किस का मीडिया ?

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किस का मीडिया

पत्रकार की आजादी नागरिक के मौलिक व नैसर्गिक अभिव्यक्ति के अधिकार से आती है। भारत के संविधान ने इसे लिखित में स्वीकारा है। अखबार उस आजादी यानी नागरिक के अपने अभिव्यक्ति के नैसर्गिक अधिकार का औजार है, एक जरिया है। उसकी ताकत का स्रोत यह नगरिकों का अधिकार है; इसीलिए उसकी शक्ति है। किन्तु है उधार की! इसे पत्रकार और पत्रकार जगत अक्सर याद रख कर नहीं चलता है। इस अधिकार की यह त्रासदी है कि जिनका अधिकार है उनके अधिसंख्यक हिस्से के पास औजार रखने के साधन नहीं हैं जिनके पास माध्यम यानी औजार को रखने की ताकत है जनता के इस अधिकार को धनवान कब्जे में रख कर इस आजादी की बदौलत समाज को अपने स्वार्थ में नाथने का काम करते हैं। अर्थ हुआ नागरिकों को अधिकार की स्वीकारोक्ति भी मिली और हाथ से छीन भी ली! भारत के संविधान और व्यवहार का यह विरोधाभास है।

आज के भारत की बुनगत का हिसाब लगा कर देखा जाए तो आबादी का बहुत बड़ा अंश यहां लगभग 80 प्रतिशत ऐसे लोगों का है जिन्हें दो वक्त की रोटी के लिए 12 से 14 घंटे खटना होता है। जब हम यह कहते हैं तो हमारे हिसाब में परिवार की इकाई है। इतनी बड़़ी संख्या कोे समय ही नहीं कि चल रही धटनाओं की तह में जा कर झांक सके कि सच क्या है। इनमें बहुत बडी संख्या अनाक्षर या अर्धाक्षर ज्ञानी हैं। आबादी का वह भाग पत्रकारों द्वारा परोसे गये ‘तथ्यों’ को पढ-सुन कर स्याना बनता है। जबकि पत्रकार स्वयं मामलों की खोजबीन करने की हालत में ही नहीं हैं। यानी अक्सर मामलों में झूठ का व्यापार चलता है जिसे ‘‘अंधता का उद्योग’’ भी कहा गया है। फिर, भारत के पत्रकार जगत का एक दूसरा पहलू भी है।

पत्रकारों का समूह रूप मीडिया है जिसे मालिक हाँकते हैं। इसमें वह पत्रकार वैभव पाता है जो पत्रकारिता के दर्जे, उसकी ताकत को अपने समग्र अथवा वर्गीय हितों को दरकिनार करके मालिकों-सेठों के हितों को आगे बढाने में अच्छे तरीके से इस्तेमाल करने की काबलियत हासिल करता है। इसकी अनेक मिसाल हैं -अरुण शौरी, बलबीर पुंज, एम.जे. अकबर, तवलीन सिंह, शेखर गुप्ताओं की यहां भरीपूरी जमात है। ऐसे प्राप्त वैभव के धनी पत्रकारों की पराई चमक से नींचे स्तर पर बहुत मित्र चौंधिाये घूमते हैं और न इधर के रहते हैं न उधर इतनी जगह है कि इन्हें भी दमक हासिल हो। अधिकतर विभिन्न हितों की खातिर जारी होने वाली विज्ञप्तियों के पत्रकार सुनी-सुनाई समझदारी के ज्ञान को परोसने वाले पुर्जे बनते हैं। खाप के प्रश्न पर ऐसी पत्रकारिता की त्रासदी ही सामने आई है।

