Subahu

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Subahu (सुबाहु) was a Nagavanshi King mentioned in Mahabharata and Ramayana. Subahu was a Chandravanshi King in the ancestry of Krishna. He was son of Bahu. Subahu was poisoned by his wife, a daughter of Mund Raja Chohan of Ajmer : he left a son, Rijh.[1]

Genealogy of Subahu

Hukum Singh Panwar[2] has given the ancestry of Bharatpur rulers starting from 1. Yadu. Shini is at S.No. 38, Krishna at S.No. 43 and Vajra at S.No. 46[3]. From Naba at S.No. 47 onward we follow James Tod[4] who has based on records of Brahman Sukhdharma of Mathura.

1. Yadu → → → → 34. Andhaka → 35. Bhajmana → 36. Viduratha → 37. Shura → 38. Shini → 39. Bhoja → 40. Hardika → 41. Devamidha → 42. Vasudeva → 43. Krishna → 44. Pradyumna → 45. Aniruddha → 46. Vajra

47. Naba → 48. Prithibahu → 49. Bahubal (w.Kamlavati Puar) → 50. Bahu → 51. Subahu → 52. Rijh → 53. Raja Gaj (founded Ghazni in Yudhishthira 3008= BC 93) → 54. Salivahana (S.72 = AD 16) → 55. Raja Baland

Jat Gotras from Subahu

Subahu in Mahabharata

शवेतवक्त्रः सुवक्त्रशचारु वक्त्रशपाण्डुरः
दण्डबाहुः सुबाहुश च रजः कॊकिलकस तदा Mahabharata (IX.44.68),

Adi Parva, Mahabharata/Mahabharata Book I Chapter 35 mentions names of the Naga chiefs. Subahu is one of them.

विरजाश च सुबाहुशशालिपिण्डश च वीर्यवान
हस्तिभद्रः पिठरकॊ मुखरः कॊण वासनः Mahabharata (1.35.14)

History

James Tod[6] writes that Rukmani was the senior of the wives of Krishna ; and the eldest of her sons was Pradyumna, who was married to a princess of Vidarbha ; she bore him two sons, Aniruddha and Vajra, and from the latter the Bhattis claim descent. Vajra had two sons, Naba and Khira. [7]

When the Yadus were exterminated in the conflict at Dwarka, and Krishna had gone to heaven, Vajra was on his way from Mathura to see his father, but had only marched twenty coss (forty miles), when he received intelligence of that event, which had swept away his kindred. He died upon the spot, when Naba was elected king and returned to Mathura, but Khira pursued his journey to Dwarica. [8]

The thirty-six tribes of hitherto oppressed by the Yadus, who had long held universal dominion, now determined to be revenged. Naba was compelled to fly the holy city (Dwarica) ; he became prince of Marusthali in the west. [9]


Naba had issue Prithibahu.

Khira had two sons, Jhareja and Yadubhan.

Yadubhan was on a pilgrimage ; the goddess heard his vows ; she awoke him from his sleep, and promised whatever he desired. 'Give me land that I may inhabit' said the youth ; 'Rule in these hills' replied the goddess, and disappeared. When Jud-bhan awoke, and was yet pondering on the vision of the night, a confused noise assailed him ; and looking out, he discovered that the prince of the country had just died without issue, and they were disputing who should succeed him. The prime minister said, 'he dreamed that a descendant of Krishna had arrived at Behera and proposed to seek him out and invest him as their prince. All assented, and Jud-bhan was elected king. He became a great prince, had a numerous progeny, and the place of their abode was henceforth styled Jadu Ka Dang, 'the mountains of Jadu' [10]

Prithi-bahu (' the arm of the earth'), son of Naba, prince of Marusthali.[11]


Naba had a son

Bahubal, ('strong arm'), who espoused Kamlavati, daughter of Vijaya Singh", Prince of Malwa, who gave in dower (daeja) one thousand horses of Khorasan, one hundred elephants, pearls, gems, and gold innumerable, and five hundred handmaids, with chariots and bedsteads of gold. The Puar (Pramar) Kamlavati became the chief queen and bore her lord one son,

