदलों की सेना लेकर 24 दिसम्बर सन् 1763 ई. को सूरजमल से लड़ने के लिए जमुना पर कदम रखा। हिंडन नदी के किनारे दानों सेनाओं ने आमने-सामने डेरे लगा दिए। पहले दिन की लड़ाई में जाट ही विजयी रहे। जब कि घमासान युद्ध मच रहा था, महाराज सूरजमल केवल 30 घुड़सवारों के साथ मुगल और बिलोचियों की सेना में पिल पड़े और वीरगति को प्राप्त हुए1 जाट सेना इतनी सुव्यवस्थित थी कि सूरजमल की मृत्यु के समाचार चारों ओर फैल जाने पर भी एक भी योद्धा विचलित न हुआ। वे इस भांति लड़ते रहे मानो कुछ भी नहीं हुआ है। जाट-सेना ने विजेताओं की भांति युद्ध-क्षेत्र को छोड़ा। महाराज सूरजमल की लाश शत्रुओं के हाथ न पड़ी। उनकी मृत्यु का विश्वास भी तब तक दुश्मनों को नहीं हुआ, जब तक कि जाट हिंडन को छोड़कर भरतपुर की तरफ न चल दिए।

फादर वेण्डिल ने महाराजा सूरजमल के स्वर्गवास का 25 दिसम्बर रविवार सन् 1663 ई. माना है। उनका मत इसलिए भी सही माना जा सकता है कि उन्होंने भरतपुर का इतिहास इस घटना के 5 वर्ष बाद ही लिखा था।

महाराजा सूरजमल वास्तव में अपने समय के योद्धाओं में भीम, नीतिज्ञों मे कृष्ण और अर्थशास्त्रियों में कौटिल्य थे। एक मुसलमान यात्री ने तो उन्हें भारत का अन्तिम हिन्दू-सम्राट लिखा है। यथार्थ में, वह नवीन युग के प्रवर्तक थे, राष्ट्रीय चेतना के जनक और देश को नयी दिशा देने के लिए प्रतिबद्ध थे।

हिंदुस्तान में जाट सत्ता

महाराजा सूरजमल ने जयपुर के महाराजा जयसिंह से भी दोस्ती बना ली थी । 21 सितम्बर 1743 को जयसिंह की मौत हो गई और उसके तुरन्त बाद उसके बेटों ईश्वरी सिंह और माधो सिंह में गद्दी के लिये झगड़ा हुआ । महाराजा सूरजमल बड़े बेटे ईश्वरी सिंह के पक्ष में थे जबकि उदयपुर के महाराणा जगत सिंह माधो सिंह के पक्ष में थे । बाद में जहाजपुर में दोनों भाईयों में युद्ध हुआ और मार्च 1747 में ईश्वरी सिंह सिंह की जीत हुई । एक साल बाद मई 1748 में पेशवाओं ने ईश्वरी सिंह पर दबाव डाला कि वो माधो सिंह को चार परगना सौंप दे । फिर मराठे, सिसोदिया, राठौड़ वगैरा सात राजाओं की फौजें माधोसिंह के साथ हो गई और ईश्वरीसिंह अकेला पड़ गया । महाराजा सूरजमल दस हजार सैनिकों के साथ ईश्वरी सिंह की मदद के लिये जयपुर पहुंचे और अगस्त 1748 में सातों फौजों को हरा दिया । इसी के साथ सूरजमल की तूती सारे भारत में बोलने लगी थी ।

महाराजा सूरज मल ने जयपुर नरेश से मित्रता पैदा करली थी. वह भी इनको पुत्रवत प्यार करते थे. सवाई जयसिंह के बाद इश्वरीसिंह और माधोसिंह में झगडा हुआ तो सूरजमल ने उनके बड़े बेटे इश्वरीसिंह का साथ दिया और माधोसिंह के हिमायतियों को जिनमें मल्हार होलकर, गंगाधर ताँतिया, और मेवाड़, मारवाड़, कोटा बूंदी के राजा सामिल थे, एक साथ ही परास्त किया. इस युद्ध में पचास शत्रुओं को स्वयं महाराजा सूरजमल ने अपने हाथ से काट डाला और एक सौ साठ को घायल किया था. यह घटना सन 1749 की है. बूंदी के कवि सूरजमल ने इस समय की महाराजा सूरजमल की वीरता का वर्णन इस भाँती किया है[2]-

