Trilok Singh Mahla

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Trilok Singh paying homage to comrade Kanaram at Sikar Jat Boarding

Comrade Trilok Singh Mahla, from Alapsar (Sikar), is ex. MLA from Sikar district in Rajasthan and was a leading person of Shekhawati farmers movement. He is a man of communist ideology.

कॉमरेड त्रिलोक सिंह का जीवन परिचय

कॉमरेड त्रिलोक सिंह ने आजीवन किसानों के लिए संघर्ष किया. इनका जन्म सन 1915 में सीकर जिले के गाँव अलपसर में हुआ. इनके पिता का नाम बलदेव था. 6 भाईयों में कॉमरेड त्रिलोक सिंह तीसरे नंबर पर था. आरंभिक शिक्षा निकटवर्ती गाँव स्वरूपसर में पाई. बचपन से ही कॉमरेड त्रिलोक सिंह में संगठन खड़ा करने की योग्यता थी. वे किसोर अवस्था से विद्रोही रूप में जाने जाते हैं. गाँव की प्रायमरी स्कूल के बाद युवा त्रिलोक सिंह मुकुंदगढ़ कसबे में पढने आये. इन्हीं दिनों मुकुंदगढ़ के जागीरदार की माँ का देहांत हो गया था. स्कूल में शोकसभा का आयोजन था. कसबे के गणमान्य नागरिक उपस्थित थे. सभी ने इसे अपूरणीय क्षति बताया. आठवीं में पढ़ रहा त्रिलोक सिंह खड़ा हुआ और दो शब्द बोलने की अनुमति मांगी. अनुमति मिलने पर बोले, " किसकी माताजी? और किस बातका दुःख? जागीरदार की माँ ने समाज के लिए ऐसा कौनसा कार्य किया था कि समाज को क्षति हो गयी? शोक सभा चिंता सभा में बदल गयी. स्कूल के हैडमास्टर परेशान दिखाई दिए. मास्टर ने सोचा कि यह दूसरे लड़कों को भी बहकायेगा इसलिए स्कूल से निकाल दिया. त्रिलोक सिंह वहां से विद्यार्थी भवन झुंझुनू में पढने के लिए आ गए. यह छात्रावास राजनीतिक चेतना का केंद्र बन गया था.[1]

कॉमरेड त्रिलोक सिंह शेखावाटी किसान आन्दोलन से जुड़े

छात्रावास में रहकर पढने वाले एक छात्र के पिता को ठिकानेदार ने एक कैम्प में रोक लिया था. ठिकानेदार ऐसे किसानों को कैम्प में रोक लेते थे जिनके पास लगान देने के लिए रुपये नहीं थे. ऐसे करीब दस बंदी किसान थे. त्रिलोक सिंह को जब यह सूचना मिली तो उन्होंने छात्रों की एक टोली बनाई. कैम्प पर धावा बोलकर दादू पंथियों को भगा दिया और बंधक किसानों को मुक्त कर दिया.[2]

गाँव में आपके बड़े भाई भूर सिंह की शादी थी. बाग़दौड़ा ठिकानेदार ने चेतावनी दे दी, 'भूर सिंह दूल्हा बनकर घोडी पर नहीं चढ़ेगा.' नवयुवक त्रिलोक सिंह ने इसे चुनौती समझा. एक घोडा खरीद लिया. इस पर दूल्हा बैठ गया और शेष बारात ऊंटों पर चदकर बाग़दौड़ा गाँव से निकल गयी. ठाकुर देखते रह गए. यहीं से त्रिलोक सिंह शेखावाटी किसान आन्दोलन से जुड़ गए. [3]


सत्यदेव सिंह को सन 1937 में सरदार हरलाल सिंह एवं नेत राम सिंह उनके गाँव देवरोड़ से झुंझुनू ले आये. विद्यार्थी भवन में रहकर सत्यदेव ने शिक्षा ग्रहण की. उनका कहना है कि उस समय विद्यार्थी भवन में करीब 15 छात्र थे. इनके नाम थे - सुल्तान सिंह, गुलाब सिंह खाजपुर नया एवं पुराना, नत्थू सिंह बाडलवास, नाहर सिंह पातुसरी, सरदार हरलाल सिंह के दो पुत्र - नरेंद्र सिंह एवं फ़तेह सिंह, श्योदान सिंह, शीश पाल सिंह भादरवास, शिव लाल सिंह, नानक सिंह वारिसपुरा, अमर सिंह नरुका, सब्बल सिंह देरवाला, त्रिलोक सिंह अलपसर, संवत सिंह हनुमानपुरा आदि. [4]

