ग्रामीण भारत, खाप व गोत्र

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खाप के सवाल पर अब तक सिद्धान्त के सन्दर्भ में चर्चा हुई है ताकि ग्रामीण भारत की जीवनशैली को दकियानूसी, पिछड़ेपन, देश विरोधी तथा विकास विरोधी संस्था कह कर गाली देने वालों या नासमझी में गलतफहमी के शिकार बंधुओं के सामने इतिहास का पन्ना खोल कर रखा जाए। आजादी के बाद देश में चालू चुनावी व्यक्तिमुखी प्रणाली से संक्रमण में खाप पर चिपकी कमजोरयिों के छोड़ कर विचार करें तो खाप कोई नफरत के लायक संस्था नहीं है, बल्कि बहुसंख्यक लोगों की जीवनशैली है। ठीक से समझे तो यह भागीदार लोकतन्त्र की सबसे विकसित प्रणाली है जिसपर नाज किया जाना चाहिए। सम्भत संसार में ऐसा विकसित रूप कहीं नहीं उपलब्ध है। एक समय 1917 के इंकलाब से पहले व बाद में प्रचलित सोवियत प्रणली से भी कहीं अधिक उन्नत। फिर भी हम जानते है कि जिनके हित पूंजी समेटने वाली चालबाजियों से रंगे हुए हैं वे खाप को लांछित करके लोगों में भ्रम रचना करते रहेंगे। नम्र निवेदन इतना है कि शक्ति के दुरुपयोग से समाज का अहित करते समय ध्यान रखें कि दूसरे भी बराबर के इंसान हैं। उनकी गैरत को न ललकारें।

किन्तु, हम अब 21वीं सदी में जी रहे हैं और सिद्धान्तों की दुनियां पर कालिख पोतने वाले बेसब्र हैं। उन्हें जल्दीं भी है। सोचने-सझने का समय वे छोड़ना नहीं चाहते। उनकी कारस्तानियों से अब तक समाज को बहुत हानि उठानी पड़ी है। दुनियां में लगभग चार सौ साल से जिस शहरी सभ्यता की गंदगी का साम्राज्य चलता आ रहा है उसका बीते 67 साल से भारत पर भी दुष्प्रभाव बहुत तेजी के साथ फैला है। ग्रामीण आंचल शहरी तामझाम और जीवनशैली के जहरीले प्रभाव से अछूता नहीं रह सका है।

चालाकी यह हुई कि शिक्षा को रोजगार के साथ बांध दिया गया। इसके चलते ग्रामीण घर-परिवार के बच्चे पढाई के लिए उनकी आत्मघाती सभ्यता के दरवाजे पर पहुंचते हैं जिससे ये कीटाणुओं को लेकर आते हैं। ंघर-परिवार टूटन की दहलीज पर पहुंच गये हैं। ग्रामीण आंचल के आदमी/औरत को भी उसी तरह व्यक्तिमुखी बना दिया है, निजी स्वार्थ से आगे न सोचने की प्रवृति यहां भी बढी है। सत्ता-राजनीति का चस्का और राज का पिच्छलग्गु बन कर काम निकालने की मानसिकता ने इन्हें भी सरमायेदारों की दहलीज पर नाक रगडना सिखा दिया है। सरकार के साथ लग कर ताकत पाने की हवस बढी है ताकि स्वार्थ-सिद्धि की राह खुले। इसके लिए खाप का दुरुपयोग होने लगा है। ताकत समाज हित के लिए प्रयोग होने की बात पीछे जा पड़ी है। रोग फैला है, फैलाने वाले लोग खुश हैं। उनकी इसी से सधती है। पुरानी पीढी दुखी है। रोग की जड़ पकड़ने में कमी से बचाव का काम धीमी गति का है। किन्तु ये व्यति की कमजोरियां हैं, खाप प्रक्रिया इसकी दोषी नहीं है जिसे नफरत की जाए।

आजादी के बाद की इस अवधि में अनेक पीढियां चली गयीं। इससे पहले अंग्रेजों के राज्य ने यहां की सभ्यता को पलटने का पूरा प्रबंध किया ही था। परिणाम है कि स्वयं देहात में निवास करने वाले बहुत लोग अब अपने इन सिद्धान्तों को भूलने लगे हैं जो ग्रामण जीवन को रस देते थे। यह याद नहीं रहा कि इन सिद्धान्तों पर अमल करते रहने से ही एक समय भारत खास बना था।

