Rainwater harvesting

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Author:Laxman Burdak, IFS (R)

Kishananu Pakka Johad of Thathawata
Rainwater storage in House

Rainwater harvesting is the collection and storage of rain water from a roof-like surface and redirected to a tank, cistern, deep pit (well, shaft, or borehole). Its uses include watering gardens, livestock, irrigation, domestic use with proper treatment, and domestic heating. The harvested water can also be committed to longer-term storage or groundwater recharge. Rainwater harvesting is one of the simplest and oldest methods of self-supply of water for households.

वर्षा जल संग्रहण एवं भंडारण का महत्व

वर्षा जल प्रकृति की एक अमूल्य देन है. स्वास्थ्य लाभ और आत्मनिर्भरता के मद्देनजर वर्षा जल का महत्व इस पोस्ट में बताने का प्रयास किया गया है. प्रारंभ में यह बताया गया है कि किस तरह वर्षा जल आपके स्वास्थ्य के लिए उपयोगी हो सकता है और आप स्वयं के लिए यह व्यवस्था सरल तरीके से किस प्रकार कर सकते हैं. सुविधा के लिए गणना भी दी गई हैं. यह भाग सभी के स्वास्थ्य के लिए उपयोगी होने से अवश्य पढ़ें. बचपन से मैंने पानी के अभाव को बहुत नजदीक से देखा और भोगा है. इसलिये कुछ अधिक गहराई में जाते हुये मैंने विभिन्न प्रकार के जल स्रोतों के विकास का इतिहास और संरचनाएं भी प्रकाश में लाने का प्रयास किया है. राजस्थान के मेरे मूल गाँव में जोहड़ से वर्षा का मीठा पानी मटके से लाने से शुरू कर बृहत स्तर पर बड़े बांध में वर्षा जल भंडारण का अनुभव शेयर कर रहा हूँ. ऐतिहासिक, आर्थिक और भौगोलिक ज्ञान बढ़ाने की रुचि हो तो यह भाग भी पढ़ सकते हैं.

मीडिया में हम देखते हैं कि उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे घनी वर्षा और नदियों वाले प्रदेशों में जब बाढ़ आती है तो लोग सरकार से पीने के पानी की माँग करते दिखते हैं जबकि ऊपर से भारी वरसात भी हो रही होती है. वे आराम से किसी बर्तन में ही पीने का पानी एकत्रित कर सकते हैं. राजस्थान के मरू-प्रदेश में कम पानी होते हुये भी पीने के पानी की माँग करते लोग मीडिया में शायद ही दिखते हैं. राजस्थान में बरसात बहुत कम होती है और वह भी बहुत सीमित अवधि में. राजस्थान के अधिकांश भागों में पानी या तो खारा है या जहां खारा नहीं है वहां पर पानी में फ्लोराइड की मात्रा बहुत बढ़ गई है. इससे स्वास्थ्य पर बहुत विपरीत प्रभाव पड़ रहा है.