"सह्यो भले ही जट्टिनी, जाए अरिष्ट अरिष्ट ।
जाठर तस रवि मल्ल हव, आमरण को इष्ट ।।
बहुरि जट्ट मल्हार सन', लरर लग्यो हर बल्ल ।
आंगर है हुलकर, जाट मिहिर, मल्ल प्रति मल्ल" ।। [3]

अर्थ- जाटनी ने व्यर्थ ही प्रसूति पीड़ा नहीं सही. उसके गर्भ से शत्रु का संहारक और आमेर राजा का हितैषी सूरजमल पैदा हुआ. फ़िर जाट सेना के आगे भाग में मल्हार राव से युद्ध करने लगा. होलकर रात्रि की छाया और जाट सूर्य था. दोनों वीर अच्छी तरह युद्ध में भिडे. इस युद्ध के पश्चात महाराजा सूरजमल की कीर्ति सारे भारत में फ़ैल गयी, क्योंकि उन्होंने शिशोदियों, राठोरों, चोहानों और मराठों को एक ही साथ हरा दिया था. यह बात राजस्थान क्या भारत के इतिहास में एक अपूर्व मिशाल थी.[4]

मई 1753 में महाराजा सूरजमल ने दिल्ली और फिरोजशाह कोटला पर कब्जा कर लिया । दिल्ली के नवाब गाजी-उद-दीन ने फिर मराठों को सूरजमल के खिलाफ भड़काया और फिर मराठों ने जनवरी 1754 से मई 1754 तक भरतपुर जिले में सूरजमल के कुम्हेर किले को घेरे रखा । मराठे किले पर कब्जा नहीं पर पाए और उस लड़ाई में मल्हार राव का बेटा खांडे राव होल्कर मारा गया । मराठों ने सूरजमल की जान लेने की ठान ली थी पर महारानी किशोरी ने सिंधियाओं की मदद से मराठाओं और सूरजमल में संधि करवा दी ।

वेंदेल के अनुसार जर्जर मुगल-सत्ता की इसी कालावधि में जाट-शक्ति उत्तरी भारत में प्रबल शक्ति के रूप में उभरकर सामने आई । सवाई जयसिंह की मृत्यु के बाद सन् 1748 के उत्तराधिकार युद्ध में मराठों और राजपूतों सहित सात राजाओं की शक्ति के विरुद्ध कमजोर परन्तु सही पक्ष को विजयश्री दिलाकर सूरजमल ने जाट-शक्ति की श्रेष्ठता सिद्ध की । उसी समय मुगलों का कोई भी अभियान ऐसा नहीं था जिसमें जाट-शक्ति को सहयोग के लिए आमंत्रित न किया गया हो । वजीर सफदरजंग तो पूर्णरूप से अपने मित्र सूरजमल की शक्ति पर अवलम्बित था । अपदस्थ वजीर सफदरजंग के शत्रु मीरबख्शी गाजीउद्दीन खां के नेतृत्व में मराठा-मुगल-राजपूतों की सम्मिलित शक्ति सन् 1754 में सूरजमल के छोटे किले कुम्हेर तक को भी नहीं जीत पाई । सन् 1757 में नजीबुद्दौला द्वारा आमंत्रित अब्दाली भी अपने अमानवीय नरसंहार से सूरजमल की शक्ति को ध्वस्त नहीं कर सका । देशद्रोही नजीब ने उस समय वजीर गाजीउद्दीन खां और मराठों के कोप से बचने के लिए अब्दाली को हिन्दुस्तान पर आक्रमण करने के लिए सन् 1759 में पुनः आमंत्रित किया था । पानीपत के अंतिम युद्ध से पूर्व बरारी घाट के युद्ध में मराठों की प्रथम पराजय के बाद सूरजमल के कट्टर शत्रु वजीर गाजीउद्दीनखां ने भी भागकर जाटों के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया था । वेंदेल के अनुसार 'मुगल अहंकार की इतनी कठोर और इतनी सटीक पराजय इससे पहले कभी नहीं हुई थी' । वस्तुतः मुगल सत्ता का गर्वीला और भयावह दैत्य धराशायी हो चुका था जिसके अवशेषों पर महाराजा सूरजमल के नेतृत्व में विलास और आडंबर से दूर, कर्मण्य, शौर्यपरायण, निर्बल की सहायक, शरणागत की रक्षक, प्रजावत्सल, हिन्दू-मुस्लिम एकता की प्रतीक, राष्ट्रवादी जाट-सत्ता की स्थापना हुई । [5]


