Bhai Gurbaksh Singh

From Jatland Wiki
Jump to: navigation, search

Bhai Gurbaksh Singh was great grand-father of Bhai Lal Singh who was son of Desu Singh of Bidar - Jat clan and one of the Punjab Chiefs of Kaithal. Kaithal town and district headquater is now in Haryana.

The Kythal family

The Kythal family was of so much importance in the Cis-Satlej States, and their history is so closely connected with that of Pattiala, that a sketch of it is essential here. The genealogy of the family is as follows :—

The genealogy of the Kythal family

The Kythal family have the same origin as the Phulkian. Gurbaksh Singh, the founder of the Chiefship, was the son of Bhai Ramdyal, who had a great reputation as a saint. The son was a fine soldier and an able man, but he had little of the saint about him, and thought more of annexing territory than of religion. He was a great friend of Raja Ala Singh of Pattiala, and they made many expeditions together, and he helped the Raja out of more than one difficulty. The possessions of Gurbuksh Singh were divided among his sons ; but they soon increased them. Desu Singh captured Kythal from some Afghans, Bhikh Baksh Khan and Nihmat Khan, and, with his brother Budha Singh, seized Thanesar, though the town and fort were afterwards taken from them by Sirdar Bhanga Singh, the fiercest and most feared of all the Cis-Satlej chiefs. When Desu Singh died in 1781, Lal Singh was in confinement as a rebel against his father, and Behal Singh, the elder son, did all he could to keep his brother in prison ; but he contrived to escape, killed his elder brother and took possession all the estates of his father, which he much enlarged by new acquisition. Lal Singh was, at the time of the British advance northwards, in 1809, the most powerful Cis-Satlej Chief, after the Raja of Pattiala. He was a very' able man, though utterly untrustworthy, and so violent and unscrupulous that the English authorities had the greatest difficulty in persuading him to maintain


[Page-52]: anything like order. In 1819, the Government allowed him to succeed to the share of the estate held by Mai Bhagbari, the widow of his first cousin Karam Singh. Partab Singh the elder son and then the younger son, Udai succeeded, but on the death of the latter without issue in 1843, the whole of the Kythal estate lapsed to Government, with the exception of that portion which had been acquired by the founder of the family, Bhai Gurbuksh Singh, and to which the collaterals of the Arnowli branch were permitted to succeed.

Thakur Deshraj writes

कैथल का भाई खानदान

जिस समय सिख-धर्म के प्रवर्तक गुरुनानक (1469 – 1539) इस संसार से विदा हो गए तो उनके बाद अंगदजी गुरु हुए। अंगदजी के पश्चात् अमरदास और फिर रामदास गुरु की श्रेष्ठ पदवी से विभूषित हुए। जिस समय गुरु रामदास जी को गद्दी दी गई थी, उस समय गद्दी देते हुए अमरदासजी ने रामदासजी से एक कार्य करने के लिए कहा था। वह कार्य यह था कि तुंग, सुल्तान पिंड और गुमटाला नामक गांवों के बीच में कई कोस का एक जंगल था। उस जंगल में एक बहुत पुराना तालाब था किन्तु वह मिट्टी से भरा हुआ था। गुरुजी उसे खुदवाकर फिर से जलाशय बनाना चाहते थे। गुरु अमरदासजी रामदासजी को लेकर उस स्थान पर पहुंचे भी। चूंकि वह जगह जाटों की सम्मिलित भूमि थी, इसलिए गुरुजी ने आस-पास के मुख्य-मुख्य जाटों को बुलवाकर उस भूमि को मांगा। जाटों ने जब सुना कि गुरुजी इस स्थान पर निरन्तर पानी रखने वाला तालाब खुदवाना चाहते हैं तो उन्होंने वह जमीन गुरुजी को दे दी। जगह मिलने पर आषाढ़ संवत् 1929 (? 1629) वि० को उस स्थान पर गुरु रामदासजी के हाथ से एक नगर और सरोवर की बुनियाद डलवाई।