लोकोक्तियों और मुहावरों में वर्षा और जल

  • अम्बर राच्यो, मेह माच्यो | हिन्दी – आसमान का लाल होना वर्षा का सूचक है।
  • अम्मर पीळो में सीळो । हिन्दी – आसमान का पीला होना वर्षा का सूचक है।
  • असलेखा बूठां, बैदां घरे बधावणा । हिंदी - असलेखा नक्षत्र में वर्षा हो तो बैद-हकीमों के घर बधाई बँटे, मतलब रोग बढ़ते हैं ।
  • आदरा भरै खाबड़ा, पुनबसु भरै तलाव।
  • आभा राता मेह माता, आभा पीला मे सीला।
  • आसाडां धुर अस्टमी, चन्द सेवरा छाय। च्यार मास चूतो रहै, जिउं भांडै रै राय॥
  • आसाडे सुद नवी नै बादल ना बीज। हलड़ फाडो ईंधन करो, बैठा चाबो बीज॥
  • आसाढ़ै सुद नोमी, घण बादल घण बीज। कोठा खेर खंखेर दो, राखो बलद ने बीज॥
  • आसोजी रा मेहड़ा, दोय बात बिनास। बोरटियां बोर नहीं, बिणयाँ नहीं कपास॥
  • आसोज्यां में पिछवा चाली, भर भर गाडा ल्याई।
  • उन्नाळै खाटु भळी सियाळे अजमेर। नागाणौ नितको भळो सावणं बिकानेर॥
  • ऊमस कर घृत माढ गमावे, झांड कीड़ी बहार लावे | नीर बिनां चिडियां रज न्हावै, तो मेह बरसे धर मांह न मावै।
  • पपैया पीऊ–पीऊ करेँ, मोरा घणी अजग्म। छत्र करै मोरिया सिरे, नदिया बहे अथग्म॥ हिंदी– मोर के नाचने पर तथा पपीहे के पीहू–पीहू करने पर भारी वर्षा सम्भावित रहती है।
  • पवन गिरि छूटे पुरवाई। धर गिर छोबा, इन्द्र धपाई॥ हिंदी– पूरब से हवा चलने पर वर्षा धरती व पर्वत तक को तृप्त करेगी।
  • पहली रोहण जल हरे, बीजी बहोतर खाय, तीजी रोहण तिण हरै, चौथी समन्दर जाय।
  • पाणी रो तोड़ो अठे,जोड़ो जल़ री बूंद । बिरखा जल़ भेल़ो करो,ढ़ोल़ो मत चख मूंद ।। (चख =आंख) (दयाराम महरिया)
  • पिरवा पर पिछवा फिरै, घर बैठी पणिहार भरै।
  • पैली पडवा गाजै, दिन बहत्तर बाजै | हिंदी– आषाढ़ की प्रतिपदा को बादल गरजने पर हवा तो चलेगी पर बरसात नहीँ होगी।
  • पोही मावस मूल बिन, रोहिण (बिन) आखातीज। श्रवण बिन सलूणियुं क्यूं बावै है बीज?
  • बजनस पवन सुरिया बाजै। घड़ी पलक मांही मेह गाजै॥ हिंदी– उत्तर–पश्चिम से हवा चलने पर शीघ्र वर्षा होगी।
  • बादल कर गर्मी करै, जद बरसण की आस।
  • बादल की छाया सै कै दिन काम सरै?
  • बादल में दिन दीखै, फूड़ दलै न पीसै।
  • बादल रहे रात को बासी, तो जाणो चोकस मेह आसी | हिंदी– पहले वाली रात के बादल सुबह तक छाये रहेँ तो वर्षा निश्चित रूप से होती है।
  • बिगड़ी घिरत बिलोवणो, नारी होय उदास। असवारी मेँह की, रहे छास की छास॥ हिंदी– दही बिलौने पर घी बिखर–बिखर जाये तो समझो जोर की वर्षा होगी।
  • बिजनस पवन सूरिया बाजे, घड़ी पालक मांहे मेह गाजे।
  • भादरवे जग रेलसी, छट अनुराधा होय। डंक कहे हे भड्डली, करो न चिंत कोय।
  • भादवै की रूत भली, भली घट बसन्त।
  • मावां पोवां धोंधूकार, फागण मास उड़ावै छार, चैत मासा बीज ल्हकोवै, भर बैसाखां केसू धोवै, जेठ जाय पन्तो तो कुण रोकै सावण भादवा जल बरसंतो।
  • मेवा तो बरसँता भला, होणी होवॅ सो होय ।
  • मेवां की माया, बिरखां की छाया।
  • मेह की रुख तो भदवड़ा'ई बता दें ।
  • मेहा तो तित बरस सी, जित राजी होसी राम।
  • राजा जोगी अगन जळ, इण की उलटी रीत । डरता रहियो परसराम, ये थोडी पाळै प्रीत ।।
  • राजा मान्या सो मानवी, मेवां मानी धरती।
  • वात, पित युक्त देह ज्यांक, होय रहे धाम–धूम। अण भणियां आलम कथी कहे मेहा अतिघोर॥ हिंदी – वातयुक्त व्यक्ति को यदि गर्मी से सिर दर्द करे तो वर्षा की सम्भावना होती है।
  • शुक्रवार की बादली, रही शनिचर छाय। डंक कहे है, भडली बरस्यां बिना न जाय॥ हिंदी – शुक्रवार को आकाश पर बने बादल यदि शनिवार तक रहेँ तो वर्षा अवश्य होती है।
  • संवारै रो गाजियो ऐलौ नहीँ जाय | हिंदी – सुबह मेघ–गर्जन निश्चित रूप से वर्षा का संकेत है।
  • सांप, गोयरा, डेडरा, कीड़ी–मकोड़ी जाण। दर छोड़ै बाहर भागे, नहीँ मेह की हाण॥ हिंदी – यदि मेँढक, चीँटी, साँप आदि अपने–अपने स्थान पर जाने लगेँ तो भारी वर्षा की सम्भावना होती है।
  • सावण भलो सूर'यो भादुड़ो पिरवाय, आसोजां मैं पछवा चाली गाडा भर भर ल्याव ।* सावण में तो सूर्यो चालै, भादूड़ै पुरवाई। आस्योजां में नाडा टांकण, भरभर गाडा ल्याई॥
  • सूरज कुंड अर चांद जलेरी, टूटा बीबा भरगी डेरी।
  • सूरज कुंड और चन्द्र जलेरी। टूट्या टीबा भरगी डेरी॥ हिंदी – चन्द्रमा के चारोँ ओर जलेरी तथा सूरज के चारोँ ओर कुण्ड होने पर भारी वर्षा की सम्भावना होती है।

वर्षा जल की आवश्यकता क्यों?

Rainwater harvesting tank

पिछले कुछ वर्षों से मैं जयपुर में निवास कर रहा हूं. यह देखने में आ रहा है कि अधिकांश बुजुर्ग लोगों के पैरों में और घुटनों में दर्द होने लगा है. बहुत लोगों को पथरी की समस्या है. आजकल हमने अपने प्राकृतिक जीवन को छोड़कर कृत्रिम जीवन पद्धति को अपना लिया है. अपना जो प्राकृतिक खानपान था वह भूल गए हैं. यह पता लगा कि इन समस्याओं का कारण वास्तव में यहां प्रदाय किया जा रहा पेयजल है. कुछ क्षेत्रों में यहां कुए का पानी प्रदाय किया जाता है. आजकल जमीन का पानी कम होने के कारण कुओं या बोरिंग की गहराई बहुत ज्यादा हो गई है. पानी के साथ बहुत साल्ट आने लगे हैं. कुछ क्षेत्रों में फ्लोराइड बहुत ज्यादा है. यह फ्लोराइड शरीर में जोड़ों में दर्द के लिए जिम्मेदार है. दाँतों की और नशों की अनेक समस्याएँ पैदा हो रही हैं. लोग इस जमीनी पानी को फिल्टर करने के लिए आर.ओ. का प्रयोग कर रहे हैं. आरो के प्रयोग में लगभग तीन चौथाई पानी बेकार जाता है. जो पानी फिल्टर हो जाता है उसमें से भी सारे मिनरल आदि निकल जाते हैं जिसके कारण शरीर में कैल्शियम की कमी हो जाती है. कैल्शियम को शरीर में हजम करने के लिए विटामिन D3 की आवश्यकता होती है. लोग डाक्टरों के पास जाते हैं तो संपूर्ण शरीर की जाँच लिख देते हैं. ये जाँचें बहुत महंगी हैं. आजकल सारे डॉक्टर कैल्शियम, विटामिन बी-12 और विटामिन डी-3 तो लगभग सभी लोगों, खास तौर पर स्त्रियों को देने लगे हैं. इससे अनावश्यक रूप से लोगों का खर्च बढ़ गया है. हाँ डॉक्टरों की आमदनी बढ़ गई है और उन कंपनियों की भी आमदनी बढ़ गई है जो इन उत्पादों का निर्माण करती हैं. गाँवों तक में लोग मिनरल वाटर का प्रयोग करने लगे हैं जिसकी कोई विश्वसनीयता नहीं है और खर्चा बढ़ गया वह अलग. स्वास्थ्य संबंधी इस समस्या पर गंभीर रूप से राष्ट्रीय स्तर पर चिंतन कर निराकरण करने की आवश्यकता है. परंतु ऐसा होना कहीं प्रतीत नहीं होता.