बाद में 1760 में सदाशिव राव भाऊ और सूरजमल में कुछ बातों पर आनाकानी हुई थी । मथुरा की नबी मस्जिद को देखकर भाऊ ने गुस्से में कहा - सूरजमल जी, मथुरा इतने दिन से आपके कब्जे में है, फिर इस मस्जिद को आपने कैसे छोड़ दिया ? सूरजमल ने जवाब दिया - अगर मुझे यकीन होता कि मैं सारी उम्र इस इलाके का बादशाह रहूंगा तो शायद मैं इस मस्जिद को गिरवा देता, पर क्या फायदा ? कल मुसलमान आकर हमारे मंदिरों को गिरवायें और वहीं पर मस्जिदें बनवा दें तो आपको अच्छा लगेगा? बाद में फिर भाऊ ने लाल किले के दीवाने-खास की छत को गिरवाने का हुक्म दिया था, यह सोच कर कि इस सोने को बेचकर अपने सैनिकों की तनख्वाह दे दूंगा । इस पर भी सूरजमल ने उसे मना किया, यहां तक कहा कि मेरे से पांच लाख रुपये ले लो, पर इसे मत तोड़ो, आखिर नादिरशाह ने भी इस छत को बख्श दिया था । पर भाऊ नहीं माना - जब छत का सोना तोड़ा गया तो वह मुश्किल से तीन लाख रुपये का निकला । सूरजमल की कई बातों को भाऊ ने नहीं माना और यह भी कहा बताते हैं - मैं इतनी दूर दक्षिण से आपकी ताकत के भरोसे पर यहां नहीं आया हूं ।

14 जनवरी 1761 में पानीपत की तीसरी लड़ाई मराठों और अहमदशाह अब्दाली के बीच हुई । मराठों के एक लाख सैनिकों में से आधे से ज्यादा मारे गए । मराठों के पास न तो पूरा राशन था और न ही इस इलाके का उन्हें भेद था, कई-कई दिन के भूखे सैनिक क्या युद्ध करते ? अगर सदाशिव राव महाराजा सूरजमल से छोटी-सी बात पर तकरार न करके उसे भी इस जंग में साझीदार बनाता, तो आज भारत की तस्वीर और ही होती । पर उसने यह बेवकूफी की और उस जंग में अपनी जान भी गंवा बैठा । महाराजा सूरजमल ने फिर भी दोस्ती का हक अदा किया । तीस-चालीस हजार मराठे जंग के बाद जब वापस जाने लगे तो सूरजमल के इलाके में पहुंचते-पहुंचते उनका बुरा हाल हो गया था । जख्मी हालत में, भूखे-प्यासे वे सब मरने के कगार पर थे और ऊपर से भयंकर सर्दी में भी मरे, आधों के पास तो ऊनी कपड़े भी नहीं थे । दस दिन तक सूरजमल नें उन्हें भरतपुर में रक्खा, उनकी दवा-दारू करवाई और भोजन और कपड़े का इंतजाम किया । महारानी किशोरी ने भी जनता से अपील करके अनाज आदि इक्ट्ठा किया । सुना है कि कोई बीस लाख रुपये उनकी सेवा-पानी में खर्च हुए । जाते हुए हर आदमी को एक रुपया, एक सेर अनाज और कुछ कपड़े आदि भी दिये ताकि रास्ते का खर्च निकाल सकें । कुछ मराठे सैनिक लड़ाई से पहले अपने परिवार को भी लाए थे और उन्हें हरयाणा के गांवों में छोड़ गए थे । उनकी मौत के बात उनकी विधवाएं वापस नहीं गईं । बाद में वे परिवार हरयाणा की संस्कृति में रम गए । महाराष्ट्र में 'डांगे' भी जाटवंश के ही बताये जाते हैं और हरयाणा में 'दांगी' भी उन्हीं की शाखा है ।

मराठों के पतन के बाद महाराजा सूरजमल ने गाजियाबाद, रोहतक, झज्जर के इलाके भी जीते । 1763 में फरुखनगर पर भी कब्जा किया । वीरों की सेज युद्धभूमि ही है । 25 दिसंबर 1763 को नवाब नजीबुदौला के साथ युद्ध में महाराज सूरजमल वीरगति को प्राप्त हुए ।

