Orchha

From Jatland Wiki
Jump to navigation Jump to search
Location of Orchha
District map of Tikamgarh

Orchha (ओरछा) is a town and tahsil in Tikamgarh district of Madhya Pradesh. Orchha (or Urchha) town was established by Rudra Pratap Singh some time after 1501, as the seat of an eponymous former princely state of central India, in the Bundelkhand region.[1]

Variants

  • Orachha (ओरछा) (बुंदेलखंड, म.प्र.) (AS, p.116)
  • Jahangirpur जहांगीरपुर = Orchha (ओरछा) (AS, p.361)

Origin of name

Location

Orchha lies on the Betwa River, 80 km from Tikamgarh & 15 km from Jhansi in Uttar Pradesh.

Origin

Jat Gotras

History

The ruling family of Orchha- Tikamgarh, was called Digora.[2]


Orchha was founded in 1531 (the 16th century AD)[3] by the Bundela Rajput chief, Rudra Pratap Singh,[4] who became the first King of Orchha, (r. 1501-1531) and also built the Fort of Orchha.[5] The Chaturbhuj Temple was built during the reign of Emperor Akbar, by the Queen of Orchha Ganesh Kunwar (गणेश कुँवर),[6] while Raj Mandir was built by 'Madhukar Shah' during his reign, 1554 to 1591.[7]


James Todd[8] writes ....The Chandela, classed by some of the genealogists amongst the thirty-six tribes, were powerful in the twelfth century, possessing the whole of the regions between the Jumna and Nerbudda, now occupied by the Bundelas and Baghelas.


[p.140]: Their wars with Prithwiraja, forming one of the most interesting of his exploits, ended in the humiliation of the Chandela, and prepared the way for their conquest by the Gaharwars ; the date of the supremacy of the Bundela Manvira was about A.D. 1200. Madhukar Sah, the thirteenth in descent from him, founded Orchha on the Betwa, by whose son, Birsingh Deva, considerable power was attained. Orchha became the chief of the numerous Bundela principalities ; but its founder drew upon himself everlasting infamy, by putting to death the wise Abu-l Fazl,1 the historian and friend of the magnanimous Akbar, and the encomiast and advocate of the Hindu race.

From the period of Akbar the Bundelas bore a distinguished part in all the grand conflicts, to the very close of the monarchy : nor, amongst all the brave chiefs of Rajasthan, did any perform more gallant or faithful services than the Bundela chieftains of Orchha and Datia. Bhagwan of Orchha commanded the advanced guard of the army of Shah Jahan. His son, Subhkarana, was Aurangzeb's most distinguished leader in the Deccan, and Dalpat fell in the war of succession on the plains of Jajau.2 His descendants have not degenerated ; nor is there anything finer in the annals of the chivalry of the West, than the dignified and heroic conduct of the father of the present chief.3 The Bundela is now a numerous race, while the name Gaharwar remains in their original haunts.


1 Slain at the instigation of Prince Salim, son of Akbar, afterwards the emperor Jahangir. See this incident stated in the emperor's own Commentaries [Ain, i. Introd. xxiv. ff.].
2 [For Subhkaran Singh, see Manucci (i. 270, 272). Dalpat was one of his patients (Ibid. ii. 298).]
3 On the death of Mahadaji Sindhia, the females of his family, in apprehension of his successor (Daulat Rao), sought refuge and protection with the Raja of Datia. An array was sent to demand their surrender, and hostility was proclaimed as the consequence of refusal. This brave man would not even await the attack, but at the head of a devoted band of three hundred horse, with their lances, carried destruction amongst their assailants, neither giving nor receiving quarter : and thus he fell in defence of the laws of sanctuary and honour. Even when grievously wounded, he would accept no aid, and refused to leave the field, but disdaining all compromise awaited his fate. The author has passed upon the spot where this gallant deed was performed ; and from his son, the present Raja, had the annals of his house.

