Maharaja Baldeo Singh

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Maharaja Baldeo Singh

Maharaja Baldeo Singh (1823 - 1825) (महाराजा बलदेव सिंह, भरतपुर) was the ruler of princely state Bharatpur and successor of Maharaja Randhir Singh after his death in 1823. Maharaja Randhir Singh had no son. As per rule his brother Maharaja Baldeo Singh ascended the throne after death of his brother Maharaja Randhir Singh in 1823.

Family disputes

Maharani Laxmi, the Rani of Maharaja Randhir Singh, was not happy with Baldeo Singh, so she went to Brindavan and took with her the keys of fort as well. She died there soon and this settled the dispute. Mean while his younger brother’s sons Durjansal and Madho Singh rebelled against Baldeo Sngh. Due to these family disputes Baldeo Singh called Sir David Acturloni and made his son Balwant Singh as his successor in his presence. After this Baldeo Singh died on 26 February 1825.

British won Bharatpur

Soon, there developed the family dispute between Durjansal and Madho Singh. Madho Singh went to Deeg and started organizing army. Charles Metcalf took advantage of this situation and declared attack on the Bharatpur fort. The British forces under the leadership of Lord Cambalmiyar reached Bharatpur on 10 December 1825. War started on 23 December 1825. The British forces won the impregnable fort of Bharatpur.

Due to this family dispute, Britishers captured 60 iron-guns and 73 brass-guns. After Bharatpur victory, The British ruled over entire Rajputana.

Maharaja Baldeo Singh died on 26 February 1825. The successor of Baldeo Singh was his son Maharaja Balwant Singh.

महाराज बलदेवसिंह

ठाकुर देशराज लिखते हैं कि महाराज रणधीरसिंह निःसंतान मरे थे। इसलिए नियम के अनुसार उनके भाई बलदेवसिंह राजा बनाए गए। किन्तु रानी ‘लक्ष्मी’ जो कि महाराज रणधीरसिंह की महारानी थी, इनसे नाराज थीं, वे किले की कुंजियों को लेकर वृन्दावन चली गई। वहीं उनका स्वर्गवास हो गया। इस तरह देवर-भाभी का यह झगड़ा तो शांत हो गया, किन्तु उनके छोटे भाई राव लक्ष्मणसिंह के पुत्र दुर्जनसाल और माधौसिंह उपद्रव पर उतारू हो गए। उन्होंने एक दिन तो महाराज बलदेवसिंह पर जवाहर बुर्ज में आक्रमण कर दिया। उनके स्थान को तोड़ डाला। किन्तु माधौसिंह को पकड़ लिया गया और झगड़ा बढ़ने नहीं पाया। इस घटना के बाद महाराज को सन्देह हो गया कि मेरे पश्चात् यह मेरे पुत्र बलवंतसिंह को अवश्य हानि पहुंचाएंगे। इसलिए उन्होंने सर डेविड अक्टरलोनी को बुलाकर बालक बलवंतसिंह को स्वत्वाधिकारी स्वीकार करा दिया। इसके कुछ दिन ही बाद 26 फरवरी 1825 ई. को बलदेवे सिंह जी का स्वर्गवास हो गया। उनके स्वर्गवास के पश्चात् वही हुआ, जिसकी कि उन्हें आशंका थी। दुर्जनसाल और उसके पुत्र जगतसिंह ने सेना को अपनी ओर मिला लिया। माधौसिंह जो कि अब तक कैद में था, उसे कैद से छुड़ा लिया और बालक महाराज बलवन्तसिंह और मांजी अमृतकुवरि को कैद कर लिया। राज्य पर दुर्जनसाल और माधौसिंह ने कब्जा तो कर लिया, किन्तु अनेक सरदार उनके विद्वेषी और बालक बलवन्तसिंह के पक्षपाती थे। अक्टरलोनी के स्थान पर मुकर्रिर हुए।

थोड़े दिन ही बाद माधौंसिंह और दुर्जनसाल में भी अनबन हो गई। माधौसिंह डीग में जाकर सेना-संगठन करने लगा। परिस्थिति अनुकूल देखकर सर चार्ल्स मेटकाफ ने भरतपुर पर चढाई करने की घोषणा जारी की। 10 दिसम्बर सन् 1825 को अंग्रेजी सेनाएं लार्ड केम्बलमियर की अध्यक्षता में भरतपुर पहुंच गई। 23 दिसम्बर से लड़ाई आरम्भ हो गई। 5 जनवरी सन 1826 तक भरतपुर पर गोले बरसाए जाते रहे। कई बार किले पर धावा किया गया। कई बार किले में घुसने की चेष्टा की गई। 18 जनवरी तक यही होता रहा। इस युद्ध में अंग्रेजी-सेना के 61 अंग्रेज, 41 देशी सिपाही मारे गए और 282 अंग्रेज, 183 हिन्दुस्तानी घायल हुए।

इस गृह-कलह के कारण 60 लोहे की तोपें और 73 पीतल की तोपें भरतपुर


जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठान्त-669


की अंग्रेजों के हाथ लगीं। अजेय दुर्ग भरतपुर केम्बलमियर ने जीत लिया। यह बात भरतपुर के इतिहास में लिखी गई। केवल गृह-कलह से ही ऐसा हुआ। भरतपुर विजय के बाद अंग्रेजो की धाक समस्त राजपूताने पर बैठ गई।

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References

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