Chaudhary Charan Singh: Desh ke Ek Pramukh Path-Prdarshak

From Jatland Wiki
Jump to navigation Jump to search
लेखक : प्रो. एचआर ईसराण, पूर्व प्राचार्य, कॉलेज शिक्षा, राजस्थान

चौधरी चरण सिंह: देश के एक प्रमुख पथ-प्रदर्शक

चौधरी चरण सिंह

चौधरी चरण सिंह का जन्म 23 दिसम्बर 1902 को उत्तरप्रदेश के नूरपुर गाँव के एक किसान परिवार में हुआ। गाँव में पले- बढ़े। खेत-खलिहान की असलियत से रूबरू हुए। कुशाग्र बुद्धि से सुसम्पन्न इस बालक की पढ़ाई के प्रति ललक शुरू से रही। साल 1925 में इतिहास में एम. ए. की डिग्री प्राप्त की। 1928 में आगरा यूनिवर्सिटी से विधि (Law) की उपाधि प्राप्त कर गाजियाबाद में वक़ालत के पेशे से जुड़ गए।

स्वतंत्रता सेनानी

साल 1929 में कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में जब पूर्ण स्वराज्य की मांग की गई तो आज़ादी के दीवाने इस युवा ने अपना यौवन आज़ादी की लड़ाई में झोंक दिया। आजादी की लड़ाई के सभी प्रमुख आंदोलनों में बढ़-चढ़कर भाग लिया। नमक सत्याग्रह में जेल गए थे। सन् 1940 में व्यक्तिगत सत्याग्रही के रूप में उन्हें गिरफ्तार करके जेल भेजा गया। बाद में 1942 के 'भारत छोड़ो आंदोलन' में भी वे कैद किए गए। स्वंतत्रता संग्राम के वे एक सच्चे सेनानी के रूप में राष्ट्रीय परिदृश्य पर उभरकर सामने आए।

हिम्मती इंसान

प्रसिद्ध अर्थशास्त्री, कृषि-लोकतंत्र के पक्षधर सिद्धांतकार, दलितों, पिछड़ो, किसानों, खेतीहर मजदूरों, दस्तकारों के हितों को नीति-निर्धारण में केंद्र-बिंदु पर रखने वाले देश के पंचम प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह ( 28 जुलाई 1979 - 14 जनवरी 1980 ) सच्चाई, साहस और सादगी की सशक्त शख्सियत थे।

बहुमुखी प्रतिभा के धनी चौधरी चरण सिंह ने सत्ता का रुख शहरों से गाँवो की ओर मोड़ कर अपने आर्थिक चिंतन का केंद्र-बिंदु गांव, खेत-खलिहान और कुटीर उद्योग को बनाया। विकास की अवधारणा में ग्रामीण अर्थव्यवस्था को प्रमुखता प्रदान कर उसके अनुरूप नीति निर्धारण करने में उनकी अग्रणी भूमिका रही है। किसान की उनकी परिभाषा सिर्फ़ ज़मीन के मालिक किसान तक ही सीमित नहीं थी। वे किसान की श्रेणी में भूमिहीन खेतिहर मजदूर, दस्तकार, कुटीर उद्योग से जुड़े हुए श्रमिकों को भी शामिल करते थे।

किसान- मसीहा

चौधरी चरण सिंह को गांव-ढाणी तथा कृषि की समस्याओं की गहरी समझ थी। उनके आर्थिक चिंतन में किसानों की व्यावहारिक समस्याएं तथा उनकी स्थितियों के प्रति चिंता साफ साफ झलकती है।

आज़ादी से पूर्व 1937 में 34 साल की उम्र में चौधरी चरण सिंह पहली बार गाज़ियाबाद क्षेत्र से प्रांतीय धारा सभा ( Legislative Assembly of the United Provinces ) के सदस्य चुने गए। किसानों को इज़ाफा-लगान व बेदख़ली के अभिशाप से मुक्ति दिलाने के उद्देश्य से उन्होंने सभा में लैण्ड यूटिलाइजेशन बिल ( भूमि उपयोग बिल) का मसौदा तैयार कर उसे पास करवाने का प्रयास किया परन्तु अंग्रेज़ सरकार ने इस बिल को प्रस्तुत नहीं होने दिया।

चौधरी साहब को पहली सफलता सन 1939 में मिली, जब उन्होंने धारा सभा में ऋण निर्मोचन विधेयक पारित करा लिया था। ऋण के बोझ के नीचे दबे किसानों को राहत दिलाने के उद्देश्य से उन्होंने धारा सभा में यह विधेयक प्रस्तुत किया था। विडम्बना देखिए कि उस समय कांग्रेस के ही कुछ विधायक नहीं चाहते थे कि यह विधेयक पास हो क्योंकि उन्होंने लाखों ग़रीब किसानों को ऋण के जाल में फंसा रखा था। तार्किकता के धनी चरण सिंह ने विधेयक की पुरज़ोर पैरवी की और विधेयक पास हो गया। इसके परिणामस्वरूप लाखों किसान ऋण के जाल से मुक्त हो सके।

आजादी के बाद चौधरी साहब देश के सबसे बड़े प्रान्त उत्तर प्रदेश के कृषि व राजस्व मंत्री बने। उत्तर प्रदेश सरकार ने सन 1952 में जो जमींदारी उन्मूलन एवं भूमि सुधार विधेयक पारित किया था, उसे तैयार करने का दायित्व मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत ने चौधरी साहब को ही सौंपा था। चौधरी चरण सिंह के द्वारा तैयार किया गया जमींदारी उन्मूलन विधेयक राज्य के कल्याणकारी सिद्धांत पर आधारित था। उनकी कोशिशों के बदौलत जमींदारी प्रथा का उन्मूलन हुआ और गरीबों को खेतों पर अधिकार मिला।

