Rani Sahib Kour

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Rani Sahib Kour of Patiala was sister of Raja Sahib Singh and who had married Sirdar Jaimal Singh Kanheya the master of a great part of the Bari Doab, above Dinanagar.

Rani Sahib Kour becomes Chief Minister of Pattiala

Lepel H. Griffin writes:[1]To her he sent, begging her to pay him a Visit at Pattiala and when she arrived he proclaimed her his Chief Minister, with Tara Singh, one of her own people, as Deputy ; and Diwan Singh, the nephew of Nanun Mal, was again taken into favor and made Finance Minister or Diwan. She had not been long at Pattiala when she heard that her husband, at this time a young man of twenty-one, was in difficulties and hard pressed by his cousin Fatah Singh.

She accordingly begged a force from her brother which he willingly granted, and, heading it herself, she marched to Fatehgarh and rescued her husband who had been captured by Fatah Singh, returning soon after this exploit to Pattiala in triumph.

The gallantry of Sahib Kour

Lepel H. Griffin writes:[2] Retreat would have soon turned to flight had not Bibi Sahib Kour, who had come herself with the troops, leaving her brother in his zanana at Pattiala, stepped down from her chariot (Rath) and, drawing her sword, declared that the Sikhs would be for ever disgraced if they allowed her, a woman and the sister of their Chief, to be slain, for she was determined never to retreat. This gallantry so shamed and encouraged the soldiers, that they returned with renewed fury to the fight, which they maintained, though with considerable loss, till nightfall, neither side being able to claim the victory.

Night attack on the Mahratta camp:

The Sikh Chiefs now wished the lady to return to Pattiala while she was able, as the next day must bring with it their defeat, but she refused ; and their case being desperate, proposed a Night attack on the Mahratta camp.

The very audacity of the proposal contained its best chance of success, the troops were immediately put under arms, and, just before day-break, attacked the Mahrattas, who were taken completely by surprise.

The enemy retire:

The Sikhs did little more than gallop through the camp, cutting down those of the enemy they met, and the Mahrattas suffered no great loss ; but the confusion caused was very great, and the next day, Anta Rao, hearing that large Sikh reinforcements were approaching, retired towards Karnal.

Raja Sahib Singh quarrels with his sister

Lepel H. Griffin[3]No sooner had danger from without ceased, than Raja Sahib Singh dissensions were renewed within ; and the weak-minded Sahib Singh, influenced by his favorites, who were jealous of Rani Sahib Kour's power, began to treat his sister with great coldness.

The new cause of family discord :

There was, moreover, a new element of discord in the person of Rani Aus Kour, daughter of Sirdar Gurdas Singh of Chattah, whom the Raja had married in 1792, and who, in 1797, bore him a son and heir who was named Karm Singh. This lady, both clever and ambitious, thought the influence possessed by Bibi Sahib Kour over the Raja belonged legitimately to her, and coalesced with his Court officials against Sahib Kour who was accused to her brother of many imaginary offences. Of these, the first asserted that she had herself kept the elephant given by the Raja of Nahan as a return for the services rendered in restoring order in his State. As Rani Sahib Kour had performed all the work at Nahan, while her brother was squandering health and money among pimps and prostitutes at Pattiala, she might well have pleaded her right to keep the present. It was also alleged, as a crime, that she had built, in 1795, a fort near Sunam, in her jagir, without her brother's permission, and had changed the name of the village of Bhirian to Ubhowal, which it still retains. When the Rani saw that the evil advice of his favorites had more weight with the Raja than all her services, she left Pattiala in disgust for Bhirian, where her new fort stood.

Her flight from Pattiala:

This conduct seemed to confirm the Raja's suspicious, and he ordered her to leave Bhirian and return to her husband at Fatahgarh,


The Raja's first military expedition:

The Rani had been so long accustomed to command that she was not disposed to obey, and took no notice of this order ; on which the Raja himself marched against the fort and was making preparations to reduce it when Bhai Dal Singh and other mutual friends succeeded in persuading him that it would not be for his fame to commence his military career by fighting with his sister, and in inducing the Rani to submit and return to Pattiala. On the road, however, suspicious, with very good reason, of the intentions of her brother, she escaped and returned to Bhirian, when all the negotiations had to be commenced afresh.

The treatment of Sahib Kour:

At last, on promises of safety, she consented a second time to return to Pattiala ; but when the Raja had conveyed her as far as Dhodan Or Bhawanigarh, he placed her in confinement in the fort. She soon contrived to escape, changing clothes with one of her servants, and returned to Bhirian, where she lived without further molestation for some time.

Her death, AD 1799.'

She died in 1799, the unjust treatment that she had received having probably shortened her life.

