Mandawar Bijnor

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Note - Please click → Mandawar for details of similarly named villages at other places.

Author:Laxman Burdak, IFS (Retd.)

Location of Mandawar in Bijnor district

Mandawar (मंडावर) is a town in tahsil and district Bijnor in Uttar Pradesh.

Variants of name


It is situated at a distance of about 15 km from Bijnor in north . Chandok station of northern railway (Moradabad-Saharanpur) is about 6 km in the north of Mandawar.

Jat Gotras

Mention by Panini

Mardeyapura (मार्देयपुर) is mentioned by Panini in Ashtadhyayi. [1]


V. S. Agrawala[2] writes that Panini mentions Pura (IV.2.122) ending names of towns like Mardeyapura (Mārdeyapura) (VI.2.100) - probably Mandawar in Bijnor district where the ancient route to Hastinapura crossed the Ganga River on the opposite bank. .

This is an ancient city settled on the banks of Malini or Malan River mentioned in Abhigyana Shakuntala by Kalidasa. As per local tradition this is the site of Rishi Kanva. Panini in Chapter 4.2.10 of Ashtadhyay has mentioned this place as Mardeyapura (मार्देयपुर). The River Ganga flows very close to Mandawar and on the other side of the Banks of Ganga is situated Sukkartal, the Shakravatara of Abhigyana Shakuntala, village in Jansath tahsil in Muzaffarnagar district in Uttar Pradesh. It is believed that the ring of Shakuntala felled in Ganga river at this very place while she was on way to Hastinapur to meet King Dushyanta. In north east of Mandawar is situated the Kajalivana near Najibabad where Dushyanta used to go for hunting. According to Cunningham, the ancient name of Mandawar is Matipura (मतिपुर) where Xuanzang had visited in 634 AD. He mentioned this place as Matipolo. At that time it was site of a Buddhist vihara of Gunaprabha's pupil named Mitrasena. Cunningham had explored this place and found coins and sculptures of the Kushanas and Guptas. [3]

Bhim Singh Dahiya [4] associates Mardeyapura with the history off Mirdhas.

Visit by Xuanzang in 636 AD

Alexander Cunningham[5] writes that From Srughna the Chinese pilgrim Xuanzang proceeded to Mo-li-pu-lo, or Madipura, which M. Vivien de St. Martin has identified with Mandawar, a large town in

[p.349]: "Western Rohilkhand, near Bijnor. I had previously made the same identification myself, and I have since been able to confirm it by a personal examination of the site.[6] The name of the town is written मड़ावर Madawar, the Mundore of the maps. Aecording to Johari Lai, Chaodri and Kanungo of the place, Madawar was a deserted site in Samvat 1171, or A.D. 1114, when his ancestor Dwarka Das, an Agarwala Baniya, accompanied by Katar Mall, came from Morari in the Mirat district, and occupied the old mound. The pesent town of Madawar contains 7000 inhabitants, and is rather more than three-quarters of a mile in length by half a mile in breadth. But the old mound, which represents the former town, is not more than half a mile square. It has an average height of 10 feet above the rest of the town, and it abounds with large bricks, which are a sure sign of antiquity. In the middle of the mound there is a ruined fort 300 feet square, with an elevation of 6 or 7 feet above the rest of the city. To the north-east, distant about one mile from the fort there is a large village on another mound called Madiya ; and between the two there is a large tank called Kunda Tall, surrounded by numerous small mounds which are said to be tho remains of buildings. Originally these two places would appear to have formed one large town, about 1¼ mile in length, by a mile in breadth or just 3½ miles in ciruit which agrees very well with Hwen Thsang's measurement of 20 li, or 3⅓ miles.

It seems probable that the people of Madawar, as pointed out by M. Vivien de St. Martin, may be the of Megasthenes, who dwelt on the banks of the

[p.350]: Erineses. If so, that river must be the Malini. It is true that this is but a small stream ; hut it was in a sacred grove on the bank of the Malini that Sakuntala was brought up, and along its course lay her route lo the court of Dushmanta at Hastinapur.While the lotus floats on its waters, and while the Chakwa calls to its mate on the bank, so long will the little Malini live in the verse of Kalidas.