सूरज सुजान से कवितायें

ईश्वरी सिंह का पत्र

देषि देस को चाल ईसरी सिंह भुवाल नैं ।

पत्र लिख्यौ तिहिकाल बदनसिंह ब्रजपाल कौ ।।

करी काज जैसी करी गुरुडध्वज महाराज ।

पत्र पुष्प के लेते ही थे आज्यौ ब्रजराज ।।

आयौ पत्र उताल सौं ताहि बांचि ब्रजयेस ।

सुत सरज सौं तब कहौ थामि ढुढाहर देस ।।

जाट सेना का जयपुर अभियान

ईश्वरी सिंह की सहायता के लिए मुगल, मराठा एवं राजपूत सेना और से युद्ध करने हेतू जाट सेना का जयपुर अभियान का वर्णन

संग चढे सिनसिनवार हैं, बहु जंग के जितवार हैं

खंड खंड ने खुंटैल हैं, कबहु न भय मन में लहैं

चढि चाहि चाहर जोर दै, दल देसवार दरेरेदै

असवार होत अवारिया, जिन कितै वैर वादारिया

डर डारि डागुरि धाइयो, बहु भैनवार सु आइयौ

गुनवंत गूदर चट्ठियौ, सर सेल सांगन मट्ठियौ

सजियौ प्रचन्ड सुभोंगरे, जितवार जंगन के खरे

खिनवार गोधे बंक हैं, जिन किए राजा रंक हैं

सिरदार सोगरवार हैं, रन भुमि मांझ पहांर हैं

सिरदार सोरहते सजे, रन काज ते रन लै गज

सजि नौहवार निसंक हैं, रुतवार रावत बंक हैं

मुहिनाम याद इतेक हैं, बहु जाट जाति कितेक हैं

सबहि चढे भट आगरे, सबहि प्रताप उजागरे

सूरजमल पर कवितायें

कविता (1) महाराजा सूरजमल जाट By Ram Lal Jani

13 फरवरी 1707 बदन सिंह घर जन्म पाया।

सन 1733 सूरजमल ने गढ भरतपुर बसाया।।

वीरता धीरता चातुर्य से सबको लोहा मनवाया ।

अजय योद्धा का परचम विश्व भर में लहराया।।

वो जाट वीर था सदा सर्वधर्म हितकारी ।

हिन्दू मुस्लिम सब प्रजा थी उनको प्यारी ।।

25 वर्ष की उम्र में सोघर जीत आया।

अजेय दुर्ग लोहागढ़ का निर्माण करवाया।।

अब आ गई बागडोर सूरजमल के हाथ।

भरतपुर का हर वासी हो गया सनाथ।।

घनघोर संकट भी डिगा नहीं पाए वीर को ।

सूझबूझ से बदल दिया राज्य की तकदीर को ।।

सन 1748 का ऐतिहासिक था बागडू रण ।।

काम लिया सूरजमल ने बुद्धि चातुर्य क्षण-क्षण।

बागड़ू का वह युद्ध बेमेल था सामने थी सेना भारी।

लेकिन बुद्धि का खेल था,सू रजमल ने बाजी मारी ।।

एक तरफ थे बड़े-बड़े मराठा राजपूत योद्धा।

दूसरी तरफ सूरजमल अकेले ने सब को रौंदा।।

सूरजमल के रण कौशल से हारी बाजी पलट गई।

जाट शेरों से डर के मारे शत्रु सेना पीछे हट गई ।।

ईश्वर सिंह को मिली राजगद्दी और सूरजमल को नाम ।

जाट सेना ने दुश्मन का कर दिया काम तमाम।।

सन 1750 मीर बख्शी को चारों ओर से घेरा ।

दुश्मन के आजू-बाजू में था सूरजमल का डेरा।।

मीर बख्शी मांग रहा था संधि की भीख ।

सब कह रहे थे सूरजमल से ले तू सीख ।।

रुहेलो के विरुद्ध जाटों ने वीरता दिखलाई।

सूरजमल ने बल्लभगढ़ की समस्या सुलझाई ।।

मुगल बादशाह की सेना बड़ी लाचार थी।

वीर सूरजमल की सेना तेजस्वी और खूंखार थी।।

मुगल मराठा संयुक्त सेना आ धमकी थी ।

लेकिन वीर सूरजमल की बुद्धि फिर चमकी थी।।

बुद्धि चातुर्य का उपयोग भरपूर किया ।

दुश्मन को संधि करने को मजबूर किया ।।

मुगल मराठा विशाल सेना काम ना आई।

जाटों ने बुद्धि बल से उन को धूल चटाई।।

भोगी अहमदशाह अब्दाली का जी ललचाया।

उसने आकर दिल्ली में आतंक मचाया ।।

जाट राज्य को लूटने का ख्याल आया।

उसने सूरजमल को कर देने का संदेश भिजवाया ।।

जवाहर सिंह ने अफगान टुकड़ी को हराया ।

अब अब्दाली ने लूटपाट का हुक्म फरमाया ।।

मथुरा में चहुंओर तोपों का धुआं छाया।

अब्दाली सूरजमल के किलों को जीत नहीं पाया ।।

न भेद न कोई जीत का मौका आया ।