रणमल सिंह के साथ

रणमल सिंह[5] लिखते हैं कि कूदन ग्राम में पढ़ते समय मेरा संपर्क श्री बद्रीनारायण सोढानी से हुआ। उनको सीकर का गांधी कहते थे। उन्होने कहा कि पढ़ाना छोड़ो और देश की आजादी के आंदोलन में आ जाओ। उनकी प्रेरणा से मैं 29 फरवरी 1944 को अध्यापक पद से त्याग पत्र देकर जयपुर प्रजामण्डल में शामिल हो गया। प्रजामण्डल में मेरे साथ माधोपुरा का लालसिंह कुलहरी था। हम दोनों जनजागृति के लिए रोजना गाँव में 24 मील पैदल सफर करते थे। मैं देश की आजादी के लिए जागीरदारों के ज़ुलम के खिलाफ सीकर किसान आंदोलन में भाग लेने लगा। सीकर ठिकाने में काश्त की जमीन का बंदोबस्त सन 1941 में हो गया था परंतु लगान व लाग-बाग के नाम पर जागीरदारों की लूट-खसोट बंद नहीं हुई थी। हमने इसका विरोध किया। हमने पहली मीटिंग बेरी गाँव की खेदड़ों की ढाणी में की। इसमें ईश्वर सिंह, त्रिलोक सिंह भी साथ थे, जिनहोने आगे चलकर अलग किसान सभा बना ली थी।

मार्क्सवाद से जुड़े

त्रिलोक सिंह शेखावाटी के प्रथम नेता थे जिन्होंने मार्क्सवाद-लेनिनवाद का गहन अध्ययन किया. जब भी समय मिलता, वे क्रांतिकारियों की जीवनी और वामपंथी साहित्य पढ़ते रहते थे.

किसान सभा का सदस्य चुना 1946

किसान सभा की और से रींगस में विशाल किसान सम्मलेन 30 जून 1946 को बुलाया गया. इसमें पूरे राज्य के किसान नेता सम्मिलित हुए. यह निर्णय किया गया कि पूरे जयपुर स्टेट में किसान सभा की शाखाएं गठन की जावें. आपको जयपुर स्टेट की किसान सभा का सदस्य चुना गया. (राजेन्द्र कसवा, p. 203)


सीकर वाटी में त्रिलोक सिंह, देवा सिंह बोचल्या, ईश्वर सिंह भामू, हरी सिंह बुरड़क आदि किसान सभा के जिम्मेवार नेताओं के रूप में पहचाने गए. (राजेन्द्र कसवा, p. 204)

जाट जन सेवक

ठाकुर देशराज[6] ने लिखा है ....चौधरी त्रिलोकसिंह जी - [पृ.315]: सीकर के नौजवानों में एक तेजस्वी नौजवान हैं चौधरी त्रिलोक सिंह। आपको फॉरवर्ड मेन कहना अत्युक्ति नहीं होगी। डर आप को छू नहीं गया है। जिस समय समय आप बोलते हैं मुर्दा नसों में खून का संचार होने लगता है। यह है आप की विशेषताएं।

आप अल्पसर गांव के रहने वाले चौधरी बलदेवसिंह जी के सुपुत्र हैं। आप का गोत्र महलावत है और आप को इस बात का अभिमान है कि हम वीर यौद्धेयों के संतान हैं। आपने मिडिल पास करके पढ़ना लिखना छोड़ दिया


[पृ.316]: और कोमी सेवा के काम से जुट गए। आप जितने पढे हैं गुणे उससे कहीं बहुत ज्यादा है। व्यवहारिक ज्ञान में आप ऊंची डिग्री वालों के कान काटते हैं।

प्रजामंडल में आप हमेशा वाम पक्ष के रहे हैं। पुराने महाढीस मनोवृत्ति के लीडर आप से घबराते हैं।

सन 1946 में जयपुर राज्य में जो नया किसान संगठन आरंभ हुआ उसके आप एक रथी बने और बराबर उसके काम को आगे बढ़ाते रहे और अब भी उन्हीं कदमों पर किसानों के संगठन का प्रचार करते हैं। वह इस नारे के समर्थक हैं की “स्वतंत्र भारत में किसान राज्य हो” और रियासत में शासन सत्ता किसानों के हाथों में आनी चाहिए क्योंकि एक बुजुर्वा लोगों से किसान हित की कतई उम्मीद नहीं रखते। आप पांच भाई हैं जो सभी निडर प्रकृति के हैं। आपका गांव तेजस्विता के लिए मशहूर है

References

  1. राजेन्द्र कसवा: मेरा गाँव मेरा देश (वाया शेखावाटी), जयपुर, 2012, ISBN 978-81-89681-21-0, P. 180
  2. राजेन्द्र कसवा: मेरा गाँव मेरा देश (वाया शेखावाटी), जयपुर, 2012, ISBN 978-81-89681-21-0, p. 181
  3. राजेन्द्र कसवा: मेरा गाँव मेरा देश (वाया शेखावाटी), जयपुर, 2012, ISBN 978-81-89681-21-0, p. 181
  4. राजेन्द्र कसवा: मेरा गाँव मेरा देश (वाया शेखावाटी), प्रकाशक: कल्पना पब्लिकेशन, जयपुर, फोन: 0141 -2317611, संस्करण: 2012, ISBN 978-81-89681-21-0, p. 175
  5. रणमल सिंह के जीवन पर प्रकाशित पुस्तक - 'शताब्दी पुरुष - रणबंका रणमल सिंह' द्वितीय संस्करण 2015, ISBN 978-81-89681-74-0, पृष्ठ 57, 121
  6. Thakur Deshraj:Jat Jan Sewak, 1949, p.315-316

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