चौधरी साहब ने ग़रीब तबक़े के हित को ध्यान में रखकर इस विधेयक का मसविदा तैयार किया और देश भर में इसकी सर्वत्र प्रशंसा की गई। इस क्रांतिकारी विधेयक ने पूरे देश के लिए प्रेरणा का काम किया था। अमेरिकी अर्थशास्त्री वुल्फ़ ए. लैंडजिन्सकी ने भारत के योजना आयोग को प्रस्तुत एक रिपोर्ट में इसकी प्रशंसा की थी, वह असल में चौधरी साहब की प्रशंसा ही थी। लैंडजिन्सकी ने कहा था, "उत्तर प्रदेश... एक ऐसा राज्य है, जहां बहुत सोचा- समझा व व्यापक कानून पारित किया गया है, और उसे असरदार ढंग से लागू किया गया है। वहां लाखों काश्तकारों को जो जमीन से बेदखल कर दिए गए थे, उनके अधिकार वापस दिए गए हैं।"

इसी श्रंखला में चौधरी साहब ने 1953 में 'चकबंदी कानून' तथा 1954 में 'भूमि संरक्षण कानून' पारित करवाया, जिसके परिणामस्वरूप राज्य के हर छोटे से छोटे किसान को उसकी ज़मीन का वास्तविक हक मिल सका। जमींदारी उन्मूलन एवं भूमि सुधार अधिनियम लागू कर किसानों को जमीन का मालिक बनाने, किसानों को पटवारी राज से मुक्ति दिलाने, किसानों के बिखरे खेतों को एक चक बनवाने के लिए चकबंदी अधिनियम पारित कराया। किसान नेता के रूप में उन्होंने किसानों को छोटे आकार के खेतों की उपयोगिता को सरलता से समझा दिया। चौधरी साहब ने उपज बढ़ाने हेतु मिट्टी का वैज्ञानिक परीक्षण कराने की व्यवस्था की। इससे कृषि को वैज्ञानिक स्वरूप प्राप्त करने में सहायता मिली। इसके साथ ही निर्धन किसानों की सहायतार्थ सस्ते खाद बीज आदि के लिए कृषि आपूर्ति संस्थानों की स्थापना की गईं। नहर की पटरियों पर चलने पर जुर्माना लगाने का ब्रिटिश काल का कानून खत्म कराकर किसानों को बड़ी राहत प्रदान की। 1960 में जब उन्हें गृह एवं कृषि मंत्रालय सुपुर्द किया गया तब भूमि हदबंदी क़ानून लागू करने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।

1959 में कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन में चौधरी चरण सिंह ने नेहरू जी के सामने उनकी सहकारी खेती का विरोध कर राजनीति में एक निर्भीक नेता की पहचान बनाई। चौधरी चरणसिंह ने राज्य द्वारा सामूहिक और सहकारी खेती के समर्थन के सवाल पर नेहरू की अर्थनीति का इस आधार पर विरोध किया कि सामूहिक खेती मानव-स्वभाव के विरुद्ध है और इससे उत्पादन पर ख़राब असर पड़ेगा।

मुख्यमंत्रित्व काल

चौधरी चरणसिंह ने सन 1967 में गैर-कांग्रेसवाद का दामन थाम लिया और एक नई पार्टी भारतीय क्रांति दल का गठन किया, जिसका चुनाव चिह्न 'हलधर' ( कंधे पर हल धारण किया हुआ किसान ) था। बड़े पैमाने पर किए जा रहे औद्योगीकरण के स्थान पर यह नई पार्टी कृषि निवेश पर जोर देने वाली नीतियां बनाना तथा गाँवों में कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देना चाहती थी।

किसान-मजदूर वर्ग को एकजुट कर उन्होंने उत्तर प्रदेश में एक सशक्त संगठन खड़ा किया, जिसे मजगर MJGAR ( मुस्लिम-जाट-गुर्जर-अहीर-राजपूत ) नाम से जाना गया। जनाधार वाले नेता के रूप में उभरने के कारण चौधरी चरण सिंह पहली बार 3 अप्रैल 1967 को देश के सबसे बड़े राज्य उत्तरप्रदेश के पहले गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री बने। इस पद पर रहते हुए उन्होंने कुटीर उद्योगों तथा कृषि उत्पादन में वृद्धि की योजनाओं को लागू कर सरकारी एजेंसियों द्वारा ऋण देने के तौर -तरीकों को सरल बनाया। साढ़े छह एकड़ तक कि जोत पर आधा लगान माफ़ कर दिया। किसानों को नक़दी एवं अन्य फसलों के लाभकारी मूल्य दिलाने के संबंध में महत्वपूर्ण निर्णय लिए और किसानों के लिए जोतबही की व्यवस्था की। भूमि- भवन कर समाप्त किया। इसके अलावा उन्होंने खाद पर से सेल्स टैक्स हटाकर किसानों को एक बड़ी राहत दी। 1967 में देशभर में सांप्रदायिक दंगे बड़े पैमाने पर हुए परंतु चौधरी चरण सिंह के मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए उत्तर प्रदेश में पूर्ण साम्प्रदायिक सद्भाव क़ायम रहा।

