Thakur Ganga Singh

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Thakur Ganga Singh

Thakur Ganga Singh was RAS officer and Historian from Bharatpur District in Rajasthan.

As Author

He is author of book on Jat History - 'Gyat vansha Bharatpur ka itihas'. This book helps us to fix the Date of birth of Maharaja Suraj Mal as 13 February 1707. Thakur Ganga Singh has mentioned in his book 'Gyat vansha Bharatpur ka itihas' about the birth of Maharaja Suraj Mal. He has referred to a folk-song badhaya sung by ladies on special Royal functions, which is produced below in Hindi as under[1]:

'आखा' गढ गोमुखी बाजी । माँ भई देख मुख राजी ।।
धन्य धन्य गंगिया माजी । जिन जायो सूरज मल गाजी ।।
भइयन को राख्यो राजी । चाकी चहुं दिस नौबत बाजी ।।

According to the above-folk-song the date of birth of Maharaja Suraj Mal is 'आखा' meaning ākhātīj or akshyatratiya.

The ancestry of Bharatpur rulers

Hukum Singh Panwar[2] has given the ancestry of Bharatpur rulers starting from 1. Yadu. Shini is at S.No. 38 and Krishna at S.No. 43 as under[3]:

34. Andhaka → 35. Bhajmana → 36. Viduratha → 37. Shura → 38. Shini → 39. Bhoja → 40. Hardika → 41. Devamidha → 42. Vasudeva → 43. Krishna → 44. Pradyumna → 45. Aniruddha → 46. VajraKhira

ज्ञात से जाट शब्द बना

ठाकुर गंगासिंह मानते हैं कि राचीन ग्रंथो के अध्ययन से यह बात साफ हो जाती है कि परिस्थिति और भाषा के बदलते रूप के कारण 'ज्ञात' शब्द ने 'जाट' शब्द का रूप धारण कर लिया. महाभारत काल में शिक्षित लोगों की भाषा संस्कृत थी. इसी में साहित्य सर्जन होता था. कुछ समय पश्चात जब संस्कृत का स्थान प्राकृत भाषा ने ग्रहण कर लिया तब भाषा भेद के कारण 'ज्ञात' शब्द का उच्चारण 'जाट' हो गया. आज से दो हजार वर्ष पूर्व की प्राकृत भाषा की पुस्तकों में संस्कृत 'ज्ञ' का स्थान 'ज' एवं 'त' का स्थान 'ट' हुआ मिलता है. इसकी पुष्टि व्याकरण के पंडित बेचारदास जी ने भी की है. उन्होंने कई प्राचीन प्राकृत भाषा के व्यकरणों के आधार पर नवीन प्राकृत व्याकरण बनाया है जिसमे नियम लिखा है कि संस्कृत 'ज्ञ' का 'ज' प्राकृत में विकल्प से हो जाता है और इसी भांति 'त' के स्थान पर 'ट' हो जाता है. [4] इसके इस तथ्य की पुष्टि सम्राट अशोक के शिलालेखों से भी होती है जो उन्होंने 264-227 ई. पूर्व में धर्मलियों के रूप में स्तंभों पर खुदवाई थी. उसमें भी 'कृत' का 'कट' और 'मृत' का 'मट' हुआ मिलता है. अतः उपरोक्त प्रमाणों के आधार पर सिद्ध होता है कि 'जाट' शब्द संस्कृत के 'ज्ञात' शब्द का ही रूपांतर है. अतः जैसे ज्ञात शब्द संघ का बोध कराता है उसी प्रकार जाट शब्द भी संघ का वाचक है. [5]

यह रूपांतर कब हुआ और 'जाट' शब्द कब अस्तित्व में आया. खेद का विषय है कि ब्राह्मण-श्रमण एवं बौध धर्म के संघर्ष में जाटों द्वारा ब्राह्मण धर्म का विरोध करने के कारण इसका इतिहास नष्ट हो गया. जहाँ-तहां इस इस इतिहास के कुछ संकेत मात्र शेष रह गए हैं. व्याकरण के विद्वान पाणिनि का जन्म ई. पूर्व आठवीं शताब्दी में प्राचीन गंधार राज्य के सालतुरा गाँव में हुआ था, जो इस समय अफगानिस्तान में है, उन्होंने अष्टाध्यायी व्याकरण में 'जट' धातु का प्रयोग कर 'जट झट संघाते' सूत्र बना दिया. इससे इस बात की पुष्टि होती है कि जाट शब्द का निर्माण ईशा पूर्व आठवीं शदी में हो चुका था.[6]

Contact details

Address - Kothi Ganga Bihar, Anah Gate, Bharatpur.

External links

References

  1. Jat Samaj, Agra, January-February 2007
  2. The Jats:Their Origin, Antiquity and Migrations/Appendices/Appendix No.1
  3. Yadu Vamsavali of Bharatpur given by Ganga Singh in his book 'Yadu Vamsa', Part 1, Bharatpur Rajvansa Ka Itihas (1637-1768), Bharatpur, 1967, pp. 19-21
  4. प्राकृत व्याकरण द्वारा बेचारदास, पृ. 41
  5. ठाकुर गंगासिंह: "जाट शब्द का उदय कब और कैसे", जाट-वीर स्मारिका, ग्वालियर, 1992, पृ. 7
  6. ठाकुर गंगासिंह: "जाट शब्द का उदय कब और कैसे", जाट-वीर स्मारिका, ग्वालियर, 1992, पृ. 7

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