From Jatland Wiki
Jump to navigation Jump to search

Udaygiri Caves (उदयगिरि गुफ़ाएँ) are situated in Vidisha district of Madhya Pradesh in India. Udaygiri is word of Sanskrit language meaning – sunrise hills.



These caves are at a distance of 4 km from Vidisha and 13 km from Sanchi.

Gupta art and architecture

These are a group of rock-cut caves sanctuaries carved into a sandstone hill that stands sentinel-like on the horizon. An inscription in one of these states that it was produced during the reign of Chandragupta II (382-401 AD), thus dating these caves to 4th - 5th century AD. The use of the word "cave" is a bit of a misnomer, since these are not natural, but instead examples of rock-cut architecture.

The Udaygiri caves possess all the distinctive features that gave Gupta art its unique vitality, vigour and richness of expression; the beautifully moulded capitals, the treatment of the intercolumniation, the design of the entrance way and the system of continuing the architrave as a stringcourse around the structures.

They have been numbered probably according to the sequence in which they were excavated, beginning with Cave 1, which has a frontage adapted out of a natural ledge of rock, thus forming both the root of the cave and its portico. The row of four pillars bear the ‘vase and foliage’ pattern of which the eminent art historian Percy Brown so eloquently says: “the Gupta capital typifies a renewal of faith, the water nourishing the plant trailing from its brim, and allegory which has produced vase and flower motif, one of the most graceful forms in Indian architecture”.

The shrines are progressively more spacious and ornate. Cave No.9 is remarkable for its large ceiling and massive, 8 feet high pillars, its long portico and pillared hall. Throughout, there is evidence that the master craftsmen of Besnagar practised their art with skill and artistry under the Guptas. Four centuries later. In Cave No. 5 a massive carving depicts Vishnu in his Varaha avatar, aloft one tusk. Yet another stupendous sculpture is of the reclining Vishnu. Taken as a whole, this group is a rich representation of the vitality and strength of Gupta art and architecture.

Udayagiri Cave Inscription of Chandragupta II (401-402 CE)

  • Perfection has been attained! In the year 80 (and) 2, on the eleventh lunar day of the bright fortnight of the month Âshâdha,— this (is) the appropriate religious gift of the Sanakânika, the Mahârâja . . dhala (?),— the son’s son of the Mahârâja Chhagalaga; (and) the son of the Mahârâja Vishnudâsa,— who meditates on the feet of the Paramabhattâraka and Mahârâjâdhirâja, the glorious Chandragupta (II.)
  • From: Fleet, John F. Corpus Inscriptionum Indicarum: Inscriptions of the Early Guptas. Vol. III. Calcutta: Government of India, Central Publications Branch, 1888, 25.

Udayagiri Cave Inscription of Chandragupta II

  • Perfection has been attained! . . . . . . . . . . . . which shines like the sun, radiant with internal light, . . . . . . . upon the earth . . . . . . . . ., pervades . . . . . . . . . . (and) has the appellation of Chandragupta (II.), (and is) wonderful;-
  • (Line 2.)-Bought by the purchase-money of [whose] prowess, [the earth], in which (all other) princes are humiliated by the slavery (imposed on them by him), . . . . . . . gratified by . . . . . . . . . . . . . . . . . . religion.
  • (L. 3.)-He who holds the position, acquired by hereditary descent, of being a minister of that same saintly sovereign, possessed of inconceivable . . . . . . . . , (and) [has been appointed to] (the office of arranging) peace and war; (viz.)-
  • (L. 4.)-He who, belonging to the Kautsa (gôtra) is well-known under the name of Shâba, (but is called) Vîrasêna by (his) family-appellation;-who knows the meanings of words, and logic, and (the ways of) mankind;-who is a poet;-and who belongs to (the city of ) Pâtaliputra,-
  • (L. 5.)-He came here, accompanied by the king in person, who was seeking to conquer the whole world; and, through devotion towards the divine (god) Shambhu, he caused this cave to be made.
  • From: Fleet, John F. Corpus Inscriptionum Indicarum: Inscriptions of the Early Guptas. Vol. III. Calcutta: Government of India, Central Publications Branch, 1888, 35-36.

Udayagiri Cave Inscription of Kumaragupta I (425-426 CE)