एक साल के बाद 17 अप्रैल 1968 को उन्होंने मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया। मध्यावधि चुनाव में उन्होंने अच्छी सफलता मिली और दुबारा 17 फरवरी 1970 को वे उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री बने। दूसरे कार्यकाल में उन्होंने कृषि उत्पादन बढ़ाने की नीति पर जोर दिया। साढ़े तीन एकड़ वाली जोतों का लगान माफ़ किया और उर्वरकों पर बिक्री कर ख़त्म कर दिया। साढ़े तीन एकड़ वाली जोतों का लगान माफ कर दिया, भूमिहीन खेतिहर-मजदूरों को कृषि भूमि दिलाने के कार्य पर और जोर दिया। छः माह की अवधि में ही 6,26,338 एकड़ भूमि की सीरदारी के पट्टे और 31,188 एकड़ के आसामी पट्टे वितरित किये गये। सीलिंग से प्राप्त सारी जमीनें भूमिहीन दलितों तथा पिछड़े वर्गों को ही दी गई।

भूमि विकास बैंकों की कार्यप्रणाली को और उपयोगी बनाया। अपने कार्यकाल में उन्होंने सीलिंग से प्राप्त जमीनों को भूमिहीनों, गरीबों और दलितों में बांट दिया। गुंडा विरोधी अभियान चलाकर यू.पी. में उन्होंने कानून का राज चलाया।

अक्टूबर 1970 में उत्तरप्रदेश में राष्ट्रपति शासन लागू कर देने के बाद से चौधरी चरण सिंह की राजनीतिक गतिविधियां केंद्र (दिल्ली) की तरफ़ झुकती गईं। 29 अगस्त 1974 को उन्होंने लोकदल का गठन किया।आपातकाल की अवधि में चौधरी चरण सिंह को नजरबंद कर दिया गया।

राष्ट्रीय राजनीति में धमक

राष्ट्रीय राजनीति में चौधरी चरण सिंह किसानों के सशक्त गठजोड़ के शिल्पी के रूप में अपनी पहचान स्थापित की। आपातकाल के बाद 1977 में हुए आम चुनाव के बाद जब जनता पार्टी की सरकार मोरारजी देसाई के नेतृत्व में बनी तब चौधरी चरण सिंह को उप -प्रधानमंत्री एवं गृहमंत्री बनाया गया। इस पद पर रहते हुए उन्होंने 'मण्डल आयोग 'एवं 'अल्पसंख्यक आयोग' की स्थापना की। मण्डल आयोग की रिपोर्ट के आधार पर ही देश के के बड़े पिछड़े वर्ग को आरक्षण का लाभ मिल सका था। दरअसल डॉ. राम मनोहर लोहिया के बाद चौधरी चरण सिंह देश की राजनीति में अकेले ऐसे नेता थे, जिन्होंने पिछड़ी जातियों में राजनीति में हिस्सेदारी का एहसास जगाया और उन्हें सत्ता के नए शक्ति केंद्र के रूप में उभारा।

भारत सरकार में गृह मंत्री बनने पर चौधरी साहब ने हिंदी भाषी प्रदेशों के युवाओं की परेशानी को ध्यान में रखते हुए युनियन पब्लिक सर्विस कमीशन (UPSC) में सीविल सर्विसेज् में पहली बार हिन्दी माध्यम से परीक्षा देने का प्रावधान करवाया। इस प्रावधन की बदौलत ही हिन्दी भाषी युवाओं के लिए लिये इंडियन सीविल सर्विसेज् में अपनी करामत दिखाने का मौका मिला। बात दें कि इससे पहले आई सी एस परीक्षा सिर्फ अंग्रेजी माध्यम से ही देनी पड़ती थी, जिसके कारण हिंदी भाषी प्रदेशों के ग्रामीण विद्यार्थी इस परीक्षा में बैठने से हिचकिचाते थे।

केंद्र सरकार में चौधरी चरण सिंह ने गांव-खेत-खलिहान- खेतिहर मजदूर-कुटीर उद्योगों का राष्ट्रीय विकास में महत्व स्वीकारते हुए ग्रामीण विकास नीतियों को केंद्र बिंदु में रखा। चौधरी साहब ने जनता पार्टी की सरकार में 1979 में वित्त मंत्री तथा उप-प्रधानमंत्री के रूप में पदासीन रहते हुए राष्टीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक-नाबार्ड की स्थापना की। उर्वरकों व डीजल के दामों में कमी की, कृषि यंत्रों पर उत्पाद शुल्क घटाया, काम के बदले अनाज योजना लागू की।

यह चौधरी चरण सिंह ही थे जिन्होंने महात्मा गाँधी की सोच के अनुसार 'अंत्योदय'योजना को प्रारम्भ किया। विलासिता की सामग्री पर भारी टैक्स चौधरी चरण सिंह ने ही लगाये। मूल्यगत विषमता पर रोक लगाने के लिए कृषि जिन्सों की अन्तर्राज्यीय आवाजाही पर लगी रोक हटाई। लाइसेंस आवण्टन पर पाबंदी लगाई तथा लघु उद्योगों को बढ़ावा दिया। उन्होंने बड़ी कपड़ा मिलों को 20 प्रतिशत कपड़ा गरीब जनता के लिए बनाने की हिदायत दी। पहली बार कृषि बजट की आवण्टित राशि में उन्होंने वृद्धि की। ग्रामीण पुनरुत्थान मंत्रालय की स्थापना की, जो इस समय ग्रामीण विकास मंत्रालय के नाम से जाना जाता है। इसके अतिरिक्त चौधरी चरण सिंह ने डीजल के मूल्य को भी नियंत्रित करने का साहसी कदम उठाया, जिससे किसानों को खेती की लागत में कमी का फायदा मिल सका। ट्रैक्टर को खेती के लिए परिवहन का साधन ऊंट गाड़े के रूप में मानते हुए उसे टैक्स व उसका चालान करने से मुक्त किया।

