Paharsar

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Location of Rajgarh in Churu district

Paharsar (पहाडसर) (Pahadsar) is a village in Rajgarh tahsil in Churu district in Rajasthan. This Village is famous for its villagers who are serving in Indian Army.

Location

Paharsar is located on Rajgarh-Hanumangarh railway line and is second stop. It is 75 km from Churu on the border of Haryana, Jhumpa village of Haryana is 10 kms away.

Founder

Paharsar village in Rajgarh, Churu was founded by Gyana Ram Punia after his grandfather named Paharu Ram Punia.

Jat Gotras

Population

As per Census-2011 statistics, Paharsar village has the total population of 2474 (of which 1291 are males while 1183 are females).[1]

History

Pahadsar village was a Khalsa village not ruled by any Thakur Jagirdar but directly controlled by Raja of Bikaner. It was under Numberdar and last numberdar was Amar Singh Punia.

Paharsar was founded by Gyana Ram Punia after his grandfather named Paharu. Gyana Ram Punia came from nearby village Dhandhal. He was descendant of Lakshi Punia. Lakshi Punia’s descendants founded seven villages named Dhandhal Shera, Dhandhal Lekhoo, Dhandhal Taal, Gulpura, Narwasi, Mithi Redu and Paharsar.

Hira Singh Chahar (हीरासिंह चाहर), a social reformer, folk-singer and freedom fighter, was born in this village on 17 January 1901 in the family of Laxman Ram Chahar, who joined Arya Samaj at the age of fourteen and spread the doctrine of Arya Samaj in remote villages of Rajasthan. Shri Hira Singh took active participation in India’s freedom movement, worked in rural areas to change mindsets to educate young girls, eradicate child marriage, and tirelessly worked to get rid of social rituals like मृत्यु भोज (feast after death), usually organized supposedly for liberation of the soul of the dead, which literally bankrupted farmer families. उन्होंने जीवन पर्यन्त राष्ट्र के स्वतंत्रता संग्राम, रियासती आंदोलन, सामंती उत्पीड़न के मुक्ति संघर्ष एवं कुरूतियो के निवारण के लिए समाज सुधार कार्यक्रमों में बढ़चढ़ कर भाग लिया.


चौधरी हीरा सिंह चाहर के समर्पण, स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने, व समाज में सकारात्मक सामाजिक परिवर्तन के लिए अथक प्रयास को मध्ये नजर रख्ते हुए 2 अक्टूबर 1987 को, राजस्थान के मुख्यमंत्री ने उन्हें "ताम्र पत्र" से सम्मानित किया, और 13th अप्रैल 1988 को जिला कलेक्टर, चूरू द्वारा आयोजित विशेष कार्यक्रम में उन्हें "ताम्र पत्र" प्रदान किया गया. निम्नलिखित "ताम्र पत्र" पर अंकित है:

"राष्ट्र के स्वतंत्रता संग्राम और राजस्थान के रियासती आंदोलन एवं सामंती उत्पीड़न के मुक्ति संघर्षों में सक्रिय योगदान, त्याग और बलिदान के लिए यह सम्मान पत्र मुख्यमंत्री, राजस्थान ने भेंट किया. (२ अक्टूबर १९८७)"


Hira Singh was moved by the declaration of "Purna Swaraj” by the Indian National Congress and speeches by its leaders, especially by Mahatma Gandhi in 1930 at the Lahore session which culminated in a public declaration on 26 January 1930 to celebrate as ‘Independence Day.’ Rajasthan/Rajputana consisted of princely states, and citizens of the state were untouched by freedom movement. Hira Singh decided to sell off the business and move the family back to Paharsar in 1932. He immersed himself in the freedom movement, was part of Praja Parishad Bikaner, and as a result of this Maharaja of Bikaner, Shri Ganga Singh deported (“देश निकाला”) him from his kingdom. He put his life in danger multiple time including in Dabra(डाबड़ा) Kand, dated March 13th, 1947, in which Jaghirdars got together in a bid to crush the political awakening among the Kisan. Jaghirdars and their henchmen, wielding guns and swords attacked the participants, killed some and badly injured many. Hira Singh barely survived, yet he helped provide first-aid to the wounded and help transport injured to nearby hospitals. During this freedom movement, he worked with great leaders like Mathuradas Mathur, Choudhary Hans Raj Arya, Kumbharam Arya, Baldev Ram Mirdha and many famous leaders of that time.