According to Hwen Thsang, the kingdom of Madipura was 6000 li, or 1000 miles, in circuit; but this estimate, as I have already pointed out, must certainly include the two neighbouring states of Govisana and Ahichhatra, as they are also in Rohilkhand, and at so short a distance that Madipur alone must have been a very small district, confined to the tract between the Ganges and Ramganga, of not more than 250 miles in circuit. But even with the extended limits now proposed, which would include the whole of the country lying to the east of the Ganges from Haridwar to Kanoj as far as the bank of the Ghagra near Khairigarh the circuit would not be increased to more than 650 or 700 miles. This is still too small ; but as some large allowance must be made on the northern mountain boundary for the difference between direct measurement on the map and the actual road distance, I think that the true circuit may be not less than 850 miles. The king of Madawar was a Siu-to-lo or Sudra, who worshipped the Devas, and cared nothing for Buddhism. As Govisana and Ahichhatra eere without kings, I presume that they were tributary to Madawar, and that the circuit of the territory recorded by Hwen Thsang was the political boundary of the whole State, and not that of the district proper.


Mardeyapura (मार्देयपुर) (AS, p.737): पाणिनि की अष्टाध्यायी 4,2,10 में उल्लिखित स्थान जो शायद मंडावर है.[7]

मंडावर, बिजनोर

मंडावर, जिला बिजनोर, उ.प्र., (AS, p.684) कालिदास के अभिज्ञान शाकुंतल में वर्णित मालिनी (=मालन) नदी के तट पर बसा हुआ प्राचीन स्थान है. स्थानीय किंवदंती में इस कस्बे को बड़े प्राचीन काल से ही कणव ऋषि का आश्रम माना गया है जो यहां की स्थिति को देखते हुए ठीक जान पड़ता है.पाणिनि ने ने शायद इसी स्थान को अष्टाध्यायी 4,2,10 में मार्देयपुर कहा है. मंडावर के उत्तर की ओर कुछ दूर पर गंगा है जिसके दूसरे तट पर वर्तमान शुक्करताल (जिला मुजफ्फरनगर, उत्तर प्रदेश) या अभिज्ञान शाकुंतल का शक्रावतार है. हस्तिनापुर जाते समय शकुंतला की उंगली से दुष्यंत की अंगूठी इसी स्थान पर गंगा के स्रोत में गिर गई थी. हस्तिनापुर का मार्ग मंडावर से गंगा पार शुक्करताल होकर ही जाता है. मंडावर के उत्तर-पश्चिम में नजीराबाद के ऊपर कजलीवन स्थित है जहां कालिदास के वर्णन के अनुसार दुष्यंत आखेट के [p.685] लिए आया था (इस विषय में देखें लेखक का माडर्न रिव्यू नवंबर 1951 में ‘टोपोग्राफी ऑफ अभिज्ञान शाकुंतल’ नामक लेख). मंडावर का प्राचीन नाम कनिंघम के अनुसार मतिपुर है जहां 634 ई. के लगभग चीनी यात्री युवानच्वांग आया था. यहां उस समय बौद्ध विहार था जहां गुणप्रभ का शिष्य मित्रसेन रहता था. इसकी आयु 90 वर्ष की थी. गुणप्रभ ने सैकड़ों ग्रंथों की रचना की थी. युवानच्वांग के अनुसार मतिपुर जिस देश की राजधानी था उसका क्षेत्रफल 6000 ली या 1000 मील था. यहाँ समय 20 बौद्ध संघाराम और 50 देवमंदिर स्थित थे. युवानच्वांग ने इस नगर को, जिसका राजा उस समय शूद्र जाति का था, बहुत समृद्ध दशा में पाया था. उसने इससे माटीपोलो नाम से अभिहित किया है. चीनी यात्री ने जिन स्तूपों का वर्णन किया है उनका अभिज्ञान करने का प्रयास भी कनिंघम ने किया है. यहां से उत्खनन में कुषाण तथा गुप्त नरेशों के सिक्के, मध्यकालीन मूर्तियां तथा अन्य अवशेष मिले हैं. किंवदंती है कि यहां का पीरवाली ताल, बौद्ध संत विमलमित्र के मरने पर जो भूचाल आया था उसके कारण बना है. यह घटना प्राय: 700 वर्ष पुरानी कही जाती . मंडावर बिजनौर से प्राय 10 मील उत्तर-पूर्व की ओर है. उत्तर रेल का चंदक स्टेशन (मुरादाबाद-सहारनपुर लाइन) मंडावर से प्राय: चार मील है.