चौधरी चरण सिंह ग्राम्य विकास के लिए कुटीर एवं लघु उद्योगों को अत्यंत महत्वपूर्ण मानते थे और अर्थव्यवस्था के विकेंद्रीकरण की बात कहते थे। वर्ष 1979-80 का संसद में चौधरी साहब ने जो बजट पेश किया उसमें उन्होंने कृषि क्षेत्र में उत्पादन बढ़ाने और इसमें विकास की गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए विशेष जोर दिया था। उदाहरण के लिए उन्होंने भारत के कुटीर उद्योग व लघु उद्योगों में बनी माचिस से लेकर बिस्कुट, टॉफ़ी आदि पर मामूली शुल्क लगाया था और इन्हीं वस्तुओं को बनाने वाली बड़ी कम्पनियों पर अधिक टैक्स लगाया था। जाहिर है चौधरी साहब ने उस समय की आर्थिक जरूरतों को ध्यान में रखते हुए यह नीति अपनाई थी।

स्वतंत्र विचारक व मौलिक लेखक

चौधरी चरण सिंह ने देश की आर्थिक स्थितियों पर कई पुस्तकें एवं अनेक लेख लिखे हैं जिनमें उन्होंने स्वतंत्र रूप से अपनी बातें कही हैं। उनका आर्थिक चिंतन गांधी जी के अधिक करीब है। उनकी आर्थिक नीति ग्रामोन्मुख थी। आजादी के पहले अंग्रेजी शासन ने भारत की अर्थव्यवस्था के आधार कृषि और कुटीर उद्योग दोनों को तोड़कर देश को कमजोर किया था। चौधरी साहब इसी दुर्बलता को समाप्त कर के भारतीय अर्थव्यवस्था को पुनः सुदृढ़ और प्रगतिशील बनाना चाहते थे। वे किसानों के शोषण को जनतांत्रिक तरीके से समाप्त करने तथा गांधीवादी तरीके से देश का विकास करने के हिमायती थे।

चौधरी साहब का तर्क था कि कृषि के काम में देश की 57.75 प्रतिशत जनता लगी हुई है और यदि इसमें भूमिहीन खेतिहर मजदूरों की तादाद को भी जोड़ दिया जाए तो यह आंकड़ा 75.5 प्रतिशत तक पहुंच जाएगा। जिस देश की इतनी अधिक आबादी कृषि से जुड़ी हो तो वहाँ की सरकार और प्रशासन में खेत-खलिहान की समझ रखने वाले लोगों का प्रभुत्व होना चाहिए।

इसीलिए आजादी से ठीक पहले 21 मार्च 1947 को चौधरी साहब ने एक लेख लिखा जिसका शीर्षक है, ‘Why 60% services should be reserved for sons of cultivators?’ इस लेख के जरिए उन्होंने सरकारी सेवाओं में किसानों के लिए आरक्षण की मांग की। स्पष्ट कर दूं कि आजादी के बाद हिंदी में लिखे इस लेख में उन्होंने इस आरक्षण सीमा को 50% तक करने की मांग की।

भारतीय अर्थव्यवस्था एवं खेती-किसानी पर चौधरी चरण सिंह के चिंतन और लेखन का दायरा विशाल है।आज तक भारत में ऐसा शायद ही कोई नेता हुआ है, जिसने कृषि व ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर चौधरी चरण सिह जितना चिंतन किया हो या फिर इतनी संख्या में पुस्तकें लिखीं हो। बता दें कि उनकी पुस्तकें बाकायदा अंग्रेजी मे हैं और विदेशी विश्विद्यालयों के पाठ्यक्रमों में स्वीकृत हैं। विषविधली। उनके द्वारा लिखी पुस्तकों की सूची पर जरा नज़र डालिए:

1. Abolition of Zamindari (1947)

2. शिष्टाचार (1954)

3. Whither Co-operative Farming (1956)

4. Agrarian Revolution in Uttar Pradesh (1957)

5. Joint Farming X-rayed: the Problem and its Solution (1959)

6. India’s Poverty and It’s Solution (1964)

7. India's Economic Policy: The Gandhian Blueprint (1978)

8. Economic Nightmare of India: Its Cause and Cure (1981)

9. Peasant Proprietorship or Land to the Workers

10. Prevention of Division of Holdings below a Certain Minimum

11. Land Reforms in UP and the Kulaks (1986)

इन पुस्तकों के अलावा चौधरी चरण सिंह ने विभिन्न प्रख्यात पत्र-पत्रिकाओं में किसानी को लेकर कई लेख लिखे। उन्होंने 2 अक्टूबर 1979 को चौधरी देवी लाल और राजनारायण के साथ मिलकर किसान ट्रस्ट के मार्फत ‘असली भारत’ और ‘Real India’ नाम से किसानों के मुद्दे उभारने के लिए दो साप्ताहिक पत्रिकाएं भी लॉन्च की। “देश की समृद्धि का रास्ता गांवों के खेतों एवं खलिहानों से होकर गुजरता है” जैसा नारा देने वाले चरण सिंह अपने लेखन के जरिए हमेशा किसान- कल्याण पर गहन चिंतन करते रहे और मौका मिलने पर इस दिशा में सार्थक काम करके भी दिखाया। चौधरी चरण सिंह को 'किसानों के हिमायती' के रूप में पहचाना जाता रहा है किन्तु अफ़सोस की बात है कि उनके लेखन की बहुत कम लोगों को जानकारी है।

