Veerbhoomi Haryana/हरयाणा प्रदेश के नाम के कारण

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हरयाणा इतिहास ग्रन्थमाला का प्रथम मणि


वीरभूमि हरयाणा

(नाम और सीमा)

लेखक

श्री आचार्य भगवान् देव


_________________________________


हरयाणा प्रदेश के नाम के कारण

१ - प्रथम पक्ष

अपने-अपने विचारानुसार हरयाणा-प्रदेश का नाम हरयाणा क्यों है ? इस विषय में अनेक लेखकों ने लिखा है । आज से लगभग अस्सी वर्ष पूर्व उर्दू भाषा में छपा हुआ रोहतक मण्डल (जिला) का एक इतिहास है, जिसका नाम "तवारीख जिला रोहतक" है । इस इतिहास को अंग्रेजी सरकार की प्रेरणा से किसी तहसीलदार महोदय ने लिखा है । उसमें हरयाणा के नाम के विषय में लिखते हुए लेखक ने लिखा है –


"रोहतक जिला पंजाब प्रान्त में हिसार के आधीन देहली से पश्‍चिम की ओर है । रोहतक नगर देहली से ४४ मील है । यह देश हरयाणे के नाम से प्रसिद्ध है । जिला रोहतक पूर्व से पश्‍चिम की ओर ४० मील चौड़ा और दक्षिण से उत्तर की ओर ६४ मील लम्बा है ।


वीरभूमि हरयाणा,पृष्ठान्त-1



इसके उत्तर-पूर्व के कोने में करनाल, पूर्व में जिला देहली, दक्षिण में गुड़गांव और दक्षिण-पश्‍चिम में 'दुजाना राज्य' का बहु और नाहड़ का परगना विद्यमान है । पश्‍चिम में दादरी, जीन्द राज्य का भाग और जिला हिसार है । उत्तर-पश्‍चिम के कोने में जीन्द राज्य का भाग लगा हुआ है । हरयाणा देश सिर्फ रोहतक जिले को नहीं कहते, किन्तु जिला हिसार और दादरी का प्रदेश भी इसमें सम्मिलित है । हरयाणा देश की सीमायें इस प्रकार से प्रसिद्ध हैं –


पूर्व में खादर प्रदेश, पश्‍चिम में बागड़ प्रदेश (मरुभूमि), दक्षिण में डाब्बर प्रदेश और उत्तर में नरदक प्रदेश विद्यमान हैं । हरयाणे के नाम के कई कारण प्रसिद्ध हैं, किन्तु जो अधिकतर सत्य, विश्‍वसनीय और सबको समझ में आने योग्य हैं (जिसको सबकी बुद्धि मानती है) । यह नाम इस देश को बाहर के लोगों ने दिया है । ऐसे समय में जबकि यहाँ लूट-मार और दस्युओं एवं डाकुओं द्वारा धन अपहरण की बहुत अधिकता थी, जिसकी कर्त्ता-धर्त्ता जातियां राँघड़ (राजपूत) और जाट प्रसिद्ध हैं । प्रान्तीय भाषा में 'हर' शब्द के अर्थ लूट लेने के हैं । 'याना' शब्द कर्त्ता की संज्ञा में प्रयोग हुआ है अर्थात् लूटने वाला एवं लुटेरा देश ।


वीरभूमि हरयाणा,पृष्ठान्त-2



जैसा कि नरदक देश जो देश हरयाणा से मिला हुआ है, जिसका अर्थ निर्दयी, बेरहम देश है । नर का अर्थ निषेध और दक का अर्थ दया है, अर्थात् जिस देश में दया व रहम न हो, उसे नरदक कहेंगे ।" (तवारीख जिला रोहतक)


समीक्षा - ऊपर जो हरयाणा का अर्थ लुटेरों का प्रदेश किया है, यह विदेशियों अर्थात् अंग्रेजों का किया हुआ अर्थ है । ये अंग्रेज आदि विदेशी जातियां स्वयं लुटेरी जातियां थीं । भारत से स्वर्णादि धन सैकड़ों वर्षों तक लूट-लूट कर अपने देश में ले जाते रहे । इस बात को सत्य सिद्ध करने के लिए एवं प्रत्यक्ष करने के लिए ब्रिटिश म्यूजियम का भारतीय कक्ष देखा जा सकता है । किस तरह से अंग्रेजों ने भारत को लूट-लूट कर इस दयनीश दशा में पहुंचाया है, यह उक्त भारतीय कक्ष को देखकर सहज में ही अनुमान हो जाता है । इस विषय में स्वनामधन्य प्रातः स्मरणीय महर्षि दयानन्द जी महाराज लिखते हैं -


"यह आर्यावर्त देश है, जिसके सदृश भूगोल में दूसरा कोई देश नहीं है, इसलिये इस भूमि का नाम स्वर्ण भूमि है, क्योंकि यही स्वर्ण आदि रत्‍नों को उत्पन्न करती है । जितने भूगोल में देश हैं वे सब इसी देश


वीरभूमि हरयाणा,पृष्ठान्त-3



की प्रशंसा करते हैं और आशा करते हैं कि 'पारस-मणि' पत्थर सुना जाता है, वह बात तो झूठी है, किन्तु आर्यावर्त देश ही सच्चा पारस मणि है, जिसे लोहेरूप दरिद्र विदेशी छूते के साथ स्वर्ण अर्थात् धनाढ्य हो जाते हैं ।" (सत्यार्थप्रकाश ११ समुल्लास)


इससे सिद्ध होता है कि अंग्रेज आदि दरिद्र विदेशी लोग भारत के स्वर्ण आदि धन को लूट-लूट कर धनाढ्य हो गये । इसे विस्तार से जानना चाहें तो "भारत में अंग्रेजी राज्य" नामक पुस्तक का अध्ययन करें कि किस प्रकार अंग्रेज आदि विदेशी लुटेरों ने इस स्वर्णभूमि भारत को लूट कर सर्वथा दरिद्र कर दिया । जो विदेशी स्वयं लुटेरे थे उनको सभी लुटेरे दिखाई दिये, और हरयाणा जैसे पवित्र प्रदेश को जो आर्यावर्त का मध्य भाग और प्राण है, जिसके अन्तर्गत ही ब्रह्मर्षि देश है इसी के विषय में मनु महाराज ने लिखा है –


एतद्‍देश प्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मनः ।

स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्वमानवाः ॥

- मनु० २ अ० २० श्‍लोक


आर्यावर्त के ब्रह्मर्षि प्रदेश जो हरयाणा का एक भाग है, इसी प्रदेश के मान्य विद्वानों की चरण शरण


वीरभूमि हरयाणा,पृष्ठान्त-4



में आकर ही समग्र भूमण्डल के लोग अच्छे चरित्र की शिक्षा लेने आया करते थे ।


इन अंग्रेज विदेशी लुटेरों ने हमारे सारे इतिहास के साथ ही अनर्थ किया है । इस देश के मूल निवासी आर्यों को भी बाहर से आने वाले विदेशी बताने वाले इन लुटेरे अंग्रेजों के अतिरिक्त और कोई नहीं है । हमारे पूर्वजों को जंगली, असभ्य एवं अशिक्षित बतलाने वाले भी यही विदेशी लुटेरे हैं । हरयाणे के निवासियों के साथ तो उनको विशेषतः ईर्ष्या, द्वेष और शत्रुता थी । इसका मुख्य कारण यही था कि संवत् १९१४ अर्थात् १८५७ ई० में जो अंग्रेजों के विरुद्ध प्रथम स्वतन्त्रता का युद्ध लड़ा गया, उस युद्ध में सब से प्रथम शस्‍त्र उठाने वाले हरयाणे के ही वीर थे । मेरठ, दिल्ली, रोहतक के सैंकड़ों ग्रामों और सहस्रों नहीं, लाखों व्यक्तियों ने इस युद्ध में सशस्‍त्र भाग लिया था । उस क्रान्ति के शान्त होने पर अंग्रेजों ने जो अत्याचार हरयाणे पर किये, वे इतिहास प्रसिद्ध हैं । सहस्रों व्यक्तियों को गोली मारी गई, हजारों कोहलुओं के नीचे कुचल दिये गए । पर्याप्‍त संख्या में ग्राम अग्नि से जला कर भस्मसात् कर दिये गये और इनका धन-माल सब लूट लिया गया । सहस्रों व्यक्तियों को वृक्षों पर लटका


वीरभूमि हरयाणा,पृष्ठान्त-5



कर फाँसी दी गई । छः हजार से अधिक व्यक्ति जो इस प्रान्त के मुखिया और चौधरी थे, काले-पानी अण्डमान की नरक समान भूमि में भेज दिये गये । सबसे पहले काले-पानी को बसाने वाले यही हरयाणे के वीर थे । वे सब अपने देश के लिये बलि चढ़ गये, उनमें से लौट कर कोई नहीं आया ।