पुराने जमाने में जब शहरों में जल निकास की नालियाँ और सिविर लाइन नहीं बनी थी तब भवनों की संरचना ऐसी होती थी की छतों का पानी खुली नालियों से सीधा फर्स अथवा जमीन पर छोड़ा जाता था. गांवों में अब भी यही व्यवस्था है. वहां छत से सीधा आपको पानी मिल जाएगा. परंतु शहर में आजकल छत के पानी को नालियों के माध्यम से सिविर लाइन में जोड़ दिया गया है. इससे छतों का पानी बहकर शहर से बाहर चला जाता है. यह पानी जमीन में नहीं जाता है जिससे शहरी क्षेत्र की जमीन वर्षा जल से रिचार्ज नहीं हो पाती है. इसका पर्यावरण पर बहुत विपरीत प्रभाव पड़ता है. आजकल वर्षा के समय जो चुभने वाली गर्मी और पसीना आता है यह इसी बात का परिणाम है. पुराने समय में जयपुर में वर्षा शुरू होते ही हवायें ठंडी हो जाती थी परंतु आजकल ऐसा नहीं होता है. इसलिए हमें अपने घरों में और आसपास भी कुछ कच्ची जमीन अवश्य छोड़नी चाहिए जिसे वर्षा का पानी सीधा जमीन में जा सके. घरों के बाहर भी सड़कों के अलावा दोनों तरफ पक्के खुर्रे बना दिए हैं. इसलिए एक इंच भी जमीन कच्ची नहीं है. वर्षा का सारा का सारा पानी बहकर बाहर जाता है. तेज वर्षा होने पर शहर में बाढ़ की स्थिति बन जाती है. यह शहर के लिए उचित प्रबंधन नहीं है.

वर्षा जल के फायदे

वर्षा के पानी का प्रयोग करने से पैरों तथा घुटनों में जो दर्द होता है उसमें बहुत राहत महसूस होती है. जो लोग पहले कुवों का साल्ट वाला हार्ड पानी पीते थे, जिसके कारण घुटनों में दर्द होने लगा था, उनके द्वारा वर्षा जल का उपयोग करने पर पैरों में दर्द कम होना अनुभव किया गया. वर्षा जल पीने में मीठा होता है और इससे पेट ठीक रहता है और हाजमे में भी बहुत सुधार होता है. कुए के पानी से दालें और राजमा नहीं पकती हैं जो वर्षा जल में बहुत आराम से पकती हैं. इससे शरीर में पथरी नहीं बनती है. कोरोना काल में तो यह और भी उपयोगी है. यह आपको बाहरी पानी के दुष्प्रभावों से बचाता है. किसी कारण जल प्रदाय में समस्या हो जाए तो आपको कोई चिंता नहीं है. यह कार्य आपको आत्मनिर्भर बनाता है. वर्षा जल संग्रहण का काम एक कम खर्चीला और आसान सा परम्परागत प्रयोग है जो कोई भी घर या खेत में कर सकता है.

घरेलू विधि से वर्षा जल संग्रहण

घरेलू विधि से वर्षा जल संग्रहण

हमने एक प्रयोग किया कि छत का पूरा पानी जो नालियों से सिविर लाइन में चला जाता था, उसमें से गैरेज का पाइप काट कर एक टंकी में जोड़ कर उस में यह पानी भंडारित किया गया. पीने के लिए यही पानी प्रयोग में लाते हैं. घरेलू विधि से वर्षा जल संग्रहण संग्रहण के लिए आपको एक पक्की छत की जरूरत होती है और उस पानी को भंडारित करने के लिए आवश्यकतानुसार केपेसिटी की टंकी. आपको अपने लिए कितनी छत और कितनी बड़ी टंकी लगेगी इसकी गणना नीचे दिये तरीके से की जा सकती है.

