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जाट की चतुराई

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एक ब्राह्मण, एक क्षत्रिय और एक नाई तीनों कहीं जा रहे थे। सफर लंबा था। रास्ते में तीनों को भूख ने सताया और चने का फला हुआ एक खेत भी इनकी दृष्टि में आया। तीनों ने सोचा कि प्रथम तो इस समय इस जंगल में कोई है नहीं, जो हम लोगों को इस खेत में चने उखाड़ते हुए देख ले; दूसरे, यदि कोई देख भी लेगा, तो हम उससे कह देंगे कि भाई जी, हमने भूख के कारण थोड़े-थोड़े चने उखाड़े हैं।

वह खेत एक जाट का था और दोपहर का समय था। जाट जी ने सोचा कि दोपहर का समय है, चलो, एक चक्कर खेत की ओर ही लगा आएँ कि जिससे कोई नुकसान न करे। जाट जी कंधे पर कुल्हाड़ा रख खेत की ओर चल पड़े। वहाँ जाकर क्या देखते हैं कि उनके खेत में तीन जवान चने उखाड़ रहे हैं। जाट ने सोचा कि अगर मैं एकाएक इन तीनों को कुछ कहता हूँ, तो प्रथम तो यह जगंल है, यहाँ कोई है भी नहीं; दूसरे, मैं अकेला और ये तीन हैं, इसलिए युक्ति से काम लेना चाहिए। अतः जाट दी ने तीनों के पास जाकर सबसे पहले ब्राह्मण महाराज से पूछा, ‘‘आप कौन हैं ?’’ उन्होंने उत्तर दिया, ‘‘हम ब्राह्मण हैं।’’ तब जाट जी ने कहा, ‘‘ महाराज, आप तो परमेश्वर की देह हैं, आपने बड़ी दया की, भला आप काहे कभी हमारे खेत में आते। धन्य हो महाराज, हमारा तो खेत पवित्र हो गया। यदि आपको और दो-चार गट्ठे चनों की आवश्यकता हो, तो उखाड़ लीजिए। आपका ही तो खेत है।’’ इसके पश्चात् जाट जी ने क्षत्रिय से पूछा, ‘‘आप कौन हैं ? उन्होंने कहा, ‘‘हम तो क्षत्रिय हैं।’’ जाट जी बोले, ‘‘धन्य हो महाराज कुँवर जी, आपने तो हमारे ऊपर बड़ी दया की। भला आप कभी हमारे खेत में काहे को आते। संयोग की बात है। आपको यदि और दो-चार गट्ठे चनों की आवश्यकता हो, तो घोड़े वगैरह के लिए उखड़वा लीजिए। आपका ही तो खेत है।’’ इसके पश्चात् जाट जी ने नाई से पूछा, ‘‘आप कौन हैं ?’’ वह बोला, ‘‘मैं तो आपका हज्जाम हूँ।’’ जाट जी बोले, ‘‘भला अगर इन ब्राह्मण जी ने चने उखाड़े ? तो यह हमारे पूजनीय ठहरे और कभी कथा-वार्ता सुना देते, कभी ब्याह-काज ही करा देते और कुँवर जी ने उखाड़े तो यह तो हमारे राजा ठहरे और फिर कभी हम लोगों पर आमदनी ही में दया करते, हमारी रक्षा करते, पर तूने साले चने क्यों उखाड़े गधे के खाए, न पाप में, न पुण्य में।’’ ऐसा कह जाट जी ने नाई को खूब पीटा। अब ब्राह्मण और क्षत्रिय बोले, ‘‘अच्छा हुआ, जो यह नव्वा पिट गया। यह कुछ बदनाम भी था। इस साले को जब कभी घर से बाल बनवाने को बुलाओ तो घंटों नहीं निकलता। चलो, आज ठीक हो गया।’’ उधर नाई सोचने लगा कि मैं पिट गया और ये बच गए। ये लोग जाकर गांव में कहेंगे कि देखो, नव्वा पिट गया। परमेश्वर, कहीं इन दोनों के भी दो-दो हाथ लग जाते, तो ठीक हो जाता। जब नाई पिट-पिटा के कुछ दूर गया, तो जाट जी बोले, ‘‘क्यों कुँवर जी, खेत क्या मुफ्त में तैयार हुआ था ? ब्राह्मण जी ने उखाड़े, तो वह तो हमारे पूजनीय ठहरे, पर आपने चने क्यों उखाड़े ?’’ ऐसा कह जाट जी ने इनकी भी खबर ली और लाठी मार-मार के शरीर लाल कर दिया। अब तो ब्राह्मण जी बोले, ‘‘अच्छा हुआ। यह भी बड़ा टर्रबाज था। कभी सीधा बोलता ही न था। हमेशा अकड़ के चलता था। आज सारी अकड़ निकल गई।’’ उधर क्षत्रिय मन में सोचने लगा कि देखो, हम पिट गए, पर यह ब्राह्मण बच गया। यह गाँव में जाकर कहेगा कि नाई और क्षत्रिय दोनों पिटे। परमेश्वर, यदि यह भी पिट जाता तो ठीक हो जाता। इस प्रकार जब कुँवर जी पिट-कुटकर चले और कुछ दूर पहुँचे, तब जाट जी पूजनीय की पूजा हेतु उनकी ओर मुखातिब हुए और ब्राह्मण से कहा, ‘‘क्यों महाराज, यह खेत ऐसे ही तैयार हो गया था ? इसमें मेहनत नहीं करनी पड़ी थी ? क्या आप संस्कारों या कथा-वथा में अपने टके छोड़ देते हैं ? अरे भाई, ये चने क्यों उखाड़े ?’’ यह कहकर जाट ने उनकी भी मरम्मत कर दी।

अब आप लोग नतीजा निकालें कि अगर ये तीनों आपस में न फूटते, तो कोई भी न पिटता-फूटे तो पिटे। मित्रों, ठीक यही हमारी, आपकी, सबकी हालत है। क्या आपको उन लोगों पर अफसोस नहीं, जो आपस में हमेशा अंगुल-अंगुल जगह पर, एक-एक पनाले पर और एक-एक खूँटे पर निष्प्रयोजन रात-दिन वैर-विरोध किया करते हैं ? जाट की चतुराई यहां गौर करने योग्य है।


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