इन विदेशी लुटेरों को फिर हरयाणा वासी वीर लोग कैसे अच्छे लगते ? इसी द्वेष के कारण इन्हें लुटेरा और इनके प्रदेश को लुटेरों का देश लिखा और हरयाणे के वीर लोगों को जो भयंकर दण्ड दिया वह था - "इस हरयाणे के संगठन को तोड़ने के लिये इसे कई भागों में बांट देना । मथुरा, आगरा, अलीगढ़, बुलन्दशहर, मुरादाबाद, मेरठ, मुजफ्फरनगर, सहारनपुर, देहरादून और बिजनौर आदि अनेक जिलों को यू० पी० अर्थात् संयुक्त प्रान्त (उत्तर प्रदेश) के साथ मिला दिया । कुछ भाग तोड़कर राजस्थान में मिला दिया । दादरी, महेन्द्रगढ़, नरवाणा पंजाब के सिक्ख राज्यों में मिला दिये । दिल्ली को पृथक कर दिया । गुड़गावां, रोहतक, हिसार, करनाल और अम्बाला आदि जिले पंजाब के साथ मिला दिये । इस प्रकार इसके अंगों को भंग करके इसके संगठन को सदा के लिये मिट्टी में मिला दिया ।"


वीरभूमि हरयाणा,पृष्ठान्त-6



दौर्भाग्य तो यह है कि स्वराज्य मिलने पर भी यह हरयाणा की वीर-भूमि उसी प्रकार पूर्ववत् कटी-फटी, टूटी-फूटी बिखरी पड़ी है । जो दण्ड अंग्रेजों ने दिया था, स्वराज्य प्राप्‍ति के पश्‍चात् भी आज हरयाणे के वीर उसे भोग रहे हैं । यहाँ के नेताओं द्वारा बार-बार मांग करने पर भी हमारी भारतीय सरकार के कानों पर जूं नहीं रेंगी । इसी कारण आज भी यह प्रान्त पिछड़ा हुआ है । हमारी सरकार ने भी इसे सर्वथा उपेक्षित छोड़ा हुआ है । स्वतन्त्रता युद्ध में बढ़-चढकर भाग लेने का यही पुरस्कार है । अंग्रेज तो लुटेरे थे, विदेशी थे, उनके विरुद्ध हरयाणे के वीर लोग उठकर लड़े । वे तो इनको दण्ड देते ही । लुटेरा और लुटेरों का देश कहने में उन्हें क्या संकोच होता । उन्हें तो हरयाणे का अर्थ उल्टा करना ही था । हरयाणे के वीर सपूतों ने विदेशी लुटेरों को लूटा अर्थात् अंग्रेजों और मुसलमानों को जो हमारे घर से हमारा धन ले जाते थे, वह हमारे लिये कैसे सहनीय हो सकता था, हमारे वीर पूर्वजों ने इसलिये इन विदेशी लुटेरों को लूटा । उनके शासन को न मान कर सदैव हमारा पंचायती राज्य सारे हरयाणा प्रान्त में चालू रहा । इस दुःख के कारण विदेशी लुटेरे अंग्रेज इत्यादि लुटेरों


वीरभूमि हरयाणा,पृष्ठान्त-7



का प्रदेश कहें तो हमें कोई दुःख (गिला) नहीं । किन्तु हमारी सरकार भी हमारे साथ लुटेरों जैसा व्यवहार करे तो उसके लिये शोभा की बात नहीं । हरयाणा प्रदेश लुटेरों का नहीं, सच्चे क्षत्रियों का प्रदेश है । यह आगे इसका इतिहास ही प्रमाणों द्वारा सिद्ध करेगा ।


हरयाणा तो वैदिक तथा ऐतिहासिक नाम है, जिस पर इसी प्रकरण में आगे प्रकाश डाला जायेगा । इस प्रदेश को तो मुसलमानों के समय में भी स्वर्ग के समान लिखा है । सारबान ग्राम दिल्ली से पाँच मील दूर दक्षिण में है, वहां से एक शिलालेख सुलतान मुहम्मद बिन तुगलक के समय का मिला है, जो इस समय दिल्ली के पुरातत्त्व संग्रहालय (म्यूजियम) में सुरक्षित है । इस शिलालेख पर तिथि संवत् १३८४ वा ८५ विक्रमीय फाल्गुन शुक्ल ५ मंगलवार अंकित है । इस शिलालेख में सब सोलह श्‍लोक हैं । इसके तृतीय-चतुर्थ श्‍लोक में निम्न वर्णन है –


देशोऽस्ति हरियानाख्यः पृथिव्यां स्वर्गसन्निभः ।

ढिल्लिकाख्या पुरी तत्र तोमरैरस्ति निर्मिता ॥

तोमरानन्तरं तस्यां राज्यं हितकण्टकम् ।

चाहमाना नृपाश्‍चक्रुः प्रजापालन-तत्पराः ॥


शिलालेख के इन श्‍लोकों से सिद्ध होता है कि ६३६ वर्ष पूर्व भूमण्डल में एक स्वर्ग समान हरयाणा


वीरभूमि हरयाणा,पृष्ठान्त-8



नाम का देश था, जिसमें वीर तोमरों के द्वारा बसाई गई एक ढिल्ली (दिल्ली) पुरी थी । तोमरों के अनन्तर प्रजापालन में तत्पर चाहमान (चौहान) राजाओं ने इस पर क्लेश रहित सुखपूर्ण राज्य किया ।


इससे स्पष्‍ट सिद्ध होता है कि समग्र पृथिवी पर हरयाणा स्वर्ग समान प्रदेश था और उसमें दिल्ली नाम की पुरी इसकी राजधानी थी । ऐसे प्रदेश को विदेशी लुटेरे अंग्रेजों का लुटेरों का देश कहना सर्वथा अनुचित है । यह उनके पक्षपात, द्वेष और ईर्ष्या को ही प्रकट करता है ।


आज से २०० वर्ष पूर्व नाथ सम्प्रदाय के बहुत बड़े प्रसिद्ध साधु श्री मस्तनाथ जी हुये हैं, जिन की तपस्थली रोहतक के पास बोहर ग्राम के निकट थी । इन्होंने नाथों के इस मठ की, जो 'अस्थल बोहर मठ' कहाता है, स्थापना की । श्री मस्तनाथ जी के जीवन-चरित्र को प्रारम्भ करते हुये उनके जन्म स्थान किसरैंटी ग्राम का वर्णन करते हुये मस्तनाथ के जीवन चरित्र के लेखक श्री शंकरनाथ जी जो कि महन्त व पीर चेतनाथ के शिष्य थे, हरयाणे का वर्णन कविता में इस प्रकार करते हैं –


वीरभूमि हरयाणा,पृष्ठान्त-9



देश अनूप एक हरियाना ।

दूध दधी घृत का जहं खाना ॥

बसत कुशल जहं हरिजन गेहूं ।

राखत अधिक साधु पद नेहूँ ॥

दया धर्म अरु भक्‍त रसीले ।

लोग अहिंसक बहुत सुशीले ॥

केसरिहटी एक नगर सुहावन ।

रोहतक जिला मांहि अति पावन ॥


इससे सिद्ध होता है कि हरयाणा प्रदेश पृथिवी पर अनुपम - इसके समान अन्य कोई देश नहीं था । यहाँ का विशेष भोजन प्रचुर मात्रा में दूध, दही और घृत था । यहाँ के वासी सब लोग कुशल-सुखी थे । ईश्‍वर भक्त और साधु-महात्माओं से अधिक स्नेह करते और उनमें श्रद्धा रखते थे । मधुर स्वभाव वाले, भक्त, दया धर्म से युक्त और सुशील थे, किसी प्रकार की हिंसा नहीं करते थे, अर्थात् मन, वचन, कर्म से किसी को कष्‍ट नहीं देते थे । यह स्वर्ग की ही व्याख्या है । ऐसे ही प्रदेश हरयाणे के अति पवित्र रोहतक जिले में सुन्दर सुहावने नगर किसरैण्टी में बाबा मस्तनाथ ने जन्म लिया था ।


वीरभूमि हरयाणा,पृष्ठान्त-10



इसी प्रकार हरयाणे के प्रसिद्ध सन्त श्री गरीबदास जी के पुत्र सन्त जैतराम जो ग्राम करौंथा (रोहतक) में रहते थे, हुए हैं । वे आजीवन ब्रह्मचारी रहे । उनकी वाणी का एक ग्रन्थ साहेब २०११ में छपा है । उसके पृष्ठ ३९५ पर हरयाणा की प्रशंसा में लिखा है -