किसानों की दुर्दशा और भारत

चौधरी चरण सिंह ने 1980 में एक पुस्तक लिखी जिसका शीर्षक था 'नाइट मेयर आफ इंडियन इकॉनमी' (भारतीय अर्थव्यवस्था का दुरास्वप्न)। इस पुस्तक में उन्होंने स्पष्ट किया कि पश्चिमी देशों के विकास के मॉडल का अंधानुकरण करके हम भारत का समावेशी विकास नहीं कर सकते। इसके लिए हमें एेसी आर्थिक व्यवस्था का सृजन करना होगा जिसमें ग्रामीण अर्थव्यवस्था की उत्पादकता को बढ़ाकर उसका समुचित बाजार मूल्य तय हो सके। कृषि व ग्रामीण क्षेत्रों में पूंजी निर्माण (कैपिटल फॉर्मेशन) करके ही इसका हल ढूंढा जा सकता है।

इस पुस्तक में चौधरी चरण सिंह ने भारतीय अर्थव्यवस्था की समुचित विवेचना कर नतीजा निकाला कि कृषि प्रधान देश की अर्थव्यवस्था में शहरों की ओर पूंजी का रुख मोड़ने से नहीं बल्कि पूंजी के ग्रामोन्मुखी होने से ही बदलाव आयेगा और सहायक उद्योगों के विस्तार से ही बेरोजगारी का सामना करते हुए अधिक से अधिक जनसंख्या की खेती पर निर्भरता समाप्त की जा सकेगी।

चौधरी साहब मानते थे कि महात्मा गांधी के कुटीर उद्योग दर्शन से ही भारत के गांवों को समृद्ध बनाया जा सकता है और कृषि मूलक लघु उद्योगों के जरिये किसानों की आय में बढ़ोत्तरी करके उन्हें समाज के अन्य संभ्रान्त वर्गों के समकक्ष बेहतर शिक्षा व स्वास्थ्य सेवाएं पाने में सक्षम बनाया जा सकता है। मगर इसके लिए सबसे पहले कृषि पैदावार बढ़ाने हेतु किसानों को आधुनिकतम खेती तकनीकों से लैस किया जाना जरूरी होगा। पैदावार बढ़ाये बिना कृषि पर निर्भरता कम नहीं की जा सकती।

चौधरी साहब इस बात पर जोर देकर कहते थे कि सरकारी नीतियां बाजार मूलक न होकर गांव व कृषि मूलक बनानी होंगी और खेती की लागत को कम करते हुए उत्पादकता बढ़ाकर किसान को उसकी उपज का लाभकारी मूल्य इस प्रकार देना होगा कि वह औद्योगिक उत्पादन की लाभप्रदता का मुकाबला अपने बूते पर ही कर सके। इससे ग्रामीण व शहरी क्षेत्रों के बीच की खाई को पाटने में मदद मिलेगी। गांवों का विकास सुनिश्चित होने से इन इलाकों में शिक्षा का प्रचार-प्रसार होगा और किसानों की अगली पीढि़यां डॉक्टर, इंजीनियर व वैज्ञानिक बनने के साथ राष्ट्रीय राजनीति में अग्रणी भूमिका निभा सकेंगी। चौधरी साहब ग्रामोत्थान के लिए शिक्षा को आवश्यक मानते थे। राजनीतिक मंचों पर भी किसानों और मजदूरों को बच्चों को उच्च शिक्षा दिलाने को प्रोत्साहित करते थे। वे कहते थे कि किसान, खेती को सिर्फ साधन मानें, बच्चों को पढ़ाई में आगे बढ़ाएं।

साल 1981 में उन्होंने इकोनॉमिक नाइटमेयर ऑफ इंडिया : इट्स कॉज ऐंड क्योर (भारत का आर्थिक दु:स्वप्न: इसका कारण और इलाज) नामक ग्रंथ प्रकाशित किया, जिसमें एक पेशेवर अर्थशास्‍त्री की तरह उन्होंने पूरे तथ्यों के साथ भारतीय अर्थव्यवस्था की प्रकृति, उसकी समस्याओं और उनके समाधान पर विस्तार से विवेचन करके अपने निष्कर्ष प्रस्तुत किए। उनका मानना था कि आजादी के समय भारत के सामने एक-दूसरे से जुड़ी हुई चार समस्याएं थीं- गरीबी, बेरोजगारी या अर्ध-बेरोजगारी, निजी आय में व्यापक असमानता और किसान-मजदूर वर्ग के अलावा अन्य वर्गों की कठोर श्रम के प्रति बढ़ती अरुचि। यदि हम आज के भारत पर नजर डालें तो यही समस्याएं आज भी मुंह बाए खड़ी दिखती हैं। हां, उनका स्वरूप अब पहले से कहीं अधिक विकराल हो गया है। विकास की प्रक्रिया इस प्रकार से आगे बढ़ी है कि आर्थिक विकास के फलस्वरूप देश के कुछेक परिवारों में समृद्धि का केंद्रीकरण हो रहा है और सबसे गरीब व्यक्ति और सबसे अमीर व्यक्ति के बीच की खाई इतनी अधिक गहरी और चौड़ी हो गई है कि अब उसे भरना असंभव हो गया है।

चौधरी चरण सिंह ब्रिटिश-विरोधी राष्ट्रीय आंदोलन के भीतर से उभरे हुए नेता थे और उनकी सामाजिक चेतना और जीवनमूल्यों पर गांधीवादी चिंतन और आचरण का बहुत गहरा असर था। अपने ग्रंथ के प्राक्कथन में उन्होंने प्रसिद्ध स्वीडिश अर्थशास्‍त्री गुन्नार मिर्डल के एक लेख को उद्धृत किया है, जिसमें मिर्डल ने कहा है कि भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास की योजना यदि गांधी की समन्वित विकास की अवधारणा पर आधारित होती तो उसे अनेक समस्याओं का सामना ही न करना पड़ता और ग्रामीण विकास की राह आसान हो जाती।