टीप, बिजनौर

विजयेन्द्र कुमार माथुर[8] ने लेख किया है ...टीप (जिला बिजनौर, उ.प्र.) (p.379): खेड़ा मंडावर के निकट स्थित है यहां कुषाण वंशीय शैव नरेश वासुदेव का एक सिक्का मिला था जिससे इस बस्ती की प्राचीनता सिद्ध होती है. मंडावर (=मतिपुर) से भी बहुत प्राचीन कस्बा है.


विजयेन्द्र कुमार माथुर[9] ने लेख किया है कि.... अभिज्ञानशाकुंतल, अंक 5 के उल्लेख अनुसार हस्तिनापुर जाते समय शक्रावतार के अंतर्गत सचीतीर्थ में गंगा के स्रोत में शकुंतला की अंगूठी गिरकर खो गई थी-- 'नूनं ते शक्रावताराभ्यंतरे सचीतीर्थसलिले वंदमानाया: प्रभ्रष्टमं अंगुलीयकम्'. यह अंगूठी शक्रावतार के धीवर को एक मछली के उदर से प्राप्त हुई थी--'शृणुत इदानीम् अहं शक्रावतारवासी धीवर:' अंक-6. सचीतीर्थ में गंगा की विद्यमानता का उल्लेख इस प्रकार है-- 'सचीतीर्थंवंदमानाया: सख्यास्ते हस्ताद्गंगास्तोत्रसि परिभ्रष्टमं'- अंक-6. हमारे मत में शक्रावतार का अभिज्ञान जिला मुजफ्फरनगर (उत्तर प्रदेश) में गंगा तट पर स्थित शुक्करताल नामक स्थान से किया जा सकता है. शुक्करताल, शक्रावतार का ही अपभ्रंश जान पड़ता है. यह स्थान मालन नदी के निकट स्थित मंडावर (जिला बिजनौर) के सामने गंगा की दूसरी ओर स्थित है. मंडावर में कण्व आश्रम की स्थिति परंपरा से मानी जाती है. मंडावर से हस्तिनापुर (जिला मेरठ) जाते समय शुक्करताल गंगा पार करने के पश्चात दूसरे तट पर मिलता है और इस प्रकार कालिदास द्वारा वर्णित भौगोलिक परिस्थिति में यह अभिज्ञान ठीक बैठता है. शुक्करताल का संबंध शुकदेव से बताया जाता है और यह स्थान अवश्य ही बहुत प्राचीन है. बहुत संभव है कि शक्रावतार का शक्र ही शुक्कर बन गया है और इस शब्द का सुखदेव से कोई संबंध नहीं है (दे. मॉडर्न रिव्यू नवंबर 1951, में ग्रंथकर्ता का लेख 'टोपोग्राफी ऑफ अभिज्ञान शाकुंतल'). महाभारत 84,29 (III.82.25) में उल्लिखित शक्रावर्त भी यही स्थान जन पड़ता है.


विजयेन्द्र कुमार माथुर[10] ने लेख किया है .....बिजनौर, उ.प्र. (AS, p.628): बिजनौर गंगा नदी के वामतट पर लीलावाली घाट से तीन मील की दूरी पर एक छोटा सा क़स्बा है। कहा जाता है कि इसे विजयसिहं ने बसाया था। दारानगर और विदुरकुटी यहाँ से 7 मील की दूरी पर स्थित है। ये दोनों स्थान महाभारत कालीन बताये जाते हैं।

स्थानीय जनश्रुति में बिजनौर के निकट गंगातटीय वन में महाभारत काल में मयदानव का निवास स्थान था। भीम की पत्नी हिडिंबा मयदानव की पुत्री थी और भीम से उसने इसी वन में विवाह किया था। यहीं घटोत्कच का जन्म हुआ था। नगर के पश्चिमांत में एक स्थान है जिसे हिडिंबा और पिता मयदानव के इष्टदेव शिव का प्राचीन देवालय कहा जाता है। मेरठ या मयराष्ट्र बिजनौर के निकट गंगा के उस पार है।

