स्ंविधान का पलटा चेहरा व ग्रामीण भारत

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संविधान का पलटा चेहरा

यह निर्विवाद है कि भारत का संविधान कोई सार्वभौम दस्तावेज नहीं है। ऐसा दावा किसी का नहीं रहा। सब मानते है कि यह अंग्रेजों द्वारा भारत पर अपना लुटेरा शासन रखने की खातिर सन् 1935 के बने कानून का विस्तृत रूप है। इसके अलावा कुछ दूसरे देशों की नकल भी इसमें रख ली गयी है। इसे लिखने वाले लोग भी अधिकतर अंग्रेजियत के धनी लोग थे। आजाद देश की जनता को बेवकूफ बनाने के वास्ते इसमें थोथेबाजी का अधिक सहारा लिया गया जिसका कुछ अर्थ नहीं निकला। ब्रिटिश संसद द्वारा भारत को आजादी देने की शर्तों कों लेकर बनाए ‘इंडिया इंडिपेण्डैस एक्ट-1947 की सीमाबंदी इस संविधान की खासियत है। यह आम जानकारी में है कि भारत को अनेक शर्त के साथ आजादी देने पर सहमति बनी थी जिनका समावेश संविधान में जगह जगह हुआ था। सन् 1949 की 26 नवम्बर को पास हुए संविधान में इन शर्तों के बखूबी दर्शन हो जाते हैं। यह बगावती आजादी न होकर समझौते की आजादी थी। इसका अर्थ यही है कि अंग्रेजों द्वारा अपने हितों को बचाने वाली शर्त इसमें थीं। संविधान सभा में अनेक सदस्यों ने इस तथ्य को माना है। नवम्बर 1948 में संविधान पर आपत्तियों की बौछार हुई उससे इसके मौलिक चरित्र पर सवाल उठे। भारत के स्वतन्त्रता आन्दोलन की इच्छाओं का जिक्र हुआ जिसकी झलक के लिए सदस्य तरसते दिखे। नौबत यहां तक आई कि अन्तिम क्षणों में भी इनके दशर्न संविधान में नहीं दिखने पर विरोध को शांत करने के लिए नेताओं को कहना पड़ा कि समयाभाव के चलते जो नहीं हो सका वह बाद में होगा। विरोध इस स्तर का था।

एक बात अदालतों के दायरें को समझने वाली है। अदालतों की सीमा है। उन्हें तो लिखे को परिभाषित करने का काम दिया गया है, लोगों की आकांक्षाओं के अनुरूप लिखने या संविधान बदलने का काम अदालतों का नहीं है। यह काम संसद को करना था या फिर संविधान सभा गठित होती। इसलिए किसी अनुच्छेद अथवा प्रावधान पर अदालती निर्णय को बाइबल की लिखत नहीं माना जा सकता है। यह काम नेताओं के जिम्मे था कि उस समय किए गये वायदों पर अमल होता, नहीं हुआ। मौलिक बात यह है। पहली संविधान सभा का गठन ब्रिटिश संसद द्वारा पारित कानून के दायरें में हुआ था। एक आजाद देश अपने लिए नयी संविधान सभा क्यों नहीं गठित कर सकता था? कारण था शर्त पर मिलने वाली आजादी। अब मामला अधिक पेचीदा बन गया है जब भारत की चुनाव प्रणाली व संसद का चरित्र ही पक्षपाती है जिस पर सेठियागिरी का रूप छा चुका है।

जे हो, 1949 में पारित भारत के संविधान में उस जमाने के दार्शनिक दबावों की झलक भी समाहित है। उसमें समता की बात है। पंथ निर्पेक्षता का उल्लेख है जो यहां की विविधता को स्वीकरता है। साफ लिखा है कि सरकार इस तरह काम करेगी कि उससे संसाधनों का जमावड़ा चंद हाथों में न हो सके। सरकार देश की स्वत़न्त्रता को बचा कर रखेगी। किसी दूसरी ताकत के दबाव में काम नहीं करेगी, न दबाव में अपने कानून बदलेगी या बनायेगी। आजादी का यही मतलब हो सकता है। लेकिन, हुआ क्या है?