ओरछा का इतिहास

ओरछा मध्य प्रदेश के बुन्देलखण्ड सम्भाग में बेतवा नदी के किनारे स्थित है। मध्य काल में यहाँ परिहार राजाओं की राजधानी थी। मुग़ल बादशाह अकबर में यहाँ के राजा मधुकर शाह थे, जिन्होंने मुग़लों के साथ कई युद्ध किए थे। औरंगज़ेब के राज्य काल में छत्रसाल की शक्ति बुन्देलखण्ड में बड़ी हुई थी। ओरछा के राजाओं ने कई हिन्दी कवियों को आश्रय प्रदान किया था। आज भी यहाँ पुरानी इमारतों के खंडहर बिखरे पड़े हैं। [9]

मध्यकाल में यहाँ परिहार राजाओं का राज्य था और उन्होने अपनी राजधानी यहीं बनाई थी. परिहार राजाओं के बाद ओरछा चन्देलों के अधिकार में रहा था। चन्देल राजाओं के पराभव के बाद ओरछा श्रीहीन हो गया। [10]

उसके बाद में बुंदेलों ने ओरछा को राजधानी बनाया और इसने पुनः अपना गौरव प्राप्त किया। राजा रुद्रप्रताप (1501-1531 ई.) वर्तमान ओरछा को बसाने वाले थे। 1531 ई. में इस नगर की स्थापना की गई और क़िले के निर्माण में आठ वर्ष का समय लगा। ओरछा के महल भारतीचन्द के समय 1539 ई. में बनकर पूर्ण हुए और राजधानी भी इसी वर्ष पुरानी राजधानी गढ़कुंडार से ओरछा लायी गयी। अकबर के समय यहाँ के राजा मधुकर शाह थे जिनके साथ मुग़ल सम्राट ने कई युद्ध किए थे। जहाँगीर ने वीरसिंहदेव बुंदेला को, जो ओरछा राज्य की बड़ौनी जागीर के स्वामी थे, पूरे ओरछा राज्य की गद्दी दी थी। वीरसिंहदेव ने ही अकबर के शासन काल में जहाँगीर के कहने से अकबर के विद्वान् दरबारी अबुलफजल की हत्या करवा दी थी। शाहजहाँ ने बुन्देलों से कई असफल लड़ाइयाँ लड़ीं। किंतु अंत में जुझार सिंह को ओरछा का राजा स्वीकार कर लिया गया। बुन्देलखण्ड की लोक-कथाओं का नायक हरदौल वीरसिंहदेव का छोटा पुत्र एवं जुझार सिंह का छोटा भाई था। औरंगज़ेब के राज्यकाल में छत्रसाल की शक्ति बुंदेलखंड में बढ़ी हुई थी। ओरछा की रियासत वर्तमान काल तक बुंदेलखंड में अपना विशेष महत्त्व रखती आई है। यहाँ के राजाओं ने हिन्दी के कवियों को सदा प्रश्रय दिया है। महाकवि केशवदास वीरसिंहदेव के राजकवि थे।[11]

नामकरण: ओरछा की स्थापना संबंधी जनश्रुतियां भी काफ़ी रोचक हैं। एक जनश्रुति के अनुसार महाराज रुद्रप्रताप ओरछा के समीपस्थ राज कुंडार से आखेट की तलाश में घूमते हुए महर्षि तुंग के आश्रम तुङ्गारण्य तक आ गए। तभी उन्हें प्यास लगी और वे मछली भवन दरवाजे से बावली में उतरे, किन्तु जल अत्यधिक गंदा था। उनके साथियों ने महाराज को बताया कि थोड़ी दूर पर पावन सलिला बेतवा (बेत्रवती नदी) बहती है वहीं चलकर जल पिया जाए। महाराज नदी पर गए, अंजलि में लेकर जल पिया। प्यास से तृप्ति पाकर लौटते समय महर्षि तुंग के दर्शन किए। ऋषि ने महाराज से याचना की कि सावन तीज को बावली के समीप मेला लगता है। वहां पर चोर भोले-भाले दुकानदारों को परेशान किया करते हैं, यदि आप रक्षा करें तो अति कृपा होगी। महाराज ने विचार किया कि यहां बावली के समीप तो गोंड राज्य की सीमा लगी हुई है इसलिए बिना नगर बसाए रक्षा करना संभव न हो सकेगा। इस पर ऋषि ने अनुरोध किया कि कुछ भी हो आपको यह पावन कार्य करना ही होगा। महाराज ने उन्हें रक्षा करने का वचन दे दिया और अपने साथियों को आदेश दिया कि इस स्थान पर विराट दुर्ग की नींव डाली जाए। नगर का नाम क्या रखना चाहिये यह तय नहीं हो पा रहा था। सभी पुन: ऋषि के समीप पहुंचे और इस विषय में उनकी राय जाननी चाही। उस समय वे स्नानादि से निवृत्त होकर लौट रहे थे। संयोग से जिस समय महाराज ने प्रश्न किया कि नगर का नाम क्या होना चाहिए उसी समय ऋषि को ठोकर लगी और उनके मुंह से निकला ‘ओच्छा'। यह सुनकर महाराज यहां से लौट आए और ‘ओच्छा’ नाम से नगर बसाना प्रारंभ कर दिया। यही ‘ओच्छा’ शब्द आगे चलकर परिमार्जित हुआ और ‘ओरछा’ में परिवर्तित हो गया। [12]