अर्थव्यवस्था के विकेंद्रीकरण के पैरोकार

चौधरी साहब ग्राम में विकास के लिए कुटीर एवं लघु उद्योगों को अत्यंत महत्वपूर्ण मानते थे और अर्थव्यवस्था के विकेंद्रीकरण की बात कहते थे। उन्होंने सन् 1982 में लिखे अपने लेख "भारत का बिगड़ता रूप" में स्पष्ट रूप से लिखा था कि..." गरीबी से बचकर समृद्धि की ओर बढ़ने का एक मात्र मार्ग गांव तथा खेतों से होकर गुजरता है ...हमें ग्रामीण क्षेत्रों को प्राथमिकता देकर तथा कृषि को केंद्र बनाकर कुटीर उद्योग और कृषि की ओर वापस लौटना होगा।"

वास्तविक भारत गांवों में रहता है पर देश की सत्ता तथा प्रशासनिक बागडोर शहरों में पले-बढ़े राजनेताओं व बुद्धिजीवियों के हाथों में है। ये लोग न तो गांवों की समस्याओं से परिचित हैं, न ही उसकी जरूरतों, कमियों, आवश्यकताओं तथा ग्रामीणों के मनोविज्ञान को समझते हैं। यही वजह है कि ये लोग गांव की समस्याओं का समाधान उनके दिमाग में पहले से बनी धारणाओं के आधार पर करने की कोशिश करते हैं। विदेशी खेलों को देखकर या किताबें पढ़कर हमारे नीति निर्माताओं, शहरी नेताओं व प्रशासकों ने अधकचरी योजनाएं प्रारम्भ की हैं। सहकारी खेती, राज्य द्वारा अनाज का व्यापार, फसल बीमा या खेतिहर मजदूरों के लिए न्यूनतम मजदूरी--ये ऐसी योजनाएं हैं, जो असफल रही हैं।

असली भारत शहरों में नहीं, गाँवों में निवास करता है। आजकल जिस न्यू इंडिया की बात जोरशोर से की जा रही है, वह असली भारत से अलग है। गांव निर्धन हैं, क्योंकि खेती व कुटीर उद्योग बर्बाद हो चुके हैं। अधिकांश जनसंख्या बेरोजगार है या अर्द्ध-बेरोजगार है। गांव की विशाल श्रम-शक्ति को उन्नत खेती व कुटीर उद्योगों से जोड़कर ही उन्हें उत्पादक रोजगार दिया जा सकता है। सरकारी संरक्षण में प्राकृतिक संसाधनों की लूटमार कर बड़ी पूंजी लगाकर शुरू होने वाले यंत्रीकृत अर्थ-व्यवस्था केवल बेरोजगारी में बढ़ोत्तरी करेगी और धन कुछ कॉरपोरेट घरानों के हाथों में सिमटता जा रहा है। इस प्रकार पूंजीवाद अपनी सारी बुराइयों के साथ देश को अपने शिकंजे में कसता जा रहा है।

निष्कर्ष यह है कि भारत में समृद्धि की ओर बढ़ने का एकमात्र मार्ग गांव तथा खेतों से होकर गुजरता है, शहर तथा उद्योग नगरियों से होकर नहीं। गांधी दर्शन के अनुरूप चौधरी चरण सिंह देश का निर्माण नीचे (गरीब तबक़े) से ऊपर (अमीर तबक़े) की ओर करना चाहते थे। वे इस बात पर जोर देते थे कि नीति-निर्माताओं का ध्यान गांव और शहरों में रहने वाले गरीबों पर केंद्रित होना चाहिए। जब तक उनकी दशा नहीं सुधरेगी और उनका आर्थिक विकास नहीं होगा, तब तक देश की अर्थव्यवस्था मजबूत नहीं हो सकती।

जाति-प्रथा के घोर विरोधी

चौधरी साहब जाति प्रथा को एक सामाजिक बुराई मानते थे, और सर्वधर्म समभाव के प्रबल पक्षधर थे। उन्होंने अपनी पुस्तक "इकोनॉमिक नाइटमेर ऑफ इंडिया: इट्स कॉजेज एंड क्योर" में जाति -प्रथा की बुराई का जिक्र करते हुए लिखा है कि "...जाति प्रथा के कारण ही भारत के विभिन्न धार्मिक समूह सामाजिक और राजनीतिक रूप से एक दूसरे के समीप नहीं आ सके, तथा एक सुदृढ समाज का निर्माण नहीं हो सका " पंडित नेहरू को 26 मई 1954 को लिखे एक पत्र में चौधरी साहब ने कहा था कि 'इससे (जाति-प्रथा) से विभेद और अन्याय बढ़ता है। इससे विकृतियां बढ़ती हैं। आदमी के दिल और दिमाग में संकीर्णता जाती है, तथा दोषारोपण का दुष्चक्र पैदा हो जाता है, और समाज में अविश्वास तथा संदेह की भावना भर जाती है।" चौधरी साहब की इस चेतावनी को याद रखने की जरूरत है।

दुःखद बात यह है कि चौधरी चरण सिंह भारतीय राजनीति में सबसे ज़्यादा ग़लत समझे जाने वाले नेता रहे हैं। जिंदगी भर वे मीडिया, बुद्धिजीवी और कुलीन वर्ग के निशाने पर रहे परन्तु वे अपने चिंतन की धारा से कभी विमुख नहीं हुए। चौधरी चरण सिंह जातिवाद के घोर विरोधी थे। उन्होंने अपनी पुत्रियों का अन्तर्जातीय विवाह किया और ताउम्र जातिवाद के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद करते रहे परन्तु मीडिया इस किसान हितैषी नेता को जाति विशेष से जोड़ा जाता रहा।

