Mandu Jat

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Mandu Jat (मांडू जाट) founded Mandawa village. He first established a dhani (helmet) and dug a well here, which was completed on savan badi 5 samvat 1797 (1740 AD) [1]. Initially this place was known as ‘Mandu ki dhani’, ‘Mandu ka bas’ or ‘Manduwas’ which changed to ‘Manduwa’, ‘Mandwa’ and finally ‘Mandawa’. [2]

मंडावा का इतिहास

रतन लाल मिश्र लिखते हैं कि शार्दुल सिंह का एक अन्य पुत्र नवल सिंह था. इसने झुंझुनू से दक्षिण की और २४ मील दूर रोहिली नामक स्थान पर गढ़ बनाकर एक गाँव बसाया जिसे नवलगढ़ नाम दिया गया. यह बात विक्रम संवत माघ शुक्ल २, १७९४ की है. इसने गंगवाने की लडाई में भाग लिया था. इसने अनेकों लड़ाइयों में भाग लिया जिनमें बहल, सिहाणी एवं ढूंढ मुख्य हैं. विक्रम संवत १८१२ में इसने मांडू जाट की बस्ती में एक गढ़ बनाकर गाँव बसाया तथा उसे मंडावा नाम दिया गया. [3] मंडावा नगर शेखावतों के आने से पहले बस गया था. यह बात मंडावे के बाइयों के मंदिर के नाम से विख्यात देवालय के विद्वान संत वृजदास जी की बही के उल्लेख से पता लगता है. उस समय इसका नाम मांडवा या मांडवी था. नगर में भागचंद के लड़िये, गोयनके और हरलालके बस गए थे. बही में १३ रुपये ११ आने मांडू जाट की कूई की नाल के चक हेतु चैत बदी ८ विक्रम संवत १७८८ की तिथि लिखी है. इससे ज्ञात होता है कि संवत १७८८ तक मांडू जाट की कच्ची कुई विद्यमान थी और मांडू ने इस स्थान को काफी वर्षों पहले बसाया था. [4]

References

  1. Shekhawati Bodh, A monthly magazine of Shekhawati region, Mandawa special issue, July 2005
  2. Dr. Raghavendra Singh Manohar:Rajasthan Ke Prachin Nagar Aur Kasbe, 2010,p. 217
  3. रतन लाल मिश्र:शेखावाटी का नवीन इतिहास, कुटीर प्रकाशन मंडावा, १९९८, पृ. १७१
  4. रतन लाल मिश्र:शेखावाटी का नवीन इतिहास, कुटीर प्रकाशन मंडावा, १९९८, पृ. १८३

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