Rana Nihal Singh

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Rana Nihal Singh

Rana Nihal Singh (b.1863, r.1873-d.1901) was the Jat ruler of princely state Dholpur (1873 - 1901) in Rajasthan, India. He was from Bamraulia gotra of Jats. He was born on 4th May 1863 as son of Kulender Singh and succeeded Rana Bhagwant Singh on 9th February 1873 after his death. He was of 11 years of age when ascended to the throne in 1873.

He married on 30th April 1879 with the second daughter of Shah Dev Singh of Pandriganeshpur in Lahore and had issue.

He was popular as ‘Pyare Raja Saheb’. He got his education under the guidance of his mother who was daughter of Maharaja Narender Singh of Patiala. He got educated in English language in 1873-74 and also learnt Hindi, Sanskrit and Persian languages. He attended the Prince of Wales (VII Adward) darbar at Delhi in 1876. He got done the settlement of land, first time, in the state in 1875. He got full rights in 1884.

He was a good horse rider. There is a story that he did relay horse riding with the train and he won the train under terms of agreement with British. This train was in his ownership till his reign. He got constructed hospitals, ponds, repaired buildings, spread a network of roads and rail during his reign. He was a pop[ular ruler.

He received honourary Major in the Central India Horse, and received the C.B. and Frontier Medal for services in the Tirah campaign.

He died July 1901. His successor was Rana Ram Singh.

महाराज निहालसिंह (r.1873 - 1901)

नाबालिग महाराज राणा ‘प्यारे राजा साहब’ राज्य के मालिक हुए। उनकी शिक्षा का प्रबन्ध उनकी माताजी के सुपुर्द हुआ। उनकी माताजी पटियाले के महाराज नरेन्द्रसिंह जी की पुत्री थी। वह शिक्षित और बहुत चतुर थी। सर दिनकर राव ने पोलीटिकल एजेण्ट को यही राय दी थी। एक अंग्रेजी पढ़ा हुआ ब्राह्मण भी उनकी शिक्षा के लिए रखा गया। यह भी प्रबन्ध किया गया कि कभी-कभी महाराज आगरा जाकर अंग्रेज लोगों तथा उनकी मेम साहिबान से बातचीत किया करें, इससे अंग्रेजी बोलना उन्हें जल्द आ जाएगा। सन् 1873-74 में धौलपुर मदरसे के हेडमास्टर से उन्होंने अंग्रेजी सीखी। साथ ही हिन्दी, संस्कृत और फारसी भी सीखते रहे।

महाराज राणा अंग्रेजी के क्रिकेट पोलो आदि खेल में बड़ी प्रसन्नता से शामिल होते थे।


जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठान्त-690


सन् 1876 में महाराजा साहब प्रिन्स-आफ-वेल्स सप्तम एडवर्ड के दरबार में शामिल हुए। दरबार से लौटते हुए महाराज ग्वालियर व शाहजादे साहब धौलपुर में आए, उनका आतिथ्य-सत्कार खूब किया।

पंज सरदारों में उस समय ठा. दरियावसिंह (जाट) रिश्तेदार महाराणा साहब, कुंवर हरदेवसिंह खानदान महाराणा साहब, लल्लू लक्ष्मणसिंह, लाला सुन्दरलाल और मीर आबिद थे। माल, फौजदारी, दीवानी और सेना का काम पंज सरदारों के उत्तदायित्व में था।

अब तक राज्य की जमीन का बन्दोबस्त न हुआ था। सन् 1875 में मि. स्मिथ को बन्दोबस्त के लिए बुलाया गया। मुंशी कन्हैयालाल और दुर्गाप्रसाद के सहयोग से सन् 1877 तक बन्दोबस्त हो गया, और जमाबन्दी की कठिनाई भी हल हो गई।

राज्य की आय-व्यय का मिती-वार हिसाब रखा जाने लगा जिससे खर्च करने में आमदनी के हिसाब से विचार कर लिया जाता था। सन् 1875 ई. में मौजा सहानपुर को जो कि जागीर में था, खालसे में मिलाया गया।

धौलपुर में दो खिराज गुजार रियासते हैं। दोनों यादव राजपूतों की हैं। एक सरमथुरा की और दूसरी बिजौली की। सरमथुरा से खिराज में बीस हजार रुपये आते थे और बिजौली से 1631 रुपये सालाना खिराज में महाराणा धौलपुर को मिलते थे। ये दोनों टांकेदार कहलाते थे। राजा ग्वालियर में एक मौजा निमरौल का है, वहां टांकेदार नहीं थे, किन्तु गुजार थे।

