Rup Ram Maan

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लेखक:लक्ष्मण बुरड़क, IFS (Retd.), Jaipur
Volunteers of Kangad Kand, Rupa Ram is standing right

Chaudhari Rup Ram Maan (चौधरी रूपराम मान) was from village Gotha (गोठा) in Rajgarh tahsil of Churu district in Rajasthan. [1]

Career

He was Head Constable in Railway Police at Ratangarh, Rajasthan. He left the job and founded Vidyarthi Bhawan at Sihagon Ki Chhatri in Ratangarh. Here he started educating farmer community boys. Initially his wife used to cook food for the boys. Vidyarthi Bhawan Ratangarh playsed very important role in spreading education and reforms.

He played an important role in Kangar Ratangarh farmers movement against Jagirdars.

Role in Kangar movement

Chaudhari Rupram Maan and Swami Chetnanand started the education program of Jat farmers in rural areas of Ratangarh tehsil by opening private schools. They appointed Swami Nityanand and Chaudhari Chandgi Ram for this purpose. Swami Chetnanand was born in the family of a Dhaka Jat farmer and could feel the effect of oppression by Jagirdars. These people remained under ground and collected money to start the private education of Jat boys. Chaudhari Budh Ram Katewa of Bharatia ki Dhani, Ratangarh, Chaudhari Budh Ram Dudi village Sitsar and Chaudhari Surta Ram Sewda, Ratangarh helped a lot in this campaign. Chaudhari Surta Ram Sewda gave his own land for starting a school and Chaudhari Budh Ram Dudi got made a shade on this land to start a school.[2]

At that time there were about 40-50 Jat boys getting education in Ratangarh town who were mainly from Sihag, Dudi, and Tetarwal Jats of Ratangarh town and rest were from nearby villages like Sangasar, Loonchh, Loha, Chhabri, Kadia, Tidiyasar, Thathawata etc. Most of these boys were from poor families and could not afford education on their own. The only means of funding the private education was through collection of contribution (chanda) or subscription from the farmers. Jats of Ratangarh and Churu either could not afford or did not give subscription out of fear of the Jagirdars. But the Jats of Ganganagar district were well off and they were not much effected by Jagirdars. They gave handsome amounts for education. [3]

Chaudhari Hari Ram Dhaka went to Sangariya to get financial help from Swami Keshwanand. Swami Keshwanand appointed him the Manager of Industries Department of Jat High School Sangariya. Megh Singh Sewda also joined this school. Chaudhari Hari Ram Dhaka collected about Rs. 2000/- from the teachers of Jat High School and called Chaudhari Rupram Maan, Vidyarthi Bhawan Ratangarh, to hand over this amount. He then sent Chaudhari Rupram Maan to Advocate Harishchandra Nain at Ganganagar. There was a good subscription at Ganganagar and with this financial assistance Chaudhari Rupram Maan and Swami Chetnanand organized a grand sabha of farmers at Ratangarh in Podaron ka Nohra. Swami Keshwanand and Chaudhari Hari Ram Dhaka also joined this sabha. A number of decisions were taken in this sabha about awakening of the farmers of this area. As decided in this sabha Swami Keshwanand sent Chaudhari Hari Ram Dhaka to Ratangarh to enhance the movement of education and freedom.[4]

Loha Sabha against Jagirdari system

Hari Ram Dhaka and Megh Singh Sewda went from village to village in Churu district and gave momentum to this movement. Tiku Ram Budania of Loha, Budh Ram Dudi of Sitsar, Rupram Maan and Hari Ram Dhaka of Norangsar organized a meeting at village Loha in Ratangarh tehsil on 10 October 1946.

The urban people also came in their support. Mohan Lal Saraswat and Rameswar Pareek from Ratangarh were of great help in the sabha. Jagirdars did their best to disturb the sabha but it continued. It was decided unanimously not to pay the taxes to the Jagirdars and not to obey their orders.[5]

जाट जन सेवक

Jat Jan Sewak, 1949, p.147
Jat Jan Sewak, 1949, p.148

रियासती भारत के जाट जन सेवक (1949) पुस्तक में ठाकुर देशराज द्वारा चौधरी रूपराम जी का विवरण पृष्ठ 147-148 पर प्रकाशित किया है। ठाकुर देशराज[6] ने लिखा है ....चौधरी रूपराम जी - [p.147]: विद्यार्थी भवन रतनगढ़ के संस्थापकों में चौधरी रूपराम जी एक प्रमुख हैं। आरंभ में उन्होंने इस शिक्षा संस्था को अपना


[p.148]: जीवनदान ही दे दिया था। वही इस के संचालक रहे हैं। आप पुलिस में क्लर्क थे। 30-32 साल के इस नौजवान के दिल में अपनी कौम की गिरी दशा के लिए दर्द था। आखिर नौकरी को लात मारनी ही पड़ी। तहसील राजगढ़ में गोठा एक गांव है। वहीं के मान गोती जाट चौधरी रामजस जी के सुपुत्र हैं। आसपास के लोग आप को हृदय से प्यार करते हैं। आपने बीकानेर के आंदोलन में भी भाग लिया है।