बिजनौर के इलाके को वाल्मीकि रामायण में प्रलंब नाम से अभिहित किया गया है। नगर से आठ मील दूर मंडावर है जहाँ मालिनी नदी के तट पर कालिदास के [p.629]: "अभिज्ञान शाकुंतलम" नाटक में वर्णित कण्वाश्रम की स्थिति परंपरा से मानी जाती है।

कुछ लोगों का कहना है कि बिजनौर की स्थापना राजा बेन ने की थी जो पंखे या बीजन बेचकर अपना निजी ख़र्च चलाता था और बीजन से ही बिजनौर का नामकरण हुआ।

मण्डावर का इतिहास

दलीप सिंह अहलावत ने लिखा है कि इस वीर योद्धा बसरूसिंह के चार पुत्र थे - रामसिंह, धर्मसिंह, आलमसिंह तथा पदारथसिंह। इनमें सर्वाधिक प्रतापी राय पदारथसिंह थे। इनके गौरवर्ण के तेजस्वी मुखमण्डल पर काली घनी मूंछें इतनी लम्बी थीं कि उन्हें मरोड़कर आप उन पर नारंगी रख लिया करते थे। इसीलिए उन्हें मूंछ पदारथसिंह तेगबहादुर के नाम पर भी प्रसिद्धि प्राप्त थी। ये बहादुरगढ़ से विशाल गोधन के साथ कनखल (हरिद्वार) और चण्डी से बालावाली तक के उस प्रदेश पर आकर शासक बन गए जो गंगा के दोनों ओर आज के बिजनौर और सहारनपुर जिलों में पड़ता है। इनकी गाय भैंसें नांगल के पास गंगा पार करके आज के नजीबाबाद क्षेत्र में चरने जाया करती थीं। वह स्थान “भैंस घट्टे की घटरी” के नाम पर आज भी विख्यात है। इन्हें अपने “धन” की रक्षार्थ वन के शेरों, चीतों आदि हिंसक प्राणियों का प्रायः आखेट करना होता था। राय मूँछ पदारथसिंह ने शहजादा सलीम (जहांगीर) को प्रभावित करके मित्र बना लिया और शेरों के शिकार के लिए अपने प्रदेश में आमन्त्रित किया। सलीम ने इधर आकर शेरों का शिकार खेला। उसने राय मूँछ पदारथसिंह को आखेट की सकुशल सम्पन्नता पर प्रसन्न होकर उसे तत्कालीन सूबेदार से जिला मुरादाबाद में लगने वाले परगने जलालाबाद, किरतपुर, मण्डावर के 300 गांवों पर अधिकार स्वीकार करा दिया। सन् 1603 ई० में इन्हें ‘राय’ की उपाधि खिलअत और “ता संग अज गंगा” गंगा से शिवालिक पहाड़ तक के प्रदेश पर शासक होने का ताम्रपत्र दिया गया। तब राय मूँछ पदारथसिंह ने बहादुरगढ़ से अपने परिवार को भी यहां बुला लिया। इन्होंने इधर आकर गंगा पार नांगल में एक कच्चा किला बनाया। माता सोती के नाम पर इस गांव को आबाद किया। आज भी इसे सोती की नांगल के नाम से प्रसिद्धि प्राप्त है। नांगल के अतिरिक्त राय मूँछ पदारथसिंह ने एक किला कच्चा बनवाया। उसके अन्दर विशाल हवेलियां बनवायीं। उसका नाम जलालुद्दीन अकबर के नाम पर जलालाबाद रखा। अगले वर्ष 1605 ई० में इन्होंने किला स्वर्णपुर जो आज साहनपुर के रूप में प्रसिद्ध है, पर अधिकार कर लिया। इस प्राचीन किले के इनके अधिकार में आने पर ये इस क्षेत्र के दूर-दूर तक एकछत्र अधिपति के नाम पर प्रख्यात हो गए।[11]

Notable persons

External links


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