धौलपुर राज्य में 380 देहात मालगुजारी देने वाले थे। 210 गांव नानकार थे। जिन लोगों को जमाबन्दी में कुछ दिया जाता था, नम्बरदारी आदि का हक था, ऐसे हक लेने वाले गांवों को नानकार कहा जाता था। पीछे से यह नानकारी हटाना मुनासिब समझा गया।

महाराज राणा निहालसिंह के समय तक जो प्यारे साहब भी कहे जाते थे, इस राज ने 61 देहात जागीरदारों में दे रखे थे। जागीरदार लोग सवारों की नौकरी देते थे। उन्हें राज-सेवा के उपलक्ष में जागीरें दी गई थीं।

इस समय मालगुजारी और सायर से राज-कर में आमदनी भी बढ़ी। चूंकि अनेक लोगों ने अनेक गांवों में मुआफी के नाम पर जमीन के बहुत से हिस्से पर कब्जा कर रखा था, उसकी जांच करके जमीन पर लगान बांध दिया गया। कस्टम चौकियों पर रवाना होने का कायदा हो जाने से आमदनी बढ़ गई और जो गड़बड़ पहले होती थी, वह भी कम होने लगी।

पंज सरदारों ने पंचायत के जरिए नमक और अफीम पर जो कि आगरा बम्बई के बीच धौलपुर होकर जाते थे, महसूल बांध दिया। स्टाम्प जारी होने से भी राज की आमदनी बढ़ी। इसी भांति कोयले व सरपते की बिक्री से भी आमदनी बढ़ गई।


जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठान्त-691


कहने का सारांश यह है कि राज्य की आमदनी बढ़ाने के तरीकों पर खूब ध्यान दिया गया।

सन् 1884 ई. में महाराज राणा नौनिहालसिंह को राज के कुल अधिकार अंग्रेज सरकार की ओर से प्रदान किए गए।

महाराज राणा नौनिहालसिंह बड़ी खुश तबियत के आदमी थे। उनकी यह इच्छा कभी नहीं रहती थी कि कोई भी प्रजा-जन उनकी जात खास से दुःख पा सके। फिजूलखर्ची उनके समय में खूब हुई। महाराज राणा नहीं चाहते थे कि इतना खर्च हो, इसलिए वे सम्भल भी गए। सन् 1888 ई. में उनकी नेकनाम दादी-साहिबा का स्वर्गवास हो गया।

इन महाराज के समय में अस्पताल, तालाब, इमारतों की मरम्मत, आबपाशी के साधनों में अच्छी तरक्की हुई। रेलवे लाइन और कुछ सड़कें भी बनीं। पोलीटिकल एजेण्ट के रहने के लिए भी अलग भवन निर्माण हुआ।

कहा जाता है कि ये महाराज घोड़े के बड़े प्रसिद्ध चढ़ने वाले थे। रेल के साथ शर्तबन्दी पर घोड़ा दौड़ाने की चर्चा इनके सम्बन्ध में आगरा जिले के सभी वर्ग के लोगों से सुनी जाती है। प्रजाजनों के साथ हिलमिलकर बात करने में महाराज खूब प्रसन्न होते थे।

धर्म-कर्म में इस राजवंश की निष्ठा सदैव से अधिक मात्रा में चली आई है। आपके समय भी सैकड़ों ब्राह्मणों को पूजा-पाठ के लिए वेतन दिया जाता था।

अंग्रेज सरकार की ओर से आपको ‘सेन्ट्रल इण्डिया हार्स’ में आनरेरी मेजर और फ्रन्टियर मेडिल और सी. बी. की उपाधियां मिली थीं। आपने ब्रिटिश सरकार के पक्ष में तेराह के युद्ध में बहुत सहायता दी थी। अतः अंग्रेज सरकार उनकी बड़ी इज्जत करती थी। सन् 1901 में महाराज के लिए भी वह समय आ गया जो कि सभी के लिए आता है। वह स्वर्ग सिधार गए।

References

  • Dr. Ajay Kumar Agnihotri (1985) : "Gohad ke jaton ka Itihas" (Hindi)
  • Dr. Natthan Singh (2004) : "Jat Itihas"
  • Jat Samaj, Agra: June 2004
  • Jat Samaj, Agra: October-November 2004
  • Dr. Natthan Singh (2005): Sujas Prabandh (Gohad ke Shasakon ki Veer gatha – by Poet Nathan), Jat Veer Prakashan Gwalior

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