हरयाणे की महिमा


सत गुरु हमकूँ पाया सन्तो, सत गुरु हमकूँ पाया ॥


दिल्ली मण्डल देश बखानो, हरयाना कहलावै ॥

बागड़ जमना मधि बिचालै, सुखदाईं मन भावै ॥१॥


ब्रज और घाघरि मध्य हरियाना, समझ विचारो भाई ॥

हरियाना आनन्द मन भाया, जहां दूध दही सुखदाई ॥२॥


अन्न जल भोजन मन के भाये, भक्ति रीति सह नाना ॥

संत समागम सेवन करिहि, गंगा जमना नहाना ॥३॥


वीरभूमि हरयाणा,पृष्ठान्त-11



जीव हिंसा जहां नाहीं करा हीं, मदिरा भखै न कोई ॥

भक्ति रीति सब ही व्योहारा, विध्न करै नहीं कोई ॥४॥


ऐसा है हरियाना दीपं, कन्या हतै न कोई ॥

भक्ति रीति सब ही व्योहारा, कुटिल कर्म सब खोई ॥५॥


तीर्थ व्रत करैं सब प्राणी, चोरी जारी खंडा ॥

राम नाम सुमरन मन मान्या, कर में शस्त्र डंडा ॥६॥


बिन स्नान न भोजन पावै, सहज मतै सुखदाई ॥

गंगा जमना भाव पिघानै, लोहागर पोहकर को जोई ॥७॥


गया, प्रयाग पिंड भरावैं, पितरों कारन जाई ॥

गंगा जमना फूल जो डारै, गरड़ बचावैं आई ॥८॥


वीरभूमि हरयाणा,पृष्ठान्त-12



कथा कीर्तन गांवना ध्यावन, गीता पाठ कराहीं ॥

श्रवण सुनै भागवत सब लीला, राम राम मुख गाहीं ॥९॥


ऐसी चाल देश की कहिये, हरियाना मन मान्या ॥

अति जाजुल कर्म नहीं कोई, करैं सो बहुत पछिताना ॥१०॥


तातैं कर्म कोई जन करि हैं, और कहैं क्यों कीन्हा ॥

जाकूं सब मिल कर समझावैं, फिर संकल्प भर दीन्हा ॥११॥


अपने अपने होले मांही, कर्म लिखा सो पावैं ॥

खेती बनज करें मन मान्या, कहीं न भटका खावैं ॥१२॥


दूध दही मन मान्या होई, कोई जन बिरला खाली ॥

अति सुन्दर नीकी नर काया, सब के मुख पर लाली ॥१३॥


वीरभूमि हरयाणा,पृष्ठान्त-13



कुट चलनी त्रिया कोई नाहीं, मरजाद रूप ब्योहारा ॥

जैतराम ऐसा हरियाना सब देशों से न्यारा ॥१४॥


इसमें हरियाने का नाम "दिल्ली-मण्डल देश बखानों हरयाणा कहलावे" अर्थात् दोनों पर्यायवाची हैं । १८५७ की क्रान्ति तक इस प्रदेश का नाम दिल्ली भी रहा । हरयाणे की सीमायें जिसमें बागड़ और जमना के बीच में तथा ब्रज और घाघर नदी के बीच में बताई हैं । उस समय सबको इच्छा अनुसार अन्न, जल, घृत, दूध सुखदायी भोजन मिलता था । यहां के लोग साधु-सन्तों का सत्संग करते थे और पौराणिक मत का प्रचार होने से तीर्थ मानकर गंगा जमना में स्नान करते थे । सब अहिंसक और निरामिष भोजी थे । मदिरा (शराब) और मांस (गोश्त) आदि अभक्ष्य पदार्थों का कोई सेवन नहीं करता था । यहां कन्याओं को कोई नहीं मारता था । सब लोग प्रभु भक्त थे, कोई किसी की उपासना में विघ्न नहीं डालता था । छल, कपट, कुटिलता, मिथ्या व्यवहार कोई नहीं करता था, सब सत्य के पुजारी थे । सब लोग धार्मिक, व्रत, उपवास और तीर्थों में श्रद्धा रखने वाले और ईश्वर


वीरभूमि हरयाणा,पृष्ठान्त-14



का स्मरण करने वाले थे । चोरी, जारी, व्यभिचार आदि निकृष्ट कर्मों से सर्वथा दूर थे । सब क्षत्रिय प्रकृति के होने के कारण सदैव अपने हाथ में अपना प्रिय शस्त्र डण्डा (लाठी) रखते थे । बिना स्नान के कोई भोजन नहीं करता था । गंगा, जमना के अतिरिक्त लोहागर, पोहकर (पुष्कर) आदि को भी तीर्थ मानकर उनमें स्नान करते थे । पौराणिक मत का इतना प्रचार था कि अपने मृत पितरों का गया प्रयाग में पिण्ड दान भरवाते, मोक्ष प्राप्‍ति के लिये गंगा, जमना में मृत पितरों के फूल (हड्डियां) डालते और अपने किसी सगे सम्बन्धी के मर जाने के पश्‍चात् अपने घर में गरुड़ पुराण की कथा करवाते । कथा, कीर्तन और गाने-बजाने में विशेष रुचि रखते थे । अर्थात् सदा यह धर्म-प्रेमी देश रहा है । कोई भी व्यक्ति निकृष्ट अधर्म युक्त कार्य नहीं करता था । यह इस हरयाणा प्रान्त की विशेषता थी । यदि कोई किसी प्रकार की त्रुटि वा भूल कर देता तो सब समझा कर उसे आगे के लिये सावधान कर देते थे । निर्वाह के लिये खेती, बनज (व्यापार) इच्छानुसार करते थे । लोग नौकरी आदि के लिये इधर-उधर नहीं भटकते थे । 'उत्तम खेती मध्यम व्यापार, निखद


वीरभूमि हरयाणा,पृष्ठान्त-15



चाकरी भीख द्वार' के अनुसार कृषि को उत्तम, व्यापार को मध्यम, चाकरी-नौकरी तथा भीख मांगने को निकृष्ट समझते थे । मन चाहा दूध, दही और घृतादि सभी व्यक्तियों को मिलता था । इसलिये सब के शरीर सुन्दर, सुदृढ़ और स्वस्थ थे । सबके मुख पर लालिमा तेज था । चरित्र-हीन स्‍त्री नहीं होती थी । सब मान-मर्यादा को रखने वाला व्यवहार करतीं थीं । ऐसा सब देशों से न्यारा श्रेष्ठ देश हरयाणा था । ऐसा सन्त ब्रह्मचारी जैतराम जी ने अपनी वाणी में लिखा है ।


अब पाठक ही स्वयं विचार करें कि ऐसे पवित्र देश हरयाणे को लुटेरों का देश कहना कितना मूर्खतापूर्ण पक्षपात है ।


आज से लगभग २४७ वर्ष पूर्व सन्त गरीबदास जी का जन्म हुआ था । ब्रह्मचारी जैतरामदास जी ने अपने विषय में वर्णन करते हुए हरयाणे के सम्बन्ध में यह लिखा है । २०० वर्ष से पूर्व अर्थात् अंग्रेजों के आने के पूर्व हरयाणे की यह अवस्था थी । स्वर्ग समान देश को लुटेरों का देश लिखना अंग्रेजों के कलुषित हृदय की कालिमा को ही प्रकट करता है ।


वीरभूमि हरयाणा,पृष्ठान्त-16



इसी प्रदेश के विषय में अपभ्रंश भाषा के कवि पुष्पदन्त ने अपने यौधेय-भूमि अर्थात् हरयाणे के विषय में लिखा है -


जोहेयउ णामिं अत्थि देसु ।

णं धरिणाएं धरियउ दिव देसु

जहिं जण धण कण परि पुण् णनाम्

पुरणयर सुसीमा रामसम ॥


यह कवि पुष्पदन्त महाराज कृष्णराज का दरबारी कवि था । इसका काल १०वीं ११वीं शती माना जाता है, अर्थात् लगभग सात सौ आठ सौ वर्ष पूर्व का यह वर्णन है । वह लिखता है - "यौधेय नाम का यह देश धरणी-पृथ्वी पर दिव्य वेष धारण किये हुये है । जो देश धन-धान्य से परिपूर्ण है । वहां के ग्राम और नगर बड़े शोभायमान हैं ।"


यह उपरि लिखित सात सौ आठ सौ वर्ष पूर्व हरयाणा प्रदेश की अवस्था थी । ऐसे दिव्य और सुखी देश को जिसकी सारी पृथ्वी पर कोई समनाता नहीं रखता, उसको लुटेरों का देश लिखना ऐसा प्रतीत होता है कि मदिरा के मद में उन्मत्त (पागल) होकर अंग्रेजों ने ऐसा ऊंटपटांग लिखा है ।


