Wadala

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Daska on map of Sialkot

Wadala (वडाला) is the name of a city and tahsil in Sialkot district in Pakistan.

Jat Gotras

History

Sindhu descendant Mokal founded village in his name, 10 miles south of Daska. Several generations later Gajju founded village Wadala, 3 miles east of Mokal. [1]


Ram Sarup Joon[2] writes ....Sindhu Chiefs Of Wadala: Sardar Mokal Singh, leader of this dynasty, founded the village of Mokal near Daska. After several generations Chaudhary Durga Das was appointed Chaudhary on behalf of the Moghuls. Later Sardar Mahtab Singh occupied 82 villages due to the weakness of the Mughal emperor. He was a member of Bhangi Misal.

जाट इतिहास:ठाकुर देशराज

वडाला: कहा जाता है इस वंश का संस्थापक गजनी से आया था। आजकल इस वंश के लोग मंझा में बसे हुए हैं। लाहौर, अमृतसर में भी बहुत से सिन्धू गांव हैं और गुरुदासपुर में भी बहुत से हैं। गुजरानवाला में 90 गांव हैं, स्यालकोट में 50 और थोड़े से गुजरात में हैं। इससे आगे उत्तर में यह वंश नहीं पाया जाता है। जिला अमृतसर के तरन तारन परगना में आकर सिन्धू पहले बस गया। उसके मरने के कई वर्ष बाद उसका वंशज मोकल स्यालकोट चला आया, जहां पर डस्का के पास उसने एक गांव अपने नाम से बसाया। कुछ पीढ़ियों के बाद उसके वंशजों में से एक ने जिसका कि नाम गजू था, मोचल के पास ही एक दूसरा गांव बसाया, जिसका नाम उसने अपने खानदान में सबसे बड़ा होने के कारण वडाला रक्खा (पंजाबी भाषा में वडा बड़े को कहते हैं)। मुगल शासन-काल में इस वंश का दुर्गामल नामक व्यक्ति पड़ौसी गांवों का चौधरी नियुक्त हुआ। यह पद वंशानुगत था और कुछ समय के बाद इस पद का अधिकारी दुर्गामल का नाती हुआ जिसने कि सिख-धर्म स्वीकार कर लिया था। दीवानसिंह ने मरते समय तक मुगल राज्य से मित्रता रक्खी और अपनी सेवाओं के कारण उपहार-स्वरूप अपने इलाका के तीन गांवों के प्रधान-पद के अधिकार को प्राप्त किया।

इन्होंने अपने पीछे एक पुत्र छोड़ा जिसने इस वंश के इतिहास को नया रूप दे दिया। अपने पिता की मृत्यु के थोड़े ही दिन बाद, सरदार महताबसिंह ने देखा कि मुगल-वंश का सितारा लुप्त होता जा रहा है, अतः इन्होंने अपने लिये एक नया मार्ग ग्रहण करने के लिये इरादा कर लिया। इन्होंने 52 गांवों की उगाही को अपने


जाट इतिहास:ठाकुर देशराज, पृष्ठान्त-543


चार्ज में लेकर वडाला में अपनी स्थिति को शक्तिशाली करने का कार्य शुरू किया। उन्होंने शीघ्र ही मालूम किया कि वह अकेले ही इस कार्य को सम्पन्न नहीं कर सकते। अतः उन्होंने भंगी मिसल के बड़े सरदार गंडासिंह और झंडासिंह के यहां स्वयं तथा अपने साथियों को लेकर नौकरी कर ली।

उन्हें अपने गांवों की उगाही का तो अधिकार दे दिया गया, किन्तु उन्हें इसके लिए अपने मालिकों को थोड़ी सी फौजी मदद देना आवश्यक था। इसी समय में उनके तीसरे पुत्र सुलतानसिंह ने सरदार भागसिंह मलोदा के एक रिश्तेदार की पुत्री से शादी कर ली। इस रिश्तेदारी की ताकत से वह शीघ्रता से अपनी शक्ति बढ़ाने लगे। यह देखकर महासिंह उत्तेजित हो गये और उन्होंने गुजरानवाला की घरू पंचायत में बुलाया। यह 500 आदमियों को साथ में लेकर के बड़ी शान-शौकत से वहां गये। लेकिन दूसरे ही दिन उस समय की रिवाज के अनुसार वह गिरफ्तार कर लिए गए और कैद कर दिए गए। एक बड़ी फौज वडाला जीतने के लिए भेजी गई। किन्तु इनके चारों पुत्रों ने बड़ी बहादुरी से मुकाबिला किया और थोड़ा सा युद्ध होने के पश्चात् राजीनामा हो गया, जिसके कि अनुसार 125000) जुर्माना देने पर वे अपने बाप को मुक्त करा सकें। चूंकि कुल रुपया एकदम ही नहीं दिया जा सकता था, अतः सुलतानसिंह को जिसकी कि शादी भी इस उपद्रव का एक कारण थी, जमानत के लिए रक्खा गया। महासिंह की मृत्यु के बाद शेष जुर्माना अदा न करने की चेष्टा की गई, किन्तु सफलता न मिली। सुलतानसिंह को कुल जुर्माना ही वसूल हो जाने पर बरी किया गया।