उसने हार कर कंधार का मार्ग अपनाया।।

पानीपत की तीसरी लड़ाई 1761 में थी छाई ।

राजपूत देख रहे थे तटस्थ चुपचाप लड़ाई ।।

उनकी विलासिता और दूरदर्शिता आड़े आई ।

वीर सूरजमल ने फिर तलवार चमकाई।।

जाटों की बहादुरी थी दुनिया में छाई ।

शत्रु सेना जाटों की बहादुरी से घबराई ।।

सूरजमल वीर था बड़ा बुद्धिमानी ।

उसने सदा प्रजा की रक्षा की ठानी ।।

सभी धर्म पंथ थे उसके लिए समान।।

नहीं उसने किया किसी का अपमान।।

हर कोई सूरजमल की शरण आया ।

किसी को चौखट से वापस नहीं लौटाया।।

61 में जाटों ने फिर आगरा को जय किया।

वीर गोकुला की शहीदी का बदला लिया ।।

उस जाट वीर सूरजमल ने हर युद्ध जीता था ।

उसके बिना खुद इतिहास का खजाना रीता था ।।

सन 1763 में वह वीर स्वर्ग सिधारा था।

हर इतिहासकार ने उसको पुकारा था ।।

उसका इतिहास विश्व पटल पर छाया था ।

हर कोई उसकी गाथा लिखने को ललचाया था ।।

किसी ने लिखी कविताएं किसी ने गीत।

हजारों संदेश देती है उसकी एक एक जीत ।।

उनकी वीरता कभी शब्दों में सिमट नहीं पाएगी ।

मैंने एक कविता लिखी दुनिया लिखी लिखती जाएगी।।

वीर सूरजमल हिंदुस्तान का आखिरी सम्राट था।

वह शूरवीर बुद्धिमान तेजस्वी जाट था।।

रचनाकार =- रामलाल जाणी Pabubera,barmer mo.8003041770

कविता (2) By Balveer Ghintala Tejabhakt

बच रही थी जागीरें जब, बहु बेटियों के डोलों से,
तब एक सूरज निकला, ब्रज भौम के शोलों से,
दिन नही मालूम मगर, थी फरवरी सत्रह सो सात,
जब पराक्रमी बदन के घर, पैदा हुआ बाहुबली जाट,
था विध्वंश था प्रलय, वो था जिता जागता प्रचंड तूफां,
तुर्कों के बनाये साम्राज्य का, मिटा दिया नामो निशां,
खेमकरण की गढी पर, बना कर लोहागढ ऊंचा नाम किया,
सुजान नहर लाके उसने, कृषकों को जीवनदान दिया,
बात है सन् 1748 की, जब मचा बगरू में हाहाकार,
7 रजपूती सेनाओ का, अकेला सूरज कर गया नरसंहार,
इस युद्ध ने इतिहास को, उत्तर भारत का नव यौद्धा दिया,
मुगल मराठों का कलेजा, अकेले सूरज ने हिला दिया,
मराठा मुगल रजपूतो ने, मिलकर एक मौर्चा बनाया,
मगर छोटी गढी कुम्हेर तक को, यह मौर्चा जीत न पाया,
घमंड में भाऊ कह गया, नहीं चाहिए जाटों की ताकत,
मराठों की दुर्दशा बता रहा, तृतीय समर ये पानीपत,
अब्दाली के सेना ने जब, मराठों की औकात बताई,
रानी किशोरी ने ही तब, शरण में लेके इनकी जान बचाई,
दंभ था लाल किले को खुद पे, कहलाता आगरे का गौरव था,
सूरज ने उसकी नींव हीला दी, जाटों की ताकत का वैभव था,
बलशाली था हलधर अवतारी था, था जाटों का अफलातून,
जाट प्लेटो गजमुखी वह, फौलादी जिस्म गर्वीला खून,
हारा नहीं कभी रण में, ना कभी धोके से वार किया,
दुश्मन की हर चालों को, हंसते हंसते ही बिगाड़ दिया,
ना केवल बलशाली था, बल्कि विधा का ज्ञानी था,
गर्व था जाटवंश के होने का, न घमंडी न अभिमानी था,
25 दिसंबर 1763 में, नजीबद्दीन से रणसमर हुआ,
सहोदरा की माटी में तब, इसका रक्त विलय हुआ,
56 वसंत की आयु में भी, वह शेरों से खुला भिड़ जाता था,
जंगी मैदानों में तलवारों से, वैरी मस्तक उड़ा जाता था,
वीरों की सदा यह पहचान रही है, रणसमर में देते बलिदान है,
इस सूरज ने वही इतिहास रचा, शत शत तुम्हें प्रणाम है,
अमर हो गया जाटों का सूरज, दे गया गौरवगान हमें,
कर गया इतिहास उज्ज्वल, दे गया इक अभिमान हमें,
'तेजाभक्त बलवीर' तुम्हें वंदन करे, करे नमन चरणों में तेरे,
सदा वैभवशाली तेरा शौर्य रहे, सदा विराजो ह्रदय में मेरे,

