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Murachipattana

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Author:Laxman Burdak, IFS (R)

Murachipattana (मुरचीपत्तन) is the name of an ancient city mentioned in Ramayana (IV.42.13). It is located near Jatapur in Kerala, India. [1]

Variants

In Ramayana

Murachipattana find mention in Ramayana (IV.42.13). Kishkindha Kanda Sarga 42 mentions that Sugreeva sends troops to west side to search for Sita under the leadership of Sushena. Describing the various provinces like Surashtra, Balhika and Chandrachitra (Mathura), Western Ocean, River Sindhu and magnificent mountains that are situated at the northwest of India, cities like Murachipattana, Jatapura, Avanti and Angalepa and also the ocean down south to it, namely the present Arabian Sea and almost up to Persian provinces, he orders monkey troops to return within one month's time.

"Sita shall be searched along with the residency of Ravana on the mountains that are sitting pretty on the seashore, as well as in the forests on those mountains. Further, the delightful cities available alongshore like Murachipattana, Jatapura, Avanti and Angalepa are to be searched together with the forest of Alakshita, including the nearby provinces and spacious townships. (4.42.12b, 13, 14)[2]

"At the junction of River Sindhu with the ocean, Mouth of Indus, there is a huge mountain named Hemagiri, Golden-Mountain, which is with hundreds of summits and gigantic trees. (4.42.15)[3]

मुरचीपत्तन

विजयेन्द्र कुमार माथुर[4] ने लेख किया है ...मुरचीपत्तन (AS, p.751) 'कृत्स्नं कॊल्ल गिरिं चैव मुरची पत्तनं तथा द्वीपं ताम्राह्वयं चैव पर्वतं रामकं तथा'--महाभारत सभा पर्व 31,68. इसे सहदेव ने दक्षिण की विजय यात्रा में विजित किया था. महाभारत की कई प्रतियों में मुरचीपत्तन का पाठांतर सुरभीपत्तन है. मुरचीपत्तन का उल्लेख वाल्मीकि रामायण किष्किंधा कांड 42, 13 में भी है--'वेलातलनिविष्टेषु पर्वतेषु वनेषु च मुरचीपत्तनं चैव रम्यं चैव जटापुरम्।' मुरचीपत्तन रोमन लेखकों का मुजरिस है. (दे. क्रंगनौर, तिरुवांचीकुलम्)

जटापुर

विजयेन्द्र कुमार माथुर[5] ने लेख किया है ...जटापुर (AS, p.353) मुरचीपत्तन (केरल) के निकट स्थित है। इसका उल्लेख वाल्मीकि रामायण, किष्किंधाकांड 42, 13 में इस प्रकार हुआ है- 'वेलातलनिविष्टेषु पर्वतेषु वनेषु च मुरचीपत्तनं चैव रम्यं चैव जटापुरम्।' संभव है कि जटापुर का इसका संबंध जटातीर्थ से हो।

क्रंगनौर

विजयेन्द्र कुमार माथुर[6] ने लेख किया है ...क्रंगनौर केरल (AS, p.246) परियार नदी के तट पर बसा हुआ प्राचीन बंदरगाह जिसे रोम के लेखकों ने मुजीरिस कहा है. ई. सन के प्रारंभिक काल में यह समुद्र-पत्तन दक्षिण भारत और और रोम साम्राज्य के बीच होने वाले व्यापार का केंद्र था. इसका एक नाम मरीचीपत्तन या मुरचीपत्तन भी था जिसका अर्थ है 'काली मिर्च का बंदरगाह'. मुजिरिस शब्द इसी का रोमीय रूपांतर जान पड़ता है. मुरचीपत्तन का उल्लेख महाभारत 2,31,68 में है. इस बंदरगाह से काली मिर्च का प्रचुर मात्रा में निर्यात होता था. (देखें तिरुवांचीकुलम्)