जल भंडारण की गणना

एक आदमी रोज औसत 3 लीटर पानी पीता है. उसको महीने में लगभग 100 लीटर पानी चाहिए. 12 महीने के लिए पानी संग्रहित करने हेतु कुल 1200 लीटर क्षमता की टंकी चाहिए. वर्षा का पानी संग्रहण के लिए यह गणना मेरी आवश्यकता के अनुसार दे रहा हूँ. इसी आधार पर आप भी गणना कर सकते हैं. मेरा घर का गैरेज 15 फीट (=450 cm) लंबा और 10 फुट (=300 cm) चौड़ा है. इसका क्षेत्रफल वर्ग सेंटीमीटर में निकालें तो 450 x 300 = 135,000 वर्ग सेमी होता है. जयपुर की औसत वर्षा कम से कम भी मानें तो 500 मिली है अर्थात 50 सेंटीमीटर. इन तीनों को गुणा करने पर 6750,000 घन सेंटीमीटर प्राप्त होता है. 1 लीटर = 1000 घन सेंटीमीटर होता है. इस तरह मेरे गैरेज की छत से हमें कुल 6750 लीटर पानी प्राप्त होगा. मानलो कि शुरू का कुछ पानी 30 प्रतिशत (=2025 लीटर) हम बहने देते हैं ताकि साफ़ पानी मिलने लगे. इस प्रकार इस छत से हमें 4725 लीटर आराम से प्राप्त हो जाता है. यह पानी तीन-चार व्यक्तियों के परिवार के लिए साल भर पीने के लिए पर्याप्त है. इसमें यह ध्यान रखना है कि छत को वर्षा से पहले साफ़ करलें. पहली वर्षा में छत के पानी को बाहर जाने दो इसको संग्रहित मत करो. इसके लिए हमने एक नल अलग से दिया है. जब छत का पानी साफ़ आने लगे तो निकासी वाला नल बंद कर दें और टंकी का नल खोल दें. टंकी के मूंह पर आप एक कपड़ा लगा सकते हैं ताकि कोई कचरा टंकी में न जाए. जब टंकी भर जाए तो टंकी का नल बंद कर दें और नीचे का निकास का नल खोल दें. यह आपका जल भंडारण कार्य पूर्ण हो गया.

प्राकृतिक जीवन

प्रकृति ने हर जगह के लिए अलग-अलग खानपान और वातावरण प्रदान किया है. जिसके कारण अलग-अलग जगह के लोग भिन्नता रखते हैं और हर जगह के व्यक्तियों में और पशुओं में कुछ अलग विशेषता होती है. उदाहरण के लिए नागौर के बैल की नस्ल बहुत प्रसिद्ध है. यह इसलिये था कि नागौर के जलवायु और खानपान ने इसकी नस्ल को संरक्षित कर रखा था. परंतु आजकल नागौर के बैल को गवार खाने को नहीं मिलता, बाहर से लाई हुई नकली चूरी देते हैं. इसलिए नागौर के बैल में आज वह गुण नहीं रह गया है जो पहले था. आयुर्वेद का एक मूल मंत्र है—“यस्य देशस्य यो जंतुस्तज्जं तस्यौषधम हितम” जो प्राणी जहां जन्मा है उसके लिए उसी देश की औषधियां एवं आहार-विहार ही हितकारी होते हैं.

बचपन और मीठा पानी

तालाब से पानी लाती पनिहारिन

हमारे गांव ठठावता जिला चुरू, राजस्थान में में पानी थोड़ा खारा था परंतु इतना खाना भी नहीं था कि पी न सकें. हमारे गांव से पश्चिम में कादिया गाँव है जहां पर बहुत खारा पानी था. वहाँ के लोग हमारे गाँव से पानी लेजाकर पीते थे. हमारे गांव से उत्तर-पूरब दिशा में बिरमसर गाँव है जहां का पानी थोड़ा मीठा था. वर्ष 1985 में राजीव गांधी मिशन के तहत बिरमसर से पानी नल द्वारा प्रदाय किया जाने लगा. इसका परिणाम यह हुआ कि पहले हमारे गाँव में किसी व्यक्ति के बाल सफेद नहीं होते थे परंतु बिरमसर के पानी के प्रयोग के साथ ही लोगों के बाल सफेद होने लगते हैं. इसलिए जरूरी है कि जो जिस भाग में रहता है वहां का खाना खाए और वहां का ही पानी पिए तभी वह मूल रूप से उस स्थान विशेष की विशेषता आती है.

हमारे गाँव में पानी माध्यम खारा होने के कारण शरदी में तो इस पानी से कोई दिक्कत नहीं होती थी परंतु गर्मी में इससे पेट खराब होता था. गर्मी के समय कुए का खारा पानी नहीं पीते थे. इसलिए कुंड में संग्रहित वर्षा का पानी ही पीते थे. 70 के दशक से पहले गांव में धनवान लोगों के पास ही कुंड होते थे. गांव के गरीब लोग उनसे मांग कर एक-एक मटका मीठा पानी लाते थे जिसको ‘पालर’ पानी कहते थे. इस पानी को घर में अलग रखा जाता था और इसको घी की तरह प्रयोग करते थे. एक भी बूंद बर्बाद करने का तो सवाल ही नहीं था.

वर्षा जल भंडारण के तरीके

राजस्थान में कम वर्षा होने के कारण वर्षा के जल को संग्रहण कर साल भर उपयोग करने की परंपरा है. इसके लिए बावड़ी, जोहड़ और कुंड मुख्य रूप से निर्माण किए जाते हैं. रेतीली मिट्टी होने के कारण तालाब उपयोगी नहीं हैं.