खेद की बात है कि आज के देहात और स्वयं उसकी जीवनपद्धति पर पराये लक्षणों का प्रभाव रंग जमाने लगा है। खाप प्रणाली में बहुत कमजोरियां इसी कारण आ बैठी हैं। इनसे मुक्त होना बड़ी चुनौती है। जानते हैं इन कमजोरियों का लाभ जिन्हें मिलेगा वे ग्रामीण जीवन के हिमायती कतई नहीं हैं। शहरी सभ्यता असल में कोई जीने लायक सभ्यता नहीं है, वह औद्योगिक व व्यापारिक हितों के मुताबिक रहने सहने की प्रणाली है जहां मनुष्यता का मेल नहीं बैठता है। देहात व उसकी जीवनशैली एवं सिद्धान्तों पर पलने वाली सभ्यता को इस शक्तिशाली एवं मोहक विष से खतरा है। शहरों में रोजगार व धंधा पीटने के वास्ते ग्रामीण आंचल के मजबूर लोग भी रहते हैं। वे एक दुविधा के बीच झूलने वाले प्राणी हैं जिन्हें दोनों पद्धतियों के बीच फर्क को समझ कर जीना सीखना चाहिए। शहरी शैली के मोह में फंस कर पीढियों के भविष्य पर अंधेरा न छाने दें तभी बचेंगे। धंधे की मजबूरी में शहरी निवास के रहते भी ग्रामीण शैली से जिया जा सके तो बेहतर विकल्प है। यह एक सचेत संघर्ष की मांग करता है।

चर्चा के मूल बिंदु पर कहना उचित होगा कि ग्रामीण जीवनपद्धति पर पराये असर को मुक्त करके ही आगे बढा जा सकेगा। इनमें एक कमजोरी खाप पर स्थाई चौधरी बैठाने की है। एक बार हो गयी गलती को सुधारना भी आसान नहीं रहता है, यह ठीक है। किन्तु रोग से मुक्ति पाना ही जीवन है। इसमें खाप पर जमें चौधरियों को सहमत कराने का काम होना चाहिए तभी खाप की ताकत लौटेगी और सब को फायदा रहेगा। यह अभियान चलना चाहिए।

दूसरा पहलू खाप व गोत्र खाप में भेद को समझने का है। किसी खास बिरादरी की खाप जब मामलों पर विचार करे तो बात स्पष्ट होनी चाहिए कि यह गोत्र खाप यानी बिरादरी विशेष की खाप का मामला है। खाप सब को साथ लेकर भाईचारे के सम्बंधित गांवों कीे बनती है और सही में जनसमर्थन प्राप्त वही शक्तिशाली पद्धति होगी जिसे अधिक जीवन्त करना चाहिए। खाप पद्धति पर देश का चित्र बने तो बेमतलब के बहुत झगड़े तो अपने आप समाप्त होगें जैसे भाषाई भेद, क्षेत्रीय असन्तुलन, जिला और प्रान्तों में बंटवारे की मांग आदि आदि। सही मायने में तभी यहां लोकतन्त्र पनपने की स्थिति बन सकेगी। बिरादरियां मिलवर्तन का आधार हैं, रहनी चाहिएं। ये बंटवारे का कारण नहीं हैं, न रहनी चाहिएं। आपसी मिलवर्तन से सब की ताकत बढती है। जहां कहीं इनमें भेद है उसे मिलकर हल किया जा सकता है। वर्तमान में तरह तरह की फैली कलह से यह कहीं आसान रास्ता है। बशर्ते खाप प्रक्रिया को समझने का ईमानदार प्रयास हो और इनके प्रति बेवजह की नफरत से मुक्त होंकर विचार हो। बिरादरियों में कलह का आजकल बड़ा कारण चुनाव बन गये हैं। चुनाव राज की लडाई है समाज को ताकत देना इसका न काम है, न ऐसा वह होगा। समाज की ताकत समाज के भीतर है जिसे सचेत लोग मिल कर बचा सकते हैं। चुनाव की दौड़ में शामिल लोग अपने मकसद के लिए अलग अलग जातिगत जत्थेबंदी करते हैं, एक दूसरे के विरुद्ध नफरत फैला कर अपना काम साधते है जिससे बिरादरी को कुछ लाभ नहीं पहुंचता। यह राज वालों की लडाई है। खाप का इस चुनावगत राजनीति से कोई सम्बंध नहीं है। न होना चाहिए। जहां होगा, वहीं घाटा होगा क्योंकि यह दूसरे किस्म का खेल है जो राजनीतिक दलों का धंधा है।