आज से पांच हजार वर्ष पूर्व इसी यौधेय प्रदेश


वीरभूमि हरयाणा,पृष्ठान्त-17



हरयाणे के विषय में महर्षि व्यास ने महाभारत सभापर्व में लिखा है -


ततो बहुधनं रम्यं गवाढ्यं धनधान्यवत् ।

कार्तिकेयस्य दयितं रोहितकमुपाद्रवत् ॥


यह यौधेय प्रदेश की राजधानी रोहतक का वर्णन करते हुये उस समय की हरयाणे की विशेषताओं पर प्रकाश डाला है । कार्तिकेय की प्रियनगरी रोहतक बहुत धनवाली, अति रमणीय, गौओं से परिपूर्ण और धन-धान्य से भरपूर थी । "दयितम्" के स्थान पर "भवनम्" भी पाठ भेद मिलता है । जिससे सिद्ध होता है कि रोहतक कार्तिकेय की प्रिय नगरी ही नहीं थी, अपितु यहां उसका निवास स्थान (भवन) भी था ।


महर्षि व्यास जो इसी हरयाणा प्रदेश के थे और इसी प्रदेश में उनका आश्रम था, यहां के इतिहास से सुपरिचित थे । अतः उन्होंने कार्तिकेय की प्रिय नगरी और निवास स्थान बनाकर यह सिद्ध कर दिया कि यह रोहतक नगरी अत्यन्त प्राचीन है ।


महर्षि अग्निष्वात्त के पौत्र तथा श्री शिव जी (जिनका दूसरा नाम 'हर' भी है) के पुत्र देवताओं के सेनापति कार्त्तिकेय सृष्टि के आदि में इस नगरी में रहते थे । महाभारत के समय मयूरक अर्थात् यौधेय गण


वीरभूमि हरयाणा,पृष्ठान्त-18



का यहां आधिपत्य था । और महर्षि व्यास के उल्लिखित विशेषण यह सिद्ध करते हैं कि उस समय भी यह प्रदेश स्वर्ग समान था । शिव और कार्त्तिकेय का विशेष सम्बन्ध इससे सिद्ध होता है । आरम्भ में इन्हीं का राज्य यहां रहा है । गणराज्यों के संस्थापक शिव जी महाराज तथा उनके पुत्र कार्त्तिकेय और गणेश थे । इसलिये गणराज्य प्रिय हरयाणे के निवासियों ने महादेव के प्रिय नाम 'हर' के कारण ही इस प्रदेश का नाम हरयाणा रखा । इस पर विस्तार से आगे लिखूंगा ।

२ - द्वितीय पक्ष

जिला संगरूर तहसील नरवाना में जीन्द से कुछ दूर जिला हिसार की सीमा के पास ही एक स्थान 'रामराय' है, जिसे 'रामहृदय' भी कहते हैं । पौराणिक हिन्दू इस स्थान को अपना पुण्यतीर्थ (सरोवर) मानते हैं । प्रतिवर्ष इस पर मेला भी लगता है । यह स्थान कुरुक्षेत्र के अन्तर्गत ही माना जाता है । यहां कुरुक्षेत्र के समान सूर्य-ग्रहण के समय भी मेला लगता है । पौराणिक लोगों में ऐसा विश्वास और जन-श्रुति है कि इसी स्थान पर परशुराम ने क्षत्रियों का


वीरभूमि हरयाणा,पृष्ठान्त-19



विध्वंस किया था । वे इसको क्षत्रियों की बलि-भूमि मानते हैं । यहाँ से कुछ मील दूर हिसार जिले में एक बहुत प्राचीन उजड़ खेड़ी (थेह) 'राखी गढ़ी' है । वहां सहस्रवीर्य अर्जुन राज्य करता था, ऐसी प्रसिद्धि है । सहस्रवीर्य अर्जुन और परशुराम के पिता जमदग्नि का परस्पर संघर्ष हुआ । सहस्रवीर्य अर्जुन ने जमदग्नि का शिर काट दिया । इसी से क्रुद्ध होकर परशुराम ने जिसको पौराणिक भाई विष्णु वा हरि का अवतार मानते हैं, क्षत्रियों को एकत्र करके पर्शु (कुल्हाड़े) द्वारा इक्कीस बार उनका विध्वंस कर दिया था । इसलिये परशुराम हरि होने से इसका नाम हरियाणा पड़ा अर्थात् हरि परशुराम के द्वारा क्षत्रियों की बलिदान भूमि (बन्दोबस्त रिपोर्ट जिला हिसार सन् १८६३ ई०) ।


प्राचीन काल में इस प्रान्त में अनेक ऋषि-महर्षि आदि महापुरुष हुये हैं । श्री परशुराम जी भी इसी प्रान्त में हुये हैं । यह तो कुछ उचित ही प्रतीत होता है, क्योंकि महर्षि च्यवन वा भृगु ऋषि के वंश में ही ये हुये हैं और महर्षि च्यवन का स्थान ढौसी नारनौल के निकट माना जाता है । वहां पर्वत पर वे तपस्या करते थे, यह तो जनश्रुति है ही । उनके वंश में


वीरभूमि हरयाणा,पृष्ठान्त-20



भार्गव ढूसर अपने आप को मानते हैं । उनके स्मारक रूप में ढौसी के पर्वत पर च्यवन-आश्रम अब भी बना रखा है । श्री परशुराम की वंशावली निम्न प्रकार से है - जो के वायुपुराण में श्‍लोक ६५, ७२, ७४ में दी है –


भृगु -- च्यवन -- आप्नवान् -- ऊर्व -- ऋचीक (धर्मपत्‍नी - सत्यती) -- जमदग्नि -- परशुराम


इस प्रकार परशुराम जी जिन्हें पौराणिकों ने विष्णु का अवतार माना है । किन्तु एक बड़ी समस्या है कि पौराणिक भाई एक ही काल में विष्णु के दो अवतार जमदग्नि-राम अर्थात् परशुराम और दूसरे दाशरथि-राम अर्थात् महाराज रामचन्द्र, इन दोनों


वीरभूमि हरयाणा,पृष्ठान्त-21



को विष्णु का अवतार मानते हैं । एक समय में यह कैसे सम्भव हुआ ? उनकी बुद्धि इसे कैसे स्वीकार करती है ? वैसे ईश्वर का अवतार तो होता ही नहीं है क्योंकि वह निराकार है । यह अवतार की कोरी कल्पना मात्र है । इस श्री परशुराम को विष्णु का अवतार होने से उसका हरि नाम हुआ और यह प्रदेश हरि-परशुराम के नाम के कारण तथा उनका स्थान होने से 'हरियाना' नाम से विभूषित हुआ, इसमें कोई ठोस प्रमाण तो है नहीं, सम्भव है यह भी एक कारण हो ।

३ - तीसरा पक्ष

ऐसी जनश्रुति एवं लोकोक्ति प्रसिद्ध है कि एक बार अपनी राजधानी अयोध्या से महाराजा हरिश्‍चन्द्र भ्रमण करते हुए इस प्रदेश में आये थे, तब यह समस्त भू-भाग जंगल पड़ा था, उन्होंने उसको बसाया । हरिश्‍चन्द्र के नाम से हरि का आना हरि-आना (हरियाना) पड़ गया । (बन्दोबस्त रिपोर्ट जिला हिसार सन् १९६३ ई०)


समीक्षा - इस युक्ति में कोई ऐतिहासिक तथ्य नहीं है और न ही इसके लिये कोई ठोस प्रमाण ही उपलब्ध है कि महाराजा हरिश्‍चन्द्र कभी अपनी


वीरभूमि हरयाणा,पृष्ठान्त-22



राजधानी अयोध्या से यहाँ पधारे थे और न ही इस प्रदेश का समस्त भू-भाग कभी जंगल ही रहा है । आदि सृष्टि से रोहतक (रोहीतक, रोहितक) आदि बड़े-बड़े नगर हमारे पूर्व पुरुषाओं ने इस प्रान्त में बसाये थे । जैसे शिव जी महाराज के पुत्र कार्त्तिकेय की प्रियनगरी रोहतक उनका निवास-स्थान ही था, जो कार्त्तिकेय आदि सृष्टि की तीसरी-चौथी पीढ़ी में ही हुये हैं । जैसा कि महाभारत सभापर्व में रोहतक को कार्त्तिकेय का निवास-स्थान लिखा है –

"कार्त्तिकेयस्य भवनं (दयितं) रोहितकमुपाद्रवत् ।"


जैसे महाराजा हरिश्‍चन्द्र के नाम पर इस प्रदेश का नाम हरयाना पड़ा है, ऐसा मानने वालों की यह केवल कपोल-कल्पना है, वैसे ही रोहतक का नाम पहले महाराजा हरिश्‍चन्द्र के पुत्र रोहतास के नाम पर 'रोहतासगढ़' था, ऐसा कहने वालों की यह भी एक मनगढ़न्त कल्पना है । इसमें कोई प्रमाण एवं सार नहीं है । कभी जोगियों ने गाते हुये सांघी ग्राम का नाम सांगानेर अपने गाने में गा दिया और रोहतक का नाम रोहतासगढ़ बना कर गा दिया । इन दोनों - सांघी और रोहतक - का अन्तर साढ़े सात कोस है और उसको साढ़े सात सौ कोस बतला


