Pindaraka

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Location of Pindaraka on District map of Jamnagar

Pindaraka (पिण्डारक) was a Nagavanshi ruler of period of Mahabharata. Pindaraka Tirtha is located at Pindara village in Jamnagar district of Gujarat.

Variants

  • Pindaraka पिंडारक, कठियावाड़, गुजरात, (AS, p.556)

Location

Pindaraka Tirtha is situated at village Pindara 14 km from town Bhatiya, 60 km from Dwarka and 35 km from Bhopalka Railway station.

History

पिंडारक

विजयेन्द्र कुमार माथुर[1] ने लेख किया है ...पिंडारक (AS, p.556) द्वारका से 20 मील दूर प्राचीन तीर्थ है. कहा जाता है कि यहां दुर्वासा ऋषि का आश्रम था. महाभारत वन पर्व में इसका उल्लेख प्रभास के साथ [p.557] है-- 'प्रभासं चॊदधौ तीर्थं त्रिदशानां युधिष्ठिर, तत्र पिण्डारकं नाम तापसाचरितं शिवं, उज्जयन्तश्च शिखरी क्षिप्रं सिद्धिकरॊ महान्'. किंवदंती है कि पांडव महाभारत युद्ध के पश्चात इस स्थान पर अपने मृत संबंधियों का श्राद्ध करने के लिए आए थे. विष्णु पुराण के अनुसार इसी स्थान पर यादवों को मुनिजनों ने उनकी धृष्टता पर क्रुद्ध होकर शाप दिया था जिसके फलस्वरूप वे समूल नष्ट हो गए थे--'विश्वामित्रस्तथा कण्वो नारदश्च महामुनि: पिंडारके महातीर्थे दृष्टवा यदुकुमारकै': विष्णु पुराण 5,31,6.

पिण्डारक तीर्थ

पिण्डारक तीर्थ - द्वारका से 60 किमी दूर स्थित है। द्वारका-जामनगर रेल लाईन पर स्थित भोपालका स्टेशन से 35 किमी दूर है। यहाँ पिंड दान किया जाता है। भाटिया से 14 कि.मी. दूर पिंडारा नाम का गाँव है। [2]


एक तीर्थ स्थान है, जो प्रभास के निकट 'द्वारवती' (द्वारका) में स्थित है। इसे गुजरात में द्वारका से सोलह मील पूर्व में स्थित बताया गया है। इस तीर्थ का पुलस्त्य-भीष्म, गौतम-आंगिरस एवं धौम्य-युधिष्ठिर संवाद में उल्लेख आता है। पद्म लक्षण मुद्राएँ और पद्म त्रिशूल अंकित चिह्न यहाँ पर आज भी मिल जाते हैं। यहाँ पर महादेव का सान्निध्य है, और पितृ-पिंड सरोवर में डालने से पानी पर उतराते हैं। इसीलिए यह महान् पिंड तारक (पिंडारक) तीर्थ माना जाने लगा। [3]

In Mahabharata

Pindaraka (पिण्डारक) (Naga) is mentioned in Mahabharata (I.31.11), (I.52.16), (I.177.18),

Pindaraka (पिण्डारक) (Tirtha) is mentioned in Mahabharata (III.80.82), (III.86.18),


Adi Parva, Mahabharata/Mahabharata Book I Chapter 35 gives us Names of Chief Nagas. Pindaraka (पिण्डारक) (Naga) is mentioned in Mahabharata (I.31.11). [4]


Adi Parva, Mahabharata/Book I Chapter 52 mentions the names of Nagas who fell into the fire of the snake-sacrifice. Pindaraka, from Nagas of race of Dhritarashtra, is mentioned in Mahabharata (I.52.16). [5]....Rishabha, Vegavan, Pindaraka; Mahahanu, Raktanga, Sarvasaranga, Samriddha, Pata and Vasaka ....


Adi Parva, Mahabharata/Book I Chapter 177 gives us list of Kshatriyas who came on Swayamvara of Draupadi. Pindaraka is mentioned in (I.177.18). [6].... Viduratha, Kanka, Samika with Saramejaya, the heroic Vatapati, Jhilli, Pindaraka, the powerful Usinara, all these of the Vrishni race....


Vana Parva, Mahabharata/Book III Chapter 80 mentions Merit attached to tirthas: Pindaraka (पिण्डारक) (Tirtha) is mentioned in Mahabharata (III.80.82). [7].... the tirtha known by the name of Varadana (वरदान) (3.80.81) , where (the Rishi) Durvasha had given a boon unto Vishnu. A man by bathing in Varadana obtaineth the fruit of the gift of a thousand kine. One should next proceed with subdued senses and regulated diet to Dwaravati (द्वारवती) (3.80.82), where by bathing in Pindaraka (पिण्डारक) (3.80.82), one obtaineth the fruit of the gift of gold in abundance. O blessed one, it is wonderful to relate that in that tirtha, to this day, coins with the mark of the lotus and lotuses also with the mark of the trident, are seen. O represser of heroes! And O bull among men, the presence of Mahadeva is there....

Vana Parva, Mahabharata/Book III Chapter 86 mentions the sacred tirthas of the south. Pindaraka (पिण्डारक) (Tirtha) is mentioned in Mahabharata (III.86.18). [8]....on the sea-coast is the Chamasonmajjana (चमसॊन्मज्जन) (III.86.17), and also Prabhasa (प्रभास) (III.86.17), that tirtha which is much regarded by the gods. There also is the tirtha called Pindaraka (पिण्डारक) (III.86.18), frequented by ascetics and capable of producing great merit. In that region is a mighty hill named Ujjayanta (उज्जयन्त) (III.86.18) which conduceth to speedy success.

External links

See also

Reference

  1. Aitihasik Sthanavali by Vijayendra Kumar Mathur, p.556-557
  2. दिव्य द्वारका, प्रकाशक दण्डी स्वामी श्री सदानन्द सरस्वती जी, सचिव श्रीद्वारकाधीश संस्कृत अकेडमी एण्ड इंडोलॉजिकल रिसर्च द्वारका गुजरात, पृ.76
  3. भरतकोष-पिंडारक
  4. नागः शङ्खनकश चैव तथा च सफण्डकॊ ऽपरः, क्षेमकशमहानागॊ नागः पिण्डारकस तथा (1.35.11)
  5. ऋषभॊ वेगवान नाम पिण्डारक महाहनू, रक्ताङ्गः सर्वसारङ्गः समृद्धः पाट राक्षसौ (1.57.16)
  6. विडूरथशकङ्कशसमीकः सारमेजयः, वीरॊ वातपतिश चैव झिल्ली पिण्डारकस तथा, उशीनरशविक्रान्तॊ वृष्णयस ते परकीर्तिताः (1.177.18)
  7. वरदाने नरः सनात्वा गॊसहस्रफलं लभेत, तॊ द्वारवतीं गच्छेन नियतॊ नियताशनः, पिण्डारके नरः सनात्वा लभेद बहुसुवर्णकम (III.80.82)
  8. तत्र पिण्डारकं नाम तापसाचरितं शुभम, उज्जयन्तश च शिखरी कषिप्रं सिद्धिकरॊ महान (III.86.18)

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