Tilwara

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Location of Tilwara in Barmer District

Tilwara (तिलवाड़ा) is a village in Pachpadra Tahsil of Barmer district in Rajasthan. It is known for biggest cattle fair of western Rajasthan in memory of Mallinath.

Jat Gotras

History

James Tod[1] writes that Balotra and Tilwara, are two celebrated names in the geography of this region, and have an annual fair, as renowned in Rajasthan as that of Leipsic in Germany. Though called the Balotra mela (literally, 'an assemblage, or concourse of people '), it was held at Tilwara, several miles south, near an island of the Luni, which is sanctified by a shrine of Mallinath, ' the divinity of the Malli,' who, as already mentioned, is now the patron god of the Rathors. Tilwara forms the fief of another relative of the Mewa family, and Balotra, which ought to belong to the fisc, did and may still belong to Awa, the chief noble of Marwar. But Balotra and Sandri have other claims to distinction, having, with the original estate of Dunara, formed the fief of Durgadas, the first character in the annals of Maru, and whose descendant yet occupies Sandri. The fief of Mewa, which includes them all, was rated at fifty thousand rupees annually. The Pattayats with their vassalage occasionally go to court, but hold themselves exempt from service except on emergencies. The call upon them is chiefly for the defence of the frontier, of which they are the Simiswara, or lord-marchers.

राजस्थान का सबसे बडा पशु मेला

पश्चिमी राजस्थान का सबसे बडा पशु मेला बाडमेर जिले के तिलवाड़ा ग्राम पंचायत मुख्यालय पर प्रतिवर्ष चैत्र कृष्ण एकादशी से चैत्र शुक्ल एकादशी तक आयोजित होता है. बाड़मेर की लोक संस्कृति एवं आस्था के प्रतीक सिद्घ पुरूष मल्लीनाथ की स्मृति में आयोजित यह मेला एक पखवाड़ा तक चलता है. इस मेले में लगभग एक लाख पशु खरीद फरोख्त के लिए यहां आते हैं.

राजस्थान की सबसे लम्बी मौसमी नदी लूणी की तलहटी में आयोजित होने वाला यह मेला मात्र पशुओं के क्रय विक्रय तक ही सीमित नहीं है, अपितु इसके साथ दैवीय आस्था भी जुड़ी हुई है. यह प्रकृति का अदभुत करिश्मा है कि वर्षभर सैकड़ों फुट की गहराई तक भी एक बूंद पानी उपलब्ध न होने वाले इस क्षेत्र में मेले के दिनों में जहां भी गड्डा खोदा जाता है, आसानी से पानी मिल जाता है. इसी तरह की एक अन्य मान्यता है कि आज तक व्यवस्थागत कारणों से विशाल मेले में मानव एवं पशुधन की कोई हानि नहीं हुई है.

तिलवाडा मेले की एतिहासिक पृष्ठभूमि पर दृष्टिगत करने पर इसके उदभव एवं 600 वर्ष पुरानी विकास यात्रा का सहज ही ज्ञान हो जाता है. ऐतिहासिक तथ्य ऐसा बताते हैं कि सन् 1374 में तत्कालीन शासक मल्लीनाथ के राज्याभिषेक के समय एक विशाल सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया. इस आयोजन में भाग लेने के लिए लोग ऊंट, घोड़े, बैलगाडी एवं सजीली वेशभूषा में तो थे ही, उन्होंने अपने वाहन और सवारियों को भी खूब सजाया था. कई लोगों ने अपने मवेशियों एवं बैलगाडिय़ों की अदला-बदली की. उन्होंने भी नये मवेशी खरीदे, तभी इस मेले की शुरूआत हुई.

ऐतिहासिक प्रमाण यह भी संकेत देते हैं कि मल्लीनाथ राव जोधा एवं वीकाजी के पूर्वज थे, जिनहें महेवा के शासक के रूप मे अनेक युद्घों का सामना करना पडा था. इसी तरह के संघर्ष में 1397 में पचपदरा के निकट होडियाल ग्राम में वे वीरगति को प्राप्त हुए. जनता के प्रिय शासक होने, न्याय और व्यवस्था के पुजारी तथा धार्मिक समभाव की भावनाओं से ओत प्रोत होने के कारण लोगों ने उनकी स्मृति को अक्षुण्य बनाने के लिए इस मेले का आयोजन करने का निर्णय किया. उनकी कर्मस्थली तिलवाड़ा में एक विशाल मंदिर है, जो मल्लीनाथ की जनप्रिय छवि को उजागर करता हैं. मंदिर में उनकी अश्वारोही मूर्ति के निकट ही उनकी प्रिय रानी रूपलदे की भी मूर्ति विद्यमान है. आज भी लोग उन्हें लोक देवता के रूप में पूजते हैं.

मल्लीनाथजी के राज्यारोहण की भी अदभुत कहानी है, मल्लीनाथ के चाचा कान्हडदे 12वीं शताब्दी के अंतिकाल में महेबा के शासक थे, उनके बड़े भाई एवं मल्लीनाथ के पिता राव सलखा के निधन के पश्चात् मल्लीनाथ अपने चाचा के पास रहने लगे एवं अपने चाचा की प्रशासनिक कार्यों में मदद करने लगे. उनकी वीरता, प्रबंध कौशल एवं जनता के प्रति कल्याणकारी दृष्टिकोण के फलस्वरूप कान्हडदे ने अपने जीवन काल में मल्लीनाथ को सता की बागडोर सौंप दी.

वर्तमान में राज्य का पशुपालन विभाग सन् 1958 से इस मेले का राज्य स्तरीय आयोजन करता आ रहा है. इस मेले में दूर-दूर के पशुपालक अपने थारपारकर और कांकरेज नस्ल के बैल, बछड़े, मालानी नस्ल के घोड़े व अच्छी नस्ल के ऊंटों के क्रय विक्रय के लिए यहां आते हैं. राज्य के अलावा गुजरात, महाराष्ट्र दिल्ली, पंजाब प्रान्त के व्यापारी पशुओं की खरीद फरोख्त करते हैं.

Notable persons

External links

References

  1. James Todd Annals/Sketch of the Indian Desert, Vol. III,p. 1270

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