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दिया । इसी प्रकार ऊपर लिखी कल्पनायें भी सर्वथा मिथ्या हैं, इनमें तथ्य एवं सत्यांश नाम-मात्र को भी नहीं ।


४ - चतुर्थ पक्ष

एक प्रचलित किंवदन्ति है कि ब्रज से द्वारका को जाने के लिये हरि अर्थात् कृष्ण के यान का जाने का यही निर्दिष्ट मार्ग था, अतः यह भू-भाग हरियाणा कहलाया । इसी से मिलती-जुलती एक अन्योक्ति भी है कि कौरवों और पाण्डवों के युद्ध में श्रीकृष्ण जब सम्मिलित होने के लिए आये तो सर्वप्रथम इसी प्रदेश में ठहरे थे । उनकी सेना भी इधर ही एकत्र थी । इसलिये हरि-कृष्ण का आना, इससे यह प्रदेश हरि-आना (हरियाना) कहलाया । (बालमुकुन्द स्मारक ग्रन्थ, पृष्ठ १)


समीक्षा - योगिराज श्रीकृष्ण को भी पौराणिक भाईयों ने विष्णु का अवतार माना है, अतः विष्णु के नाम हरि से इन्हें भी विभूषित किया गया । श्रीकृष्ण जी महाराज की जन्मभूमि मथुरा भी हरियाणे में है और इनकी कर्मभूमि इन्द्रप्रस्थ तथा कुरुक्षेत्र भी इसी प्रदेश में हैं । इनके महाभारत के समय ठहरने का स्थान भी हरयाणा था तथा ब्रज से द्वारका जाने


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का मार्ग भी उनका यहीं से था । अतः इस प्रदेश का नाम उनके 'हरि' नाम के कारण हरियाणा पड़ गया । यह कल्पना भी कारण हो सकती है, किन्तु इससे अधिक प्रमाणित बात यह है कि जहाँ उनकी कर्मभूमि और जन्मभूमि दोनों ही इस प्रदेश में थीं, वहाँ उन्होंने इस प्रदेश को जीतकर अपनी विजय पताका इस पर फहराई थी तो इसी कारण इसका नाम हरियाणा भी हो गया । महाभारत सभापर्व में उनकी जीत का निम्नलिखित प्रमाण है –

नकुलस्य तु वक्ष्यामि कर्माणि विजयं तथा ।

वासुदेव - जितामाशा यथासवजयत प्रभुः ॥

(महा० सभापर्व ३२ अध्याय)


मैं नकुल के पराक्रम और विजय का वर्णन करूंगा । शक्तिशाली नकुल जिस प्रकार भगवान् वसुदेव के पुत्र श्रीकृष्ण ने इस पश्‍चिम दिशा को जीता था, उसी प्रकार इस पश्‍चिम दिशा पर नकुल ने विजय पाई ।


महर्षि व्यास ने पश्‍चिम दिशा का जो उल्लेख किया है, उसमें सर्वप्रथम हरयाणे का भाग रोहतक आदि आता है । (निर्याय खांडवप्रस्थात्) वह नकुल खांडवप्रस्थ (इन्द्रप्रस्थ) दिल्ली से पश्‍चिम की ओर


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चलता है और जहाँ-जहाँ पहुँचता है उसके विषय में लिखा है -

ततो बहुधनं रम्यं गवाढ्यं धनधान्यवत् ।

कार्तिकेयस्य दयितं रोहितकमुपाद्रवत् ॥

(महा० सभापर्व अ० ३२)


वहाँ इन्द्रप्रस्थ से चलकर मार्ग में बहुत धनी, गोबहुल धन ही नहीं, धान्य (अनेक प्रकार के अन्नों) से परिपूरित सुन्दर रमणीय कार्त्तिकेय के प्रिय नगर रोहितक (रोहतक) में जा पहुँचा ।

तत्र युद्धं महच्चासीत् शूरैर्मत्तमयूरकैः ।

मरुभूमिं च कार्त्स्न्येन तथैव बहुधान्यकम् ॥

(महा० सभापर्व अ० ३२)


वहाँ उनका मत्तमयूरक (मयूरध्वज धारी) शूरवीर यौधेयों के साथ घोर संग्राम हुआ । नकुल ने सारी मरुभूमि (मयूरभूमि) और सारे बहुधान्यक (हरयाणा) प्रदेश को जीत लिया ।

शैरीषकं महेत्थं च वशे चक्रे महाद्युति ।

आक्रोश चैव राजर्षिं तेन युद्धमभवन्महत् ॥

तान् दशार्णान् जित्वा स प्रतस्थे पाण्डुनन्दनः ।


इस प्रदेश के मध्य स्थान शैरीषक (सिरसा) और महेत्थं (महम) आदि को उस तेजस्वी नकुल ने जीता । इस प्रकार यौधेयों के दशार्ण - दश दुर्गों को जीत कर


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वह आगे बढ़ा । यहां आक्रोश के साथ घोर युद्ध हुआ, किन्तु नकुल ने उसे जीत लिया ।

इस प्रकार श्रीकृष्ण जी महाराज ने इस हरयाणा प्रदेश को जो नकुल ने जीता, इसे पहले ही जीत लिया था । इसी अध्याय में पुनः इसकी पुष्टि महाभारत में की है । यथा -

एवं विजित्य नकुलो दिशं वरुणपालिताम् ।

प्रतीचीं वासुदेवेन निर्जितां भरतर्षभ ॥२०॥


इस प्रकार हे भरत श्रेष्ठ ! भगवान् वासुदेव श्रीकृष्ण द्वारा जीती हुई वरुणपालित पश्‍चिम दिशा पर (हरयाणा सहित) विजय पाकर नकुल इन्द्रप्रस्थ को गया । इस प्रकार यह हरयाणा श्रीकृष्ण महाराज की जन्मभूमि, कर्मभूमि और विशेषतया उनका जीता हुआ प्रदेश था । अतः श्रीकृष्ण का नाम विष्णु के नाम (अवतार) हरि मानने के कारण हरियाणा पड़ गया, इस युक्ति में कुछ सार और तथ्य प्रतीत होता है ।


५ - पञ्चम पक्ष

यह भी कहा जाता है कि इस प्रदेश में जो जंगल या बन था, उसका नाम 'हरिया बन' प्रसिद्ध था । पश्‍चात् उसमें बस्ती हो जाने पर इस प्रदेश


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को भी हरिया बन कहा जाने लगा, फिर यही हरियाबन - हरिया अन-हरियान, हरियाना हो गया " (बन्दोबस्त रिपोर्ट जिला हिसार सन् १८६३ ई०)


समीक्षा - इस प्रदेश में हरे-भरे जंगल थे । पीछे बस्ती होने पर 'हरियाबन' से बिगड़ कर इसका नाम 'हरियाणा' हो गया । इस युक्ति में कोई विशेष सार नहीं है, क्योंकि हिमालय से उतर कर हमारे पूर्व पुरुषाओं ने सर्वप्रथम इसी प्रदेश में बड़े बड़े नगर और बस्तियाँ बसाईं थीं । इसके लिये 'कार्त्तिकेयस्य दयितं रोहितकम्' यह महाभारत का प्रमाण ही पर्याप्‍त है । अन्य सभी प्रदेशों के समान इस प्रदेश के भी कुछ भागों में बन जंगल सदा रहे हैं । अतः 'हरिया बन' से बिगड़ कर हरियाना बना है यह केवल भ्रम मात्र ही है ।

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६ - छठा पक्ष

"पं० धरणीधर जी हांसी वाले ने अपने पुस्तक "अखण्ड प्रकाश" में इस प्रदेश का नाम 'हरिवाणक' था ऐसा लिखा है और पीछे यह उच्चारण भेद से 'हरियाना' हो गया । हरिवाणक शब्द का यह अर्थ किया कि जहां हरि अर्थात् इन्द्र की अधिक आकांक्षा हो । योगरूढि से यह शब्द प्रदेश-वाची बन गया ।


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आज भी हरियाना पानी की बूंद के लिए तरसता है और इन्द्र भगवान् की ओर आशा भरी दृष्टि से देखता है ।" (पं० धरणीधर कृत 'अखण्ड प्रकाश")


हरयाणा में वर्षा का अभाव रहता है। पौराणिक भाई वृष्टि का देवता 'इन्द्र' जिसका नाम 'हरि' भी है, मानते हैं, और इन्द्र की ओर सदैव इस दृष्टि से ताकते (देखते) रहते हैं कि वह कब कृपा करे जिससे वृष्टि हो और इस प्रान्त के निवासियों का निर्वाह हो सके ।