  • Reverence to the Perfect Ones! In the augmenting reign of the family of the best of kings, belonging to the Gupta lineage, who are endowed with glory (and) are oceans of virtuous qualities;-in a century of years, coupled with six; and in the excellent month of Kârttika; and on the fifth day of the dark fortnight;-
  • (Line 3.)-He who has conquered the enemies (of religion), (and) is possessed of tranquillity and self-command, caused to be made (and set up) in the mouth of (this) cave, this image of a Jina, richly endowed with (the embellishments of) the expanded hoods of a snake and an attendant female divinity, (and) having the name of Pârshva, the best of the Jinas.
  • (L. 4.)-He is, indeed, the disciple of the saint, the Âchârya Gôsharman, who was the ornament of the lineage of the Âchârya Bhadra (and) sprang from a noble family; but he is more widely renowned on the earth (as being) the son, (begotten) on Padmâvatî, of the Ashvapati, the soldier Sanghila, who, unconquerable by (his) enemies, took himself to be a very Ripughna;-by his own appellation, he is spoken of under the name of Shankara; - (and) he has adhered to the path of ascetics, conformable to the sacred precepts.
  • (L. 7.)-Born in the region of the north, the best of countries, which resembles (in beatitude) the land of the Northern Kurus, - he, the wise one, has set aside whatever religious merit (there is) in this (act), for the purpose of destroying the band of the enemies of religious actions.
  • From: Fleet, John F. Corpus Inscriptionum Indicarum: Inscriptions of the Early Guptas. Vol. III. Calcutta: Government of India, Central Publications Branch, 1888, 259-260.

उदयगिरि गुफ़ाएँ

विजयेन्द्र कुमार माथुर[1] ने लेख किया है....

1. उदयगिरि (AS, p.94) बेसनगर या प्राचीन विदिशा (भूतपूर्व ग्वालियर सियासत) के निकट उदयगिरि विदिशा नगरी ही का उपनगर था। यह प्राचीन स्थल भिलसा से चार मील दूर बेतवा तथा बेश नदियों के बीच स्थित है। चन्द्रगुप्त द्वितीय के उदयगिरि गुहालेख में इस सुप्रसिद्ध पहाड़ी का वर्णन है। यहाँ पर बीस गुफ़ाएँ है। जो हिन्दू और जैन मूर्तिकारी के लिए प्रसिद्ध हैं। मूर्तियाँ विभिन्न पौराणिक कथाओं से सम्बद्ध हैं और अधिकांश गुप्तकालीन हैं। गुफा संख्या-4 में शिवलिंग की प्रतिमा है. इसके प्रवेश द्वार पर एक मनुष्य वीनावादन में व्यस्त दिखाया गया है जिसके कारण इस गुफा को 'बीन की गुफा' कहते हैं. मूर्तिकला की दृष्टि से पाँचवीं गुफ़ा सबसे महत्त्वपूर्ण है। इसमें वराह अवतार का दृश्य अंकित वराह भगवान का बाँया पाँव नाग राजा के सिर पर दिखलाया गया है। जो सम्भवतः गुप्तकाल में सम्राटों द्वारा की गये नाग शक्ति के परिहास का प्रतीक है।


'नमः सिद्धेभ्यः श्री संयुतानां गुणतोयधीनां गुप्तान्वयानां नृपसत्तमाना राज्ये कुलस्याधिविवर्धमाने षड्भिर्य्युतैः वर्षशतेथ मासे सुकार्तिके बहुल दिनेथ पंचमे गुहामुखे स्फटविकतोत्कटामिमां जितोद्विषो जिनवर पार्श्व-संज्ञिका जिनाकृर्ति शमदमवानचीकरत् आचार्य भद्रान्वय भूषणस्य शिष्योह्मसावार्य कुलोद्गतस्य आचार्य गोशर्म्ममुनेस्तुसुतस्तु पद्मावतावश्वपतेब्भटस्य परैरजयस्य सिपुघ्न मानिनस्य संघिल स्येत्यभि विश्रृतोभुवि स्वसंज्ञया शंकरनाम शब्दितो विधानयुक्तं यतिमार्गमास्थितः स उत्तराणां सदंशे कुरुणां उदग्दिशादेशवरे प्रसूतः क्षयाय कर्मारिगणस्य धीमान् यदत्र पुण्यं तद्पाससर्ज्ज।'

Udayagiri Cave Inscription of Kumaragupta I of year 425-426 AD[2]

एक अन्य गुफ़ा में गुप्त संवत् 425-426 ई. में उत्कीर्ण कुमार गुप्त प्रथम के शासन काल का एक अभिलेख है। इसमें शंकर नामक किसी व्यक्ति द्वारा गुफ़ा के प्रवेश-द्वार पर जैन तीर्थ कर पार्श्वनाथ की मूर्ति के प्रतिष्ठापित किए जाने का उल्लेख है- यह लेख बॉक्स में दिया गया है-

विजयेन्द्र कुमार माथुर[3] ने लेख किया है ...

2. उदयगिरि और खण्डगिरि गुफ़ाएँ ( p.95): भुवनेश्वर (उड़ीसा) के समीप नीलगिरि, उदयगिरि तथा खण्डगिरि नामक गुहा समूह में 66 गुफाएँ हैं जो पहाड़ियों पर अवस्थित हैं. इनमें से अधिकांश का समय तीसरी शती ई.पू है. और उनका संबंध जैन संप्रदाय से है.