उस समय गुरु लोगों की कोई भारी शक्ति न थी। वे अपने उपदेशों से अपना सम्प्रदाय बढ़ाया करते थे। रामदासजी के भी आस-पास अनेक हिन्दू और विशेषतया जाट शिष्य हो गए। इन्हें जाट शिष्यों में एक भाई भगतू थे। यह बिड़ार-वंशी जाट थे। इनके पिता का नाम ओम् था। भगतूजी इतने ईश्वर-भक्त और गुरु-भक्त थे कि लोग उनके असली नाम को भूल गए और वे भगतू के नाम से ही मशहूर हो गए। रामदासजी इस चिन्ता में थे कि तालाब किस भांति खुदे। उनके पास कोई साधन न था। ओम् गुरुजी की इस चिन्ता से दुःखी हुए, किन्तु वह भी कोई वैभव सम्पन्न व्यक्ति न थे। हां, उनके पास साहस था इसलिए वह स्वयं


जाट इतिहास:ठाकुर देशराज, पृष्ठान्त-510


कैथल का किला

तालाब खोदने में लग गए। और भी कुछ मनुष्य तालाब की खुदाई करते थे किन्तु वे मजदूरी लेते थे। ओम् धार्मिक कृत्य समझकर खोदते थे। गुरु रामदासजी ओम् की भक्ति से बहुत प्रसन्न हुए और आशीर्वाद दिया कि तेरा पुत्र बड़ा प्रतापी होगा। दैवयोग से बात ऐसी ही हुई। ओम् के सुपुत्र भगतू के नाम से आज सारा पंजाब परिचित है।

गुरु रामदासजी की मृत्यु के पश्चात् गुरु अर्जुन गद्दी पर विराजे। भगतू ने सिख धर्म की और गुरुजी की बहुत सेवाएं कीं। समस्त सिख भगतू को श्रद्धा की दृष्टि से देखते हैं। भगतू के सम्बन्ध में एक बड़ी विचित्र बात कही जाती है। गुरु हरिराम ने इनसे कहा कि तुम मेरे ही सामने शरीर छोड़ दो। भगतू ने यह बात मान ली और करतारपुर में जो कि इलाका जालन्धर में है, पृथ्वी में समा गया। कुछ काल बाद गुरु हरीराम उधर से फिर गुजरे। भगतू की समाधि के पास आकर कहने लगे कि ऐ सिख वीर भगतू! हमें दर्शन दे। भगतू गुरु की इस बात को सुनकर समाधि में से जिन्दा निकल आए। गुरुजी से वार्तालाप करने के बाद फिर समाधि में समा गए। गुरु ने आशीर्वाद दिया कि तुम्हारी संतान के लोग वैभवशाली और राजा होंगे।

भगतू का खानदान भाई के नाम से भी मशहूर है। इसका कारण यह बताया जाता है कि गुरु अर्जुन ने भगतू की भक्ति से प्रसन्न होकर भाई की उपाधि दी। भगतू के दो बेटे हुए - संतदास और गोरा

संतदास, जिसका कि दूसरा नाम जीवनसिंह भी था, की औलाद के लोग भटिण्डा की ओर चले गये और वहां जाकर उन्होंने राज्य स्थापित कर लिया।

गोरा की संतान के लोगों ने कैथल और दूनोली के परगने को अपने कब्जे में कर लिया और राजा बन बैठे।

गोरा के महासिंह, किशनसिंह, माईदास और दयालसिंह नाम के चार पुत्र हुए। जिसमें किशनसिंह, महासिंह की संतान के लोग भटिंडा की ओर चले गए और माईदास निःसन्तान मर गए।

भाई दयालसिंह के छः पुत्र हुए। उनके सुक्खासिंह, धनसिंह, गुरुदाससिंह, देसूसिंह, बुद्धासिंह और बख्तसिंह नाम रखे गये थे।