Bahu, killed by a fall from his horse ; he left one son,

Subahu, who was poisoned by his wife, a daughter of Mund Raja Chohan of Ajmer : he left a son,

Rijh, who reigned twelve years. He was married to Subhag Sundri, daughter of Ber Sing, prince of Malwa. Having, when pregnant, dreamed that she was delivered of a white elephant, the astrologers, who interpreted this as an indication of greatness, desired he might be named Guj. [12]

काशि राज्य

काशि राज्य की राजधानी काशि थी जो गंगा नदी के किनारे पर थी। वहां पर काश्य-काशीवत (जाट गोत्र) लोगों का राज्य था। वहां का नरेस सुबाहु था। (जाट इतिहास पृ० 24, लेखक ठा० देशराज)। भीमसेन ने काशिराजा की कन्या बलन्धरा से विवाह करके उससे एक पुत्र सर्वग उत्पन्न किया। [13]


महाभारत युग में श्रीनगर राजा सुबाहु के राज्य की राजधानी थी तथा वन पर्व के दौरान गंधमर्दन पर्वत के रास्ते पाण्डवों ने सुबाहु का आतिथ्य ग्रहण किया था।[14]

Subahu in Ramayana

Ramayana Bala Kanda Sarga 30 mentions about Rama's slaying of the demoness Taraka of the forest, his slaying of the demon Subahu and his hordes who defile the yajnas of Vishvamitra. The story goes like this:

मारीच और सुबाहु का वध

दूसरे दिन ब्राह्म मुहूर्त में उठ कर तथा नित्यकर्म और सन्ध्या-उपसना आदि निवृत होकर राम और लक्ष्मण गुरु विश्वामित्र के पास जा कर बोले, "गुरुदेव! कृपा करके हमें यह बताइये कि राक्षस यज्ञ में विघ्न डालने के लिये किस समय आते हैं। यह हम इसलिये जानना चाहते हैं कि कहीं ऐसा न हो कि हमारे अनजाने में ही वे आकर उपद्रव मचाने लगें।"

दशरथ के वीर पुत्रों के इन उत्साहभरे इन वचनों को सुन कर वहाँ पर उपस्थित समस्त ऋषि-मुनि अत्यंत प्रसन्न हुये और बोले, "हे रघुकुलभूषण राजकुमारों! यज्ञ की रक्षा करने के लिये तुमको आज से छः रात्रियों तक पूर्ण रूप से सावधान मुद्रा में और सजग रहना होगा। इन छः रात्रियों मे विश्वामित्र जी मौन होकर निःशब्द यज्ञ करेंगे। इस समय भी वे तुम्हारे किसी भी प्रश्न का उत्तर नहीं देंगे क्योंकि वे यज्ञ की दीक्षा ले चुके हैं।"