समीक्षा - इस युक्ति में कुछ थोड़ा सा बल तो प्रतीत होता है । किन्तु सदैव इस प्रदेश में अनावृष्टि रहती है, ऐसी बात तो नहीं है । अन्य प्रदेशों के समान यहां भी अतिवृष्टि, अनावृष्टि और समयोचित वृष्टि भी होती रहती है । अतः उपर्युक्त कारण से इन्द्र के हरि नाम के कारण इस प्रदेश का 'हरयाणा' नाम पड़ा यह युक्ति और प्रमाण की कसौटी पर सत्य सिद्ध नहीं होती ।

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७ - सातवां पक्ष

हरा-भरा होने से इस प्रदेश का नाम हरयाणा पड़ गया है ।


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समीक्षा - यह युक्ति अच्छी तो लगती है और 'बहुधान्यक' शब्द भी जो इस प्रदेश का पुराना नाम है, इसकी पुष्टि करता है । इस दृष्टि से इसका नाम हरयाणा पड़ गया, यह यहाँ के निवासियों को रुचिकर तो होगा । किन्तु संस्कृत का शब्द तो 'हरित' है और इसके आधार "हरिताना" या "हरियाना" होना चाहिये था । किन्तु हरयाणा नाम तो ऐतिहासिक और वैदिक नाम ही है । यही उचित प्रतीत होता है । अतः उपर्युक्त कारण के आधार पर इस प्रदेश का 'हरयाणा' नाम पड़ा है, प्रमाणाभाव के कारण यह सिद्ध नहीं होता । अतः यह विचारणीय नहीं ।


८ - आठवां पक्ष

श्री डा० वासुदेव शरण जी अग्रवाल ने प्राचीन "अभीरायण (अहीरों का घर या स्थान) शब्द से हरयाणा शब्द की व्युत्पत्ति अधिक सम्भव मानी है । आभीरायण-अहिरायन-हीराअन-हरिआन हरियान और हरियाना"।


समीक्षा - डा० शंकरलाल यादव ने अपनी पुस्तक "हरयाणा प्रदेश का लोक साहित्य" में यह डा० वासुदेव शरण का उद्धरण दिया है, किन्तु स्वयं


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ही अपनी पुस्तक में उन्होंने ऐसी बातें लिखी हैं, जिससे उनका ख्ण्डन हो जाता है । उन्होंने हरयाणा प्रदेश का एक भाषाई मानचित्र भी इसी पुस्तक के ६०वें पृष्ट पर दिया है जिसमें अहीरवाटी, गुड़गावां, मेवात, रेवाड़ी, ब्रज और बागड़ प्रदेश को हरयाणे की सीमा से पृथक दिखाया है । वे इस प्रकार इस विशाल प्रदेश के रोहतक महम, हाँसी, दादरी, हिसार जींद, सफीदों, कैथल और नरवाना को ही प्रधान नगर मानते हैं । रेवाड़ी, गुड़गांवा, महेन्द्रगढ़ और नारनौल आदि को हरयाणे के अन्तर्गत नहीं मानते । इतना सब होने पर भी वे इस मत का खण्डन भी नहीं करते । इतना ही नहीं, वे इसी पुस्तक के ६२वें पृष्ठ पर लिखते हैं - "इस प्रदेश की जनता का सबसे अधिक भाग देशवासी (देशवाली) जाटों से मिलकर बना है । इन्हीं लोगों की संस्कृति के दर्शन 'हरयाणा संस्कृति' के रूप में पाठकों को मिलेंगे, यों दूसरी जातियाँ भी पर्याप्‍त मात्रा में हैं, किन्तु प्रधानता जाट जाति की है ।" (हरयाणा प्रदेश का लोक साहित्य पृष्ठ ६२)


इस प्रकार अपने मत का वे स्वयं खण्डन कर देते हैं । उनके लेख के अनुसार तो हरयाणे के स्थान पर दूसरी जातियों के नाम के अनुसार दूसरा ही कोई नाम


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होना चाहिये था, क्योंकि इस प्रदेश में बहुसंख्यक जातियां दूसरी ही हैं । अतः श्री वासुदेव शरण अग्रवाल व डा० शंकरलाल यादव के लेखानुसार तो 'आभीर-अहीर' हीर जाति के निवास स्थान के कारण इस प्रदेश का नाम हरयाणा कभी नहीं हो सकता । इनकी युक्ति सर्वथा सारहीन प्रतीत होती है । इस प्रदेश में गौड़ ब्राह्मण, अग्रवाल-वैश्य, जाट, राजपूत, रवे तथा गुर्जर भी पर्याप्‍त संख्या में बसते हैं । फिर इनका निवास स्थान होने से इनमें से किसी जाति-नाम पर इस प्रदेश का नाम होना चाहिए था, किन्तु जाति विशेष के कारण हरयाणा नाम इस प्रदेश का नहीं पड़ा, यह तो वैदिक और ऐतिहासिक नाम है, जिस पर आगे विस्तार से प्रकाश डाला गया है ।

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९ - नवां पक्ष

डा० श्री शंकरलाल यादव ने जिन्होंने "हरयाणा प्रदेश का लोक साहित्य" नामक पुस्तक लिखी है, राहुल सांकृत्यायन का एक सुझाव लिखा है कि - "हरियाना शब्द 'हरिधान्यकः हरिहानक -हरि आनक- हरि-आन-अ, हरि-आन, हरियान और हरियाना आदि प्रक्रिया से अपभ्रंश की चक्की में पड़कर बना है । वह यह युक्ति देते हैं कि महाभारत में इस प्रदेश का


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नाम 'बहुधान्यक' है । इसका नामान्तर हरिधान्यक भी मिलता है । बहुधान्यक शब्द का अर्थ - प्रभूत धन वाला । इसी प्रकार 'हरिधान्यक' का अर्थ होगा - हरित एवं धन-धान्य पूर्ण । यह प्रदेश प्राचीन काल में हरा-भरा रहा होगा, यह सहज में अनुमान लगाया जा सकता है, जबकि सरस्वती नदी इस प्रदेश की हरितिमा की सुषमा बखेरती बहती होगी । इसी कारण इसका नाम हरयाणा होगा । निःसन्देह यह आज अपने उस रूप में नहीं है" ।


समीक्षा - राहुल जी की तुकबन्दियां प्रायः सर्वत्र इसी प्रकार की हुआ करती हैं । वे खोज करने के लिये इतना यत्‍न नहीं करते थे, जितना कि सर्वत्र अपनी टांग अड़ाने का यत्‍न करते थे । उनकी पुस्तकें पढ़ने वाले विचारशील सभी भली-भाँति जानते हैं कि कितनी कपोल-कल्पित, मनघड़न्त, बेतुकी युक्ति और प्रमाण रहित बातें लिखने का उनका स्वभाव था । जैसे हेमू को रोनियार और बिहार प्रान्त का लिख दिया । "जय यौधेय" नाम का उपन्यास लिख कर इन पवित्र आर्यवीरों पर सभी गन्दे दोष लगा डाले, जैसे पौराणिकों ने श्रीकृष्ण जी महाराज पर लगाये हैं । केवल इनके लेख में इतना ही सार है कि


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जब यहाँ सरस्वती आदि नदियां बहतीं थीं तब यह प्रान्त हरा-भरा था । धन-धान्य से परिपूर्ण होने के कारण इसका नाम 'बहुधान्यक' था, किन्तु प्राचीन साहित्य में इसका नाम कहीं भी 'हरिधान्यक' नहीं मिलता । अतः बहुधान्यक से हरिधान्यक और उससे हरयाणा बह गया, यह कल्पना मात्र है । शिलालेखों में और प्राचीन साहित्य में हरियाणा, हरयाणा और हरियाणक शब्द ही देखने में आता है, हरिधान्यक कहीं देखने में नहीं आता । अतः उनकी कल्पना भ्रम-मूलक और असत्य है ।

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१० - दसवां पक्ष (दशार्ण हरयाणा)

महाभारत के समय तथा उससे पूर्व दशार्ण नाम इस हरयाणा प्रान्त का ही था । महाभारत के विराट् पर्व और सभापर्व में इसके लिये प्रमाण विद्यमान हैं । सभापर्व में नकुल की पश्चिम दिग्विजय का निम्न श्‍लोकों में वर्णन किया गया है । वैसे ये श्‍लोक पहले भी आ चुके हैं, किन्तु पाठक दशार्ण को इन श्‍लोकों द्वारा भली-भाँति समझ सकें, इस दृष्टि से


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पुनः उद्‍धृत किये जाते हैं -


ततो बहुधनं रम्यं गवाढ्यं धनधान्यवत् ।

कार्तिकेयस्य दयितं रोहितकमुपाद्रवत् ॥

तत्र युद्धं महच्चासीत् शूरैर्मत्तमयूरकैः ।

मरुभूमिं च कार्त्स्न्येन तथैव बहुधान्यकम् ॥

शैरीषकं महेत्थं च वशे चक्रे महाद्युति ।

आक्रोश चैव राजर्षिं तेन युद्धमभवन्महत् ॥

तान् दशार्णान् जित्वा स प्रतस्थे पाण्डुनन्दनः ।

(महा० सभापर्व अ० ३२)