हरसावा-फतेहपुर की बावड़ी

बावड़ी में जल भंडारण: बावड़ी या बावली उन सीढ़ीदार कुँओं , तालाबों या कुण्डो को कहते हैं जिन के जल तक सीढ़ियों के सहारे आसानी से पहुँचा जा सकता है. भारत में बावड़ियों के निर्माण और उपयोग का लम्बा इतिहास है. गुजराती में 'वाव' कहते हैं. संस्कृत के प्राचीन साहित्य में इसके कई नाम हैं, एक नाम है-वापी. इनका एक प्राचीन नाम 'दीर्घा' भी था. वापिका, शकन्धु, कर्कन्धु आदि भी इसी के संस्कृत नाम हैं. कात्यायन ने दो तरह की बावड़ियों का उल्लेख किया है जो शकन्धु, और कर्कन्धु नाम से जानी जाती हैं और ये शक तथा कर्क लोगों से संबंधित रही हैं.[1] [2]

जल प्रबन्धन की परम्परा प्राचीन काल से हैं. हड़प्पा नगर में खुदाई के दौरान जल संचयन प्रबन्धन व्यवस्था होने की जानकारी मिलती है. प्राचीन अभिलेखों में भी जल प्रबन्धन का पता चलता है. पूर्व मध्यकाल और मध्यकाल में भी जल सरंक्षण परम्परा विकसित थी. पौराणिक ग्रन्थों में तथा जैन बौद्ध साहित्य में नहरों, तालाबों, बाधों, कुओं बावडियों और झीलों का विवरण मिलता है. कौटिल्य के अर्थशास्त्र में जल प्रबन्धन का उल्लेख मिलता है. चन्द्रगुप्त मौर्य के जूनागढ़ अभिलेख में सुदर्शन झील और कुछ वापियों के निर्माण का विवरण प्राप्त है. इस तरह भारत में जल संसाधन की उपलब्धता एवं प्राप्ति की दृष्टि से काफी विषमताएँ मिलती हैं, अतः जल संसाधन की उपलब्धता के अनुसार ही जल संसाधन की प्रणालियाँ विकसित होती हैं. बावड़ियां हमारी प्राचीन जल संरक्षण प्रणाली का आधार रही हैं- प्राचीन काल, पूर्वमध्यकाल एवं मध्यकाल सभी में बावडि़यों के बनाये जाने की जानकारी मिलती है. दूर से देखने पर ये तलघर के रूप में बनी किसी बहुमंजिला हवेली जैसी दृष्टिगत होती हैं.

बावड़ी-निर्माण का यह कार्य 11वीं से 16वीं शताब्दी में अपने पूर्ण चरम पर रहा.[3]

ग्राम ठठावता, जिला चूरु राजस्थान में स्थित पक्का जोहड़

जोहड़ में जल भंडारण: हमारे पूर्वजों द्वारा पीने के पानी की व्यवस्था गांव में बहुत ही सुंदर तरीके से की गई थी. हर गांव में एक पक्का जोहड़ होता था जिसके चारों तरफ जल ग्रहण क्षेत्र छोड़ा हुआ होता था. यह जोहड़ सार्वजनिक कामों के लिए प्रयोग में आता था. ग्राम पंचायत द्वारा इस पानी को शुद्ध बनाये रखने के लिए कुछ नियम बनाये गए थे जिनका पालन कड़ाई से किया जाता था.

ग्राम ठठावता जिला चूरु राजस्थान में स्थित पक्का जोहड़ का साथ में चित्र दिया गया है. किंवदंती के अनुसार लगभग 1200 ई. में गांव को बसाने वाले ठठा नाम के भड़ीया जाट ने अपने परिवार के सदस्य किसना के नाम पर किसनाणु नामक चारागाह छोड़ा था, जो गांव से पूर्व की ओर स्थित है. इसमें पक्का जोहड़ का निर्माण गांव में मावली देवी के मंदिर में पूजा करने वाली पंडी दादी ने करवाया था. जोहड़ के नजदीक एक धर्मशाला भी बनी हुई है जिस पर एक शिलालेख संवत 1991 (=1934 ई.) अंकित है. इसी साल जोहड़ और धर्मशाला का निर्माण पूरा हुआ था. यही जोहड़ गांव के पीने के पानी की सार्वजनिक पूर्ति करता है.

बासणी, तहसील लक्ष्मणगढ़, जिला सीकर, राजस्था का जोहड़

इसी तरह गाँव बासणी, तहसील लक्ष्मणगढ़, जिला सीकर, राजस्था के जोहड़ की जानकारी प्राप्त की गई. इसका भी चित्र साथ में दिया गया है. गाँव में वर्षा जल को संचित करने के लिए पूर्व में यही एक जोहड़ था और ग्रामीण लोग इसका पानी पीते थे. पिछले कुछ दशकों में इसकी उपेक्षा से यह मिट्टी में दब गया था और ग्रामीण इसकी भूमि पर अतिक्रमण करने लगे. कोरोना काल में गाँव के युवा उत्साही कार्यकर्ता विवेक ढाका ने श्रमदान से इसकी सफाई का बीड़ा उठाया. युवा टीम द्वारा न केवल जोहड़ की सफाई का कार्य पूरा किया बल्कि जोहड़ के केचमेंट में वृक्षारोपण कर उन पौधों में पानी देने का कार्य भी किया जा रहा है. यहाँ लगे एक भित्ति लेख पर इसका निर्माण वर्ष विक्रम संवत 1980 (=1923 ई.) लिखा है. इस भित्ति लेख का पठन एवं पुष्टि सीकर के पुरातत्ववेता श्री गणेश बेरवाल द्वारा की गई. उनके द्वारा बताया गया कि इस बावड़ीनुमा जोहड़ के भित्ति लेख में उस समय के अनाजों के प्रचलित भाव लिखे गए हैं. यह बहुत महत्वपूर्ण जानकारी है.


कुंड में पानी भंडारण: राजस्थान के निवासियों ने पीने के पानी के लिए कुंड बनाए हैं. जहाँ पक्का मकान है वहाँ उसकी छत के पानी से कुंड वर्षा में भरा जाता है. जो लोग आर्थिक रूप से ठीक-ठाक हैं और जिनके मकान पक्के हैं वह अपनी छत का पानी पास ही कुंड बनाकर उसमें संग्रहित करते हैं. अपने लिए कितनी छत और कितनी बड़ी टंकी लगेगी इसकी गणना ऊपर दिये तरीके से की जा सकती है.