स्थापत्य कला: ओरछा अपने में भारतीय संस्कृति का प्राचीन इतिहास छुपाए हुए अपूर्व शांति और नीरवता में स्थित हज़ारों दर्शकों को देश-विदेश से अपनी ओर आकृष्ट करता रहता है। ओरछा प्रारंभ से ही वीरों और कलाकारों की जन्मस्थली रहा है। महाराज भारती चंद्र मधुकर शाह, रामशहवीर देव और चंपतराय ने जहां अपनी वीरता और शौर्यपूर्ण कार्यों से संपूर्ण भारत में ख्याति अर्जित की, वहीं कविप्रिया एवं रसिकप्रिया जैसे उच्च कोटि के रस से विभोर काव्यों का सृजन करने वाले कवीन्द्र केशव तथा अपने रूप-लावण्य, विद्वत्ता गीत माधुर्य एवं अनुपम नृत्य से भारत के शहंशाह अकबर को भी अपने समक्ष नतमस्तक होने के लिए विवश कर देने वाली राय प्रवीन जैसी नृत्यांगना एवं कवयित्री को अपनी कोख से जन्म देने वाली ओरछा की धरती आज भी स्वयं पर गौरवान्वित है। कालिंजर के महान् सेनापति शेरशाह सूरी को यहां के बहादुरों ने परास्त कर विजय प्राप्त की थी। जब अकबर ने अपने सर्वाधिक विश्वासपात्र सेनापति अबुल फ़ज़ल को डेढ़ लाख सैनिकों सहित बुंदेलखंड को फ़तह करने के लिए भेजा तो ओरछा के शासक वीरसिंह देव ने मोर्चा लेकर उसे खत्म कर दिया। अकबर जैसे महान् सम्राट के छक्के छुड़ा दिए। यह तथ्य भी इतिहास विदित है कि यदि वीरसिंह देव ने जहांगीर की सहायता नहीं की होती, तो वह भारत का सम्राट कभी नहीं बन सकता था। ओरछा के प्राचीन महल और इमारतें आज भी इन महान् शूरवीरों की वीरता और शौर्यपूर्ण कार्यों के मूक गीत गाते हुए अब तक हुए उत्थान और पतन की गवाही दे रहे हैं। देश-विदेश से आने वाले पर्यटक ओरछा की मनोहारी प्रकृति-छटा एवं ऐतिहासिकता के प्रमाण को देखकर इतने मोहित हो जाते हैं कि यहां अनिंद्य दृश्यों की छवि उनके मानस पटल पर से जीवन पर्यन्त मिट नहीं पाती। प्राचीन नदी बेतवा कल-कल का प्यारा सा निनाद करती हुई संपूर्ण ओरछा को अपने आगोश में समेटे यहां की प्राकृतिक सुन्दरता में चार चांद लगा रही है। काल के कठोर आघातों से स्वयं की रक्षा करते हुए यहां के जहाँगीर महल, शीशमहल और राजमहल आदि पर्यटकों को बरबस ही अपनी ओर आकर्षित कर लेते हैं। वास्तु कला, स्थापत्य कला एवं नैपुण्य के कारण इनका स्थान भारत की उन गिनी-चुनी इमारतों में है जिन पर यहां के पुरातत्व विभाग को गर्व रहा है। ओरछा में अनेक दर्शनीय ऐतिहासिक स्थल हैं जिन्हें देखने के लिए यात्रियों का मन लालायित रहता है।[13]