महाभारत आदि संस्कृत ग्रन्थों में रोहतक का नाम रोहीतक और रोहितक मिलता है । यह नगर अति प्राचीन वैदिक काल में ही बसाया जा चुका था । प्राचीन आर्य पूर्वजों ने जंगल काट, स्वच्छ कर नगर बसाये ।


आयुर्वेद में रोहीतक - रोहितक - रोहीड़े - रहीड़े - हरीड़े वृक्ष को कहा गया है । जिस समय रोहतक को बसाया तब यहां रोहीतक वृक्ष सर्वत्र थे । आज भी रोहतक क्षेत्र में रोहीड़े के पेड़ मिलते हैं । इसी कारण से इस नगर का नाम "रोहीतक" रखा गया था ।


सूर्य-सिद्धान्त ज्योतिष का प्रसिद्ध ग्रन्थ है । उसमें लिखा है कि -


अल्पावशिष्टे तु कृते युगे मयनामा महासुरः ।


इनसे पूर्णतया प्रमाणित होता है कि खाण्डवप्रस्थ अर्थात् इन्द्रप्रस्थ, जिसे आजकल दिल्ली कहते हैं, से


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चलकर नकुल ने कार्त्तिकेय के प्रिय दुर्ग अति सुन्दर बहुत धनी, गायों से परिपूर्ण धन-धान्य वाले रोहतक को जीता ।

अर्थात् कृतयुग - सतयुग जब सब कुछ बचा हुआ था तब यह ग्रन्थ मय नाम महाविद्वान ने बनवाया । यह काल २१६५००० वर्षों का होता है । ५ हजार से कुछ ऊपर वर्तमान कलियुग के बीत चुके । इससे पूर्व ८ लाख ६४ हजार वर्ष द्वापर और उससे पूर्व १२ लाख ९६ हजार वर्ष त्रेता युग मे बीत चुके हैं । अर्थात् २१ लाख ६५ हजार वर्ष सतयुग को बीत चुके हैं । उससे भी कुछ पहले यह ग्रन्थ बनाया जा चुका था । इस ग्रन्थ में रोहीतक का नाम आया है । जैसे -


राक्षसालयदेवौकः शैलयोर्मध्यसूत्रगाः ।

रोहीतकमवन्ती च यथा - सन्निहितं सरः ॥

इस श्‍लोक में काश्मीर, लंका, कुरुक्षेत्र, अवन्ती और रोहीतक के नाम स्पष्‍ट मिलते हैं । इससे पता मिलता है कि रोहतक नगर २१ लाख ६५ हजार वर्षों से पुराना है और प्रसिद्ध होने के कारण ही उपर्युक्त ग्रन्थ में नाम लिया गया है । हमारे पूर्वजों ने न केवल नगरों अपितु महाद्वीपों के नाम भी वृक्षों के नाम पर रखे हैं । जैसे जम्बू, प्लक्ष, शाल्मली और शाक आदि ।


वीरभूमि हरयाणा,पृष्ठान्त-36



वहाँ पर शूरवीर मयूर चिन्ह वाले धनुर्धारी यौधेयों के साथ उसका घोर युद्ध हुआ । नकुल ने उनके प्रदेश बहुधान्यक और मरुभूमि दोनों को पूर्णतया जीत लिया । उनके अन्य दोनों दुर्ग सिरसा (शैरीषक) और महेम को भी जीत लिया । वहाँ पर आक्रोश के साथ उसका महायुद्ध हुआ । पाण्डुपुत्र नकुल ने इस यौधेय प्रदेश के दशार्ण अर्थात् दशों दुर्गों को जीत लिया और वहाँ से उसने प्रस्थान किया । आगे महाभारत में वर्णन आता है कि नकुल वहां से शिबियों और त्रिगर्तों की ओर चला ।


यौधेयगण अति प्रसिद्ध, प्रभावशाली गण था । इसका स्पष्‍ट उल्लेख महाभारत आदि ग्रन्थों में मिलता है । जैसे -

(क) अथ प्रहस्य वीभत्सुर्ललित्थान् मालवानपि ।

मावेल्लकाँस्त्रिर्गतांश्‍च यौधेयांश्‍चादयाच्छरः ॥

-महाभारत द्रोणपर्व १९ अध्याय


(ख) मालवा मद्रकाश्‍चैव द्राविडाश्‍चोग्रकर्मिणः ।

यौधेयाश्‍च ललित्थाश्‍चक्षुद्राश्‍चाप्युशीनराः ॥

- महाभारत कर्णपर्व ५ अध्याय

अर्थात् महाभारत काल में अनेक गणतंत्र राज्य थे । उनमें से उपर्युक्त दोनों श्‍लोकों में "यौधेय" गण का स्पष्‍ट उल्लेख है । कहीं-कहीं संशप्‍तक गण के अन्तर्गत भी यौधेयादि गणों का वर्णन मिलता है ।


वीरभूमि हरयाणा,पृष्ठान्त-37



(ग) भारतक्षेत्रे यौधेयो नाम धाम सम्पदो जनपदः ।

(घ) स यौधेयो इति ख्यातो देशः क्षेत्रोऽस्ति भारते ।

मारदत्तो नाम राजा ॥

- सोमदेव रचित यशस्तिलक नाम नाटक ।


अर्थात् - भारतीय क्षेत्र में यौधेय प्रदेश बड़ा विख्यात है और सम्पत्ति का धाम (कोष) है । उसके किसी मारदत्त अथवा मारिदत्त राजा का उक्त कवि ने वर्णन किया है ।


महाभारत का वर्णन तो इतना स्पष्‍ट है कि उसमें सन्देह करने की आवश्यकता ही नहीं । निःसन्देह उस समय इस प्रदेश का नाम दशार्ण भी था । उस समय दस दुर्ग कौन कौन से थे यह तो अभी निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता, किन्तु तीन दुर्ग - रोहतक, सिरसा और महम - तो महर्षि व्यास ने लिख ही दिये । इस प्रदेश में उस समय दश बड़े-बड़े दुर्ग (किले) थे जिनके कारण इसको दशार्ण कहा जाता था ।


पं० भगवद्दत जी "भारतवर्ष का इतिहास" में हरयाणे को दशार्ण शब्द का अपभ्रंश मानते हैं । वे लिखते हैं कि "दशार्ण, हरयाणा, रोहतक, हिसार, सिरसा आदि प्रदेशों को भी कभी दशार्ण कहते थे । इस दशार्ण शब्द का अपभ्रंश हरयाणा है । आक्रोश राजर्षि हरयाणे के दुर्ग का उस समय अधिपति होगा । दशार्ण कुरु सीमा के अत्यन्त समीप होना चाहिये" ।


वीरभूमि हरयाणा,पृष्ठान्त-38



समीक्षा - विराट पर्व में प्रधम अध्याय के १२-१३ वें श्‍लोक में इसका निम्नलिखित प्रमाण मिलता है -

सन्ति रम्या जनपदा बह्वन्ना: परित: कुरून् ।

पाञ्चालाश्चेदिमत्स्याष्च शूरसेना पटच्चराः ॥

दशार्णा नवराष्‍ट्राश्‍च मल्लाः शाल्वा युगन्धराः ।

कुन्तिराष्‍ट्रं च विपुलं सुराष्‍ट्रावन्तयस्तथा ॥


कुरु देश के चारों ओर बहुत से सुरम्य जनपद हैं जहाँ बहुत अन्न उत्पन्न होता है । पाञ्चाल, चेदि, मत्स्य, शूरसेन, पटच्चर, विशाल कुन्तीराष्ट्र, सौराष्ट्र तथा अवन्ती, ये इनके नाम हैं । यहाँ दशार्ण नाम इसी प्रदेश के लिये प्रयुक्त हुआ है ।


पाण्डव जिस समय विराट नगर को जा रहे थे उस समय का वर्णन करते हुये विराट पर्व के पंचम अध्याय में एत्तद् विषयक एक श्‍लोक दिया है -

उत्तरेण दशार्णांस्ते पाञ्चालान् दक्षिणेन च ।

अन्तरेण यकृल्लोमान् शूरसेनांश्‍च पाण्डवाः ॥


काम्यक वन को छोड़कर पाण्डव अज्ञातवास के लिये विराट नगरी (मत्स्य प्रदेश) को चले । मत्स्य प्रदेश के उत्तर में दशार्ण, दक्षिण में पाञ्चाल और बराबर में यकृल्लोम और शूरसेन प्रदेश हैं । यहाँ भी दशार्ण शब्द का प्रयोग हरयाणा प्रान्त के लिए ही हुआ है । इससे यह भी स्पष्‍ट हो जाता है