जाट इतिहास:ठाकुर देशराज

कहा जाता है कि पटियाला महाराज साहबसिंह की छोटी बहन साहबकुंवरि बड़ी बुद्धिमती और दूरदर्शी थीं। इसलिए महाराज ने उनको ससुराल से पटियाला बुला लिया कि समय-समय पर वे उन्हें मदद और सलाह देती रहें। बीबी साहिबा जब पटियाला आ गई तो महाराज ने उन्हें रियासत का मुख्तारे आम बना दिया। दीवान नानूमल के भतीजे दीवानसिंह को दीवान नियुक्त किया।

जाट इतिहास:ठाकुर देशराज, पृष्ठान्त-413

बीबी साहिबा को पटियाला में आए कुछ रोज हुए थे कि उनकी ससुराल से समाचार मिला कि उनके पति सरदार जयमलसिंह को उनके चचेरे भाई सरदार फतेहसिंह ने कैद कर लिया है। थोड़ी सी फौज लेकर के बीबी साहिबा अपनी ससुराल गई और अपने पति को जेल से मुक्त कराके तथा वहां का सुप्रबन्ध कराके वापस पटियाला आ गई। 1794 ई० के आरम्भ में मरहठों की एक बड़ी भारी सेना लछमनराव और अन्टाराव के साथ पंजाब की तरफ लूटमार करने के लिए आ पहुंची। जींद और कैथल आदि के रईसों ने भेंट देकर मरहठों की अधीनता स्वीकार कर ली, लेकिन बीबी साहबकुंवरि को यह बात अपनी मान-मर्यादा के विरुद्ध जान पड़ी और उन्होंने मरहठों से युद्ध की तैयारी कर दी। राजगढ़ के मैदान में युद्ध हुआ। मरहठों की सेना अधिक थी, इसलिए पटियाले की सेना के पांव न जम सके। बीबी साहिबा यह देख रथ से नीचे आ गई और फौज के सामंतों को सम्बोधन कर कहा -

“यदि आप लोग कायर हैं अथवा आपको प्राण प्यारे हैं और मान-मर्यादा का कुछ भी ख्याल नहीं तो आप भाग जा सकते हैं। पर मैं प्राण रहते समरक्षेत्र से हटने वाली नहीं। वीर क्षत्राणियों ने इसी दिन के लिए आपको जना था। आप चाहें तो उनके दूध को लज्जित कर सकते हैं। अपमान की हजार वर्ष की जिन्दगी से मान की एक दिन की जिन्दगी कहीं अधिक अच्छी है। एक स्त्री को जो कि राजघराने, साथ ही आपके परिवार की भी है, मैदान में अकेली छोड़कर संसार के सामने मुंह दिखाने की हिम्मत कर सकते हैं तो आप लोग अविलम्ब मैदान छोड़कर भाग जायें!”

बीबी साहिबा के उपर्युक्त ओजस्वी भाषण ने सेना में और सेनापतियों में मर मिटने की लगन पैदा कर दी - “न दैन्यं न पलायनम्” के सिद्धान्त के अनुसार उन्होंने मरहठों की सेना पर धावा कर दिया। “हिम्मते मर्दा मददे खुदा” कहावत के अनुसार बीबी साहिबा की विजय हुई और मरहठे मैदान छोड़कर भाग खड़े हुए!

बीबी साहिबा जहां बुद्धिमान थीं, वहां बहादुर भी खूब थीं, साथ ही राज्य प्रबन्ध की योग्यता भी रखती थीं। नाहन के राजा धर्मप्रकाश के करने पर उसका छोटा भाई करम-प्रकाश जब राज्य का अधिकारी हुआ तो उसके दरबारियों और कुछ प्रजा के लोगों ने उसके विरुद्ध बगावत खड़ी कर दी। लेकिन बीबी साहिबा ने थोड़ी सी फौज के साथ नाहन पहुंचकर सारे विद्रोहियों को दबा दिया और राज्य का नये सिरे से ऐसा उत्तम प्रबन्ध कर दिया जिससे प्रसन्न होकर राजा करमप्रकाश ने बीबी साहिबा को बहुत से उपहार भेंट किए। इसके कुछ ही दिन बाद बीबी साहिबा को जार्ज टाम्स से लड़ना पड़ा। जार्ज-टाम्स का वृत्तान्त इस तरह बताया जाता है कि - जाति का यह अंग्रेज था और किसी यूरोपियन जहाज पर सन् 1781 में खल्लासी होकर हिन्दुस्तान में आया था। 1787 ई० में यह समरू की

जाट इतिहास:ठाकुर देशराज, पृष्ठान्त-414

बेगम का नौकर हो गया। 1794 ई० में बेगम ने जब इसे किसी कारण से निकाल दिया तो वह खांडेराव मरहठे जो कि माधोजी सेंधिया की तरफ से झझ्झर, दादरी मानोड़ और नारनोल के हाकिम थे, के पास आकर नौकर हो गया। इनकी नौकरियों से खांडेराव इतना प्रसन्न हुआ कि झझ्झर का उसे जागीरदार बना दिया। उसने झझ्झर के पास अपने नाम पर जार्जगढ़ किला बनाया जो आजकल जहाजगढ़ कहलाता है। खांडेराव के मरने के बाद, इसने स्वतन्त्र होकर हांसी और हिसार पर अधिकार कर लिया। इसके पास करीब आठ हजार सैनिक और 50 तोपें थीं। मरहठे और सिखों की आपसी लड़ाई से फायदा उठाने के लिए इसने सिखों को अपने साथ मिलाना चाहा। सिख भी महत्त्वाकांक्षी थे। उन दिनों प्रत्येक सिख के हृदय में यह लगन थी कि कुल भारतवर्ष की राज्य-शक्ति उनके हाथों में हो। इस सबब से जार्ज की चालबाजियों में वह न आए। इस चाल में विफल होने पर इस चालाक अंग्रेज ने जींद पर चढ़ाई की। इसका ख्याल था कि शायद अन्य सिख-रियासतें जींद की सहायता न करेंगी परन्तु इसका ख्याल गलत निकला और नाभा, पटियाला, कैथल सभी रियासतों ने इसकी फौजों को घेर लिया। पटियाला की ओर से बीबी साहबकुंवरि मैदान में पधारी थीं और बड़ी बहादुरी और योग्यता के साथ इन्होंने सेना-संचालन किया।