चौधरी साहब के जातिवाद का विरोधी होने का ही सबूत है वह शासकीय आदेश जो उन्होंने उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री की हैसियत से सन 1967 में पारित किया। आदेश यह था कि "जो संस्थाएं किसी जाति विशेष के नाम पर चल रही हैं , उनका शासकीय अनुदान बंद कर दिया जायेगा।" नतीजतन इस आदेश के तत्काल बाद ही स्कूल/ कॉलेजों के नाम के आगे से जाति -सूचक शब्द हटा दिए गए। उनका तो प्रस्ताव था कि देश में जितनी भी संस्थाएँ जाति के नाम से संचालित हैं, उनकी सरकारी ग्रांट तब तक बंद कर देनी चाहिए जब तक कि वे जाति का नाम पृथक नहीं कर दें।

जमीन से जुड़ा हुआ जन नेता

चौधरी चरण सिंह को अत्यंत खुले चरित्र के व्यक्तियों में से थे। छुपाने के लिए उनके पास कुछ भी नहीं था। मन में किसी भी तरह का दुराव-छिपाव नहीं पालते थे। जो कुछ भी सोचते थे, वही कहते थे, और जो कुछ कहते थे, वही करते भी थे। चौधरी साहब एक निर्भीक चरित्र वाले साहसी व्यक्ति थे। अपनी बात को कहने में न तो वे लाग लपेट का सहारा लेते थे, और नहीं हिचकते थे। उनकी यह निर्भीकता और साफ़गोई हमारे देश के आम किसान के चरित्र का प्रतिनिधित्व करती थी। इसलिए चौधरी चरण सिंह को देश की जड़ों से जुड़ा हुआ राजनेता माना जाता है।

उसूलों पर अडिग रहने वाले जन नेता

चौधरी चरण सिंह को अपने नेतृत्व वाली सरकार का लोकसभा में 20 अगस्त 1979 को बहुमत साबित करना था। कांग्रेस-आई ने समर्थन के लिए शर्त रख दी कि जनता पार्टी सरकार द्वारा बदले की भावना से श्रीमती गांधी और पार्टी के खिलाफ जो मुकदमे दायर किए हैं, वे वापिस लिए जाएं। चौधरी चरण सिंह ने यह शर्त स्वीकार नहीं की और राष्ट्रपति को अपना इस्तीफ़ा सौंप दिया। चौधरी चरण सिंह के नेतृत्व वाले मंत्रिमंडल की सलाह पर राष्ट्रपति ने लोकसभा भंग कर दी और मध्यावधि चुनाव घोषित कर दिए। सन 1980 में हुए मध्यावधि चुनाव में चौधरी चरण सिंह के नेतृत्व वाला लोकदल लोकसभा में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के रूप में उभरा और वे विपक्ष के नेता बने।

चौधरी चरण सिंह हमारे देश की जमीन से जुड़े हुए नेता थे। इसलिए उन्हें इस देश की अस्मिता की गहरी पहचान थी। यह बात उनके व्यवहार, चिंतन और कार्य में लगातार व्यक्त भी होती रही। सरल वेशभूषा, सादगीपूर्ण जीवन तथा सहज व्यवहार अंत तक उनके जीवन का अभिन्न अंग रहा, भले ही वे देश-प्रदेश के कितने भी महत्वपूर्ण पद पर क्यों ना रहे हों। वे अपने उसूलों पर अडिग रहते थे। उनकी ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा जगज़ाहिर थी। इसी कारण उनके व्यक्तित्व में एक प्रकार की विलक्षण दृढ़ता थी। नैतिक मूल्यों से वे हमेशा जुड़े रहे, और उनकी छवि एक कर्मठ,कुशल और सत्यवादी नेता के रूप में स्थापित हुई। जिस-जिस पद पर वे रहे, वहाँ-वहाँ उन्होंने अपने व्यक्तित्व और कार्यकुशलता की छाप छोड़ी।

मूल्याकंन

भारतीय मीडिया, उद्योग जगत, एलीट क्लास और दक्षिण पंथी ताकतों से चौधरी चरण सिंह का शुरू से छत्तीस का आंकड़ा रहा। पूंजीपतियों व कुलीन वर्ग के खिलाफ दम ठोककर बात कहते रहने के कारण मीडिया उनके खिलाफ ख़ूब उलूल-जलूल लिखते थे। उन्होंने इसकी कभी परवाह भी नहीं की क्योंकि वे किसानों के चंदे से चुनाव लड़ते थे। उन्होंने कभी धनाढ्य लोगों की सहायता को स्वीकार नहीं किया। चौधरी साहब अपने समर्थकों को इस बारे में चेताते हुए कहते थे कि 'जिस दिन अखबारों में मेरी प्रशंसा छपने लगे समझ लेना मैं आपका नहीं रहा।'

बेबुनियाद आलोचनाओं की परवाह नहीं करते हुए चौधरी चरण सिंह ठसक के साथ लगभग आधी शताब्दी तक भारतीय राजनीति के नभ में धूमकेतु की तरह छाए रहे। भारत के ग्रामीण इलाकों में उनकी बढती लोकप्रियता से उनके विरोधी इतने घबरा गए थे कि उनके खिलाफ जातिवादी होने, कभी हरिजन विरोधी होने, कभी मुस्लिम विरोधी होने, उद्योग-जगत के ख़िलाफ़ होने आदि के बेबुनियाद आरोप लगाए जाते रहे। किन्तु वे कभी विचलित नहीं हुए। उन्होंने शोषित- पीड़ित तबकों तथा किसानों की भलाई के लिए संघर्ष जारी रखा।