कविता (3) By Balveer Ghintala Tejabhakt

जंजीर गुलामी की जकडी, विषबेल चतुर्दिश फैली थी। अफगानों की करतूतो से, हिंद की सुचिता मैली थी।।

तब एक एक राजाओं ने, संधियां करना शुरू किया। लोहागढ पर दुख के अंबुद ने, घनघोर उमड़ना शुरू किया।।

जिस लोहागढ को सींचा था, गोकुल, चूड़ा के रक्तउबालों ने। जिस लोहागढ को पाला था, बदनसिंह जैसे मतवालों ने।।

जिस लोहागढ की चिंगारी ने, त्रिसेना को धूल चटाई थी। वो साधारण सा मनुज नहीं, सुरज की ज्वाला जमीं-उतर आई थी।।

हय पर सवार मर्दाने ने, कर में कृपाण को साध लिया। भीषण निनाद गरज उठा, निज सहादरा को गुंजाय दिया।।

वो थका नहीं वो रुका नहीं, अरिमर्दन करता जाता था । अरु काट काट अफगानों को , हुंकारे भरता जाता था।।

वो नव तुरंग पर चढ़ा बढ़ा, यों लड़ा कि ज्यों भीषण ज्वाला। पर रोक पाया ना पीठ वार, जो वैरी ने था कर डाला।।

तब घायल हुआ सिंह पर, धोखे से अरि ने वार किया। मिल गई वीरगति सूरज को, माटी का कर्ज उतार दिया।।

सूरज तो चला गया लेकिन, इक प्रश्न बाद में जिंदा था। सकल नरेशों के कुकृत्यों पर, ये हिंद सकल शर्मिंदा था।।

उस समय अगर कुछ रजवाड़े, सूरज का साथ निभा जाते। पानीपत में ही हम सब, दिल्ली को दुल्हन बना लाते।।

अफगानों पर मिलती विजय मगर, कुछ अपनों से ही हारा गया। कुछ गिदड़ वंशों की गद्दारी , अपने सूरज को अस्ता गया।।

हे सूरज! हैं नाज हमें, नाज हमें हिंद के उस बाहुबल पर। 'तेजाभक्त' का स्वीकारो वंदन, हैं नाज हमें गढ लोहाचंल पर।।


लेखक - बलवीर घिंटाला तेजाभक्त, मकराना नागौर, 9414980515

पिक्चर गैलरी

संदर्भ

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  1. Thakur Deshraj: Jat Itihas (Utpatti Aur Gaurav Khand)/Parishisht,p.169-170
  2. ठाकुर देशराज, जाट इतिहास, पेज 641
  3. ठाकुर देशराज, जाट इतिहास, पेज 641
  4. ठाकुर देशराज, जाट इतिहास, पेज 641
  5. Excerpts from book "Hindustan mein Jaa-Satta" (page 65) - edited by Dr. Jean Deloche (French) and Dr. Vir Singh (Hindi). Published by Radhakrishan Prakashan Pvt. Ltd. G-17, Jagatpuri, Delhi-110051. Copyright: Soorajmal Samarak Shiksha Sanstha, New Delhi. First Edition: 2001. Price: Rs. 300/-