खेतों में कुंड बनाना: खेतों में जहाँ मकान की छत उपलब्ध नहीं होती वहाँ कुंड के चारों तरफ पक्का पायतन बनाया जाता है और वह इतना बड़ा बनाया जाता है कि इससे कुंड पूरा भर जाता है. कुंड का पायतन कितना बड़ा बनाना है या टंकी की क्या क्षमता होगी इसकी गणना निम्न सूत्र से कर सकते हैं.

कुंड की क्षमता (लीटर) = π (कुंड का रेडियस सेमी ) ² x औषत वर्षा सेमी/1000. यहाँ π = 3.14 है. उदाहरण: मानलो आपको 10 फीट (300 cm) रेडियस का कुंड बनाना है. आपके यहाँ औषत वर्षा 300 मिली (30 cm) है. ऊपर के सूत्र में इनका मान रखने पर-- कुंड की क्षमता (लीटर) = 3.14 (300 सेमी ) ² x 30 सेमी/1000 = 3.14 x 90000 x30/1000 = 8478 लीटर

शासकीय सेवा में रहते वर्षा जल संग्रहण

मैं रेगिस्तान का रहने वाला हूं. इसलिए पानी के महत्व को बचपन से ही बहुत अच्छी तरह से समझता हूं. भारतीय वन सेवा में मेरी पहली पोस्टिंग वन मंडल अधिकारी उत्पादन भानुप्रतापपुर बस्तर में हुई (1985-88). बस्तर में वर्षा बहुत ज्यादा होती है. इसलिए मकानों पर छतें ढालदार होती हैं और ऊपर पकी हुई मिट्टी के खपरेल (टाईल) लगाए जाते हैं. उस समय तक सीमेंट की समतल छतें नहीं होती थी. हम जब बरसात में गए तो पता लगा कि कहीं-कहीं बोरिंग थे उनका पानी पिया जाता था या तालाब नदियों का पानी पिया जाता था. वर्षा होने के साथ ही वहां की लाल रंग वाली मिट्टी, जिसमें आयरन बहुत होता है, मुर्रम कहलाती है, पानी में घुलकर इसको लाल रंग का बना देती थी. साथ ही साल के घने पेड़ों और वनस्पतियों की जड़ों की गंध भी इसमें घुल जाती थी. हमें लगा कि इस पानी को कैसे पिएंगे. तब हमने दिमाग लगाया कि क्यों नहीं यहां राजस्थान के वर्षा जल संग्रहण की तकनीक लगाई जाए. हमारे बंगले में एकमात्र बाथरूम पर सीमेंट की छत थी जो मेरे पूर्ववर्ती राजस्थान के एक अधिकारी ने बनवाई थी. हमने लकड़ी डिपो से फालतू पड़ी हुई लोहे की एक टंकी मंगाई और बाथरूम के छत को टंकी से जोड़ दिया तथा टंकी से एक पाइप लेकर बाथरूम में दे दिया. अब हमें पीने के पानी का कोई तनाव नहीं रहा. शुद्ध जल मिलता था नहाते भी उसी से थे और पीते भी वही थे. वर्षा जल संग्रहण का यह एक छोटा प्रयास था. इसके अनेकों वर्ष बाद शासकीय सेवा में रहते हुये ही बड़े बाँधों में वर्षा जल भंडारण करने का अवसर मिला.

इंदिरासागर बांध खंडवा

इंदिरासागर बांध का उद्घाटन श्रीमती इन्दिरा गांधी द्वारा वर्ष 1984 में किया गया था जो 2005 में पूरा हुआ. यह 92 मीटर ऊँचा और 653 मीटर लंबा कंक्रीट ग्रेविटी बांध है. वन संरक्षक के पद पर मुझे नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण खंडवा (1995-96) में काम करने का अवसर मिला. इसके अंतर्गत नर्मदा नदी के जल ग्रहण क्षेत्र का उपचार करना होता था जिससे नर्मदा नदी पर बन रहे बाँधों में पानी के साथ बहकर आने वाली मिट्टी या गाद इकट्ठा न हो. बांध में गाद इकट्ठा होने से इसकी जल भराव क्षमता कम हो जाती है. नर्मदा नदी का जल ग्रहण क्षेत्र 61,642 km2 है. जल ग्रहण क्षेत्र का उपचार करना बहुत महत्वपूर्ण था क्योंकि यह नर्मदा पर मध्य प्रदेश से गुजरात तक सीरीज में बन रहे कई बाँधों को प्रभावित करता है.

मड़ीखेड़ा बांध शिवपुरी

मड़ीखेड़ा बांध शिवपुरी

शिवपुरी जिले में स्थित सिंध नदी पर बने मोहिनी सागर बाँध या अटल सागर (मड़ीखेड़ा) डेम की लम्बाई 1070 मीटर है. इस बांध का काम वर्ष 1978 में शुरू हुआ था परंतु केंद्र सरकार के स्तर पर पर्यावरणीय स्वीकृति के अभाव में यह परियोजना लंबे समय तक लटकी रही. माधव राष्ट्रीय उद्यान शिवपुरी का कुछ भाग बांध के डूब क्षेत्र में आ रहा था. इस क्षेत्र के बदले मेरे शिवपुरी में वन संरक्षक के रूप में पदस्थापना (1997-2000) के दौरान क्षेत्रीय वन मंडल का दुगुना क्षेत्रा राष्ट्रीय उद्यान को स्थानांतरित किया गया. भारत सरकार के स्तर पर सिंचाई विभाग के समन्वय से अथक प्रयास कर पर्यावरणीय स्वीकृति प्राप्त की गई जिसके कारण बांध निर्माण ने गति पकड़ी और वर्ष 2008 में यह परियोजना पूर्ण हो सकी. यह परियोजना शिवपुरी और ग्वालियर जिलों के लिए वरदान है.