इससे पहले श्यामसिंह और नधनसिंह में कुछ मनमुटाव हो गया था, और उनके पिता की मृत्यु के बाद उनकी शक्ति से दबा हुआ झगड़ा प्रत्यक्ष में शुरू हो गया। उनके पड़ौसियों ने इससे लाभ उठाया। नधनसिंह, हेतू और अहलवालियां ने वडाला रियासत को दबाना शुरू किया। उसी समय रणजीतसिंह ने इस जिले पर धावा किया और सन् 1809 में डस्का के पास नधनसिंह को परास्त किया। उन्हें वडाला और मोचल दोनों ही नधनसिंह के अधिकार में मिले थे। नधनसिंह काशमीर को भाग गया और श्यामसिंह का सबसे बड़ा पुत्र टेकसिंह भी उसके साथ चला गया और वडाला खड़गसिंह को दे दिया गया। दोनों चचा-भतीजे काशमीर के गवर्नर अतामुहम्मदखां के यहां नौकर हो गये। किन्तु पुराने खानदानी झगड़े अभी बन्द नहीं हुए थे।

जब अतामुहम्मदखां ने दोस्तमुहम्मदखां के काबुल आने के निमंत्रण को अस्वीकार कर दिया और इस प्रकार काश्मीर पर अमीर का अधिपत्य मंजूर न किया तो अमीर काबुल ने सिखों की सहायता से उसे ठीक करने के लिए चढ़ाई की। सन् 1813 में इन्हें सफलता मिल गई जब कि दीवान मौहकमचन्द और फतेहखां ने अतामुहम्मदखां को काशमीर से भगा दिया था। इस पर टेकसिंह अपने


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खानदान के उन लोगों के साथ जो कि इसके साथ यहां आये थे, दीवान के पास गया और उसके साथ ही लाहौर लौट आया। यहां पर उसे महाराज ने होशियारपुर जिले में 3 गावों के प्रधान पद के अधिकार दे दिये। उन्होंने अपने छोटे भाई को इस जागीर की देखभाल के लिए मुकर्रर कर दिया और स्वयं अटक में काम करने चले गये। उस समय से अपनी मृत्यु सन् 1844 तक वह लगातार खालसा की सेवा में रहे। टेकसिंह की सेवाओं के बदले में उसके चचाओं को पहली खानदानी रियासत के थोड़े से भाग पर अधिकार दे दिया गया, जहां पर कि वे स्यालकोट जिले में रणजीतसिंह का शासन स्थापित होने के थोड़े ही समय पश्चात् पहुंच गए। इनमें से न तो किसी आदमी ने ही और न उनके बच्चों ने ही लगातार के अशान्ति के समय में बागियों के साथ प्रत्यक्ष भाग लिया।

सन् 1830 में सरदार फतेहसिंह होशियारपुर में मर गए और कोई सन्तान न छोड़ गए। अतः जागीर के गांवों के प्रबन्ध के लिए किशनसिंह अधिकारी हुए। सन् 1862 में उनकी मृत्यु हो जाने पर यह जागीर अंग्रेजी सरकार ने अपने राज्य में मिला ली। किन्तु इस कुटुम्ब के पास अब भी इस जिले में कुछ जमीन है।

सरदारसिंह अपने ज्येष्ठ भ्राता के समान सिपाही थे और बाड़ा घुड़ चढ़ा में नौकर थे। किन्तु इन्हें टेकसिंह के समान ख्याति प्राप्त न हुई। यह सन् 1881 में मर गए। ज्वालासिंह और मोहनसिंह अपने बाप के पास थे और वहीं काशमीर में मोहनसिंह का देहान्त हो गया।

जनरल मिहांसिंह ने जो फौज में गवर्नर थे, ज्वालासिंह के लिए प्रबन्ध कर दिया। जब गवर्नर को उन्हीं की फौजों द्वारा कत्ल कर दिया गया तो ज्वालासिंह मुश्किल से अपनी जान बचाकर भाग पाया। जो फौज गदर को दबाने के लिए भेजी गई थी, वह उसमें शामिल हो गया और जब शान्ति स्थापित हो गई तो इन्होंने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया और वडाला को लौट आया और वहां पर अपनी वंशानुगत निजी जायदाद की देखभाल करता रहा। द्वितीय सिख युद्ध के समय गदर में शामिल हो जाने के कारण उनकी यह जायदाद जब्त कर ली गई। सन् 1883 में ज्वालासिंह मर गए और 5 वर्ष का एक लड़का छोड़ गए।