तिरुवांचीकुलम = तिरुवेंचीकुलम

विजयेन्द्र कुमार माथुर[7] ने लेख किया है ...तिरुवांचीकुलम = तिरुवेंचीकुलम (कोचीन, केरल) (AS, p.404) - तिरुवेंची कोचीन के निकट प्राचीन केरल की प्रथम ऐतिहासिक राजधानी के रूप में उल्लेखनीय है। तिरुवेंची का वर्तमान नाम 'क्रंगनौर' है। देवी भगवती का मंदिर और एक गिरिजा घर, शायद प्रथम शती ई. में निर्मित, अब यहाँ के अवशिष्ट स्मारक हैं। तिरुवेंचीकुलम में पेरुमल सम्राटों की राजधानी हुआ करती थी। इन्हीं सम्राटों में से एक 'कुलशेखर पेरुमल' ने प्रसिद्ध वैष्णव 'महाकाव्यप्रबंधम्' की रचना की थी। ईसा पूर्व कई शतियों तक यह स्थान दक्षिण भारत का बड़ा व्यापारिक केन्द्र था। तिरुवेंची में मिस्र, बाबुल, यूनान, रोम और चीन के व्यापारियों तथा यात्रियों के समूह बराबर आते रहते थे। इसी स्थान पर 68 या 69 ई. में रोमनों के द्वारा निष्कासित यहूदियों ने शरण ली थी। इसी स्थान को शायद रोमन लेखकों ने 'मुजिरिस' (मुरचीपतन या परिचोपत्तन) लिखा है। तिरुवेंची से मरिच या काली मिर्च का रोम साम्राज्य के देशों के साथ भारी व्यापार था। 'मुरचीपतन' (पाठान्तर सुरभीपत्तन) का उल्लेख महाभारत, सभापर्व 31, 68 में है। (दे. सुरभिपत्तन)

सुरभिपत्तन

विजयेन्द्र कुमार माथुर[8] ने लेख किया है ...सुरभिपत्तन (AS, p.976): महाभारत सभा पर्व 31,68. में वर्णित है. इसे सहदेव ने दक्षिण की विजय यात्रा में विजित किया था-- 'कृत्स्नं कॊल्लगिरिं चैव सुरभिपत्तनं तथा द्वीपं ताम्राह्वयं चैव पर्वतं रामकं तथा' (महाभारत सभा पर्व 31,68). प्रसंग से यह स्थान कोलाचल के निकट कोई बंदरगाह (पत्तन) जान पड़ता है. महाभारत की कई प्रतियों में सुरभीपत्तन का पाठांतर मुरचीपत्तन है जो वर्तमान क्रंगनौर (केरल) का बंदरगाह है. (दे.क्रंगनौर, तिरुवांचीकुलम्)

In Mahabharata

Murachipattana (मुरची पत्तन) in Mahabharata (II.28.45)

Sabha Parva, Mahabharata/Book II Chapter 28 mentions Sahadeva's march towards south: kings and tribes defeated. Murachipattana (मुरची पत्तन) is mentioned in Mahabharata (II.28.45). [9]....The Kuru warrior (Sahadeva) then vanquished and brought under his subjection numberless kings of the Mlechchha tribe living on the sea coast (Sagaradvipa), and the Nishadas and the cannibals and even the Karnapravarnas, and those tribes also called the Kalamukhas who were a cross between human beings and Rakshasas, and the whole of the Cole mountains (Kolla-giri), and also Murachipattana (Surabhipattana), and the island called the Copper island (Tamradvipa), and the mountain called Ramaka.

External links

References

  1. Aitihasik Sthanavali by Vijayendra Kumar Mathur, p.353
  2. तत्र सीताम् च मार्गध्वम् निलयम् रावणस्य च ॥४-४२-१२॥ वेलातल निवेष्टेषु पर्वतेषु वनेषु च । मुरची पत्तनम् चैव रम्यम् चैव जटा पुरम् ॥४-४२-१३॥ अवंतीम् अंगलेपाम् च तथा च अलक्षितम् वनम् । राष्ट्राणि च विशालानि पत्तनानि ततः ततः ॥४-४२-१४॥
  3. सिंधु सागरयोः चैव संगमे तत्र पर्वतः । महान् हेम गिरिः नाम शत शृंगो महाद्रुमः ॥४-४२-१५॥
  4. Aitihasik Sthanavali by Vijayendra Kumar Mathur, p.751-752
  5. Aitihasik Sthanavali by Vijayendra Kumar Mathur, p.353
  6. Aitihasik Sthanavali by Vijayendra Kumar Mathur, p.246
  7. Aitihasik Sthanavali by Vijayendra Kumar Mathur, p.404
  8. Aitihasik Sthanavali by Vijayendra Kumar Mathur, p.976
  9. ये च कालमुखा नाम नरा राक्षसयॊनयः, कृत्स्नं कॊल्ल गिरिं चैव मुरची पत्तनं तथा (II.28.45)