Panchavati

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Author:Laxman Burdak, IFS (R)

Panchavati (पंचवटी) is an ancient religious place near Nasik city in Maharashtra. It is situated North of Nasik on the banks of Godavari River.

Variants

  • Panchawati (पंचवटी), जिल्ला नासिक, महा., (AS, p.514)
  • Panchavata (पञ्च वट) (Tirtha) mentioned in Mahabharata (III.81.141).

History

Panchavati is one of the places associated with Rama, Sita and Lakshmana. It was in the fiery forests of Dandakaranya along the flowing Godavari River. In present day, the name of the place holds much of a religious significance being associated with Lord Rama and his consort Sita. The reason due to which numerous individuals adorn garb of travelling pilgrim might actually not be comprehended precisely, but the place located in North of Nashik city in Maharashtra is a magnet in itself.

When Lord Rama and Lady Sita were asked to leave Ayodhya by beloved Step-Mother Kaikeyi under the influenced of Manthara her maid, the two left. However, compelled by the love for his elder brother, Lakshman also left with the couple on exile for 14 years. Panchavati was the place where the trio made their home while serving the exile. The word literally meaning 'garden of five banyan trees'. The trees could still be seen in the temple premises nearby Sita Gufa. With Godavari flowing nearby, even the scary forests with roving animals became heavenly sanctity.[1]

In Mahabharata

Vana Parva, Mahabharata/Book III Chapter 81 mentions names of Tirthas (Pilgrims). Panchavata (पञ्च वट) (Tirtha) is mentioned in Mahabharata (III.81.141). [2]....one should next repair to the woods of Panchavata (पञ्च वट) (III.81.141). By a sojourn thither, one earneth much virtue and becometh adored in the regions of the virtuous.

पंचवटी

विजयेन्द्र कुमार माथुर[3] ने लेख किया है ...पंचवटी (AS, p.514) नासिक ज़िला, महाराष्ट्र में गोदावरी नदी के निकट स्थित एक प्रसिद्ध स्थान है। यहाँ पर भगवान श्रीराम, लक्ष्मण और सीता सहित अपने वनवास काल में काफ़ी दिनों तक रहे थे और यहीं से लंका के राजा रावण ने माता सीता का हरण किया था।

नामकरण: मरीच का वध पंचवटी के निकट ही मृगव्याधेश्वर में हुआ था। गृघराज जटायु से श्रीराम की मैत्री भी यहीं हुई थी। पंचवटी के नामकरण का कारण पंचवटों की उपस्थिति कही जाती है- 'पंचानां वटानां समाहार इति पंचवटी'। ये पंचवट इस प्रकार हैं- 1. अश्वत्थ, 2. आमलक, 3. वट, 4. विल्ब, 5. अशोक.

वाल्मीकि रामायण, अरण्यकांड 15 में पंचवटी का मनोहर वर्णन है, जिसका एक अंश इस प्रकार है- 'अयं पंचवटी देश: सौम्य पुष्पितकानन:, यथा ख्यातमगस्त्येन मुनिना भावितात्मना। इयं गोदावरी रम्या पुष्पितैस्तरुभिवृंता, हंसकारंडवाकीर्णा चक्रवाकोपशोभिता। नातिन्दूरे चासन्ने मृग यूथ निपीडिता। मयूरनादित रम्या: प्रांशवो बहुकंदरा:, दृश्यन्ते गिरय: सौम्या: फुल्लैस्तरुभिरावृत्ता। सौवर्ण: राजतैस्ताभ्रैर्देशेदेशे तथा शुभे: गवाक्षिता इव भान्ति गजा: परमभक्तिभि:'. वाल्मीकि रामायण, अरण्यकांड 15, 2-12-13-14-15.

