Richhpal Singh Fogat

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Richhpal Singh Fogat

Richhpal Singh Fogat (रिछपाल सिंह फोगाट) was an honorary Magistrate and a minister with the Jat Maha Sabha in Sikar Jat-Prajapati Maha Yagya in 1934.

संक्षिप्त परिचय

जन्म: सन 1901 , स्वर्गवास: सन 1966

पिता: चौधरी जहान सिंह,

गोत्र: फोगाट

गाँव: धमेडा कीरत , जिला: बुलंदशहर (उत्तर प्रदेश)


जीवन भर समाज की उन्नति के लिए कार्यरत रहे.

Shekhawati farmers movement

The Jat Prajapati Maha-Yagya was organized at Sikar from 20 - 29 January 1934. The program was scheduled for one whole week. The main aim of this event was to present to , the Jats and other farmers of Shekhawati, the picture of advanced level of the cultural and education development, and the progressiveness of the Jat society in U.P. and elsewhere, so that the Jats of Shekhawati could be inspired to have a desire for education and upliftment.

Many prominent persons were present:

People were enamored with their inspiring speeches.

झुंझुनूं में विशाल सम्मलेन 1932

नोट - यह सेक्शन राजेन्द्र कसवा की पुस्तक मेरा गाँव मेरा देश (वाया शेखावाटी), प्रकाशक: कल्पना पब्लिकेशन, जयपुर, फोन: 0141 -2317611, संस्करण: 2012, ISBN 978-81-89681-21-0, P. 109-117 से साभार लिया गया है.

जब राष्ट्रीय स्तर पर गांधीजी डांडी यात्रा कर रहे थे और नमक का कानून तोड़ने के अभियान चला रहे थे तो पन्ने सिंह ने शेखावाटी में जन आन्दोलन की हलचलें शुरू की. पन्ने सिंह उस समय शेखावाटी में तेजी से उभर रहे थे. उनमें संगठन निर्माण की अद्भुत क्षमता थी. रींगस के मूल चन्द अग्रवाल ने पिलानी में खादी भण्डार खोल दिया जिसे पन्ने सिंह ही संभाल रहे थे. खादी उत्पादन केंद्र देवरोड़ में खोला गया . कताई-बुनाई का कार्य शुरू किया गया. ठाकुर देशराज झुंझुनू आये औए पन्ने सिंह सहित अन्य किसान नेताओं से मिले. झुंझुनूं में विशाल पैमाने पर सम्मलेन करने के लिए गाँव-गाँव भजनोपदेशक पहुँचने लगे.

सन 1931 में ही मंडावा में आर्य समाज का वार्षिक सम्मलेन हुआ. ठिकानेदारों ने भय का वातावरण बनाया किन्तु हजारों स्त्री-पुरुषों ने सम्मलेन में भाग लिया. सभी ने आग्रह किया कि झुंझुनू में होने वाले सम्मलेन में भाग लें. ठाकुर देशराज के नेतृत्व में झम्मन सिंह वकील, भोला सिंह, हुकुम सिंह तथा स्थानीय भजनोपदेशकों की टोलियाँ शेखावाटी अंचल के सैंकड़ों गाँवों में घूमी और झुंझुनू सम्मलेन को सफल बनाने की अपील की.

जन जागरण के गीतों के माध्यम से गाँव-गाँव को जागरुक किया. घासी राम और हरलाल सिंह पडौसी रियासत बीकानेर के गाँवों में प्रचार करने लगे. राजगढ़ तहसील के जीवन राम जैतपुरा साथ थे जो देर रात तक गाँवों में भजनों के माध्यम से कार्यक्रम करते.

झुंझुनू सम्मलेन, बसंत पंचमी गुरुवार, 11 फ़रवरी 1932 को होना तय हुआ जो तीन दिन चला. स्वागत-समिति के अध्यक्ष पन्ने सिंह को बनाया गया. उनके पुत्र सत्यदेव सिंह के अनुसार महासम्मेलन के आयोजन के लिए बिड़ला परिवार की और से भरपूर आर्थिक सहयोग मिला. मुख्य अतिथि का स्वागत करने के लिए बिड़ला परिवार ने एक सुसज्जित हाथी उपलब्ध कराया. यह समाचार सुना तो ठिकानेदार क्रोधित हो गए. उन्होंने कटाक्ष किया - तो क्या जाट अब हाथियों पर चढ़ेंगे? यह सामंतों के रौब-दौब को खुली चुनोती थी. जागीरदारों ने सरे आम घोषणा की, 'हाथी को झुंझुनू नहीं पहुँचने दिया जायेगा.'