सुक्खासिंह के दो पुत्र हुए - विसावासिंह और गुरुदत्तसिंह।

उनसे छोटे भाई धनसिंह के कर्मसिंह और चड़तसिंह नामक पुत्र हुए।

लालसिंह और सुजानसिंह नाम के दो पुत्र देसूसिंह के हुए।

बुद्धासिंह के कोई संतान न थी। बख्तसिंह के दालसिंह नाम का एक ही पुत्र हुआ।

कैथल पर अधिकार देसूसिंह की संतान का था। लालसिंह उनका बड़ा पुत्र कैथल का राजा था। उसके राज्य की आमदनी चार लाख थी।

सुक्खासिंह के पुत्र विसावासिंह के पास भी बीस गांव थे।

लालसिंह के दो पुत्र हुए - उदैसिंह और प्रतापसिंह। दोनों ही निःसन्तान मर गये। लालसिंह की मृत्यु संवत् 1901 विक्रमी अर्थात् 1846 ई० में हो गई। इस समय तक महाराज रणजीतसिंह पंजाब


जाट इतिहास:ठाकुर देशराज, पृष्ठान्त-511


केसरी का स्वर्गवास हो चुका था और लाहौर की गद्दी पर नाटक हो रहा था।

उदैसिंह के पश्चात् उसकी रानी महताबकुंवरि राज्य की मालिक बनीं। वह बड़ी वीर प्रकृति की थी और अंग्रेजों से भी लड़ बैठी। अंग्रेजों की शक्ति के मुकाबले में बेचारी क्या कर सकती थी, हार निश्चित थी। सेना तितर-बितर हो गई। फिर भी आपके दिल में आशा था, अतः आप मैदान से निकल भागीं। सेना इकट्ठी करने लगी। किन्तु अंग्रेजी सेना ने आपको पकड़ लिया। उसका कैथल राज्य जब्त कर लिया गया।

उदैसिंह ने भाई विसावासिंह को गोद लिया पुत्र बना लिया था। सरकार ने उसको चौबीस हजार सालाना का इलाका दे दिया और रानी महताबकुंवरि की बीस हजार वार्षिक की पेन्शन कर दी। इसी बीस हजार में से उदैसिंह के भानजे चूहड़सिंह को भी रानी साहिबा को देना पड़ता था। पोदा नाम के गांव में आपके रहने के लिए स्थान नियुक्त हुआ। इस स्थान पर उदैसिंह जी की बनाई एक कोठी थी जिसमें पत्थर का बहुत ही अच्छा काम किया गया था। पीछे से यह स्थान अंग्रेजी इलाके में मिला लिया गया। विसावासिंह और उसके पुत्र अरनोली में रहने लगे। संगतसिंह और उनकी संतान के लोग इलाका सिद्धूवाल के अधिकारी रहे।

'सैरे पंजाब' के लेखक ने कैथल के राज-वंश की सूची इस प्रकार दी है।

कैथल राजवंश

भाई भगतू < जीवनासिंह और गौरासिंह, जीवनासिंह के भाई संगतसिंह, गौरासिंह के महासिंह, किशनसिंह, माईदास, दयालसिंह, महासिंह के दयालसिंह और मुहरसिंह, किशनसिंह के अमरसिंह, दयालसिंह के गुरुबख्तसिंह, इनके सुक्खासिंह, धनासिंह गुरुदाससिंह, देसूसिंह, बुद्धासिंह, बख्तासिंह, इनके दालासिंह। धनासिंह के करमसिंह और चड़तसिंह। देसूसिंह के लालासिंह और सुजानसिंह।

अमरदास (लावल्द)। उदैसिंह (लावल्द)। प्रतापसिंह (लावल्द)।

सुक्खासिंह की वंशावली → 1. बहादुरसिंह - इनके दो रानी थीं - सदाकौर, देसूरानी। 2. गुलाबसिंह (इनके दो पुत्र हुए - जसमीरसिंह, नौनिहालसिंह) 3. पंजाबसिंह 4. संगतसिंह (इनके एक पुत्र अलवानसिंह हुआ)।


जाट इतिहास:ठाकुर देशराज, पृष्ठान्त-512


See also

References


Back to The Rulers