Soron Etah

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For the clan see Soron
Location of Soron in Etah district

Soron village is located in Kasganj tahsil of Etah district in Uttar Pradesh.

Variants

Jat Gotras

History

V. S. Agrawala[1] writes that Patanjali makes clear the social status of the sudras in his time. Firstly there were sudras who were not excluded from Aryavrata but were living within its social system. Secondly, there was another class of sudras who were living outside Aryavrata and its society. He cites as examples (1) Kishkindha-Gabdikam (2) Shaka-Yavanam and (3) Saurya-Krauncham. Of these


Alexander Cunningham[2] writes that from Ahi-chhatra the Chinese pilgrim Xuanzang proceeded in a south direction a distance of from 200 to 270 li, from 23 to 25 miles, to the Ganges, which he crossed, and then turning to the south-west he arrived in the kingdom of Pi-lo-shan-na[3] His route to the south -would have taken him through Aonla and Budaon to the Budh Gunga (or old Ganges), somewhere near Sahawar, a few miles below Soron, both of which places stood on the main stream of the Ganges so late as 400 years ago. As his subsequent route is said to have been to the south-west, I believe that he must have crossed the Ganges close to Sahawar, which is 42 miles from Ahi-chhatra in a direct line. From all my early inquiries I was led to believe that Soron was the only ancient place in this vicinity ; and as Hwen Thsang does not give any distance for his south-west march, I concluded that Soron must have been the place to which he gives the name of Pi-lo-shan-na. I accordingly visited Soron, which is undoubtedly a place of very great antiquity, but which cannot, I think, be the place visited by the Chinese pilgrim. I will, however, first describe Soron before I proceed to discuss the superior claims of the great ruined mound of Atranji-Khera to be identified with the Pi-lo-shan-na of the Chinese pilgrim.

Soron is a large town on the right, or western, bank of the Ganges, on the high-road between Bareli and Mathura. The place was originally called Ukala Kshetra ; but after the demon Hiranyaksha had been killed by the Varaha Avatar, or Boar incarnation of Vishnu, the name was changed to Sukara Kshetra, or


[p.365]: " the place of the good deed." The ancient town is represented by a ruined mound called the Kilah, or " fort," which is one quarter of a mile in length from north to south, and somewhat less in breadth. It stands on the high bank of the old bed of the Ganges, which is said by some to have flowed immediately under it so late as 200 years ago. The modern town stands at the foot of the old mound on the west and south sides, and probably contains about 5000 inhabitants. There are no dwellings on the old mound, which is occupied only by the temple of Sita-Ramji and the tomb of Shekh Jamul ; but it is covered with broken bricks of large size, and the foundations of walls can be traced in all directions. The mound is said to be the ruins of a fort built by Raja Somadatta of Soron many hundred years ago. But the original settlement of the place is very much older, being attributed to the fabulous Raja Vena Chakravartti who plays such a conspicuous part in all the legends of North Bihar, Oudh, and Rohilkhand.

शूकरक्षेत्र

विजयेन्द्र कुमार माथुर[4] ने लेख किया है ...शूकरक्षेत्र (AS, p.905): शूकरक्षेत्र का पुराना नाम उकला भी है। कहा जाता है कि भगवान विष्णु का वराह (शूकर) अवतार इसी स्थान पर हुआ था। ऐसा जान पड़ता है कि वराह–अवतार की कथा की सृष्टि विजातीय हूणों के धार्मिक विश्वासों के आधार पर हिन्दू धर्म के साहित्य में की गई। यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि आक्रमणकारी हूणों के अनेक दल जो उत्तर भारत में गुप्तकाल में आए थे, यहाँ पर आकर बस गए और विशाल हिन्दू समाज में विलीन हो कर एक हो गए। उनके अनेक धार्मिक विश्वासों को हिन्दू धर्म में मिला लिया गया और जान पड़ता है कि वराहोपासना इन्हीं विश्वासों का एक अंग थी और कालान्तर में हिन्दू धर्म ने इसे अंगीकार कर विष्णु के एक अवतार की ही वराह के रूप में कल्पना कर ली।

शूकरक्षेत्र मध्यकाल में तथा उसके पश्चात् तीर्थ रूप से मान्य रहा है। गोस्वामी तुलसीदास ने रामायण की कथा सर्वप्रथम शूकरक्षेत्र में ही सुनी थी– 'मैं पुनि निज गुरु सन सुनी कथा, सुशूकरक्षेत्र समुझि नहीं तस बालपन, तब अति रह्यों अचत' (रामायण बालकाण्ड, 30). तुलसीदास के गुरु नरहरिदास का आश्रम यहीं पर था। यहाँ प्राचीन ढूह है। इस पर सीता–राम जी का वर्गाकार मन्दिर है। इसके 16 स्तम्भ हैं। जिन पर अनेक यात्राओं का वृत्तान्त उत्कीर्ण है। सबसे अधिक प्राचीन लेख जो पढ़ा जा सका है 1226 वि. सं. 1169 ई. का है। जिससे मन्दिर के निर्माण का समय ज्ञान होता है। इस मन्दिर का 1511 ई. के पश्चात्त का कोई उल्लेख नहीं प्राप्त होता क्योंकि इतिहास से सूचित होता है कि इसे सिकन्दर लोदी ने नष्ट कर दिया था। नगर के उत्तर–पश्चिम की ओर वराह का मन्दिर है। जिसमें वराह लक्ष्मी की मूर्ति की पूजा आज भी होती है। पाली साहित्य में इसे सौरेय्य कहा गया है। (देखें - सोरों)