गढ़कुण्डार

विजयेन्द्र कुमार माथुर[14] ने लेख किया है ... गढ़कुण्डार (AS, p.273) मध्य प्रदेश के निवाड़ी ज़िले में गढ़कुण्डार के दुर्ग एवं नगर के भग्नावशेष बीहड़ पहाड़ों एवं वनों में बिखरे पड़े हैं। कभी गढ़कुण्डार चंदेल, खंगार एवं बुन्देल राजाओं की राजधानी रहा था। प्राचीन काल में कुण्डार प्रदेश पर गौंडो का राज्य था, जो पाटलिपुत्र के मौर्य सम्राटों को मंडलेश्वर मानते थे। परवर्ती काल में परिहार राजाओं ने कुण्डार पर आधिपत्य जमा लिया। आठवीं सदी के अंत में यहाँ चन्देलों का शासन था। पृथ्वीराज चौहान तृतीय का समकालीन चन्देल नरेश परमाल के समय यहाँ का दुर्गपाल शिवा नामक क्षत्रीय कीलेदार था जो परमाल के अधीन था. 1182 ई. में चौहान शासक एवं परमाल के बीच संघर्ष में शिवा मारा गया और चौहान के सैनिक खूबसिंह या खेतसिंह खंगार का कुंडार पर अधिकार हो गया। इसने खंगार राज्य क़ी नींव डाली, जो काफ़ी समय तक झाँसी के परिवर्ती इलाक़े में पर्याप्त समय तक राज्य करता रहा।

खंगारों से बुंदेला-वंशीय क्षत्रियों को ईर्ष्या थी और वे खंगारों को अपने से छोटा समझते थे. दिल्ली के गुलाम वंश के प्रसिद्ध सुल्तान बलबन के [p.274]: शासनकाल में बुंदेलों ने गढ़कुण्डार पर, जहाँ खंगारों की राजधानी थी, अधिकार कर लिया (1257 ई.) और युद्ध में खंगार शक्ति का पूर्ण रूप से विनास कर दिया. खंगार इस शक्ति के मद में चूर रहकर अत्यधिक मदिरापान करने लगे थे. इस युद्ध में खंगारों के सभी सरदार और सामंत मारे गए. बुंदेलों का नायक इस समय सोहनपाल था जिसकी संदरी कन्या रूपकुमारी और खंगार-नरेश हुरमत की दुखांत प्रणय-कथा बुंदेलखंड के चारणों के गीतों का प्रिय विषय है. बुंदेलों की राजधानी कुण्डार में 1507 ई. तक रही. इस वर्ष या संभवत: 1531 ई. में बुन्देला नरेश रुद्रप्रताप ने ओरछा बसाकर वहीं नई राजधानी बनायी। खंगारों और बुंदेलों में जो युद्ध हुआ उसका घटनास्थल कुंडार का दुर्ग ही था. इसके बाद यह नगर धीरे-धीरे खण्डहर में तब्दील हो गया। दुर्ग के खंडहर झाँसी नगर से 30 मील दूर हैं.

जहांगीरपुर

जहांगीरपुर (AS, p.361) जहाँगीरपुर ओड़छा (मध्य प्रदेश) का ही परिवर्तित नाम था। ओड़छा नरेश वीरसिंह देव ने, जिनकी मुग़ल सम्राट जहाँगीर से बहुत मैत्री थी, ओड़छा को फिर से बसाकर उसका नाम जहाँगीरपुर रखा था, किन्तु यह नाम अधिक दिनों तक नहीं चला। वीरसिंह देव ने एक नए महल का नाम भी 'जहाँगीर महल' रखा था। बादशाह अकबर के शासन काल में वीरसिंह देव ने ही 'सलीम' (बाद में जहाँगीर) के कहने से अकबर के प्रिय मंत्री और मित्र अबुल फ़ज़ल की हत्या कर दी थी।[15]

Villages in Orchha tahsil

1. Bagan 2. Bangay Har 3. Bangay Khas 4. Basoba 5. Bhojpura 6. Chakarpur 7. Chandawani Bhata 8. Chandawani Khas 9. Chandrawan 10. Ghatwaha 11. Gujarra Kalan 12. Gujarra Khurd 13. Jamuniya Bhata 14. Jamuniya Khas 15. Janoli 16. Jijora 17. Kari Pahari 18. Kumharra Bhata 19. Kumharra Khas 20. Ladpura Khas 21. Ladpura North 22. Lathesara 23. Mador Bhata 24. Mador East 25. Mador West 26. Maharajpura 27. Majra Bangaya 28. Mathura Pura 29. Pathari 30. Pratap Pura 31. Radhapur 32. Rajpura 33. Ramnagar 34. Sitapur

Notable persons

External links

References


Back to Madhya Pradesh