Chakwa Ben

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Chakwa Ben was a Beniwal clan ruler of whose ruins are seen at Meena Majra in Sonipat Haryana.

History

A village named Meena Majra, near Sonipat towards Ganaur, which contains ancient ruins, including the multi-story buildings. There are certain ancient temples and a large tank and goddesses near the site. The local People believe that this ancient city was capital of king Chakwa Ben. The identity of this ruler Chakwa Ben is not known to the historians. However a stupa near Kesariya, known by the name of Raja Ben Chakravarti is described by Hiuen-Tsang as a memorial of Chakravarti kings.[1] Carlleyle notes a similar local tradition from Bairat (Jaipur), and there too, the name is Chakwa Ben. [2] Cunningham mentions similar legends of Chakravarti Ben in Bihar, Awadh and Ruhel Khand. Carlleyle says, he was an Indo-Scythian king. He is right. The king belonged to Ben or Beniwal clan.[3]


It is believed that Pilibhit was ruled by an ancient king named Mayurdhwaj or Moredhwaj or King Venu, who was a great devotee of lord Krishna and a loyal friend of Arjuna, whose name and geography of his kingdom, can be traced in the epic Mahabharata. Local tradition connects them with the mythical Raja Vena.[4]

इतिहास

सम्राट् चकवाबैन - इनका पूरे पंजाब पर राज रहा, इन्हीं के पौत्र मघ ने स्वप्नसुन्दरी राजकुमारी निहालदे से विवाह किया। इसी चकवाबैन से जाटों के बैनीवाल गोत्र की उत्पत्ति हुई।[5]

दलीप सिंह अहलावत लिखते हैं -

सोनीपत के निकट गन्नौर की ओर जी० टी० रोड से लगभग 20 मील दूरी पर एक स्थान है जिसका नाम मीना माजरा है। यहां पर प्राचीन नष्ट खण्डहर हैं जिनमें कई-कई मंजिलों के मकान हैं जो कि सब भूमि सतह से बिल्कुल नीचे हैं। बहुत समय पहले से इन खण्डहरों के निकट के गांवों के लोग, पक्की ईंटें निकाल रहे हैं। ये ईंटें लगभग 16 इंच लम्बी, 8 इंच चौड़ी और 2 इंच मोटी हैं। गांवों के लोगों ने रस्सों की सहायता से 30 फुट के गहराई तक दीवारों की ईंटें निकाल ली हैं। इस


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-557


काम में कुछ मनुष्य मर भी चुके हैं। इस स्थान के निकट प्राचीन मन्दिर और एक बड़ा तालाब है जो हजारों एकड़ भूमि पर है। वहां पर देवी देवताओं की प्राचीन मूर्तियां मिली हैं। इस प्राचीन नगर के विषय में लोग बताते हैं कि यह चकवाबैन की राजधानी थी। इस राजा का एक महात्मा चुन्कुट ऋषि से मतभेद हो गया, तो चकवाबैन राजा ने उसको अपने साम्राज्य की सीमाओं से बाहर जाने का आदेश दे दिया। कई वर्षों के पश्चात् वह महात्मा इस राजधानी में वापिस लौट आया और राजा को बताया कि “मैं उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम दिशाओं में पहाड़ों एवं समुद्रों तक गया, लोगों ने मुझे प्रत्येक स्थान को सम्राट् चकवाबैन के साम्राज्य का भाग बताया। अतः मैं आपके साम्राज्य से बाहिर जाने के लिए असमर्थ रहा।” इन सब बातों से ज्ञात होता है कि यह स्थान प्राचीन है और यह नगर जरूर राजधानी या एक महत्त्वपूर्ण केन्द्र था। इस चकवाबैन के विषय में इतिहास में नहीं लिखा गया है तो भी राजा बैन चक्रवर्ती के नाम पर केसारिया (Kesariya) के निकट एक स्तूप है जिसको ह्यूनत्सांग ने चक्रवर्ती सम्राटों की यादगार लिखा है। (V.A. Smith, Journal of Royal Asiatic Society, 1952, P. 271)। कारल्लेयल (Carlleyle) ने भी बैराट (Bairat) (जयपुर) से इसी तरह की परम्परागत कथा का वर्णन किया है और वहां भी चकवाबैन का नाम है। (Archaeological Survey of India, Vol. VI, P. 84)।