After independence, he tirelessly worked in rural western Rajasthan to spread the importance of education among farmers and especially girl’s education. There were old practices (कुरीतियां) like early marriages, and making feast for a large number of people on the 12th/13th day of death in the families. These मृत्यु भोज (feast after death) were organized at a very large scale, and were costly affairs and, as a result of these, farmers were getting bankrupt and losing their precious farmland to professional money-lenders because they were borrowing against farmland by way of mortgaging land. In the case that any individual didn’t organize such a feast due to poor economic conditions of the family, they were ridiculed and labeled as a miser. He fearlessly worked to eliminate such practices from the root and dedicated all of his life for the advancement of the society until his passing in 1993.

His post-independence contributions to speak against the Zamindari system, also known as Begari - forced labor, and protest against atrocities committed by Jaghirdars & Zamindars against poor farmers are notable. First few decades of post-independence were very tumultuous for the farmers due to British creating Zamindari system, which was consisted of a maze of intermediaries, and multiple taxes levied upon farmers without land rights. Hira Singh worked and propagated government efforts to abolish Zamindari system, tenancy reforms and land ceiling reforms, which brought real freedom to farmers of Rajasthan. Hira Singh participated in the event organized at Nagaur on Oct 2nd, 1959 to adopt the Panchayati Raj, which was inaugurated by the then Prime Minister Pandit Jawaharlal Nehru.

Hira Singh was very well-versed with seven languages, namely Hindi, Marwari, Punjabi / Gurmukhi, English, Urdu & Sanskrit. His medium of communication with the rural population was to have dialogue in simple and easy-to-understand language with villagers and conversing with them in simple poems and Bhajans. Some of his poem verses:

आग लगी है इस दिल में, दुनियां में आग लगाने दो ।
नंगे जलते पैरों से, भूतल पर आग बिछोने दो ।।
इन नौ खण्डी महलों नीचे, मुझे कुटिया एक बनाने दो ।
सदियों से सोई हुई शक्ति की, अब तो ज्योति जलाने दो ।।
मैंने देखी मारवाड़ में कृषकों के कर में हथकड़ियां ।
जागीरों के साये में जुड़ती हुई जुल्म की कड़ियाँ ।।
जागीरों में नंगे किसान, जीत होगी कृषकों की ।
आज नहीं तो कल सही, बात कही में परसों की ।।

फौजियों का गाँव पहाड़सर

फौजियों का गाँव पहाड़सर - देश सेवा को समर्पित कर दी सदी

प्रथम विश्वयुद्ध से लेकर अनेक संघर्षों के गवाह हैं पहाड़सर के सपूत। देश में शायद ही ऐसा कोई गांव होगा जिसे राजगढ़ तहसील, जिला चुरू के पहाड़सर गांव जैसा गौरव प्राप्त हो। यहां के रणबांकुरों ने प्रथम विश्वयुद्ध, द्वितीय विश्वयुद्ध, बंगलादेश को आजाद कराने तथा करगिल संघर्ष में विजय प्राप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यहां के सपूतों ने सेना में सिपाही से लेकर कर्नल व मेजर जैसे महत्वपूर्ण पदों को हासिल कर गांव का नाम रोशन किया है। यहां के लोग 100 सालों से सेना में सेवा दे रहे हैं। गौरतलब है कि मेजर भागूराम के बाद गांव के लोगों में सेना में जाने का सिलसिला चल पड़ा जो आज भी जारी है। वर्तमान में गांव के तीन युवा राजीव सहारण, कर्नल संजीव सारण, कर्नल कृष्ण कुमार थल सेना में कर्नल पद पर हैं। गाँव में करीब 66 जवान अन्य पदों पर आसीन होकर भारत की सीमाओं की निगरानी में डटे हुये हैं। गाँव में शायद ही ऐसा कोई परिवार होगा जिसमें से कोई सेना में नहीं हो। करीब 500 घरों के गांव में 3500 की आबादी में से 2500 के करीब मतदाता है। शिक्षा, परिवहन सुविधा व आर्थिक दृष्टि से गांव स्मृद्ध है। कारगिल युद्ध के समय कर्नल राम सिंह के साथ गांव के सूबेदार मेवा सिंह सहारण भी बटालियन में साथ थे। मेवा सिंह ने बताया कि जब कभी दोनों साथी कार्गिल संघर्ष की याद को ताजा करते हैं तो रूह कांप जाती है लेकिन उस समय तिरंगा फहराने की जो खुशी मिली है आज भी आल्हादित कर देती है। बीती एक सदी में गांव के एक जवान सुभाष चंद्र सिहाग कश्मीर में पाक सेना के आत्मघाती हमले में शहीद हो गए थे।