बाण सागर बांध

बाण सागर बांध, 25.9. 2006
बाण सागर बांध का रिजरवायर

मैं बाण सागर परियोजना रीवा में आयुक्त के पद पर 2005 से 2007 तक पदस्थ रहा. उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश और बिहार प्रदेशों की सिंचाई क्षमता बढ़ाने और विद्युत् उत्पादन करने वाली 28 वर्ष से लंबित इस बहु-उद्देशीय बांध परियोजना को पूर्ण करने में महत्व पूर्ण भूमिका निभाई. 1020 मीटर लंबे इस बांध परियोजना का शुभारम्भ वर्ष 1978 में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री मोरारजी देसाई द्वारा किया गया था. 28 वर्ष बाद मेरे कार्यकाल में 25 सितम्बर 2006 को पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेयी द्वारा इस परियोजना का राष्ट्र को समर्पण किया गया. बाण सागर का रिजरवायर 588 वर्ग किमी क्षेत्र में है. इस रिजरवायर को भरने के लिए जल ग्रहण क्षेत्र 18648 km² वर्ग किमी है जिसका पानी इसमें एकत्रित होता है.

सोन नदी और महानदी का पानी बाण सागर बांध में आता है. यह महानदी एक छोटी और अलग नदी है जो जबलपुर जिले के पूर्वी सीमा के पास स्थित घुनौर (Ghunaur) नामक स्थान से उद्भूत होकर उत्तर-पूर्व दिशा में बहती है तथा कटनी और उमरिया जिलों की सीमा बनाते हुये बहती हुई NH-43 पर स्थित कटनी के ग्राम बिलायत-कलां के पूर्व से होते हुये कटनी जिले में प्रवेश कर उत्तर में बहती है. भादौरा के आगे NH-10 को पार करती है. विजयराघवगढ़ के पहले से पूर्व की ओर मुड़ती है कुछ दूर सतना और कटनी जिलों की सीमा बनाती और मार्कण्डेयघाट (दरबार) के पास पर बाणसागर बांध में गिरती है.

बांध का नाम ‘हर्ष चरित’ नामक काव्य के रचयिता बाणभट्ट के नाम पर बाण सागर रखा गया था. वर्ष 2006 के वर्षा काल में जब पहली बार बांध के सभी 18 गेट बंद किए गए और इसमें पानी भरा गया वह बहुत रोमांचक अनुभव था. यूनिवर्सिटी के दिनों में दोस्तों के साथ जयपुर में देखी गई फिल्म ‘सत्यम शिवम सुंदरम’ की याद ताजा हो गई.

बृहद स्तरीय इन बांधों का महत्व पीने के पानी का प्रदाय, सिंचाई परियोजनाओं, विद्युत उत्पादन, बाढ़ नियंत्रण आदि कार्यों में होता है. अन्न उत्पादन और देश की जीडीपी बढ़ाने में इनका बड़ा योगदान है. इनके असर प्रादेशिक, राष्ट्रीय और कहीं कहीं अंतरराष्ट्रीय भी होते हैं. यह एक अलग विषय है यहां केवल व्यक्तिगत अनुभव शेयर करने और जल भंडारण की बृहद स्तरीय तरीके बताने के लिए उपरोक्त उदाहरण दिए गए हैं.

राजस्थान में जल स्रोतों का इतिहास

वर्षा जल संग्रहण की राजस्थान के रेगिस्तान की तकनीक बहुत पुरानी है. राजस्थान के रेगिस्तान इलाक़े को भारतीय प्राचीन इतिहास और महाकाव्यों में अनेक नाम से वर्णित किया है, यथा मरु, मरुभूमि, मरुस्थल, मारवाड़ आदि.

मरु: मारवाड़ (राजस्थान) का प्राचीन नाम है जिसका अर्थ है मरुस्थल या रेगिस्तान. मरु का उल्लेख रुद्रदामन् के जूनागढ़ अभिलेख में है, जिसमें रुद्रदामन् द्वारा विजित देशों के नाम वर्णित हैं. मरुभूमि : राजस्थान का मरूप्रदेश या मारवाड़. महाभारत सभा पर्व 32,5 में मरुभूमि के नकुल द्वारा जीते जाने का वर्णन है--'यत्रं युद्धं महच्चासीच्छूरैर मत्तमयूरकैः, मरुभूमिं च कार्त्स्न्येन तदैव बहु धान्यकम्'. (II.29.5). मारवाड़ शब्द मरुधर से बना है। यह भूमि मरु (निर्जीव) रेतीली भूमि है। नदियों सुपारु न होने से यहां का जीवन वर्षा पर ही निर्भर है और वर्षा भी यहां समस्त भारत से कम होती है. वास्तव में यह देश अकालों का देश है. यहां पर जितनी बहुसंख्यक जातियां हैं वे किसी न किसी कारण से दूसरे प्रांतों से विताडित होकर यहां आबाद हुई हैं.

मरूप्रदेश का इतिहास जानने का प्रयास किया गया तो पता लगा कि राजस्थान की इस मरु भूमि में पीने के पानी की कोई व्यवस्था नहीं होती थी और जो बाहरी लोग इस प्रदेश में गलती से फस जाते थे उनका निकलना मुश्किल होता था. बहुदा ये दल या लोग मृत्यु को ही प्राप्त करते थे इसीलिए इस भू-भाग का नाम मरू-प्रदेश पड़ा था. मरू-प्रदेश के अधिसंख्य निवासी जाट हैं. सिंध प्रांत से जाट लोग सिन्धु घाटी सभ्यता के पतन से लेकर सिकंदर या मुस्लिम आक्रमणों के समय राजस्थान के इस रेतीले भू-भाग में विस्थापित हुए और वे अपने साथ जल भंडारण हेतु कुंड, तालाब तथा कुएं आदि बनाने की तकनीक साथ में लाए.

