Swami Mansanath

From Jatland Wiki
Jump to: navigation, search
Swami Mansanath

Swami Mansanath (स्वामी मनसानाथ) from Sangaria was an instrument in developing the Gramotthan Vidyapith Sangaria.

Jat School Sangaria

On 9 August 1917, Chaudhary Bahadur Singh Bhobia with the help of Swami Mansanath and Thakur Gopal Singh Panniwali, started a school named "Jat Anglo Sanskrit Middle School" in sarrafo-ki-dharmshala in Hanumangarh town in Rajasthan, India. This was later shifted to Sangaria. There was a need of funds to expand Sangaria Jat School and Hostel. Chaudhary Bahadur Singh was under great pressure of expanding work of the school. Due to excessive work of 5-6 years, his health started deteriorating. In the month of May 1924 he was on continuous tour of the desert area to collect funds for the school. He got infected with Malaria during the tour and died of Malaria on 1 June 1924.[1]

Role in educating Tara Chand IPS

Tara Chand was born in a poor family in village Makkasar in Hanumangarh district. His father Ch. Kesho Ram Saran had died prior to his birth. His mother was Jaitabai. When child Tara Chand became of 5 years, the famous social worker of the area Saint Swami Mansanath took him away from his mother and got him admitted in a newly started school in Sangaria.

चौधरी बहादुर सिंह भोबिया के प्रेरणा स्रोत

सन् 1917 के अप्रैल महीने में होने वाले कुम्भ मेले के लिए स्वामी मनसानाथजी महंत, नाथों की थेडी के साथ चले। अम्बाला जंक्शन पर प्लेटफॉर्म के एक किनारे पर सूरतगढ-हनुमानगढ क्षेत्र के सैकडों यात्री दो-तीन दिन से रूके पडे थे। अम्बाला से हरिद्वार जाने वाली गाडी पर भीड़ अधिक होने तथा रेलवे पुलिस के कर्मचारियों की रिश्वत की भारी रकम की मांग के कारण उन्हें चढने नहीं दिया जा रहा था। स्वामी मनसानाथजी चौधरी साहब को वहां ले गये और कहा-

‘‘देखो, बहादुर सिंह! ये सब लोग आप के इलाके के हैं। अशिक्षित होने के कारण उन्हें गाडी में भी चढने नहीं दिया जा रहा है तो इनका कुंभ का मेला भी पूरा नहीं हो पाएगा।‘‘

चौधरी बहादुर सिंह अपनी सैनिक वर्दी पहनकर अंग्रेज स्टेशन-मास्टर के पास गए और उन्हें सारी स्थिति बताई। स्टेशन-मास्टर ने अलग से डिब्बे लगवाकर उन्हें रेल में हरिद्वार जाने का प्रंबंध करवा दिया। यह घटना चौधरी साहब के हृदय में एक टीस पैदा कर गई। अतः उन्होंने वहीं संकल्प कर लिया कि वे इस पिछडे इलाके को शिक्षित करने के लिए हर संभव प्रयास करेंगे।

External links

References

  1. Dr Pema Ram, Jaton ki Gauravgatha, p.62