प्रेम विवाह, सैक्स की स्वतन्त्रता, महिला उत्पीडन तो हरिजन उत्पीडन जैसे सवालों में पत्रकारिता उलझी खड़ी हैं जहां न घटनाओं की छानबीन है न परख। जब सी. पी. एम. पार्टी के जनसंगठनों की संख्या को जनता के रुप में पत्रकार पेश करता है तो इन्हें हित विशेष का साक्षी पेश न करके जनता का प्रतिनिधि रूप दे बैठता है। इससे समाज को होने वाले घाटे का हिसाब पत्रकार नही ंतो कौन लगायेगा? दी हिंदू अखबार की एक पत्रकार ने मनोज-बबली कांड पर निचली अदालत के फैसले को अपनी किताब का आधार बनाया जबकि मामला उच्च अदालत में अपील पर था। खाप को निशाना बनाया। उक्त किताब को पढने से लगता है कि खाप को निशाना बनाने के लिए ही किताब लिखी गयी है! इसे एक नामचीन प्रकाशक ने छापा। पत्रकार ने नाम भी कमाया और सम्भवतः पैसा भी। पुस्तक में अभियोजन पक्ष की कहानी व सी.पी.एम पार्टी के कार्ड होल्डर तथा हिमायतियों को छोड़ कर पूरा समाज दायरे से बाहर रख कर मामले को पेश किया गया है। सम्भव है स्वयं पत्रकार महोदया नारीवाद की स्वयं हिमयती रही हो। जब लेखिका पक्षधर अथवा घोषित एक पक्ष की हिमायती है तो वह पत्रकार कैसे हुई? हित विशेष की पत्रकार तो बनी किन्तु वह समाज की पत्रकार होने का रुतबा नहीं ले सकी। न यह पुस्तक मामले को समझने में मदद करती है, न अपराधियों को चिन्हत करने में सहायक है। तब पत्रकारिता का यह कौन उदाहरण है जिसपर तालियां बजाई जाएं? धोखापट्टी का नाम पत्रकारिता नहीं हो सकता है। सम्भवत ये लोग ग्रामीण आंचल में सामंती अवशेषों को समाप्त करके पूंजी के विकास की लड़ाई के योद्धा हैं और बतौर संस्था परिवार को दफा करके पितृसत्ता को परास्त कऱने में मस्त हैं!

एक ताजा मिसाल देखियेः 11 दिसम्बर 2014 को लोक सभा में एक प्रश्न का विधिमन्त्री ने उत्तर दिया जिसमें उडीसा से सदस्य प्रश्नकर्त्ता ने एक सन्दर्भ में कहीं खाप का शब्द भी प्रयोग कर दिया। मन्त्री ने सहज सा जवाब दे दिया जिसमें लोक सभा के रिकार्ड के अनुसार खाप के बारे में कहीं कोई उल्लेख नहीं हुआ है। किन्तु, अगले दिन के लगभग सभी अखबारों में खाप का शिकार करने निकले किन्हीं करामाती पत्रकारों/मालिकों के चलतेे विधिमन्त्री की ओर से ‘‘खाप गैर-संवैधानिक व गैर-कानूनी घोषित’’ होने का एक समान समाचार इतनी प्रमुखता से छपा कि लोग हैरान रह गये!

यह सही है कि विभिन्न हितों में ख्ंडित देश में, जैसा हमारा देश है वहां किसी के लिए पक्षधर न होना कैसे सम्भव हो सकता है? तब, पत्रकार भी उसी अनुरूप पक्षधर हैं, कोई समझ कर, कोई अनजाने। ऐसे में स्वीकार हो कि पत्रकार जगत सामान्यत धनी तबके का पक्षधर है, क्योंकि उनके रहम पर रोटी मिलती है। यदि पत्रकारिता कोरा व्यवसाय है तब नागरिकों के नैसर्गिक अधिकार का प्रयोग करके ताकत पाने का औचित्य नहीं बचता है, न उनका अधिकार है। यह तब बनता जब पत्रकारिता निष्पक्ष हो व निजी अथवा ग्रप हित का व्यवसाय न हो, अन्यथा नहीं। स्थिति का यही विरोधाभास है जो मामले को जटिल बनाता है। आज का सच यह है कि जाने-अनजाने पत्रकार जगत सामान्यत धनवान तबके के हितों की खातिर खाप के विरुद्ध अभियान का अंग बना खड़ा हैं। इससे पत्रकारिता की साख को बट्टा लगा है, विश्वास टूटा है। जनहित का पक्षधर पत्रकार इस जाल से मात्र सचेतन प्रयास से निकलने की स्थिति बना कर सफल हो सकता है।