पिलानी के कच्चे मार्ग से हाथी झुंझुनू पहुँचाना था. रस्ते में पड़ने वाले गाँवों ने हाथी की सुरक्षा का भर लिया. इस क्रम में गाँव खेड़ला, नरहड़ , लाम्बा गोठड़ा, अलीपुर, बगड़ आदि गाँवों के लोग मुस्तैद रहे. हाथी दो दिन में सुरक्षित झुंझुनू पहुँच गया. ठिकाने दारों की हिम्मत नहीं हुई की कि रोकें.

सम्मलेन के लिए वर्तमान सेठ मोती लाल कालेज और रानीसती मंदिर के मैदान में विशाल तम्बू लगाये गए थे. एक नया गाँव बस गया था. सम्मलेन का कार्यालय सभा स्थल के निकट, मुख्य सड़क पर 'टेकडी वाली हवेली' में रखा था. आम लोगों के लिए सम्मलेन स्थल पर अनेक भोजनालय बनाये गए थे. झुंझुनू शहर के दुर्गादास काइयां , रंगलाल गाड़िया, बजरंग लाल वर्मा आदि ने खूब दौड़-भाग की. बगड़, चिड़ावा आदि शहरों से भरपूर सहयोग मिला. पूरा झुंझुनू शहर महासम्मेलन का स्वयं ही आयोजक बन गया था. स्वयं सेवकों की पूरी फ़ौज तीन दिन तक सम्मलेन स्थल पर अपनी सेवाएँ देती रही. झुंझुनू की गली-गली उत्साह से सरोबर थी.

पन्ने सिंह ने महासम्मेलन की अध्यक्षता के लिए दिल्ली के आनरेरी मजिस्ट्रेट चौधरी रिशाल सिंह राव को आमंत्रित किया था. चौधरी रिशाल सिंह दिल्ली से रींगस, रींगस से झुंझुनू रेल द्वारा पहुंचे. रेलवे स्टेशन पर किसान नेताओं के अलावा हजारों का जनसमूह अपने मुख्य अतिथि की प्रतीक्षा कर रहे थे. जब वे स्टेशन पहुंचे तो झुंझुनू स्टेशन जय कारों से गूँज उठा. रेलवे स्टेशन पर ऐसी भीड़ बाद में कभी नहीं देखी गयी. स्टेशन से सभा स्थल तक मुख्य सड़क से जुलुस के रूप में जाना तय हुआ. आगे-आगे बैंड बाजा , उसके पीछे सजा हुआ हाथी चलने लगा. हाथी पर चौधरी रिशाल सिंह और उनके पीछे पन्ने सिंह सवार थे. हाथी पर इन दोनों के साथ गनपतराम नाई बैठा था, जो मुख्य अतिथि को चंवर ढुला रहा था. हाथी के पीछे पैदल स्त्रियों का जत्था पांच-पांच की पंक्तियों में गीत गाते चल रहा था. महिला जत्थे के पीछे पांच-पांच की पंक्तियों में पुरुष पैदल हाथों में लाठियां या बरछी लिए चल रहे थे. सबसे पीछे ऊंट सवारों का जत्था था. सजे हुए ऊंट भी पांच-पांच की पंक्तियों में चल रहे थे. सत्यदेव सिंह के पास वर्षों तक इस जुलुस की फोटो सुरक्षित रही परन्तु दुर्भाग्य से अब वे उपलब्ध नहीं हैं. सत्यदेव सिंह पन्ने सिंह के दूसरे बेटे हैं.

चौधरी घासीराम, हर लाल सिंह, राम सिंह बख्तावरपुरा, लादूराम किसारी, ठाकुर देशराज, पंडित ताड़केश्वर शर्मा, जीवन राम जैतपुरा, हुकुम सिंह आदि की मेहनत के कारण पूरा झुंझुनू जिला महासम्मेलन की और उमड़ पड़ा. पन्ने सिंह के बड़े भाई भूरेसिंह ने भी इस सम्मलेन के दौरान उत्साह से कार्य किया. सीकरवाटी से भी काफी संख्या में किसान नेता आये थे. यह परिवर्तन की आंधी थी. इसलिए भूखे-प्यासे, पीड़ित गाँवों के लोग पैदल जत्थों में सभा स्थल की और चल पड़े. प्रथम बार गाँवों की महिलायें गीत गाते हुए आई. झुंझुनू की मुख्य सड़क पर जुलुस सभा स्थल की और बढ़ रहा था. शहर के निवासीगण घरों की छतों पर, दीवारों और मुंडेरों तथा छपरों पर खड़े हो आन्दोलनकारियों का हौसला बढ़ा रहे थे.