बीबी-साहिबा के सुप्रबन्ध एवं युद्ध-कुशलता से बाहरी झगड़े शांत हो गए थे और राज्य में भी पूर्णतः अमन-चैन था। अवसर पा करके खुशामदी मुसाहिबों ने बीबी-साहिबा के खिलाफ भी महाराज को उसी तरह उभाड़ना शुरू किया, जिस तरह दीवान नानूमल और बीबी राजेन्द्रकुंवरि के विरुद्ध किया था। मुसाहिब लोग चाहते थे कि बीबी साहबकुंवरि का प्रजा तथा दरबारियों पर जो रौब-दौब है वह हट जाना, ताकि उन्हें मनमानी करने का अवसर मिले। महाराज साहब की महारानी साहिबा भी अपने को अब कुछ समझने लगी थीं, क्योंकि उनके पुत्र-रत्न हो चुका था और अब युवराज की मां कहलाती थीं। वह अपने से बढ़ करके बीबी साहिबा के आदर-मान को सहन नहीं कर सकती थीं। महाराज साहबसिंह के चारों तरफ से कान भरे जाने लगे। लोगों ने उनसे यह भी कहा कि राजा साहब नाहन ने जो हथिनी दी थी, बीबी साहिबा ने उसे निज की सम्पत्ति बना लिया है। वास्तव में उस पर अधिकार आपका है। सन् 1795 ई० में बीबी साहिबा ने अपनी जागीर के एक गांव बहरयान में कच्चा किला बनाकर उसका नाम ऊभा बाल रख दिया था। इस काम को उनका अनौचित्य तथा अनधिकार चेष्टा कहकर मुसाहिबों ने महाराज को भड़काया। बीबी साहिबा उन दिनों जींद में ठहरी हुई थीं। उनको जब यह पता चला कि उनका भाई साहबसिंह उनकी की हुई सेवाओं तथा बलिदानों की परवाह न करके दुष्ट लोगों की चालों में आ गया है तो उनके हृदय को बहुत कष्ट हुआ और वे भाई से अप्रसन्न होकर सीधी अपनी जागीर को

जाट इतिहास:ठाकुर देशराज, पृष्ठान्त-415

चली गईं। लोगों ने इस बात से भी लाभ उठाया और बतलाया कि बीबी साहिबा आपकी कुछ भी इज्जत और परवाह नहीं करती हैं। बात यहां तक बढ़ी कि महाराज ने उनको लिख भेजा कि - किला खाली करके अपनी ससुराल को चली जाओ। बीबी साहिबा अपनी जिद पर अड़ गईं और किला खाली करने से इनकार कर दिया। 'तारीख पटियाला' का लेखक तो यहां तक लिखता है कि दोनों बहन-भाइयों में युद्ध भी हुआ और महाराज ने उन्हें धोखे से पटियाला लाकर नजरबन्द भी कर दिया। लेकिन यह विश्वास योग्य नहीं है क्योंकि यदि ऐसी बात होती तो बीमारी के दिनों में वे भरियान से जहां कि वह बिलकुल आजाद थीं, पटियाला न आतीं और इस लेखक ने यह भी लिखा है कि महाराज को बीबी साहिबा की मृत्यु से अत्यन्त दुख हुआ। यह बात भी हमारे पक्ष का समर्थन करती है।

जार्ज टामस ने पंजाबी रियासतों में पुनः लूट-मार आरम्भ कर दी। नाभा, जींद, कैथल के साथ मिलकर महाराज ने उसको कई स्थानों पर परास्त किया। लेकिन जार्ज जमकर युद्ध नहीं करता था, वह तो सिर्फ लूट करना चाहता था। वह ऐसी चालाकी और सावधानी से लड़ता रहा कि इनको मराठी सेना के जनरल पीरू से सहायता लेनी पड़ी। लड़ाई का कुछ खर्च लेकर चन्द शर्तों के साथ पीरू ने जार्ज टामस के साथ युद्ध छेड़ दिया और कुछ दिन ही की लड़ाई के बाद, उसके तमाम इलाके पर अधिकार कर लिया। जार्ज टामस ने लड़-भिड़कर जो इलाके पंजाबी रियासतों के अपने कब्जे में कर लिए थे, सेनापति पीरू ने उन स्थानों को उनके असली हकदारों को वापस कर दिया।


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