मोहनसिंह को 10 साल की उम्र में ही शेरदिल रेजीमेण्ट में कमीशन मंजूर कर दिया गया। उसमें वे सन् 1855 तक नौकरी करते रहे और फिर 20) माहवारी की पेन्शन पर रिटायर हो गए। मेरठ में गदर शुरू होने पर उन्होंने अंग्रेज सरकार की सेवा की और ये सूबेदार तथा बन्दा-मिलिट्री पुलिस के वर्दी मेजर बनाए गए। गदर के समय में बहादुरी दिखाकर इन्होंने ख्याति प्राप्त की और बागियों से स्वयं युद्ध करने में दो बार बहुत ही ज्यादा घायल हो गए थे। इसके उपलक्ष में उन्हें 120) की पेन्शन और मोचल में दो कुओं का अधिकार मंजूर किया गया।


जाट इतिहास:ठाकुर देशराज, पृष्ठान्त-545


साहबसिंह के मर जाने पर गवर्नमेण्ट ने उनकी जागीर के तीन चौथाई हिस्से को जब्त कर लिया, शेष एक चौथाई भाग उनके दो पुत्रों में बंट गया।

इनमें से मंगलसिंह ने सरकारी नौकरी करना तो मंजूर नहीं किया, किन्तु हमेशा जिले के अफसरों को सहायता देता रहा। सन् 1882 में इसका देहान्त हो गया। इसके दोनों पुत्र फौज में भर्ती हो गये। गोपालसिंह बारहवीं बंगाल कैवेलरी का जमादार था और सुन्दरसिंह, रिसालदार तथा अठारहवीं तिवाना लैंसर्स में वर्दी मेजर था। सरदार का दूसरा पुत्र प्रसिद्ध व्यक्ति था। जब मई सन् 1857 में गदर शुरू हुआ तो डिप्टी कमिश्नर के बुलाने पर यह 200 आदमी लेकर स्यालकोट आया और पुलिस का सूबेदार नियुक्त कर दिया गया और स्यालकोट में एक महीने तक अपने आदमियों को शिक्षा दिलाने के बाद और अधिकतर उनको देहली रवाना करने के पश्चात्, वह और रंगरूट भर्ती करने के लिये वडाला लौट आया। जब उसने 9 जौलाई के छावनी के गदर का हाल सुना तो वह अकेला ही स्यालकोट रवाना हो गया और कुछ कठिनता के साथ किले में पहुंच गया। यह लैफ्टीनेण्ट मैक-महोन के साथ भी कोचाक को गये और वहां अशान्त गांवों का निरीक्षण करने में बड़ी सहायता की। इसके एक साल बाद वह अवध मिलिट्री पुलिस में भर्ती हो गये और सन् 1861 में इसके टूट जाने पर यह पंजाब में पुलिस के इन्स्पेक्टर नियुक्त किए गये। सन् 1937 में यह अन्दमान के लिये असिस्टेण्ट सुपरेण्टेण्डेण्ट की मुकर्ररी के लिये चुने गये। सन् 1844 में वह एक अच्छी पेन्शन पर वापस आ गये और एक साल पहले वायसराय द्वारा उन्हें रायबहादुरी का खिताब भी मिला। यह प्रान्तीय दरबारी भी थे, इन्हें 220 एकड़ की खानदानी जागीर वडाला में और 280 एकड़ की लाहौर जिले में रखपैमार स्थान पर दी गई। 1200) माहवारी की पेन्शन तथा गुजरानवाला जिले में 500 एकड़ की जागीर भी मिली। सन् 1908 में इनका देहान्त हो गया।

Vadala Dynasty of Punjab.JPG

सन् 1874 में सरदार का बड़ा पुत्र ठाकुरसिंह अन्दमान में नौकरी पर नियुक्त हो गया और अपने बाप के लौट आने पर पुलिस का इन्स्पेक्टर बना दिया गया। सन् 1880 में घोड़े से गिरकर इसका देहान्त हो गया। इनके दो बेटे थे, जिनमें से बड़ा सोहनसिंह पांचवीं पंजाब कैवेलरी में रिसलदार था और अन्त में अतिरिक्त सहायक कमिश्चर तथा पंजाब सरकार का मीर मुंशी हो गया। सन् 1908 में इसका छोटा भाई तीस लैन्सर्स में रिसलदार था। रायबहादुर बघेलसिंह के पुत्र हाकिमसिंह को अठारहवीं बंगाल-कैवेलरी के लिये डाइरेक्ट कमीशन मंजूर किया गया और उसी फौज में अन्तिम अफगान-युद्ध तक काम करता रहा। बाद में वह बर्मा में पुलिस बटालियन के सूबेदार बना दिए गये और वहां से पेन्शन पर वापस आ गये। वह आनरेरी मजिस्ट्रेट और सिविल जज थे और अपने बाप की मृत्यु के बाद इस खानदान के प्रधान माने गये।


जाट इतिहास:ठाकुर देशराज, पृष्ठान्त-546-547


Notable persons

Population

External links

References


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