उदयगिरि और खण्डगिरि नामक दो गुफ़ाएँ जो भुवनेश्वर (उड़ीसा) के समीप दो पहाड़ियाँ पर स्थित है। ये गुफ़ाएँ उदयगिरि और खण्डगिरि पहाडियों में पत्‍थरों को काट कर बनाई गई थी। यहाँ से कलिंग के प्रसिद्ध शासक खारवेल का अभिलेख है। इसका विस्तृत अध्ययन श्री काशी प्रसाद जायसवाल बहुत समय तक करते रहे थे. अभिलेख में पहाड़ी को कुमारगिरि कहा है. यह स्थान उड़ीसा की प्राचीन राजधानी शिशुपालगढ़ से 6 मील दूर है. इसी स्थान के पास अशोक के समय में तोसलि नाम की नगरी (वर्तमान धौली) बसी हुई थी. वास्तव में उड़ीसा के इसी भाग में इस प्रदेश की मुख्य राजधानियाँ बसाई गई थी.

विजयेन्द्र कुमार माथुर[4] ने लेख किया है ...

3. उदयगिरि गुफ़ाएँ ( p.95): विष्णु पुराण के अनुसार उदयगिरि शाकद्वीप के सप्तपर्वतों में से है--'पूर्वस्तत्रोदयगिरिर्जलधरस्तथापर:, तथा रैवतकश्यामस्तथैवास्त गिरिर्द्विज। आंबिकेयस्तथारम्य: केसरी पर्वतोत्तम: शाक:स्तत्र महावृक्षा: सिद्धगंधर्वसेवित: विष्णु पुराण 2.4.62,63

4. उदयगिरि गुफ़ाएँ ( p.95): राजगृह के सप्तपर्वतों में से एक का वर्तमान नाम

छठी गुफ़ा में दो द्वारपालों, विष्णु, महिष-मर्दिनी एवं गणेश की मूर्तियाँ हैं। गुफ़ा छः से प्राप्त लेख से ज्ञात होता है कि उस क्षेत्र पर सनकानियों का अधिकार था। उदयगिरि के द्वितीय गुफ़ा लेख में चन्द्रगुप्त के सचिव पाटलिपुत्र निवासी वीरसेन उर्फ शाव द्वारा शिव मन्दिर के रूप में गुफ़ा निर्माण कराने का उल्लेख है। वह वहाँ चन्द्रगुप्त के साथ किसी अभियान में आया था। तृतीय उदयगिरि गुफ़ा लेख में कुमार गुप्त के शासन काल में शंकर नामक व्यक्ति द्वारा गुफ़ा संख्या दस के द्वार पर जैन तीर्थंकर पार्श्वनाथ की मूर्ति को प्रतिष्ठित कराये जाने का उल्लेख है।[5]

वास्तुशिल्प: गुप्त काल में उदयगिरि में 20 पत्थर जनिक प्रकोष्ठों का उत्खनन किया गया था, जिनमें दो में चंद्रगुप्त द्वितीय के शासनकाल से जुड़ी हुई चीज़ें थीं। ये गुफाएं अत्यंत महत्त्वपूर्ण दस्तावेज हैं, क्योंकि वे भारत में हिंदू कला के प्रारंभिक स्वरूप की परिचायक हैं और यह दिखाती हैं कि पांचवी शताब्दी के प्रारंभ में ही हिंदू मूर्ति शिल्प कला स्थापित हो चुकी थी। उदयगिरि में मिली महत्त्वपूर्ण गुफाओं में एक है गुफा-5, वाराह गुफा। इसकी प्रमुख विशेषता इसका वृहत् शैल जनिक आकार है जो भगवान विष्णु के अवतार वाराह द्वारा पृथ्वी माता को विप्लव से बचाने का परिचायक है। भारतीय कलाकारों की क्षमता और उनकी शक्ति इस काल में विध्वंस और विनाश के ख़िलाफ़ एक आध्यात्मिक, ब्रह्मशक्ति के रूप में परम ऊंचाइयों पर पहुंची। [6]

Jat clans

Udayagiri Cave Inscription of Chandragupta II (401-402 CE) mentions Sanakânika,Dhala and Chhagalaga. These are associated with following Jat clans:

  • Salkalan - Bhim Singh Dahiya[7] identifies the Sankanika clan with Salkalan clan of Jats. He writes: "The Udaigiri (near Bhilsa) cave inscription of the year 402 A.D. mentions a king of Sankanika clan. And the Salkalan Jats are still existing. Here only the letter 'l' is changed into 'n' but their love of sibilants is proverbial."
Salkalan (सलकलान) gotra Jats live in Muzaffarnagar district in Uttar Pradesh. (See - http://www.jatland.com/home/Salkalan)
  • Kot (कोत) - Udayagiri Cave Inscription of Chandragupta II mentions Kautsa (gôtra) in Line-4. This is clearly a Jat Gotra - Kot. This is also confirmed from Allahabad Stone Pillar Inscription of Samudragupta (A.D. 335-76) which mentions in Line-14 about Kot ruler whom he defeated. Kot is an important gotra of Jats who live in Jodhpur, Barmer, Jaisalmer, Sikar, Hanumangarh, Ganganagar, Tonk, Jaipur districts in Rajasthan. The are also found in Haryana. (See - http://www.jatland.com/home/Kot)