स्वयं सरकार के आंकड़े मानते हैं कि उसकी नीतियों के तहत यहां संसाधनों का जमाव चंद हाथों में हुआ है, गैर-बराबरी बझी है। ऐसा क्यों हुआ, कोई जवाब है? प्रशासन द्वारा नीतियां बनाने के लिए टपका परिकल्पना किस लिए हुई, उसका संविधान के अनुच्छेद 38 व 39 से क्या मेल है? फिर, 1994 में विश्व व्यापार की संधि पर चुनी हुई जनप्रतिनिधि संसद को अंधेरे में रखने का क्या अर्थ होता है? और अब उसी संधि का हवाला देकर अमेरिका जैसे दूसरे देशों के दबाव में कानून बनाने या उनके कहने पर कानून बदलने का क्या अर्थ लिया जाए? इसे आजाद देश की तरह का व्यवहार तो कहा ही नहीं जा सकता है जब चंद सेठों के हितों की खातिर यहां की आम जनता को अभाव में जीने को मजबूर किया गया है।

परमाणु शक्ति पर अमेरिका के साथ सन् 2005 के समझौते में देनदारी के सवाल पर सरकार अब संसद द्वारा अपने कानून को ढीला करने की कसरत को किस तर्क पर जायज बता रही है? भोपाल गैस त्रासदी पर किस दबाव में सरकार ने अमेरिका के हितों को प्राथमिकता दी और क्यों? क्या यह सब संविधान के अनुकूल किया है? आजादी के बाद सरकारों ने जमीन की हदबंदी की। लेकिन, कारखानों व व्यापार के धन पर सीमाबंदी करते हुए उसे लकवा क्यों मार गया और संविधान में बराबरी के उल्लेखित लेख का क्या हुआ? खेती-किसानी में काम के बदले हकदारी में उद्योगें में काम की हकदारी के मुकाबले गैर-बराबरी को कोई कैसे बयान करेगा? जरा समझा दें, कृपा होगी। यह भी संविधान में बराबरी की बात के बावजूद जिसके जरिये खेती किसानी को खोखला करने का कर्म समपन्न किया गया है जबकि धन्ना सेठों की देशभक्ति मात्र सार्वजनिक धन की वर्षा करने पर ही जागती है। प्रोत्साहन के बिना लूटा गया या चोरी किया गया पैसा वे देश में लगाने के लिए कभी तैयार ही नहीं होते हैं। ऐसा नहीं है तो भारत की जनता से खसोटा गया धन ये सेठ बाहर के देशों में किस लिए लगा रहे हैं जबकि देश की सरकार विदेशों से धन को बुलाने पर पसीना बहाते नहीं थक रही है? कृषि पैदावार की कीमत पर तब सरकार द्वारा पाबंदी जायज कैसे हो जाती है! एक को प्रोत्साहन दूसरें को दण्डित करने की चाल बराबरी के संवैधानिक सिद्धान्त पर कैसे जायज है? या यह कहा जाए कि संविधान में सब लिखा शासको की अपनी सहूलियत के अनुसार अमल हेतु दर्ज है!! यदि ऐसा है, जो असल में हो भी रहा है तो सरकार के चरित्र को जनता हितैषी कैसे स्वीकार किया जा सकता है जबतक कोई स्याना अम्बानी जैसों को जनता न बताता हो।

विश्व स्तर के हवाई अड्डे किसी फत्तू के लिए तो बन नहीं रहे हैं जबकि टैक्स की भरपाई तो भिक्षा में प्राप्त रोटी के टुकडे पर फत्तू को भी करनी पड़ती है। फत्तू से लूटो और अम्बानी जैसों को मालामाल करने की कौनसी बराबरी का पाठ देश को पढाया जा रहा है, जरा बतायें? यह सब संविधान के कैसे अनुकूल बैठता है? यह सब बराबरी का सबक संविधान में लिखा धरा है। खाप को गैर-संवैधानिक बताने वाले अपने गिरेबां में झांक लें तो बेहतर होगा जबकि खाप तो संविधान से बहुत पहले की परिपाटी है जिसे संविधान ने भी कभी गैर संवैधानिक कहने का प्रयत्न नहीं किया। उल्ट, संविधान विविधतों को मान्यता देता है कि किसी समुदाय पर किसी दूसरे समुदाय की परिपाटी नहीं थौंपी जायेगी।