1983 से सेना में कार्यरत सहारण परिवार

देश सेवा के प्रति समर्पण करें या सेना में नौकरी करने का पेंशन। बहरहाल सहारण परिवार के रग-रग में देश सेवा की भावना भरी है। इस परिवार की चौथी पीढ़ी सेवारत है। कर्नल रामसिंह सारण के दादा लिखमाराम सूबेदार थे, पिता भागूराम मेजर तथा रामसिंह के दोनों पुत्र वर्तमान में कर्नल के पद पर तैनात हैं।

सूबेदार लिखमाराम प्रथम विश्वयुद्ध के समय 1913 में भारतीय सेना में भर्ती हुए थे और 1939 तक सेवा दी। इस दौरान उन्होंने प्रथम विश्व-युद्ध में कई बार लड़ाई में भाग लिया।

मेजर भागूराम सारण 1943 में सेना में भर्ती हुये और 1971 में रिटायर हुए। भागू राम ने द्वितीय विश्व युद्ध में जाट रेजिमेंट की ओर से लड़ाई के दौरान कई देशों में गए थे।

कीर्ति चक्र से सम्मानित कर्नल रामसिंह सारण ने 1971 में बांग्लादेश को आजाद कराने के लिए भारतीय सेना की ओर से बांग्लादेश से पाकिस्तान सेना को खदेड़ने में महती भूमिका निभाई थी। मणिपुर में उग्रवादियों को खदेड़ ने में बटालियन का नेतृत्व करते हुए 1980 में उन्होंने बर्मा बॉर्डर पर उग्रवादियों के कैंप पर हमला कर क्षेत्र को उग्रवादियों से मुक्त कराया था। इसके बाद 1999 के कारगिल संघर्ष में दुश्मन के दांत खट्टे किए। कर्नल रामसिंह ने कारगिल संघर्ष को सबसे कठिन लड़ाई बताते हुए कहा कि भारतीय सेना की लाश देख रोंगटे खड़े हो जाते थे लेकिन जंग के प्रति उत्साह कम नहीं होने दिया। कर्नल राजीव सहारण व कर्नल संजीव सहारण वर्तमान में कर्नल पद पर कार्यरत हैं। राष्ट्रीय राइफल में सराहनीय सेवा देने के लिए थल सेना अध्यक्ष की ओर से दोनों को प्रशंसा पत्र दिया गया है।

Hajari Lal Chahar - Son of Hira Singh Chahar, freedom fighter. Looks after the charitable trust in the name of his father. Retired from Army Medical Corps. He is the only person from Paharsar who has worked with Army Medical Corps(AMC).

गांव के लोगों में सेना के माध्यम से देश की सेवा करना गौरव की बात है। लोग सेना में जाने के लिए सदैव लालायित रहते हैं। मेजर भागूराम सारण ने सेना के प्रति जो अलख जगाई वह आज भी जीवित है।

संदर्भ - जाट परिवेश (मासिक पत्रिका) जून 2017, p.19

Notable persons

Gallery

External links

See also

Hira Singh Chahar - For his achievements

References

  • Dr Mahendra Singh Arya, Dharmpal Singh Dudi, Kishan Singh Faujdar & Vijendra Singh Narwar: Ādhunik Jat Itihas (The modern history of Jats), Agra 1998
  • Jat Samaj, Agra, January-February 2007

Notes

  1. http://www.census2011.co.in/data/village/70114-paharsar-rajasthan.html
  2. उद्देश्य:जाट कीर्ति संस्थान चूरू द्वारा आयोजित सर्व समाज बौधिक एवं प्रतिभा सम्मान समारोह, स्मारिका जून 2013,p.141
  3. उद्देश्य:जाट कीर्ति संस्थान चूरू द्वारा आयोजित सर्व समाज बौधिक एवं प्रतिभा सम्मान समारोह, स्मारिका जून 2013,p.135
  4. Ganesh Berwal: 'Jan Jagaran Ke Jan Nayak Kamred Mohar Singh', 2016, ISBN 978.81.926510.7.1, p.167
  5. Ganesh Berwal: 'Jan Jagaran Ke Jan Nayak Kamred Mohar Singh', 2016, ISBN 978.81.926510.7.1, p.168
  6. Ganesh Berwal: 'Jan Jagaran Ke Jan Nayak Kamred Mohar Singh', 2016, ISBN 978.81.926510.7.1, p.77

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