Bhakt Phool Singh

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Bhakt Phool Singh

Bhakt Phool Singh (1885-1942) was a Jat saint of Gathwal (Malik) Gotra from Mahra Sonipat village in Sonipat district of Haryana. A Women's University has been established in Khanpur Kalan village in Sonipat district Haryana in his name.

अमर हुतात्मा भक्त फूल सिंह

हरयाणा में नारीशिक्षा के प्रचार प्रसार का श्रेय भक्त फूल सिंह को जाता है । उनका जन्म जिला सोनीपत के ग्राम माहरा में सन 1885 में हुआ । आपके पिता एक साधारण किसान थे । आठ वर्ष की अवस्था में आपको पास के गाँव में प्रारम्भिक शिक्षा के लिए भेजा । बाल्यकाल से ही आपमें सेवाभाव, सरलता, सदाचार, और निर्भयता आदि के गुण थे । शिक्षा के बाद आप पटवारी बने । समाज सेवा की धुन सिर पर स्वर थी , अतः नौकरी से त्यागपत्र दे दिया । अब आप सारा समय आर्यसमाज के प्रचार प्रसार में लगाने लगे । आपने त्यागपत्र देने के बाद एक बड़ी पंचायत बुलवाई और उसमे रिश्वत की सारी राशि लौटा दी ।

कन्याओ की शिक्षा में योगदान

भक्त जी कन्याओ की शिक्षा के लिए विशेष चिंतित थे , अतः 1936 में खानपुर के जंगल में कन्या गुरुकुल की स्थापना की । इस गुरुकुल में आज अनेक विभाग हैं जैसे - कन्या गुरुकुल , डिग्री कॉलेज , आयुर्वेदिक कॉलेज, बी-एड आदि । सन 1937-38 में लाहौर में कसाईखाना बंद करने में आपका प्रमुख योगदान था । हैदराबाद रियासत के आर्यसत्याग्रह में आपने ७०० सत्याग्रही हैदराबाद भेजे ।

जिला हिसार के मोठ नामक स्थान के चमार बंधुओ ने कुआं बनवाना आरम्भ किया । मुसलमानों ने इसका विरोध किया । मोठ के चमार बंधु निराश होकर भक्त जी के पास आये और अपनी कष्ट भरी गाथा सुनाई । भक्त जी ने उन्हें कुआं बनवाने का आश्वासन दिया और 1 सितबर 1940 को मोठ पहुँच गए । उन्होंने लगातार तीन दिनों तक गाँव के मुसलमानों को समझाया । मुसलमानों पर उनकी बातों का कुछ भी प्रभाव नहीं पडा । भक्त जी ने आमरण अनशन शुरू कर दिया और कहा "कुआं बनने पर ही अन्नग्रहण करूँगा, अन्यथा यहीं प्राण त्याग दूंगा ।" मुसलमानों ने भक्त जी को तीन चार दिन बाद उठा कर जंगल में फेंक दिया । भक्त जी बच गए और पुनः 23 दिन के उपवास के बाद उन्हें अपने कार्य में सफलता मिल गई । कुआं बना और चमार बंधुओं की पानी की समस्या हल हो गई ।

विश्व वंद्य महात्मा गांधी जी ने उपरोक्त घटना के विषय में जब सूना तो बहुत प्रसन्न हुए और भक्त जी से मिलने की इच्छा प्रकट की । भक्त जी दिल्ली आये और बापू से लगभग डेढ़ घंटे तक वार्तालाप चला । बापू ने भक्त जी से कहा, "आप आर्यसमाज को छोड़कर मेरे कार्यक्रम के अनुसार कार्य कीजिये । समय-समय पर मैं आपको यथाशक्ति मदद देता रहूँगा , इससे आप देश की अधिक सेवा कर सकेंगे ।" भक्त जी ने निश्छल भाव से कहा -" महात्मा जी मैं आपकी सब आज्ञाओं को मानने को तैयार हूँ परन्तु आर्यसमाज को नहीं छोड़ सकता क्योंकि ऋषि दयानंद और आर्यसमाज तो मेरे रोम रोम में राम चुके हैं ।"

देहांत

भक्त जी ने सामाजिक कुरीतियों को मिटाने के लिए कई बार आमरण अनशन किये और अपनी पत्रिक संपत्ति तक बेच कर सामजिक कार्यों में लगा दी । 14 अगस्त 1942 को चार धर्मांध मुसलमानों ने गोली मारकर हत्या कर दी । ऐसे त्यागी, कर्मनिष्ठ और सर्वत्यागी संत को शत-शत नमन !!

महिला विश्वविद्यालय की स्थापना

भक्त फूलसिंह के नाम पर हरियाणा के सोनीपत जिले के खानपुर गांव में महिला विश्वविद्यालय की स्थापना की गई है - http://bpswomenuniversity.ac.in/

भक्त फूलसिंह: दलीप सिंह अहलावत

दलीप सिंह अहलावत[1] लिखते हैं:

भक्त फूलसिंह का जन्म 24 फरवरी सन् 1885 ई० को जिला सोनीपत के ग्राम माहरा (जूआं) में चौ० बाबर गठवाला मलिक जाट के घर हुआ। आपकी माता का नाम तारादेवी था। आपने जूआं स्कूल से चौथी श्रेणी तथा खरखौदा से आठवीं श्रेणी उत्तीर्ण की। 20 वर्ष की आयु में आपका विवाह धूपांदेवी नामक सुशील कन्या से हुआ। सन् 1908 के लगभग आप पानीपत नगर में पटवारी लगे। वहां पर पं० ब्रह्मानन्द जी से, आर्यसमाज के उत्सव में, यज्ञोपवीत ले लिया। सन् 1914 ई० में आपने लोगों से ली गई रिश्वत लौटाने का दृढ़ निश्चय किया। आपने पटवार का काम 1918 ई० में छोड़ दिया और आर्यसमाज के कार्यों को अपने जीवन का लक्ष्य बनाया। पटवार काल में प्राप्त रिश्वत लगभग पांच हजार रुपये थी। भक्त जी ने अपनी सम्पूर्ण पैतृक भूमि बेचकर एक बड़ी पंचायत करके यह रुपये लोगों को लौटा दिए।