उपर्युक्त उद्धरणों से ज्ञात होता है कि पंचवटी गोदावरी नदी के तट पर स्थित थी। कालिदास ने रघुवंश में कई स्थानों पर पंचवटी का वर्णन किया है- 'आनन्दयत्युन्मुखकृष्णसारा दृष्टाचिरात् पंचवटी मनो मे'-- 'रघुवंश 13, 34. 'पंचवट्यां ततोराम: शासनात् कृंभजन्मन: अनषोढस्थितिस्तस्थौ विंध्याद्रिप्रकृताविव' रघुवंश 12, 31 (इस श्लोक में [p.515]: वाल्मीकि रामायण अरण्यकांड 15, 12 के समान ही, अगस्त्य ऋषि की आज्ञानुसार श्री राम का पंचवटी में जाकर रहना कहा गया है) रघुवंश 13, 35 में पंचवटी को गोदावरी नदी के तट पर स्थित बताया गया है- 'अत्रानुगोदं मृगया निवृत्तस्तरंगत्रातेन विनीतखेद: रहस्यदुत्संग निषण्णमूर्धा स्मरामि वानीरगृहेषु सुप्त:'।

भवभूति ने उत्तर रामचरित, द्वितीय अंक में पंचवटी का श्रीराम के द्वारा उनकी पूर्व स्मृति जनित उद्वेग के कारण करुणाजनक वर्णन किया है- 'अत्रैव सा पंचवटी यत्र चिरनिवासेन दिविधविस्रम्भातिप्रसंगसाक्षिण: प्रदेशा: प्रिपाया: प्रियसखी च वासंती नाम वन देवता:, 'यस्यां ते दिवसास्तया सह मयानीता यथा स्वेगृहे, यत्संबंध कथा भिरेव सततं दीर्घाभिरास्थीयत। एक: संप्रतिनाशित प्रियतमस्तामेव राम: कथं, पाप: पंचवटी विलोकयतु वा गच्छत्व संभाव्य वा'। 2,28.

अध्यात्मरामायण अरण्यकांड 3, 48 में पंचवटी को गौतमी (=गोदावरी) के तट पर स्थित बताया है--'अस्ति पंचवटी नाम्ना आश्रमौ गौतमीतटे'. यह स्थान अगस्त्य के आश्रम से दो योजन पर बताया गया है. --'इतो योजनयुग्मे तु पुण्यकाननमंडित:' वाल्मीकि और कालिदास के समान ही अध्यात्मरामायण में पंचवटी को अगस्त्य ने श्रीराम के रहने के लिए उपयुक्त बताया था। वाल्मीकि रामायण, अरण्यकांड 3, 48

तुलसीदास ने रामचरितमानस के अरण्यकांड में अगस्त्य द्वारा ही श्रीराम को पंचवटी भिजवाया है- 'हे प्रभु परम मनोहर ठाऊं, पावन पंचवटी तेहि नाऊं। दंडक वन पुनीत प्रभु करहू, उप्रशाप मुनिवर के हरहू। चले राम मुनि आयुस पाई, तुरतहि पंचवटी नियराई। गृधराज सों भेंट भई बहुविधि प्रीति दृढ़ाय, गोदावरी समीप प्रभु रहे पर्णगृह छाय'।

पंचवटी जनस्थान या दंडक वन में स्थित थी। पंचवटी या नासिक से गोदावरी का उद्गम स्थान त्र्यंम्बकेश्वर लगभग 20 मील (लगभग 32 कि.मी.) दूर है।


इसी स्थान पर लक्ष्मण ने शूर्पणखा के नाक और कान काट लिए थे। यहाँ श्रीराम का बनाया हुआ एक मन्दिर खण्डहर रूप में विद्यमान है। पंचवटी का वर्णन 'रामचरितमानस', 'रामचन्द्रिका', 'साकेत', 'पंचवटी' एवं 'साकेत-सन्त' आदि प्राय: सभी रामकथा सम्बन्धी काव्यों में मिलता है।[4]

External links

References

  1. https://www.tourmyindia.com/pilgrimage/panchavati.html
  2. ततः पञ्च वटं गत्वा बरह्म चारी जितेन्द्रियः, पुण्येन महता युक्तः सतां लॊके महीयते (III.81.141)
  3. Aitihasik Sthanavali by Vijayendra Kumar Mathur, p.514-515
  4. भारतकोश-पंचवटी