जयपुर रियासत के पुलिस इंस्पेक्टर जनरल मि. अफ.ऍम. यंग, नाजिम शेखावाटी, पुलिस अधीक्षक झुंझुनू व अन्य अधिकारीगण जुलुस के साथ-साथ चल रहे थे. शहर के निवासियों ने अनेक स्थानों पर जुलुस रोककर , मुख्य अतिथि व किसान नेताओं का सम्मान किया. महिलाओं ने आरती उतारी. तत्पश्चात वे भी जुलुस में शामिल हो गए.

सम्मलेन स्थल पर ऊँचा मंच बना हुआ था. अनेक हवन-कुण्ड एक और बने हुए थे. अधिवेशन के दौरान तीनों दिन सुबह यग्य हुआ और जनेऊ बांटी गयी. दिन में भाषणों के अतिरिक्त भजनोपदेशक रोचक और जोशीले गीत प्रस्तुत कर रहे थे. जीवन राम जैतपुरा, हुकुम सिंह, भोला सिंह, पंडित दत्तुराम, हनुमान स्वामी, चौधरी घासी राम आदि ने एक से बढ़कर एक गीत सुनाये. ठाकुर देशराज, पन्ने सिंह, सरदार हरलाल सिंह आदि नेताओं ने सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक बदलाव की आवश्यकता प्रतिपादित की. विशाल सम्मलेन को संबोधित करते हुए जयपुर रियासत के आई .जी . यंग ने कहा - जाट एक बहादुर कौम है. सामन्तों और पुरोहितों के लिए यह असह्य था.

इस ऐतिहासिक सम्मलेन जो निर्णय लिए गए उनमें प्रमुख निर्णय था - झुंझुनू में विद्यार्थियों के पढ़ने और रहने के लिए छात्रावास का निर्माण. दूसरा निर्णय जाट जाति का सामाजिक दर्जा बढ़ाने सम्बंधित था. जागीरदार और पुरोहित किसान को प्रताड़ित करते थे और उनमें हीन भावना भरने के लिए छोटे नाम से पुकारते थे जैसे मालाराम को मालिया. मंच पर ऐलान किया गया कि आज से सभी अपने नाम के आगे 'सिंह' लगावेंगे. सिंह उपनाम केवल ठाकुरों की बपौती नहीं है. उसी दिन से पन्ना लाल देवरोड़ बने कुंवर पन्ने सिंह देवारोड़, हनुमानपुरा के हरलाल बने सरदार हरलाल सिंह, गौरीर के नेतराम बने कुंवर नेतराम सिंह गौरीर, घासी राम बने चौधरी घासी राम फौजदार. आगरा के चाहर अपना टाईटल फौजदार लगाते हैं अत: चाहर गोत्र के घासी राम को यह टाईटल दिया गया.

कुंवर पन्ने सिंह देवरोड़ महासम्मेलन के पश्चात् पूरे शेखावाटी क्षेत्र में प्रसिद्ध हो गए थे. राष्ट्रीय स्तर पर अन्य नेताओं से उनके संपर्क स्थापित हुए. उनकी कर्मठता, परिवर्तन की ललक, अध्ययन प्रियता और दबंग स्वभाव ने पन्ने सिंह को शेखावाटी अंचल का आदर्श व्यक्ति बनादिया. उनके साहस की चर्चा जन-जन में होने लगी. पन्ने सिंह के नाम से गाँवों के गरीबों में साहस भर जाता था. पिलानी के निकट होने से बिड़लाओं ने स्कूलों का जाल बिछाया, उन सबके पीछे पन्ने सिंह का मस्तिष्क काम कर रहा था.

खादी की सफ़ेद धोती, कुरता, खुले गले का कोट, सर पर सफ़ेद पगड़ी, पैरों में देशी जूती, ये पन्ने सिंह की पहचान बन गयी. विशाल काया और ऊँचा कद , पन्ने सिंह को अन्य से करते थे. उनके देवरोड़ स्थित घर में आने जाने वालों का ताँता लगा रहता था. पन्ने सिंह के बेटे सत्यदेव का कहना है कि उनके घर पर क्रांतिकारियों का जमघट लगा ही रहता था. क्रन्तिकारी बाबा नरसिंह दास लम्बे समय तक भूमिगत रूप में पन्ने सिंह के घर रहे. पन्ने सिंह की पत्नी आने वालों को खाना खिलाती थी. मेहमानों की भीड़ बढने पर गाँव के नाई की सेवा ली जाती थी.