वीरभूमि हरयाणा,पृष्ठान्त-39



कि वर्तमान जयपुर से हरयाणा ठीक उत्तर में था । महाभारत के समय दो दशार्ण प्रदेश और थे । एक पूर्व में तथा एक पश्‍चिम में । पूर्व में दशार्ण वर्त्तमान छत्तीसगढ़ का एक भाग था । पश्‍चिम का दशार्ण विदिशा के चारों ओर था, वर्तमान भोपाल का प्रान्त भी उसी में सम्मिलित था । वहां पर दशार्ण नदी भी बहती है । ऋण का अर्थ दुर्गभूमि और जल है । अथवा जलयुक्त दुर्गभूमि को भी ऋण कहा गया है ।


प्रसिद्ध व्याकरण कैयट और हरदत्त आदि ने 'प्रदीप' और 'पदमञ्जरी' नामक पुस्तकों में लिखा है -


दशार्णशब्दो नदीविशेषस्य देशविशेषस्य च संज्ञा । (आ० प्र० ६-१-८९)


अर्थात् नदी विशेष वा देश विशेष का नाम दशार्ण है । सिद्ध हेम व्याकरण पृष्ठ २७ पर निम्न पाठ आता है - 'दश ऋणानि-जल दुर्गाणि यस्यां दशार्णवनदी' । इन प्रमाणों से स्पष्‍ट हो गया कि जिस प्रदेश वा नदी में दश जलयुक्त दुर्ग हों ऐसे प्रदेश वा नदी को दशार्ण कहते हैं ।


इस हरयाणे प्रदेश का दशार्ण नाम जलयुक्त दुर्गों वाली भूमि के कारण ही था । इसमें तो कोई सन्देह


वीरभूमि हरयाणा,पृष्ठान्त-40



नहीं कि हरयाणे का नाम अथवा इसके कुछ भाग का नाम महाभारत के समय दशार्ण था । किन्तु आगे चलकर दशार्ण से बिगड़कर हरयाणा बन गया, इसमें कोई विशेष प्रमाण वा सार नहीं दिखाई पड़ता ।


श्री जयचन्द्र जी विद्यालंकार हरियाणा या हरयाणक मध्यकाल का मानते हैं । किन्तु पं० भगवद्दत जी 'हरयाणक' शब्द को महाभारत युद्ध से पहले का होगा, ऐसा अनुमान करते हैं । वे लिखते हैं कि हिसार शब्द का अर्थ भी फारसी में दुर्ग है, और दशार्ण शब्द में भी ऋण शब्द का एक अर्थ दुर्ग भूमि ही है । अतः इस दृष्टि से रोहतक, महम, हिसार, सिरसा आदि महाभारत के समय दश विशाल दुर्ग इस प्रान्त में विद्यमान थे । इसी कारण इस दुर्ग भूमि का नाम दशार्ण था ।


भण्डारकर जी ने अपने एक लेख में हरिताना नाम का भी प्रयोग किया है । पं० भगवत् दत्त जी का अनुमान है कि जिस प्रकार राजस्थान में एक स्थान का नाम "पलिताना" है इसी प्रकार दशार्ण का नाम 'हरिताना' अथवा बिगड़कर हरियाणा बन गया होगा । किन्तु यह सब अनुमानमात्र ही है । इनकी सिद्धि के लिए कोई पुष्‍ट प्रमाण नहीं ।


वीरभूमि हरयाणा,पृष्ठान्त-41



११ - ग्यारहवां पक्ष (सार्थक वैदिक नाम "हरयाणा")

महाराज मनु ने अपनी स्मृति में लिखा है –

सर्वेषां तु नामानि कर्माणि च पृथक् पृथक् ।

वेदशब्देभ्य एवादौ पृथक् संस्थाश्‍च निर्ममे ॥

मनु० १।२१॥


अर्थात् सब के नाम तथा कर्म और संस्था अर्थात् सर्वविध कला-कौशल वेद शब्दों से ही सृष्टि के आदि में प्रसिद्ध हुये हैं । ऋषि महर्षि लोगों ने वैदिक शब्दों के द्वारा सबका नामकरण किया । इस प्रमाण के आधार पर हम कह सकते हैं कि 'हरयाणा' भी वैदिक नाम है जहाँ हरयाणा पद का वर्णन है वह वेदमन्त्र निम्नलिखित है –

ऋज्रमुक्षण्यायने रजतं हरयाणे ।

रथं युक्तमसनाम सुषामणि ॥

ऋग्वेद ८।२५।२२॥


अन्वयः - सुषामणि उक्षण्यायने हरयाणे रजतं युक्तं ऋज्रं रथम् असनाम ।


अर्थ - (सुषामणि) सब प्रकर के सुखों के दाता (उक्षण्यायने) महान् पुरुषों का भी आश्रय (हरयाणे) सब दुखों के हरने वाले उस प्रभु के आधीन (युक्तम्) हम सब इन्द्रियों से युक्त (रजतम्) सुन्दर (ऋज्रम्)


वीरभूमि हरयाणा,पृष्ठान्त-42



सुखदायक वेद धर्म पर चलने वाले (रथम्) इस देह-रथ को हम (असनाम) प्राप्‍त करें ।


द्वितीयोऽर्थः - (उक्षण्यायने) बलवान बैलों वा अश्वों से जाने योग्य (हरयाणे) हरणशील अश्वों या यानों से जाने योग्य (सुषामणि) उत्तम समभूमि युक्त मार्गों में (ऋज्रम्) वेग से चलने वाले (रजतं युक्तम्) सुन्दर अश्वों से युक्त (रथम्) रथ को (असनाम) हम प्राप्‍त करें ।


तृतीयोऽर्थः - (उक्षण्यायने) बड़े-बड़े लोकों के गमनस्थान (हरयाणे) एक दूसरे को हरण करने वाले - आकर्षणकर्त्ता सूर्य चन्द्र आदि रथों के निवास स्थान (सुषामणि) अत्यन्त रमणीय आकाश में मित्र और श्रेष्‍ठ जगदीश्‍वर के द्वारा (युक्तम्, ऋज्रम्, रजतं रथम्) युक्त किये हुये सुसज्जित तथा चन्द्र तारकावली रूपी रथ को हम प्रतिदिन रात्रि में भजते हैं ।


समीक्षा - इस मन्त्र के प्रथम अर्थ में हरयाणा शब्द का अर्थ सब दुःखों के हरने वाला प्रभु किया है । जिस प्रदेश में कोई दुःख न हो, सर्वत्र प्रजा सुखपूर्वक रहती हो, वह प्रदेश सुखधाम होने से 'हरयाणा' कहलाता है ।


वीरभूमि हरयाणा,पृष्ठान्त-43



उक्त मन्त्र के द्वितीय अर्थ में 'हरयाणा' शब्द का अर्थ - 'हरयाणः-हरमाणयानः' इस यास्काचार्य के निर्वचन के अनुसार हरणशील अश्‍वों या यानों से जाने योग्य किया है । मैदानों की अधिकता से जहाँ रथ आदि यान सुविधा से विहरण कर सकें वह क्षेत्र हरयाणा कहलाता है ।


उल्लिखित मन्त्र के तृतीय अर्थ में 'हरयाण' शब्द का अर्थ आकर्षण कर्त्ता किया है । जो प्रदेश धन-धान्य से पूर्ण हो, वह सब के आकर्षण का कारण बन जाता है । जो धन-धान्य से पूरित हो, वह सब के मन का हरण करता ही है । अतः इस प्रकार के प्रदेश को भी हरयाणा कहेंगे ।


हमारे पूर्वजों ने "हरयाणा" यह वैदिक नाम यथा गुण तथा नाम रखा है । यह पाठकगण आगे इस पुस्तक में स्थान-स्थान पर अध्ययन करेंगे ।


१२ - बारहवां पक्ष (ऐतिहासिक सार्थक नाम हरयाणा)

इस प्रदेश का हरयाणा नाम ऐतिहासिक है । शिवजी के अनेक नाम हैं । उनमें से एक प्रसिद्ध नाम 'हर' है । इसी 'हर' के नाम के कारण ही इस प्रदेश का नाम 'हरयाणा' पड़ा ।


वीरभूमि हरयाणा,पृष्ठान्त-44



समीक्षा - इसकी पुष्‍टि के लिए जो युक्तियां और प्रमाण दिये जाते हैं, उनसे यही सिद्ध होता है कि यह पूर्णतया सत्य ही है । यह स्थान हर और हर के पुत्रों के साथ विशेष सम्बन्ध रखता है । इसके लिये इतिहास साक्षी है । ऐतिहासिक दृष्‍टि से 'हरयाणा' शब्द का अर्थ जब तक पाठक भली भांति न समझ लें तब तक इस विषय में और कुछ लिखना उपयुक्त नहीं होगा ।



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