भक्त फूलसिंह जी के महान् कार्य निम्न प्रकार से हैं -

  • 1. लगभग सन् 1916 ई० ग्राम संभालका (जि० करनाल) में हत्था खुलने का निश्चय हुआ। पता लगने पर भक्त जी ने बड़ी संख्या में लोगों को साथ लेकर हत्था रोकने के लिए चढ़ाई कर दी। करनाल के डिप्टी कमिश्नर को विवश होकर कहना पड़ा कि “यहां गोवध नहीं होगा।”
  • 2. सन् 1937-38 में लाहौर में पचास लाख रुपये से पंजाब गवर्नमेंट द्वारा खुलने वाले प्रसिद्ध हत्थे को बन्द करवाने में भक्त जी महाराज का विशेष हाथ रहा था।
  • 3. आपने 23 मार्च 1920 ई० को गुरुकुल भैंसवाल की स्थापना की जिसकी आधारशिला

जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-278


स्वामी श्रद्धानन्द जी ने रखी। अब तक यह संस्था यथाशक्ति आर्यसमाज व वैदिक-धर्म की सेवा कर रही है।
  • 4. आपने कन्या गुरुकुल खानपुर की स्थापना सन् 1936 ई० में की जिसका संचालन आपकी पुत्री श्रीमती सुभाषिणी देवी कर रही है।
  • 5. भक्त जी ने लोगों की आर्थिक दशा सुधारने के लिए विवाह आदि अवसरों पर फिजूलखर्ची को रोकने के लिए सन् 1925 में ग्राम गांधरा (जि० रोहतक) में हरयाणा प्रांत की सब खापों की एक बड़ी भारी पंचायत बुलवाई। इस अवसर पर बहुत से उपयोगी प्रस्ताव पास करवाये।
  • 6. सन् 1928 ई० में भक्त जी को यह पता चला कि होडल और पलवल के कुछ मूळे जाट पुनः शुद्ध होना चाहते हैं तो वहां पहुंच गये। इस शुद्धि के उपरान्त बेटी और रोटी के सम्बन्ध में जाटों की एक पंचायत बुलाई। इस काम में एक जेलदार बाधा डालता रहा, जेलदार को उचित मार्ग पर लाने के लिए आपने ग्यारह दिन का उपवास रखा। अन्त में चौ० छोटूराम के आश्वासन पर आपने अपना अनशन व्रत समाप्त किया।
  • 7. सन् 1929 के जून में आपने रायपुर ग्राम के केहरीसिंह नामक एक मूळा जाट को शुद्ध करके वैदिक धर्मी बनाया। [Matindu|मटिण्डू]] के श्री हरद्वारीसिंह ने अपनी लड़की का विवाह केहरीसिंह से कर दिया। इस विवाह में भाती बनने का कार्य भक्त फूलसिंह जी ने किया।
  • 8. ग्राम मोठ (जि० हिसार) के चमारों का कुंआ मुसलमान रांघड़ों ने बनता-बनता बन्द करवा दिया। यह सूचना मिलने पर आपने आमरण अनशन व्रत कर दिया। अर्थात् “कुंआ बनने पर ही उसका पानी पीकर व्रत खोलूंगा अन्यथा यहीं प्राण त्याग दूँगा।” ईश्वर की कृपा से 23 दिन के उपवास के बाद आप अपने कार्य में सफल हुए।
  • 9. 31 जनवरी 1939 से आरम्भ होकर 17 अगस्त 1939 में समाप्त होने वाले हैदराबाद सत्याग्रह में हरयाणा के आर्य भाइयों ने अपना अमिट योगदान दिया। इसका विशेष श्रेय भक्त जी महाराज की कार्यकुशलता व प्रभाव को समझना चाहिये।
  • 10. लोहारू काण्ड - सन् 1941 ई० में आर्यसमाज के उत्सव पर भक्त फूलसिंह जी, स्वामी स्वतन्त्रानन्द जी के साथ लोहारू पहुंचे। आर्यसमाज के जलूस पर मुसलमानों ने आक्रमण कर दिया। इस आक्रमण में भक्त जी को गहरी चोटें आईं और वे मूर्च्छित हो गये।

इस प्रकार हम देखते हैं कि भक्त फूलसिंह जी ने अपना सारा जीवन आर्यसमाज की सेवा में अर्पित कर दिया।

बलिदान - मुसलमान आपके शुद्धि कार्य से अप्रसन्न थे और सदा आपको मारने की ताक में रहते थे। 14 अगस्त 1942 ई० को श्रावण सुदी द्वितीया को रात के साढ़े नौ बजे पांच मुसलमान घातक, सैनिकों का वेष धारण करके भक्त जी के कालरूप में आये। उस रात भक्त जी कन्या गुरुकुल खानपुर में ही विश्राम कर रहे थे। नराधमों ने बैट्री की प्रकाश करके भक्त जी पर पिस्तौल के तीन फायर किये, जिससे आप वीरगति को प्राप्त हुए। मृत्यु के समय मुख से ओ३म् ही निकला। आपका नाम सदा अमर रहेगा। आप पर जाट जाति एवं भारतवासियों को गर्व है।

External Links

References

  1. जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठ.278-279

जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-279


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