कांगड़ काण्ड में भूमिका

न्याय न मिलने की उम्मीद में मेघसिंह आर्य के नेतृत्व में प्रतिनिधि मण्डल प्रजामंडल (प्रजा परिषद्) पहुंचा । प्रजामंडल ने एक जाँच दल काँगड़ गाँव भेजने का निर्णय लिया जिसमें हंसराज आर्य (भादरा), दीप चंद (राजगढ़), पं गंगाधर रंगा, प्रो केदारनाथ शर्मा, मौजीराम चांदगोठी, चौधरी रूपाराम मान, स्वामी सच्चिदानंद आदि थे । प्रतिनिधि मंडल रेवल से उतर कर पैदल ही काँगड़ के लिए रवाना हुआ । गौशाला के पास हरी राम ढाका और भजनोपदेशक शीशराम लहूलुहान पड़े कराहते हुए मिले । उन्होंने सारी कहानी प्रतिनिधि मंडल को बताई और काँगड़ जाने से मना किया । मेघ सिंह आर्य को बताया गया कि तुम्हें तो जाते ही जान से मार देंगे, कह रहे थे कि मेघला खोतला मिल गया तो जान से मारेंगे । मेघ सिंह उनके साथ नहीं गए । प्रतिनिधियों को रस्ते में लोग मिले जो डरे हुए थे, सबने आप बीती बताई । प्रतिनिधि गाँव पहुंचे तो केवल ठाकुर के गुंडे सामंती लोग तथा पुलिस वाले थे । घर सूने पड़े थे । वे वापिस स्थिति का मुआयना कर 4 मील पैदल रतनगढ़ की तरफ आ गए तो पीछे से ठाकुर के गुंडे ऊँटों पर चढ़कर आ धमके तथा घेरकर पकड़ लिए गए तथा उन्हें वापस गढ़ में ले आये, जहाँ उनकी खूब पिटाई की ।(उद्देश्य:पृ.21-22)

नंगे करके उलटे लटका कर जूतों सहित ऊपर चढ़ गए । हाथों पर अलग, पैरों पर अलग तीन-तीन, चार-चार आदमी चढ़ गए, खूब पिटाई की, बेहोश होने पर छोड़ दिया जाता और होश आने पर फिर पिटाई शुरू कर दी जाती । इस प्रकार 30 अक्टूबर 1946 से 1 नवम्बर 1946 तक पिटाई होती रही । छ: जनों की गुदा में मिर्ची के घोटे चला दिए । रूपाराम मान को कुएं पर जहाँ औरतें पानी भर रही थी, वहां नंगा करके पीटा तथा घोटे की जगह बांस गुदा में चढ़ा दिया, जिससे आंत फट गयी, बड़ी मुश्किल से चलकर रतनगढ़ आये वहां से बीकानेर आये, कोई इलाज नहीं होने दिया, ना ही रिपोर्ट पुलिस में लिखने दी । इनके पास 231 रुपये नगद थे तथा पेन्सिल, बटुआ आदि थे जो ठाकुर गोपसिंह ने खोस लिए । फिर इनका इलाज हिसार करवाया गया । ठाकुर के गुंडों ने पं. गंगाधर की जनेऊ तोड़ दी व चौटी उखाड ली तथा मूंह पर कुत्ते की बिष्ठ बाँध दी, यही हाल प्रो. केदारनाथ शर्मा का हुआ ।(उद्देश्य:पृ.22)


प्रजामंडल ने देश के अखबारों में खबर दी, जनता का दिल खोल उठा । राजा ने कोई सुनवाई नहीं की थी । जब पहले जत्थे की पिटाई हो रही थी तो जासासर के ठाकुर ने खबर दी कि पंजाब, हरयाणा व अन्य गाँवों से 10 हजार जाट हमला करने के लिए आ रहे हैं तो जागीरदारों और ठाकुर गोपसिंह में घबराहट बढ़ गयी । रतनगढ़ के कायमखानी वहां से खिसक लिए । ठाकुर के अन्य लोग भी भयभीत हो गए और भाग छूटे । गढ़ में केवल पुलिस के जवान व गिने-चुने जागीरदार बचे थे, गढ़ खाली हो गया था । ऐसी दुर्दशा किसानों और प्रतिनिधि मंडल की हुई थी । चौधरी रूपाराम मान आंत फटने का सही इलाज नहीं होने के कारण आखिर वे शहीद हो गए ।(उद्देश्य:पृ.22)

References

  1. Thakur Deshraj:Jat Jan Sewak, 1949, p.147-148.
  2. Dr Mahendra Singh Arya et al: Ādhunik Jat Itihas, Agra 1998, Section 9 pp.1-12
  3. Dr Mahendra Singh Arya et al: Ādhunik Jat Itihas, Agra 1998, Section 9 pp.1-12
  4. Dr Mahendra Singh Arya et al: Ādhunik Jat Itihas, Agra 1998, Section 9 pp.1-12
  5. Dr Mahendra Singh Arya et al: Ādhunik Jat Itihas, Agra 1998, Section 9 pp.1-12
  6. Thakur Deshraj:Jat Jan Sewak, 1949, p.147-148

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