शूकर क्षेत्र

शूकर क्षेत्र नैमिषारण्य के पास का एक तीर्थ स्थान है। इसका आधुनिक नाम सोरों हैहिरण्याक्ष का वध यहीं हुआ था।[5] सोरों शूकर क्षेत्र भारत के उत्तर प्रदेश राज्य में कासगंज जनपद का एक नगर है। यहाँ प्रत्येक अमावस्या, सोमवती अमावस्या, पूर्णिमा, रामनवमी, मोक्षदा एकादशी आदि अवसरों पर तीर्थ यात्रियों का बड़ी संख्या में आवागमन होता है और गंगा में स्नान कर पुण्य प्राप्त करते हैं। इस पवित्र क्षेत्र में अस्थि विसर्जन का विशेष महत्त्व है। यहाँ स्थित कुण्ड में विसर्जित की गईं अस्थियाँ तीन दिन के अन्त में रेणुरूप धारण कर लेती हैं। सोरों महाकवि गोस्वामी तुलसीदास की जन्मभूमि है।[6]

सोरों

विजयेन्द्र कुमार माथुर[7] ने लेख किया है ...सोरों (AS, p.995) कासगंज उत्तर प्रदेश से 9 मील दूर प्राचीन शूकरक्षेत्र है। प्राचीन समय में सोरों को सोरेय्य नाम से जाना जाता था। यहाँ का मुख्य मंदिर 'वाराह मंदिर' है। पहले सोरों के निकट गंगा बहती थी, किंतु अब गंगा दूर हट गई है। पुरानी धारा के तट पर अनेक प्राचीन मन्दिर स्थित हैं। तुलसीदास ने रामायण की कथा अपने गुरु नरहरिदास से प्रथम बार यहीं पर सुनी थी। उनके भ्राता नन्ददास जी द्वारा स्थापित बलदेव का मन्दिर सोरों का प्राचीन स्मारक है।

गंगा नदी के तट पर एक प्राचीन स्तूप के खण्डहर भी मिले हैं, जिनमें सीता-राम के नाम से प्रसिद्ध मन्दिर स्थित है। कहा जाता है कि इस मन्दिर का निर्माण राजा बेन ने करवाया था। प्राचीन मन्दिर काफ़ी विशाल था, जैसा कि उसकी प्राचीन भित्तियों की गहरी नींव से प्रतीत होता है। अनेक प्राचीन अभिलेख भी इस मन्दिर पर उत्कीर्ण हैं, जिनमें सर्वप्राचीन अभिलेख 1226 विक्रम सम्वत=1169 ई. का है। कहा जाता है कि इस मन्दिर को 1511 ई. के लगभग सिकन्दर लोदी ने नष्ट कर दिया था। सोरों के प्राचीन नाम सोरेय्य का उल्लेख पाली साहित्य में भी है।

संदर्भ: भारतकोश-सोरों

See also

शूर: ठाकुर देशराज

ठाकुर देशराज[8] ने लिखा है ....शूर - इन्हें सौरसेनों के नाम से भी याद किया जाता है। महाभारत के बाद इनके भी दो दल हो गए थे। एक दल की राजधानी मथुरा थी। कुछ दिन बाद शौरसेनी (सिनसिनी) बना ली। इनमें से विजयदेव ने बयाना को अपनी राजधानी बनाया। इनका दूसरा समुदाय सोरों और बटेश्वर के बीच में आबाद था।

Notable person

External Links

References

  1. V. S. Agrawala: India as Known to Panini, 1953, p. 78
  2. The Ancient Geography of India: I. The Buddhist Period, Including the ...By Sir Alexander Cunningham, p.364-365
  3. Julien's 'Hiouen Thsang,' ii. 235. See Map No. X.
  4. Aitihasik Sthanavali by Vijayendra Kumar Mathur, p.905
  5. पौराणिक कोश |लेखक: राणा प्रसाद शर्मा |प्रकाशक: ज्ञानमण्डल लिमिटेड, वाराणसी |संकलन: भारत डिस्कवरी पुस्तकालय |पृष्ठ संख्या: 558, परिशिष्ट 'क' |
  6. भारतकोश-शूकर क्षेत्र
  7. Aitihasik Sthanavali by Vijayendra Kumar Mathur, p.995
  8. Jat Itihas (Utpatti Aur Gaurav Khand)/Pancham Parichhed ,p.98