वस्तुत: भारतीय इतिहास में वर्णित शक और विदेशी इतिहासकारों द्वारा वर्णित सीथियन लोग ही उत्तर-पश्चिम भारत के जाट लोग हैं. जल स्रोतों का नामकरण सीथियन भाषा में हुआ है जिसमें ‘कु’ का अर्थ ‘जल’ होता है. पाकिस्तान की अनेक नदियों के नाम ‘कु’ से शुरू होते हैं यथा कुनार, कुर्रम, कुमल, कुनिहार, कुभा, कुमु आदि. जल स्रोतों के नाम इसीलिए ‘कु’ से प्रारंभ होते हैं जैसे कुवा, कुंड, कुंडी, कुंभ आदि.[4] यह तथ्य यहाँ के जाटों में प्रचलित परंपराओं से भी प्रमाणित होता है. जाटों में बच्चा पैदा होते ही कुआं पूजन की परंपरा है जिसको ‘जलवा’ कहा जाता है. सीथियन भाषा में जलवा ही कुवा है. इसलिए कुवा की पूजा की जाती है. बच्चों की शादी के समय कुम्हार का चाक पूजने के पीछे भी यही धारणा है. यह इन लोगों के लिए पानी के महत्व को बताता है.

डॉ.पेमाराम[5] लिखते हैं कि जाट मूलत: सिंधु घाटी के निवासी थे और सिंधु नदी के दोनों किनारों पर आबाद थे. इनकी मुख्य आबादी निचले सिंध विशेषकर ब्राहमणाबाद (मनसुरा) में थी. सिंध प्रांत यानि उत्तर में पेशावर से लेकर दक्षिण में देवल बन्दरगाह तक यानि सिंधु नदी का पूरा इलाका जिसमें मकरान (आधुनिक बलोचिस्तान) भी सम्मिलित है. 326 ई.पूर्व में जिस समय भारत पर सिकन्दर का आक्रमण हुआ, उस समय पंजाब में बसे जाटों को सिकंदर के आक्रमण से जर्जरित तथा अपनी स्वतंत्रता को बनाये रखने के लिए राजस्थान की ओर आने को विवश होना पड़ा यहाँ आकर वे अपनी सुविधा अनुसार बस गये. पानी के साधन हेतु बस्तियों के आस-पास तालाब, कुएं व बावड़ियां खोद ली. इन जातियों में शिवि, यौधेय , मालव, मद्र आदि प्रमुख थे. मरूभूमि में जो शिवि, रावी और व्यास नदियों से आये, उन्होंने सोजत,सिवाना, शेरगढ़, शिवगंज आदि नगर आबाद किये. यह इलाका सिंध देश से मिला हुआ था, जहाँ बहुतायत से जाट बसे हुए थे.

डॉ.पेमाराम[6] लिखते हैं किइस प्रकार 326 ई.पूर्व के सिकन्दर आक्रमण से लेकर अरबों व तुर्कों के आक्रमण के कारण जाटों की आश्रय-भूमि सिन्ध और पंजाब को छोडकर सुरक्षित स्थान के लिये राजस्थान की ओर आना पडा. मारवाड और जांगल प्रदेश में बसने के कारण पानी की कमी की पूर्ति के लिए पानी के साधनों का विकास किया. मारवाड और जांगल प्रदेश में जितने कुएं, तालाब, बावडियां बनी हैं उनमें से अधिकांश जाट व्यक्तियों द्वारा बनाई गई और वे उन्हीं के नाम से जानी जाती हैं.

डॉ पेमाराम[7]लिखते हैं कि सिंध और पंजाब से समय-समय पर ज्यों-ज्यों जाट राजस्थान में आते गये, मरूस्थलीय प्रदेशों में बसने के साथ ही उन्होने प्रजातन्त्रीय तरीके से अपने छोटे-छोटे गणराज्य बना लिये थे जो अपनी सुरक्षा की व्यवस्था स्वयं करते थे तथा मिल-बैठकर अपने आपसी विवाद सुलझा लेते थे । ऐसे गणराज्य तीसरी सदी से लेकर सोलहवीं सदी तक चलते रहे । जैसे ईसा की तीसरी शताब्दी तक यौधेयों का जांगल प्रदेश पर अधिकार था । उसके बाद नागों ने उन्हें हरा कर जांगल प्रदेश (वर्तमान बिकानेर एवं नागौर जिला) पर अधिकार कर लिया । यौधेयों को हराने वाले पद्मावती के भारशिव नाग थे, जिन्होने चौथी शताब्दी से लेकर छठी शताब्दी तक बिकानेर, नागौर, जोधपुर तथा जालोर के जसवन्तपुरा तक शासन किया । जांगल प्रदेश में नागों के अधीन जो क्षेत्र था, उसकी राजधानी अहिच्छत्रपुर (नागौर) थी । यही वजह है कि नागौर के आस-पास चारों ओर अनेक नागवंशी मिसलों के नाम पर अनेक गांव बसे हुये हैं जैसे काला मिसल के नाम पर काल्यास, फ़िरड़ोदा का फिड़ोद, इनाणियां का इनाणा, भाकल का भाखरोद, बानों का भदाणा, भरणा का भरणगांव / भरनांवा / भरनाई, गोरा का डेह तथा धोला का खड़नाल आदि ।

पिक्चर गैलरी

बाहरी कड़ियाँ

संदर्भ