Shahjehan

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Shahabuddin Muhammad Shah Jahan (Urdu: شاه جهان; Hindi: शाहजहां); (January 1594 – 22 January 1666) was the fifth Mughal Emperor of India. He ruled from 1628, until 1658. his childhood name being Prince Khurram, he was the son of Emperor Jahangir and grandson of Emperor Akbar.

Shah Jahan was chosen as successor to the throne after the death of his father in 1627. His rule has been called the Golden Age when many palaces and forts were built by the emperor. Among them, Taj Mahal at Agra and Red Fort of Agra and Delhi are most famous. He also built Jama Masjid of Delhi and more mosques of similar name, including the one at Thatta which is now in Sindh. Like Akbar, he was eager to expand his vast empire. In 1658, he fell ill and was confined by his son and successor Aurangzeb in Agra Fort, until his death in 1666.

Shah Jahan is stated to be a more orthodox Muslim than his father and grandfather. His policies towards non-Muslims were less liberal than his ancestors.

Controversy about Taj Mahal

Historian P.N. Oak and several others claim that the monument at Agra(Taj Mahal) was earlier a Hindu temple and that Shah Jahan converted it into a Mausoleum, by burying the dead body his wife, Mumtaj Mahal, at that site.

सम्राट् शाहजहां और जाट

(सन् 1627-1658 ई०)

सम्राट् शाहजहां ने 8 रमजान उलमुबारिक 1059 हिजरी (सन् 1650 ई०) को सर्वखाप पंचायत के मन्त्री चौ० जादोंराय गांव शोरम को एक शाही फरमान भेजा जिसमें लिखा कि “मुलक मौज्जम शहंशाह शाहजहां, चौ० जादोंराय गांव शोरम मंत्री सर्वखाप पंचायत के प्रति वचन (वायदा) देते हैं कि मेरी तरफ से सब जातियों के साथ मेहरबानी का सलूक रहेगा तथा सबको बराबर आजादी रहेगी।” मुहर शहंशाह शाहजहां हिन्द।[1]

दलीप सिंह अहलावत आगे लिखते हैं -

...सम्राट् शाहजहां (सन् 1627-1658) ने हिन्दू किसानों पर लगान व अन्य नवीन कर लगा दिए। ब्रजमण्डल के किसानों ने इन करों को देने से इन्कार कर दिया। मुग़ल सरकार ने इनको विद्रोही मानकर फौज़दारों तथा नवीन जागीरदारों ने ब्रजमण्डल में अत्याचार करने शुरु कर दिये। सम्राट् शाहजहां ने 1636 ई० में लगान वसूल करने तथा ब्रजमण्डल की क्रान्ति को दबाने के लिए मुर्शिद कुली खां तुर्कमान को कांमा, पहाड़ी, मथुरा तथा महावन परगनों का फौजदार नियुक्त करके भेजा। वह अपनी एक विशाल सेना के साथ आगरा से मथुरा पहुंचा और उसने इन परगनों में अपनी सैनिक चौकियां स्थापित कीं। सैनिक अभियानों की आड़ में वह अपनी कामुक वृत्तियों का दास बन गया। वह किसानों को स्थान-स्थान पर सैनिक बल से खदेड़ने लगा और उनकी सुन्दर स्त्रियों को पकड़कर अपने हरम में ले जाता था। जन्माष्टमी के दिन मथुरा के पास यमुना नदी के उस पार गोवर्धन (गोकुल) में हिन्दुओं का एक बड़ा मेला लगता था। हिन्दुओं की तरह माथे पर तिलक लगाए तथा धोती पहिने खान तुर्कमान पैदल ही उस भीड़ में चला जाता था। जब कभी वह किसी चन्द्रमुखी सुन्दर हिन्दू लड़की को देखता, तो उस पर मेमनों के झुण्ड पर झपटने वाले भेड़िये की भांति झपटता और उसे पकड़कर ले जाता था। यमुना नदी के किनारे उसके आदमी नौका के साथ तैयार रहते थे। वे उसको नौका में बैठाकर बड़ी तेजी से आगरा ले जाकर तुर्कमान के हरम में पहुंचा देते थे। इस हरम में सैंकड़ों हिन्दू लड़कियां थीं।

खान के इन अधम एवं धर्म विरोधी पापात्मक अत्याचारों का बदला लेने के लिए ब्रजमण्डल के किसान सक्रिय हो गए। वे उसकी सैनिक टुकड़ियों तथा चौकियों पर हमला करने लगे। विद्रोही


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-621


जाटों के दमन के लिए तुर्कमान ने सन् 1638 ई० में सम्भल के अन्तर्गत जटवाड़ नामक जाटों की एक सुदृढ़ गढ़ी पर आक्रमण किया, परन्तु स्वाभिमानी जाटों ने रात्रि के समय मदिरा में चूर तुर्कमान को घेर लिया और उसे कत्ल कर डाला।

इस क्रान्ति का प्रभाव हिण्डौन परगना के किसानों पर पड़ा तथा उन्होंने खालसा (सरकारी) भूमि का लगान रोक लिया। हिन्डौन परगने के किसानों से लगान वसूल करने के लिए शाहजहां ने 4 जून, 1637 ई० को एक फरमान मिर्जा राजा जयसिंह को भेजा जिसके मिलते ही वह कछवाहा फौज के साथ आमेर से हिण्डौन पहुंचा। भीषण प्रयास के बाद किसानों ने विवश होकर लगान अवश्य अदा कर दिया, परन्तु इससे स्थायी हल नहीं निकला। किसानों में क्रान्ति की भावनायें उभर रही थीं और प्रतिवर्ष उपद्रव भड़क रहे थे। इस प्रकार यह भूखण्ड क्रान्तिकारियों का अखाड़ा बनता गया।

फौजदार मुर्शिद कुली खां की हत्या के बाद 1642 ई० में सम्राट शाहजहां ने इरादत खां को मथुरा, कांमा, महावन, पहाड़ी परगनों का फौजदार नियुक्त किया और वह अपनी सेनाओं के साथ इन परगनों में शांति व्यवस्था स्थापित करने के लिए पहुंचा। इसमें उदारता तथा नैतिकता थी। वह समझता था कि “जाटों को आंख दिखाकर या धमकी देकर बस में करना जितना कठिन है, उदारता, दयाभाव से बस में करना उतना ही सरल है।” यह देखकर ही वास्तव में उसने चार वर्ष (सन् 1642-46 ई०) तक सैनिक शक्ति की अपेक्षा प्रेम तथा सहनशीलता से स्वाभिमानी जाटों को बस में रखकर ब्रजमण्डल में शान्ति व्यवस्था बनाने में सफलता प्राप्त की। [2]

External Links

References


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