पन्ने सिंह दिन-रात जिले में दौरा करते थे. आवश्कता होने पर राज्य से बाहर भी जाते थे. जब-जब भी आर्य समाज का वार्षिक सम्मलेन मंडावा में होता, पन्ने सिंह गाँव के लोगों को एकत्रित कर पैदल ही मंडावा के लिए चल देते. गाँवों में रुकते हुए, प्रचार करते हुए वे मंडावा पहुंचते थे.

राजनैतिक जीवन में व्यस्त रहने के बावजूद वे आर्थिक पक्ष का ध्यान रखते थे. इसके लिए वे निर्माण कार्यों का ठेका लेते. इससे उन्हें अतिरिक्त आय होती रहती और आर्थिक आधार सुदृढ़ बना रहता. किसी के आगे हाथ पसारने की उन्हें आवश्यकता नहीं थी. सन 1928 के पश्चात् पन्ने सिंह ने ब्याज पर रुपये उधार देना (बोरगत) बंद कर दिया था. इस कार्य से उन्हें घृणा हो गयी थी.

सीकर यज्ञ में योगदान

ठाकुर देशराज[1] ने लिखा है .... जनवरी 1934 के बसंती दिनों में सीकर के आर्य महाविद्यालय के कर्मचारियों द्वारा सीकर यज्ञ आरंभ हुआ। उन दिनों यज्ञ भूमि एक ऋषि उपनिवेश सी जांच रही थी। बाहर से आने वालों के 100 तम्बू और और छोलदारियाँ थी और स्थानीय लोगों के लिए फूस की झोपड़ियों की छावनी बनाई।

20000 आदमी के बैठने के लिए पंडाल बनाया गया था जिसकी रचना चातुरी में श्रेय नेतराम सिंह जी गोरीर और चौधरी पन्ने सिंह जी बाटड़, बाटड़ नाऊ को है। यज्ञ स्थल 100 गज चौड़ी और 100 गज लंबी भूमि में बनाया गया था जिसमें चार यज्ञ कुंड चारों कोनों पर और एक बीच में था। चारों यज्ञ कुंड ऊपर यज्ञोपवीत संस्कार होते थे और बीच के यज्ञ कुंड पर कभी भी न बंद होने वाला यज्ञ।


[पृ.227]: 25 मन घी और 100 मन हवन सामग्री खर्च हुई। 3000 स्त्री पुरुष यज्ञोपवीत धारण किए हुये थे।

यज्ञ पति थे आंगई के राजर्षि कुंवर हुकुम सिंह जी और यज्ञमान थे कूदन के देवतास्वरुप चौधरी कालूराम जी। ब्रह्मा का कृत्य आर्य जाति के प्रसिद्ध पंडित श्री जगदेव जी शास्त्री द्वारा संपन्न हुआ था। यह यज्ञ 10 दिन तक चला था। एक लाख के करीब आदमी इसमें शामिल हुए थे। इस बीसवीं सदी में जाटों का यह सर्वोपरि यज्ञ था। यज्ञ का कार्य 7 दिन में समाप्त हो जाने वाला था। परंतु सीकर के राव राजा साहब द्वारा जिद करने पर कि जाट लोग हाथी पर बैठकर मेरे घर में होकर जलूस नहीं निकाल सकेंगे।

3 दिन तक लाखों लोगों को और ठहरना पड़ा। जुलूस के लिए हाथी जयपुर से राजपूत सरदार का लाया गया था, वह भी षड्यंत्र करके सीकर के अधिकारियों ने रातों-रात भगवा दिया। किंतु लाखों आदमियों की धार्मिक जिद के सामने राव राजा साहब को झुकना पड़ा और दशवें दिन हाथी पर जुलूस वैदिक धर्म की जय, जाट जाति की जय के तुमुलघोषों के साथ निकाला गया और इस प्रकार सीकर का यह महान धार्मिक जाट उत्सव समाप्त हो गया।


इस महोत्सव में भारतवर्ष के हर कोने से जाट सरदार आए थे। इन्हीं दिनों राजस्थान जाटसभा का द्वितीय अधिवेशन कुंवर रतन सिंह जी के सभापतित्व में पूर्ण उत्साह के साथ संपन्न हुआ।

इस अवसर पर जाट साहित्य भी काफी प्रकाशित हुआ। चौधरी रीछपाल सिंह जी धमेड़ा का लिखा जाट महायज्ञ का इतिहास, चौधरी लादुराम रानीगंज का लिखा नुक्ताभोज,


[पृ 228]: पंडित दत्तूराम जी की लिखी गौरव भजनावली और ठाकुर देशराज जी का लिखा पुनीत ग्रंथ जाट इतिहास भी इस समय प्रकाशित हुए।

पुस्तक का प्रकाशन

Gallery

References

  1. Thakur Deshraj: Jat Jan Sewak, 1949, p.226-228

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