इस सूचना को पा कर राम और लक्ष्मण दोनों भाई अपने समस्त शस्त्रास्त्रों से सुसज्जित होकर यज्ञ की रक्षा में तत्पर हो गये। पाँच दिन और पाँच रात्रि तक वे निरन्तर बिना किसी विश्राम के सतर्कता के साथ यज्ञ की रक्षा करते रहे किन्तु इस अवधि में किसी भी प्रकार की विघ्न-बाधा नहीं आई। छठवें दिन राम ने लक्ष्मण से कहा, "भाई सौमित्र! यज्ञ का आज अन्तिम दिन है और उपद्रव करने के लिये राक्षसों की आने की पूरी पूरी सम्भावना है। आज हमें विशेष रूप से सावधान रहने की आवश्यकता है। तनिक भी असावधानी से मुनिराज का यज्ञ और हमारा परिश्रम निष्फल और निरर्थक हो सकते हैं।" राम ने लक्ष्मण को अभी सचेष्ट किया ही था कि यज्ञ सामग्री, चमस, समिधा आदि अपने आप भभक कर जल उठे। आकाश से ऐसी ध्वनि आने लगी जैसे बादल गरज रहे हों और सैकड़ों बिजलियाँ तड़क रही हों। इसके पश्चात् मारीच और सुबाहु की राक्षसी सेना रक्त, माँस, मज्जा, अस्थियों आदि की वर्षा करने लगी। रक्त गिरते देखकर राम ने उपद्रवकारियों पर एक खोजपूर्ण दृष्टि डाली। आकाश में मायावी राक्षसों की सेना को देख कर राम ने लक्ष्मण से कहा, "लक्ष्मण! तुम धनुष पर शर-संधान करके सावधान हो जाओ। मैं मानवास्त्र चला कर इन महापापियों की सेना का अभी नाश किये देता हूँ।" यह कह कर राम ने असाधारण फुर्ती और कौशल का प्रदर्शन करते हुये उन पर मानवास्त्र छोड़ा। मानवास्त्र आँधी के वेग से जाकर मारीच की छाती में लगा और वह उसके वेग के कारण उड़कर एक सौ योजन अर्थात् चार सौ कोस दूर समुद्र में जा गिरा। इसके पश्चात् राम ने आकाश में आग्नेयास्त्र फेंका जिससे अग्नि की एक भयंकर ज्वाला प्रस्फुटित हुई और उसने सुबाहु को चारों ओर से आवृत कर लिया। इस अग्नि की ज्वाला ने क्षण भर में उस महापापी को जला कर भस्म कर दिया। जब उसका जला हुआ शरीर पृथ्वी पर गिरा तो एक बड़े जोर का धमाका हुजआ। उसके आघात से बहुत से पेड़ टूट कर भूमि पर गिर पड़े। मारीच और सुबाहु पर आक्रमण समाप्त करके राम ने बचे खुचे राक्षसों का नाश करने के लिये वायव्य नामक अस्त्र छोड़ दिया। उस अस्त्र के प्रहार से राक्षसों की विशाल सेना के वीर मर मर कर ओलों की भाँति भूमि पर गिरने लगे। इस प्रकार थोड़े ही समय में सम्पूर्ण राक्षसी सेना का नाथ हो गया। सभी ओर राम की जय जयकार होने लगी तथा पुष्पों की वर्षा होने लगी। निर्विघ्न यज्ञ समाप्त करके मुनि विश्वामित्र यज्ञ वेदी से उठे और राम को हृदय से लगाकर बोले, "हे रघुकुल कमल! तुम्हारे भुबजल के प्रताप और युद्ध कौशल से आज मेरा यज्ञ सफल हुआ। उपद्रवी राक्षसों का विनाश करके तुमने वास्तव में आज सिद्धाश्रम को कृतार्थ कर दिया।"[15]

References

  1. James Tod: Annals and Antiquities of Rajasthan, Volume II, Annals of Jaisalmer, p.197-
  2. The Jats:Their Origin, Antiquity and Migrations/Appendices/Appendix No.1
  3. Yadu Vamsavali of Bharatpur given by Ganga Singh in his book 'Yadu Vamsa', Part 1, Bharatpur Rajvansa Ka Itihas (1637-1768), Bharatpur, 1967, pp. 19-21
  4. James Tod: Annals and Antiquities of Rajasthan, Volume II, Annals of Jaisalmer, p.196-201
  5. Dr Mahendra Singh Arya, Dharmpal Singh Dudee, Kishan Singh Faujdar & Vijendra Singh Narwar: Ādhunik Jat Itihas (The modern history of Jats), Agra 1998, p.284
  6. James Tod: Annals and Antiquities of Rajasthan, Volume II, Annals of Jaisalmer, p.195-197
  7. James Tod:Annals of Jaisalmer, Vol.II, p.195
  8. James Tod:Annals of Jaisalmer, Vol.II, p.195
  9. James Tod:Annals of Jaisalmer, Vol.II, p.195
  10. James Tod:Annals of Jaisalmer, Vol.II, p.196
  11. James Tod:Annals of Jaisalmer, Vol.II, p.196
  12. James Tod:Annals of Jaisalmer, Vol.II, p.197
  13. Jat History Dalip Singh Ahlawat/Chapter III,p.290
  14. http://210.212.78.56/50cities/srinagar/hindi/profile_mythology.asp
  15. http://vramayan.blogspot.com/2007/02/blog-post_13.html

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