बिहार में स्तूप बनाने वाले चक्रवर्ती बैन और ऊपर बताई हुई पौराणिक कथा वाला चकवाबैन, दोनों एक ही होने का पता खुदाई कार्य से ही लग सकता है। कनिंघम ने बिहार, अवध और रुहेलखण्ड में चक्रवर्ती बैन के होने का, इसी प्रकार की पौराणिक कथा का उल्लेख किया है (op. cit)। यह सम्राट् बैन या बैनीवाल गोत्र का जाट था। (जाट्स दी ऐनशन्ट रूलर्ज, पृ० 247-248, लेखक बी० एस० दहिया)।

स्वांगी एवं जोगी भी राजा चकवाबैन, उसका पुत्र राजा महीपाल तथा उसका पुत्र क्षत्रिय राजा सुलतान एवं उसकी रानी निहालदे के गाने प्राचीनकाल से आज तक भी गाते हैं। इनके साम्राज्य की सीमा तथा समय की ठीक जानकारी नहीं मिलती, फिर भी इनके गानों के आधार पर कुछ जानकारी मिलती है जो कि संक्षिप्त में निम्न प्रकार से है -

सम्राट् चकवाबैन का पौत्र और राजा महीपाल का पुत्र राजा सुलतान का विवाह पंजाब के राजा मघ की सुन्दर राजकुमारी निहालदे से हुआ था। जानी चोर राजा सुलतान का मित्र था। एक बार ये दोनों एक नदी के किनारे ठहरे हुए थे। इनको वहां पानी में बहती हुई लकड़ी की तख्ती मिली, जिस पर लिखा था कि “मैं पंजाब के एक राजा रत्नसिंह की राजकुमारी महकदे हूं। मेरे पिता के मरने के पश्चात् अदलीखान पठान मुझे बलपूर्वक उठा लाया और अदलीपुर नगर में अपने महल में मुझे बन्दी बनाकर रख रहा है। कुछ दिनों में मेरे को अपनी बेगम बना लेगा तथा मेरा धर्म बिगाड़ेगा। यदि कोई वीर क्षत्रिय है तो मेरा धर्म बचाओ।” राजकुमारी महकदे के लिख को पढ़कर राजा सुलतान ने जानी चोर को उसे छुड़ा लाने का आदेश दिया। जानी चोर नदी पार करके अदलीपुर नगर गया। वहां पर बड़ी चतुराई एवं छलबाजी से अदलीखान पठान के महल से महकदे को निकाल लाया तथा उसके धर्म की रक्षा की। राजा सुलतान ने महकदे को उसके पिता के घर पहुंचा दिया। इससे अनुमान लगता है कि अदलीखान सिन्ध नदी के पश्चिमी क्षेत्र का शासक था। महाराजा चकवाबैन का समय सम्राट् हर्षवर्धन की मृत्यु के पश्चात् का हो सकता है। यह एक खोज का


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-558


विषय है जिसके लिए बड़े परिश्रम एवं धनराशि और सरकार के सहयोग की आवश्यकता है। यद्यपि इतिहास पुस्तकों में उपर्युक्त सम्राटों का उल्लेख नहीं किया गया, किन्तु निस्संदेह इन सम्राटों का शासन रहा। बैनीवाल/बैन जाटों का शासन जांगल प्रदेश (बीकानेर) में 150 गांवों पर था। इनका युद्ध बीका राठौर से हुआ जिसने इनको हराकर इनके राज्य पर अधिकार कर लिया।[6]

External links

References

  1. V A Smith, Journal of Royal Asiatic Society, 1902, p. 271
  2. ASI, Vol. VI, p. 84
  3. Bhim Singh Dahiya: Jats the Ancient Rulers, p.247-248
  4. Imperial Gazetteer of India, vol. 20, p.138
  5. Hawa Singh Sangwan: Asli Lutere Koun/Part-I,p.61-62
  6. Jat History Dalip Singh Ahlawat/Chapter VI (Page 557-558)

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