विदेशी लेखकों व चिंतकों ने चौधरी साहब के चिंतन की विराटता व गहराई को भली-भांति समझा और इसे सराहा। पॉल आर. ब्रास, टेरेंस और जे बायर्स जैसे राजनीति विज्ञान के विश्वविख्यात जानकारों ने चरण सिंह के चिंतन की गहराई की भरपूर प्रशंसा करते हुए की खूब लिखा। प्रोफेसर पॉल आर ब्रास ने हिंदुस्तान की राजनीति और समाज का पिछले करीब 60 सालों से अध्ययन किया है, 18 से अधिक पुस्तक लिखीं हैं, और सौ से अधिक लेख लिखे हैं।

पॉल आर ब्रास ने तो ‘An Indian Political Life: Charan Singh and Congress Politics’ के टाइटल के तहत तीन खंड लिख डाले। चौधरी चरण सिंह के बारे में ब्रास ये लिखते हैं, “he was of a 'higher category of leaders' in the areas of 'intellect, personal integrity, and . . . Coherence of his economic and social thought." यानी विद्वता, व्यक्तिगत सत्यनिष्ठा के मामलों में चरण सिंह महानतम नेताओं की श्रेणी में शामिल थे, जिनका आर्थिक और सामाजिक चिंतन पूर्णतया प्रासंगिक था। दूसरे शब्दों में, ब्रास का मानना है कि चरण सिंह आज़ादी के पश्चात भारत के सबसे ईमानदार और प्रभावी नेता तो थे ही, साथ ही उनकी गांव और कृषि पर आधारित आर्थिक और सामाजिक विकास की नीति तथा चिंतन भारत के लिए एकदम उपयुक्त हैं।

चौधरी चरण सिंह ने राष्ट्रीय राजनीतिक मंच पर किसान के परिधान और स्वभाव के साथ अपनी ख़ास उपस्थित दर्ज़ करवाई परन्तु उनमें बुद्धिमत्ता एक जानेमाने विद्वान की सी थी। Prof. Paul R. Brass writes that "Charan Singh was a phenomenon who arrived on the national stage in peasant costume and demeanor, but with the intelligence of an intellectual and a scholar. Those American and European Scholars who did meet him in the 1960s when he was a minister in the U P government - or out of the power temporarily - were immediately impressed by his intelligence, intellect, knowledge and demeanor." यानी “पश्चिम के विद्वानों के लिए चरण सिंह एक अद्भुत शख्सियत थे जिनकी बुद्धिमानी, विद्वता, ज्ञान और आचरण से 60 के दशक में उनसे मिलने वाले वाले अमेरिकी और ब्रितानी विद्वान बेहद प्रभावित थे।

बी.बी.सी. ने चौधरी साहब के बारे में यह लिखा है, “दो बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री, केंद्र में गृह और वित्त मंत्री और कुछ समय के लिए भारत के प्रधानमंत्री रहे चौधरी चरण सिंह को सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी के उच्चतम मूल्य स्थापित करने के लिए याद किया जाता है।"

चौधरी चरण सिंह की स्पष्ट मान्यता थी कि भारी उद्योगों तथा विदेशी पूँजी पर आधारित अर्थव्यवस्था से देश का भला नहीं हो सकता। वे छोटे, मंझले व कुटीर उद्योगों तथा कृषि को संरक्षण एवं प्राथमिकता देने वाली नीतियों के प्रबल पक्षधर थे। उन्होंने "स्वदेशी" अवधारणा को जिया।

चौधरी चरण सिंह के विचार वर्तमान में पहले से भी अधिक प्रासंगिक प्रतीत होते हैं। वे चाहते थे कि भारत के गाँव-गाँव में छोटे-छोटे उद्योग लगें, देश व समाज का उत्पादन बढ़े। उनकी आशंका थी कि उत्पादन को बड़े शहरों में स्थापित बड़ी पूँजी व बड़ी मशीनों वाले कारखानों तक सीमित कर देने से भारतीय अर्थव्यवस्था चौपट हो जायेगी और आर्थिक विषमता घटने की जगह बढ़ेगी। उनकी आशंका अथवा उस दौर में दी गई चेतावनी कालांतर में सही साबित हुईं। आज हम देख रहे हैं कि हर ओर अमीरी-गरीबी की खाई और गहरी हुई है। भारत जैसे श्रम व कृषि प्रधान देश के लिए चौधरी चरण सिंह की अर्थनीति से बेहतर कोई नीति नहीं हो सकती है, जिसके मूल में महात्मा गांधी और डा0 लोहिया की व्यापक सोच समाहित है।

आज़ादी की 70 वीं वर्षगांठ पर अंग्रेज़ी साप्ताहिक 'इण्डिया टुडे' द्वारा 25 सितम्बर 2017 को ' 70 Visionaries who Defined India' शीर्षक से विशेषांक प्रकाशित किया जिसमें चौधरी चरण सिंह को उन 70 महान भविष्यदृष्टा भारतीयों में सम्मलित किया गया जिन्होंने भारत को परिभाषित किया है। दुःखद स्थिति है कि जातियों के घेरे में सिमटी आज की जातिगत राजनीति और धर्म -सम्प्रदायों पर आधारित राजनीति ने चौधरी चरण सिंह के किसान- मजदूर तथा गाँव पर आधारित राजनीति के मॉडल की कमर तोड़ दी है।

प्रोफेसर हनुमाना राम ईसराण
पूर्व प्राचार्य, कॉलेज शिक्षा राजस्थान
एवं पूर्व सिंडिकेट सदस्य, राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर