Gramy Arthvyavastha ke Badlte Svarup

From Jatland Wiki
Jump to navigation Jump to search
लेखक : प्रो. एचआर ईसराण, पूर्व प्राचार्य, कॉलेज शिक्षा, राजस्थान

ग्राम्य अर्थव्यवस्था के बदलते स्वरूप

विभिन्न प्रकार के सिक्के

राजस्थान का क्षेत्रफल भारत के कुल क्षेत्रफल का 10.4 प्रतिशत है एवं यहाँ कि जनसंख्या देश की जनसंख्या का 5 प्रतिशत है। जल संसाधनों की बात करें तो सारे देश के जल संसाधनों का मात्र एक प्रतिशत ही राजस्थान में उपलब्ध है।

राजस्थान की कुल आबादी में से 75.13 फ़ीसदी आबादी गाँवों में निवास करती है। विडंबना है कि जनशक्ति की इस अधिकता के बावज़ूद गाँव अभी भी पूंजी के अभाव से त्रस्त हैं। राजस्थान का 61 प्रतिशत भू-भाग मरुस्थलीय है। मानसून के मनमौजीपन के कारण वर्षा की अनिश्चितता एवं न्यूनता ग्रामीण राजस्थान की अर्थव्यवस्था के मार्ग को अवरुद्ध करती रही है।

कृषि आधारित अर्थव्यवस्था

राजस्थान की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से कृषि कार्यों एव पशुपालन पर ही निर्भर रही है। आज़ादी से पहले और बाद के लगभग तीन दशकों तक यहां खेती से निपजै धान और पशुओं के दुग्ध उत्पादों पर ही जीवन की गाड़ी चलती थी। आर्थिक गतिविधियां भी इन्हीं के इर्दगिर्द घूमती थीं। गुज़रे जमाने की ग्रामीण राजस्थान की अर्थव्यवस्था का स्वरूप आज से एकदम अलग था। उसकी कुछ विशिष्टताओं एवं उस दौर के आर्थिक क्रियाकलापों के लिए प्रयुक्त पुरातन शब्दावली का उल्लेख कर रहा हूँ।

वस्तु- विनिमय

खेती-किसानी की ज़रूरतों व जीवन यापन के लिए अपरिहार्य वस्तुओं की खरीद-फ़रोख्त 'वस्तु विनिमय' ( bartering system ) के ज़रिए होती थी। जब किसी एक वस्तु या सेवा के बदले दूसरी वस्तु या सेवा का लेन-देन होता है तो इसे वस्तु विनिमय कहते हैं। घर-गृहस्थी की अत्यावश्यक वस्तुओं को खरीदने के लिए किसान बदले में धान देते थे। गाँवों में मुद्रा की धाक जमने से पहले सारा लेन-देन वस्तु-विनिमय या सेवा-विनिमय के ज़रिए ही होता था क्योंकि आमजन के हाथों तक मुद्रा की पहुंच अक्सर नहीं होती थी। 'तब' गाँवो में मुद्रा (currency/cash) पर कब्ज़ा बहुत ही बिरले लोगों का रहता था।

जजमानी या ख़लाक व्यवस्था - बीते दौर में गांवों में निवास करने वाली जातियां पीढ़ी दर पीढ़ी अक्सर अपना पुश्तैनी शिल्प अथवा पेशा अपनाकर गाँव में अपनी सेवाएं प्रदान करती थीं। एक जाति अपनी सेवाएं दूसरी जातियों को देकर बदले में अन्य जातियों से भी अपने लिए सेवाएं लेती थीं। जातियों की यह पारस्परिक निर्भरता आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक आदि कई रूपों में देखने को मिलती थी। परिणामस्वरूप विभिन्न जातियों में अंतर्निर्भरता उस दौर की ख़ासियत थी। सेवा लेनदेन की इस परंपरागत प्रथा को 'जजमानी व्यवस्था' कहा जाता था।

उदाहरण के तौर पर खाती गाँव की खेतिहर जातियों के लिए खेत की जुताई करने का हल बनाने के अलावा खेती व घर में जरूरत की लकड़ी की चीजें बनाकर देने का काम पुश्तैनी पेशे के रूप में करता था। कुम्हार अपना पुश्तैनी पेशा निभाते हुए दूसरी जातियों को उनकी घरेलू जरूरतों व विवाह एवं त्योहारों पर जरूरत के हिसाब से मिट्टी के बर्तन आदि की आपूर्ति करता था।

गाँव या पड़ौस के गाँव में बसा नाई अन्य जातियों के लोगों की संवार/ सुंवार करने ( हेयर कटिंग ), दाढ़ी बनाने एवं घर में किसी उत्सव विशेष पर घरों में बुलावा देना का काम करता था। गांव या पड़ौस के गांव का रहवासी ब्राह्मण, जिसे गांववासी सम्मानपूर्वक दादा कहते थे, वह जाति-गोत्र के हिसाब से विभिन्न परिवारों में संस्कार व कर्मकांड सम्पन्न करवाता था। मनियार या लखारा लाख की चूड़ियां बनाकर ग्रामीण महिलाओं को पहनता था। मोची गाँव के लोगों की फ़टी-पुरानी जूतियों की मरम्मत करता था। इस तरह दस्तकारी जातियां अपने परंपरागत शिल्प अथवा पेशे से जुड़ी रहती थीं और इन जातियों द्वारा प्रदत्त सेवाओं के बदले खेतिहर जातियां उन्हें अपने खेत में उपजा अनाज देती थीं। इन सबको किसान के खलिहान में से अपने हिस्से के अनाज का बेसब्री से इंतज़ार रहता था।

लोहार जो कि यायावर जाति है उसका परिवार गांव के गुवाड़ में कुछ दिन पड़ाव करता था। खेतिहर जातियों को खेती के लिए जरूरत के हिसाब से लोहार लोहे के औजार बनाकर देता था और घर में उपयोग हेतु टूटे-फूटे बर्तनों की मरम्मत करता था। लोहार ये सब सेवाएं अनाज व बैलों के लिए चारे के बदले देता था। गांव या पड़ोस के गांव में बसे बुनकर को घर पर महिलाओं द्वारा कताई किया गया सूत या ऊँन तौलकर दे दिया जाता था और बदले में वह उससे ओढ़ने का खेसला, कामला आदि वस्त्र बुनकर देता था। गिवांरणी से अनाज के बदले सिलाई-कढ़ाई-बुनाई की सुई-धागा व अन्य सामान अनाज के बदले खरीद लिए जाते थे।

सामाजिक सीढ़ी पर एक जाति दूसरी जाति से अलग पायदान पर बैठी होने से उनके बीच सामाजिक दूरी तो थी और इसके साथ-साथ उनमें ऊंच-नीच की भावना भी थी। बावज़ूद इसके उनके जीवन-यापन करने की प्रणाली अंतर्निर्भरता और पारस्परिक सहयोग के पायों पर टिकी हुई थी। इसलिए 'तब' जातियां परम्परात्मक रूप से जजमानी व्यवस्था द्वारा परस्पर संबंधित थीं और उनमें आपस में प्रेम भाव था। विवाह, जन्म, मृत्यु तथा विभिन्न अवसरों पर जातियां अपने जजमान को सेवा प्रदान करती थीं और बदले में सेवा प्रदाता जातियों को जजमान अर्थात गाँव में किसान मुख्य रूप से अनाज, दूध-घी व कुछ अन्य कृषि उत्पादों के रूप में भुगतान करता था।

'तब' ऐसा था और 'अब' ये है

अक़्सर सुनने को मिलता है कि इतिहास अपने आप को दोहराता है। पर सच तो यह है कि इतिहास खुद को हूबहू दोहराने की बज़ाय घटनाओं की तुकबंदी जरूर मिलाता है। "History doesn’t repeat itself but it often rhymes.”

इतिहास के बहाव में घटनाओं की साम्यता देखने को मिलती रहती है। कविता में तुकबंदी की तरह ही पुरानी घटनाएं या परम्पराएँ कुछ बदले हुए कलेवर में घटती रहती हैं। समझने के लिए मिसाल एक ही काफी है। 1980 के दशक के आसपास तक राजस्थान के ग्राम्य जीवन में श्रम की अदला- बदली/ विनिमय की एक रीत थी, जिसे बड़सी कहा जाता था।

आप पूछेंगे कि गुज़रे ज़माने की बड़सी' प्रणाली का ज़िक्र अब करने का क्या तुक है? इसका तुक इसलिए है कि गए दिनों एक समाचार पढ़ा, जिसमें मध्यप्रदेश सरकार द्वारा 'टाइम बैंकिंग' प्रणाली शुरू करने के फ़ैसला का ज़िक्र था। 'तब' की बड़सी अर्थात 'लेबर बैंकिंग' अब कलेवर बदलकर 'टाइम बैंकिंग' के रूप में हमारे सामने है। दिलचस्प तुकबंदी दिखती है, इन दोनों में। कैसे? जरा पढ़ लीजिए।

बड़सी( लेबर बैंकिंग):- मुद्रा की किल्लत के पुराने जमाने में खेती-किसानी के काम में सामाजिक रूप से सर्व स्वीकार्य बड़सी प्रणाली अपनाई जाती थी। क्या होती थी बड़सी प्रणाली? चलो, इसे भी समझ लीजिए।

जब किसी किसान के खुद के खेत में काम का दबाब नहीं होता था तो वह अपने पड़ौसी या जान- पहचान के किसी दूसरे के खेत में या उसका कोई घरेलू काम करवाने में सहयोग प्रदान कर देता था। बाद में बदले में उतने ही दिन वह दूसरा किसान भी उसे उसकी ज़रूरत के हिसाब से कोई काम करवा देता था। इस तरह बिना मुद्रा के हस्तक्षेप के किसान आपस में एक दूसरे की जरूरत के हिसाब से श्रम/मज़दूरी की अदला- बदली कर लेते थे। इस प्रणाली को बड़सी और इस प्रणाली के तहत काम करने वाले को बड़सिया कहा जाता था।

इस बड़सी प्रणाली के तहत एक किसान द्वारा दूसरे किसान के 'लेबर एकाउंट' में अपना लेबर डिपाजिट करवा देता था। अपनी जरूरत के वक्त उसके खाते से लेबर के रूप में ही चुकारा कर लेता था। इस तरह लेबर/ श्रम की उधारी का चुकारा श्रम के रूप में हो जाता था। इससे स्पष्ट है कि किसान जब अपने खेत में काम नहीं कर रहा होता है तो दूसरे के खेत में खेतिहर मजदूर के रूप में सेवाएं दे रहा होता है। इसलिए किसान को खेतिहर मजदूर की संज्ञा दी जाती है।

'टाइम बैंकिंग' की जरूरत क्यों? 'अब' चूंकि मुद्रा की पहुंच सुगम हो चुकी है पर जीवन की आपाधापी में वक़्त की कमी का लोग अक़्सर रोना रोते रहते हैं। यह वो दौर है जिसमें सब क्रियाकलाप अर्थ (धन ) के इर्दगिर्द सिमटते जा रहे हैं। इसलिए धन की धमक तो बढ़ी है पर समय की कमी सबको खल रही है। न्यूक्लियर फैमिली का प्रचलन परवान पर होने से परिवार नामक संस्था ध्वस्त हो गई है। हारी-बीमारी के हालात में देखभाल करने या संबल बनने के लिए परिवार का कोई सदस्य आसानी से सुलभ नहीं हो पाता है। इधर -उधर सहारा खोजने को नज़रें तरसती रहती हैं।

परिवार के नाम पर जो इक्का- दुक्का लोग होते हैं वे भी नौकरी- पेशे के सिलसिले में दूर रहते हैं। बात यह भी है कि लोगों में ख़ुद को ख़ुद तक सीमित रखने और हद दर्जे के सुविधा भोगी होने की प्रवृत्ति परवान चढ़ी है। इसलिए दूसरे के लिए ज़रा सी तकलीफ़ उठाना उन्हें मंजूर नहीं होता।

टाइम बैंकिंग क्या है? टाइम बैंक की शुरुआत के पीछे मुख्य तर्क यह है कि सभी मानव स्वयं में संपत्ति हैं जो पारस्परिकता और अंतर्निर्भरता से प्रेरित हैं। ये कहावत हम सबने सुनी है कि 'Time is money.' Time is precious. वक़्त दौलत का ही रूप है। वक़्त बहुमूल्य है। इसी को दृष्टिगत रखते हुए टाइम बैंकिंग प्रणाली अस्तित्व में आई है। यह निजी, सामाजिक व हालात से उपजी अन्य ज़रूरतों को पूरा करने का एक नया तरीका है। हो सकता है कि 'टाइम बैंकिंग' का कॉन्सेप्ट का क्लू बीते दिनों की बड़सी प्रणाली से मिला हो। बात सीधी सी है कि सेवा का एक घन्टा किसी जरूरतमंद को दीजिए और बदले में टाइम बैंक के आपके खाते में एक घन्टे की सेवा क्रेडिट ( जमा ) कर दी जाएगी।


'टाइम बैंकिंग' में लोग एक नेटवर्क से जुड़ते हैं और आपस में एक-दूसरे की सेवाएं का लेनदेन बिना मुद्रा के हस्तक्षेप के करने को राजी होते हैं। नेटवर्क से जुड़े किसी सदस्य को जब भी अपनी देखभाल, निजी कार्य या किसी घरेलू काम में सेवा की जरूरत होती है तो वह इस नेटवर्क से जुड़े दूसरे सदस्य से सेवा लेता है। इस सेवा में हथाई ( गपशप ) व मनबहलाव या आप बीती व पर बीती साझा कर मन को हलका करना भी शामिल है।

नेटवर्क से जुड़ा कोई सदस्य जितने घन्टे कोई सेवा देता है उतने घन्टे उसके खाते में जमा कर दिए जाते हैं, जो कि बाद में उसकी जरूरत के समय ऐसी ही किसी सेवा के रूप में ही चुका दिए जाते हैं। टाइम के लेन-देन ( क्रेडिट-डेबिट ) का रिकॉर्ड रखा जाता है। इसे आधुनिक वस्तु विनिमय प्रणाली (Modern Barter System) माना जा सकता है।

पृष्ठभूमि: इतिहास में झांक कर देखें तो वर्ष 1973 में जापान में पहली बार 'टाइम बैंक' स्थापित किया गया। स्विट्जरलैंड में टाइम बैंक ख़ूब प्रचलन में है। कोई भी व्यक्ति वहां टाइम बैंकिंग के ज़रिए अपनी जरूरत के समय दूसरे व्यक्ति से अपनी देख-रेख की सेवा हासिल कर लेता है। इसलिए वहां की सोशल लाइफ काफी बेहतर मानी जाती है। बदलते सामाजिक परिदृश्य के इस दौर में कई देश टाइम बैंकिंग प्रणाली को अपना रहे हैं।

भारत में अक्टूबर 2018 में विकलांगता और बुज़ुर्ग व्यक्तियों पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (National Human Rights Commission-NHRC) के एक पैनल ने “टाइम बैंक" योजना की सिफारिश की थी। पैनल का तर्क था कि इसकी सहायता से लोग ऐसे बुज़ुर्गों की देखभाल कर सकेंगे जो अपने परिवार से दूर अकेलेपन से त्रस्त जीवन जी रहे हैं।

चर्चा में क्यों?

मध्य प्रदेश की सरकार के आनंद विभाग ( Happiness Department ) ने राज्य में देश का पहला 'टाइम बैंक' खोलने का फैसला किया है। जैसे बुरे दौर के लिए बैंक में पैसा रखा जाता है, उसी तरह टाइम बैंक में आम आदमी अपने बुरे समय के लिए 'टाइम' को रिजर्व रख पाएगा। जिस प्रकार पैसों के लिए बैंक काम करता है, उसी प्रकार टाइम बैंकिंग का संचालन होगा।

इस टाइम बैंक से जुड़ा कोई सदस्य अपनी स्वेच्छा से किसी दूसरे को उसकी ज़रूरत के हिसाब से कोई सेवा देगा तो उसके बदले उसके टाइम के खाते में उतने ही घंटे जमा कर दिए जाएंगे, जिनका भुगतान वह ऐसी ही किसी सेवा के लिए घण्टों की सेवा के रूप में कभी भी ले सकेगा। टाइम के इस लेनदेन में मुद्रा का कोई हस्तक्षेप नहीं होगा।

टाइम बैंक का सबसे ज्यादा फायदा बुजुर्गों, रोगियों या अकेले रहने वाले लोगों को मिलेगा। वहीं, टाइम बैंक से सोशल सर्विस सेक्टर में भी बूम आने की संभावना है। देश-प्रदेश में हजारों समाजसेवी हैं, लेकिन उनकी समाजसेवा को कोई काउंट नहीं करता। वे टाइम बैंक में रजिस्ट्रेशन करवाकर अपने द्वारा की गई समाजसेवा के टाइम को भविष्य की ज़रूरत के हिसाब से रिजर्व करवा सकेंगे।

यदि टाइम बैंक का कोई खाताधारी किसी दूसरे खाताधारी को उसकी जरूरत के वक़्त जितने घन्टे सेवा देगा तो उसे बाद में उसकी जरूरत के वक़्त उतने घन्टे की सेवा उसेकिसी से मिल जाएगी। मसलन, कोई खाताधारी यदि एक महीने तक एक घंटे रोज किसी व्यक्ति की देखभाल करता है या किसी संस्था में समाजसेवा करता है तो उसके द्वारा एक महीने में खर्च किए गए कुल 30 घंटे उसके टाइम बैंक के खाते में जमा हो जाएंगे। बाद में में जरूरत पडऩे पर वह खाताधारी अपने बैंक खाते में जमा टाइम का भुगतान अन्य खाताधारी से सेवा के रूप में प्राप्त कर सकेगा। इसके लिए उसे टाइम बैंक को ई-मेल या फोन करना होगा। बैंक उसके खाते में जमा टाइम के अनुसार उसके लिए एक अन्य वॉलेंटियर को सेवा के लिए भेज देगा। इतना हीं नहीं, बैंक में जमा किए गए इस टाइम रूपी धन पर बैंक ब्याज के रूप में अतिरिक्त घंटे भी देगा। जिससे जरूरतमंद व्यक्ति आवश्यकता पडऩे पर बैंक में जमा टाइम से ज्यादा टाइम तक अपनी देखरेख या अन्य कार्य के लिए वालेंटियर की सेवा ले सकेगा। इस तरह टाइम बैंक के खाते से टाइम का क्रेडिट-डेबिट होता रहेगा। दुनिया कितनी रंग-रंगीली! कोई नहीं जानता कि वक़्त की रेत के नीचे दबी कोई परम्परा/प्रणाली कब अपने को झाड़- पोंछकर फिर नए कलेवर में हमारे सामने प्रकट हो जाए।

ग्राम स्वावलंबन एवं अंतर्निर्भरता

'तब' गाँव काफी हद तक स्वावलंबी थे। खेती-किसानी व पशुपालन के लिए रात-दिन की जरूरतों की पूर्ति गाँव में बसने वाले दस्तकारों द्वारा हस्तनिर्मित वस्तुओं से हो जाती थी। शहर-क़स्बों का रुख बिरले अवसरों पर ही करना पड़ता था। गाँव इतने स्वावलंबी थे कि जीवन की आधारभूत आवश्यकताओं की पूर्ति गाँव में ही सेवा-विनिमय की।अंतर्निर्भरता प्रणाली के तहत हो जाती थी। उस समय एक ग्रामीण को मिर्च-मसाले या कभी-कभार गुड़-चावल और कपड़े के अलावा कुछ भी बाजार से ख़रीदने की जरूरत नहीं होती थी। गांववासी अपनी जरूरतें सीमित रखते थे। इतनी सीमित कि उन्हें अंगुलियों पर गिना जा सकता था। कम में संतुष्ट हो जाना उनकी ख़ासियत थी। इसीलिए वे सुखी जीवन जीते थे।

पुरानी परिपाटियां कुछ ऐसी थीं कि उनके मार्फत समाज को अपनी कामकाजी ज़िंदगियों की घनी अंतर्निर्भरता से रूबरू होना पड़ता था। लिहाज़ा बिरादरी व बस्ती के लोगों से सामाजिक रूप से जुड़कर रहना जरूरी था। बुलावा देने के लिए नाई, मांग में सिंदूर डालने में 'नायण', चूड़ी पहराई में लखारी, कुआं पुजाई में कुम्हार -कुम्हारिन -- इन सबकी स्पष्ट भूमिका रहती थी। साल भर की सेवा के बदले सेवा प्रदाता को किसान जातियां निश्चित मात्रा में अनाज देने के अलावा इन जातियों के परिवारों की जरूर आवश्यकताएं भी पूरी करती थीं। इस तरह परस्पर सहयोग से सामाजिकता को बढ़ावा मिलता था।

'तब' गाँवों की तो बात ही छोड़िए, यहाँ तक कि छोटे क़स्बों में भी कोई होटल नहीं होता था परंतु गाँव में कोई आगंतुक या राहगीर भूखा नहीं रहता था। संसाधन कम थे पर दिल से दरियादिल थे। ख़ुद भले ही कम खा कर संतोष कर लें पर मेहमान या आगंतुकों की आवभगत करने में कोई कसर नहीं छोड़ते थे। उसको खाना और रुकने की व्यवस्था ख़ुशी से करते थे।

ग्राम अपने आप में एक स्वतंत्र सामाजिक, आर्थिक, प्रशासनिक व न्यायिक इकाई थे। फ़ैसले गाँव के गुवाड़ व चौक में पंच-पटेलों द्वारा लिए जाते थे। उस न्यायिक प्रक्रिया में सामंती पुट जरूर होता था पर फ़ैसला तुरत-फुरत किया जाता था।

वर्तमान में वैश्वीकरण, नगरीकरण, राजनीतिक चेतना और नवीन व्यवस्थाओं व शिक्षा के प्रसार के कारण पढ़े-लिखे नौजवानों द्वारा पुश्तैनी पेशा छोड़कर अन्य पेशा अपनाने के परिणाम स्वरूप अंतर्जातीय संबंधों में खासा बदलाव आ चुका है।

मुद्रा का वर्चस्व

वस्तु-विनिमय प्रणाली की समाप्ति के बाद मुद्रा का वर्चस्व हर ओर स्थापित होने से सहूलियत के साथ- साथ कई बुराइयाँ भी पनपी है। अंग्रेज़ी के प्रख्यात कवि मिल्टन ने Oxymoron ( विरोधाभाष ) अलंकार का इस्तेमाल करते हुए गोल्ड ( बोलचाल में धन-दौलत ) को मूल्यवान बुराई ( precious evil ) और अभिशाप (curse ) कहा है। गोल्ड या दौलत वो लुभावना फंदा ( sweet snare ) है जिसमें आदमी ख़ुशी-ख़ुशी फंसता जाता है। ये वो नशा है जो मानव को दानव बनने की ओर धकेल देता है। ये वो अतृप्त रहने वाली भूख है जो इंसान से उसकी नैतिकता और इंसानियत छीन लेती है।

भारत में रुपये का सफ़र - गुज़रे ज़माने में भारत में मुद्रा के नाम में एकरूपता नहीं थी। मुद्रा को अलग अलग नामों से पुकारा जाता था। कहीं 'मुहर' कहीं 'दाम', कहीं 'टका' तो कहीं 'आना'। हर क्षेत्र में मुद्रा की अलग पहचान थी। बाद में इसे रुपया का नाम दिया गया। दिलचस्प बात यह है कि भारत में रुपया के रूप भी बदलते रहे परंतु उसका नाम आज भी मौजूद है। 

इतिहास में झांककर देखें तो पता चलता है कि भारत में मुद्रा को रुपया नाम सबसे पहले शेरशाह सूरी ने दिया था और सबसे पहले रुपया का चलन भी उसी ने सन 1540-45 में अपने शासनकाल में शुरू किया था। उसने रुपये का जो सिक्का चलाया था वह चांदी का था और उसका वज़न 178 ग्रेन (करीबन 11.534 ग्राम) था। उसने तांबे के सिक्के जिन्हें 'दाम' कहते थे और सोने के सिक्के जिन्हें 'मोहर' कहते थे, भी चलाए। लेकिन आज जिस रुपये का इस्तेमाल हम करते हैं वह कई पड़ावों से गुज़रता हुआ अपने वर्तमान स्वरूप तक पहुंचा है।

भारत में ब्रिटिश शासन के दौरान भी चांदी का एक रुपया का सिक्का प्रचलन में रहा। पर इसका वजन 11.66 ग्राम था, और इसमें 91.7 प्रतिशत तक शुद्ध चांदी थी। रुपए (11.66 ग्राम) को 16 आने या 64 पैसे या 192 पाई में बांटा (divide ) जाता था।

साल 1947 में भारत के आजाद होने के बाद भी ब्रिटिश सिक्के साल 1950 तक देश में चलन में थे। आज़ाद भारत में साल 1950 में एक रूपये का पहला सिक्का ढाला गया था।

भारत में रुपये का दशमलवीकरण सन 1957 में हुआ। इस प्रकार एक भारतीय रुपया 100 पैसे में विभाजित हो गया। इसलिए इसके बाद कभी -कभी पैसे के लिए नया पैसा शब्द भी इस्तेमाल किया जाता था। 1957 में भारत डेसिमल सिस्टम के तहत सिक्के ढलने लगे, लेकिन कुछ समय तक डेसिमल और नॉन डेसिमल सिक्कों दोनो का ही देश में चलन था। भारत में 'आना' सिस्टम में 1 आना, 2 आना, 1/2 आना के सिक्के चलते थे। 'आना' सीरीज या प्री-डेसिमल कॉइनेज के नाम से चर्चित इन सिक्कों में 1 आना, 2 आना, 1/2 आना के सिक्के चलन में थे।

रुपये की सबसे छोटी वैल्यू का सिक्का आधा पैसा को 1947 में आधिकारिक तौर पर बंद कर दिया गया। 1 पैसा, 2 पैसा, 3 पैसा, 5 पैसा, 10 पैसा, 20 पैसा और 25 पैसा, 50 पैसा के सिक्के जारी किए गए और वे देश में लंबे समय तक चलन में रहे।

1 पैसे का सिक्का 1957-1972 के बीच चलन में था और उसे ढाला भी जाता रहा। महंगाई ने साल दर साल 1 रुपये से कम के पैसों के सिक्कों को प्रचलन से बाहर कर दिया और इनमें से अधिकांश तो अब आधिकारिक तौर पर प्रतिबन्धित हो चुके हैं।

इसी तरह टका, आना, चवन्नी या पावली, अठन्नी अब बीते ज़माने की बात हो चुकी है। वक़्त ऐसा भी था जब पावली (पच्चीस पैसे का सिक्का) भी अच्छी रक़म मानी जाती थी। पावली रुतबे का द्योतक मानी जाती थी। कहावत भी थी कि "ठाड़े की पावली पांच आना में चाले"। इसका मतलब होता था कि शक्तिशाली का रुतबा हद से ज़्यादा क़ायम रहता है। महंगाई के दौर में जब चव्वनी का कोई मोल नहीं रहा और चलन से बाहर हो गई तो निक्कमे/ नाकारा लोगों को इंगित करने के लिए "चव्वनी छाप" मुहावरा प्रचलित हो गया।

भारत में मुद्रा की इकाइयां - भारत में मुद्रा की कई इकाइयां प्रचलन में रही हैं। यह कहानी बेहद दिलचस्प है। यह बात सही है कि आज एक रुपये की क़ीमत न के बराबर रह गई है लेकिन पुराने जमाने में एक रुपया बहुत बड़ी मुद्रा माना जाता था। उसकी खरीददारी की ताकत भी खूब हुआ करती थी। इसलिए उस समय एक रुपया से कई छोटी मुद्राएं भी चलन में थीं। रुपये की ताकत का बखान करती एक कहावत प्रचलन में थी: " जे रूपली पल्लै तो रोही में चलै।" अर्थात अगर नक़दी जेब में हो तो आदमी का रुतबा हर कहीं भी क़ायम हो जाता है।

कंगाली का ज़िक्र करते हुए अक्सर एक जुमले का इस्तेमाल किया जाता है- 'मेरे पास तो एक फूटी कौड़ी भी नहीं है'। पुराने ज़माने में 'फूटी कौड़ी' भी मुद्रा हुआ करती थी और उसे प्राचीन भारत में सबसे छोटी मुद्रा के रूप में जाना जाता था।

फूटी कौड़ी से रुपये तक का वर्गीकरण इस तरह था -

फूटी कौड़ी (Phootie Cowrie) से कौड़ी, (3 फूटी कौड़ी "=1 कौड़ी)

कौड़ी से दमड़ी (Damri), (10 कौड़ी =1 दमड़ी)

दमड़ी से धेला (Dhela), (2 दमड़ी =1 धेला)

धेला से पाई (Pie), 1 धेला = 1.5 पाई

पाई से पैसा (Paisa), 3 पाई = 1 पैसा ( पुराना)

पैसा से आना (Aana), 4 पैसा =1 आना

आना से रुपया (Rupya) बना, 16 आना = 1 रुपया।

प्राचीन मुद्रा की इन्हीं इकाइयों ने हमारी बोल-चाल की भाषा को कई कहावतें दी हैं, जो पहले की तरह अब भी प्रचलित हैं। जैसे -

एक 'फूटी कौड़ी' भी नहीं दूंगा।

'धेले' का काम नहीं करते हो!

चमड़ी जाये पर 'दमड़ी' न जाये।

'पाई-पाई' का हिसाब रखना।

'पीसै कनै ही पीसो आवै।'

'पीसौ गांठ को, हथियार हाथ को।' (अर्थात गांठ यानी पास रखा धन तथा हाथ में उठाया हथियार ही वक़्त पर काम आता है। )

बात आपकी सोलह 'आने' सच।

न्योली का रुतबा - बीते ज़माने में प्रचलित चांदी के रुपयों व अन्य सिक्कों के सुरक्षित संधारण और परिवहन के लिए लोग लगभग तीन इंच चौड़ी और पूरी कमर पर बंध सकने वाली लंबी बेल्टनुमा कोथली का इस्तेमाल करते थे जिसे न्योलीकहा जाता था। न्योली रंगीले सूत के मजबूत मोटे धागों से बुनी हुई होती थी और इसके दोनों छोरों पर गुंथी हुई मजबूत डोरियाँ जुड़ी होती थीं। इसमें सिक्के एक के ऊपर एक रखे जाते थे। न्योली में रुपयों को भरकर उसे लोग अपनी धोती के अंदर बेल्ट की तरह कमर के बांध कर कहीं ख़रीददारी करने जाते थे। न्योली पर कई कहावतें प्रचलित थीं। वैसे न्योली का सीधा अभिप्राय दौलत से भी लिया जाता था। बाद में करेंसी नोट्स प्रचलन में आने पर बुज़ुर्ग रुपये धोती की अंटी में दबाए रखते थे। उसे ख़र्च करने से बचते थे, ख़ूब अनाकानी करते थे। अंटी ढीली करना उनके लिए टेढ़ी खीर होता था क्योंकि वे हर प्रकार के अभाव में पले- बढ़े लोग थे।

बली (पूँजी) - 'तब' स्पेयर मुद्रा या नक़दी बिरले लोगों के पास ही सुलभ होती थी। अकाल और गाँव में अनाज की किल्लत की स्थितियों में कतार (दूर-दराज़ अंचल से धान खरीदकर ऊँटों पर लाद कर लाना) लाने, पशुधन खरीदने, छिटपुट कमाई का घर पर कोई छोटा -मोटा धंधा ( कुटीर उद्योग ) शुरू करने के लिए कच्चा माल खरीदने या घर पर किसी ठींचे( विवाह आदि कोई उत्सव ) पर भोज हेतु आवश्यक सामग्री खरीदने के लिए बली( धनराशि/ पूँजी/ नक़दी ) का जुगाड़ करने के लिए गांववासियों को नक़दी उधार देने वाले बोहरे/ साहूकार की ख़ूब जी-हज़ूरी करनी पड़ती थी। 'तब' लोग अपनी हैसियत को ध्यान में रखकर ही कोई जोख़िम का नया काम शुरू करते थे। "तेते पाँव पसारिये जेती लांबी सौड़", इस कहावत के मर्म को समझते थे।

उधारी - 'तब' उधारी पर ब्याज दर सामान्यतः 1रुपये 9 आना सालाना तय थी। यह दर अटपटी जरूर लगती है। दर को आठ आने की बज़ाय नौ आने शायद इसलिए किया गया था कि नौ की संख्या शुभ मानी जाती है। इसके अलावा और तो कारण समझ में नहीं आता। बोहरे (रुपये उधार देने वाले ) गाँव में गिने- चुने ही होते थे और उनकी चौधर व धौंसपट्टी भी खूब चलती थी। उधारी की लिखावट बाकायदा बही में एक निश्चित प्रारूप में लिखी जाती थी, जिसमें रकम उधार लेने का प्रयोजन आवश्यक रूप से लिखा जाता था। इसके साथ ही रक़म वापिस लौटने की समय सीमा अर्थात कोल( वादा ) का भी उल्लेख किया जाता था। उधार लेने वाले और गवाह की अंगूठा निशानी ली जाती थी। इसके लिए उस समय लेखन के लिए प्रचलित कलम ( फाउंटेन पेन या होल्डर) से अंगूठे पर स्याही रगड़कर अंगूठा निशानी बही में ले ली जाती थी। सही प्रारूप में उधारी लिखना जानने वाले गाँव में बिरले ही होते थे, इसलिए उनकी ख़ूब पूछ रहती थी। लिखने वाले का नाम उस लिखावट के नीचे ब:कलम कर नीचे लिखा जाता था। बुज़ुर्गों से ऐसा भी सुना है कि बोहरा/ साहूकार अपनी कोथली खोलने के नाम पर उधार लेने वाले से चवन्नी ( चार आने / 25 पैसे ) ऐंठ लेता था। उस ज़माने में चव्वनी भी बड़ी रक़म में शुमार थी। कुछ लालची बोहरे ब्याज़ की राशि अग्रिम रूप में काटकर रकम उधार देते थे।

गांव में कुछ एकदम निरक्षर लोग दिमाग़ी रूप से इतने तेज़ होते थे कि बिना किसी कागज़-कलम के अंगुलियों पर टेढ़ी-मेढ़ी ब्याज़ दर के बावज़ूद मूलधन पर ब्याज़ की एकदम सही-सही गणना कर लेते थे। सन 1970 के आसपास पढ़ने वाले लड़कों के लिए उधारी पर एक रुपया नौ आना ब्याज दर की गणना करना तभी संभव हो पाता था जब वे दशमलव प्रणाली के तहत इसे 1.55 रुपया मानकर गणना करते थे।

बाढ़ा/बाढ़ी प्रणाली - 'तब' गाँवों में नक़दी की किल्लत होने के कारण वस्तुओं एवं अनाज की अदला- बदली की एक स्वीकार्य प्रणाली प्रचलन में थी जिसे बाढ़ी ( सवाया/ सवा गुणा पर देना ) पर लेना- देना कहते थे। किसी के पास बाजरा या अन्य धान की खाने या बिजाई के काम के लिए कमी हो जाती थी तो जिसके पास कुछ सरप्लस धान होता था उससे वह अपनी जरूरत का धान बाढ़ी पर लेता था। अर्थात जितना धान उसने अब बाढ़ी पर उधार लिया है उसे अगली उपज पर उधार लिए गए धान की मात्रा से सवाया अर्थात सवा गुणा चुकाना होगा। इस प्रणाली के तहत धान की अदला- बदली होती रहती थी और जिसके पास सरप्लस धान होता था वह ख़राब होने से बच जाता था।

ग्राम -उद्योग और स्वावलम्बन

विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग (1949) ने अपनी रिपोर्ट में ग्राम्य जीवन के महत्व को स्पष्ट करते हुए लिखा है, “नगरों का विकास गाँवों से होता है और नगरवासी निरन्तर ग्रामवासियों के परिश्रम पर ही पनपते हैं। जब तक राष्ट्र का ग्रामीण कर्मठ है तब तक ही देश की शक्ति और जीवन आरक्षित है। जब लम्बे समय तक शहर गाँवों से उनकी आभा और संस्कृति को लेते रहते हैं और बदले में कुछ नहीं देते, तब वर्तमान ग्राम्य जीवन तथा संस्कृति के साधनों का ह्रास हो जाता है और राष्ट्र की शक्ति कम हो जाती है।” 

ग्रामीण अर्थव्यवस्था में आज़ादी से पहले व उसके लगभग तीन दशक तक कुटीर उद्योगों का ख़ास स्थान रहा। गाँवों के विकास में लघु एवं कुटीर उद्योगों की भूमिका के बारे में महात्मा गाँधी कहते हैं: “जब तक हम ग्राम्य जीवन को पुरातन हस्तशिल्प के सम्बंध में पुनः जागृत नहीं करते, हम गाँवों का विकास एवं पुनर्निर्माण नही कर सकेंगे। किसान तभी पुनः जागृत हो सकते हैं जब वे अपनी जरूरतों के लिये गाँवों पर ही निर्भर रहें न कि शहरों पर, जैसा की आज... देखने को मिल रहा है।" वे आगे कहते हैं: "बिना लघु एवं कुटीर उद्योगों के ग्रामीण किसान मृत है, वह केवल भूमि की उपज से स्वयं को नहीं पाल सकता। उसे सहायक उद्योग चाहिए।” 

गाँव में बसने वाली हस्तकला में दक्ष दस्तकार जातियों की खेती एवं पशुपालन के काम में जरूरत की चीजों के निर्माण में विशेष भूमिका रही है। खाती द्वारा लकड़ी का काम अर्थात बढ़ईगिरी, बुनकर द्वारा कपड़ा बुनाई का काम, कुम्हार द्वारा मिट्टी के बर्तन बनाने का काम, मोची द्वारा चमड़े की जूतियाँ बनाने का काम, लुहार द्वारा घरेलू व खेती के लिए जरूरी औजार का निर्माण, फ़ुर्सत में घर पर सूत की कताई, रस्सी निर्माण, महिलाओं द्वारा कसीदाकारी, पोमचे पर बंधेज बांधना, सिलाई-कढ़ाई- बुनाई आदि को ग्राम विकास की दृष्टि से काफी महत्त्वपूर्ण माना जा सकता है। स्वावलंबन कितना सशक्त होता है इसकी मिसाल हमें आज़ादी के आंदोलन में देखने को मिलती है जब गांधी जी ने मिल के कपड़ों के विकल्प के रूप में चरखे का पुनरुद्धार किया था। उनके आह्वान पर जनता ने विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार कर घर -घर में चरख़े पर सूत कताई कर खादी के कपड़े पहनना शुरू कर दिया था। इससे भारत में विदेशी मिल के कपड़े का व्यापार चौपट हो गया था। चरख़े ने स्वावलम्बन की एक साकार तस्वीर दुनिया के सामने प्रस्तुत कर दी थी।

'अब' हमारे गाँव कॉरपोरेट घरानों के कारखनों व बहुराष्ट्रीय कंपनियों के माल की बिक्री के बाजार बनते जा रहे हैं। यह मानी हुई बात है कि कोई व्यक्ति या गाँव यदि उत्पादक नहीं, सिर्फ उपभोक्ता ही है तो उसका पतन निश्चित है। व्यक्ति या गाँव पहले उत्पादक हो, फिर उपभोक्ता, तभी उसका अस्तित्व बचा रहेगा।

दुःखद स्थिति यह है कि वर्तमान में हमारे गांव, शहरों के उपनिवेश बन चुके हैं। गाँव का आदमी प्रोड्यूसर की बज़ाय कंज्यूमर बन चुका है। प्रसाधन की सामग्री, घटिया किस्म के कोल्ड ड्रिंक्स, फ़ास्ट फूड, गुटखा, यूज एंड थ्रो वाली विभिन्न वस्तुओं का बाज़ार गाँवो में सज चुका है। शहरी जीवनशैली से जुड़ी सब चीजें अब गाँवो में धड़ल्ले से बिक रही हैं और ख़पत भी सबसे ज़्यादा वहीं हो रही है। अचंभा तो यह है कि गाँव में पानी भी अब कैन में भरा हुआ कंज्यूम होने लगा है।

ग्रामीण संस्कृति नष्ट हो चुकी है। उल्टी गंगा बहने लगी है। गाँव के कुछ घरों में शहर से लाई गई दूध की थैलियों से चाय बनने लगी है। चाय की थड़ियाँ गाँवो के चौक व बस स्टैंड पर अमूमन दिखाई देने लगी हैं। कई रूपों में नशा धड़ल्ले से बिक रहा है। युवा शक्ति इसकी लत का शिकार होकर हर दृष्टि से खोखली हुई जा रही है।

कुटीर उद्योग क्यों जरूरी ? - मुद्रा का वर्चस्व स्थापित होने के बाद औद्योगिक व शहरीकरण की रफ़्तार तेज हुई और नतीज़तन ग्राम कुटीर उद्योगों का पतन हो गया। मुद्रा का हर तरफ़ प्रभुत्व क़ायम होने से किसान आबादी का विभेदीकरण (डिफरेंसिएशन) कर उसका कंगालीकरण करने की जो साजिश वर्षों पहले रची गई थी अब वह भी सफ़ल हो रही है।

कृषि के सहायक धंधों के रूप में लघु एवं कुटीर उद्योगों का विशेष महत्व है क्योंकि ये उद्योग पूंजी प्रधान न होकर श्रम प्रधान उद्योग हैं और उनमें बहुत कम पूंजी की आवश्यकता होती है। छोटे उद्योग आय एवं संपति के विकेंद्रीकरण को प्रोत्साहित करते हैं। पशुपालन, दुग्ध व्यवसाय, सूत कातना, कपडा बुनना, रस्सी बुनाई, बीड़ी बनाना, रस्सी या टोकरी बनाना, पत्तल, कुल्हड़ बनाना, कागज़ के लिफाफे बनाना आदि ऐसे उद्योग हैं जो आसानी से गाँवों में संचालित किए जा सकते हैं। कुटीर उद्योगों को तरज़ीह दी जाए तो यह रोजगार परक, पर्यावरण के अनुकूल और अर्थवयवस्था के लिये बेहतर होगा।

हर छोटी मोटी चीज़ के बड़े पैमाने पर उत्पादन के कारखाना लगने से मशीनों ने श्रमिकों का रोजगार का जरिया छीन लिया और पर्यावरण को भी नुकसान पहुंचाया है। पोलिपैक और प्लास्टिक के बढ़ते उपयोग से हर तरफ गंदगी फैल रही है और नालियां अवरुद्ध हो रही हैं। पत्तल, कुल्ल्हड, कागज आदि तो नष्ट होकर मिट्टी में मिल जाते हैं।

गाँवों से पलायन - गांवों में ढ़ांचागत विकास उपेक्षित रहने से गांवों से बड़ी संख्या में लोगों का पलायन शहरों की ओर होता जा रहा है। इससे शहरों के ढांचागत संसाधनों पर दबाब बढ़ा है तथा अधिकांश शहर जनसंख्या के बढ़ते दबाव को वहन कर पाने में असमर्थ हो गए हैं। यह विडम्बना ही है कि भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहीं जाने वाली कृषि अर्थव्यवस्था निरन्तर कमजोर हो रही है और गांव वीरान होते जा रहे हैं।

खेतों में भरपूर हाड़ गलाने के बावजूद किसान को खेती में नुकसान उठाना पड़ रहा है। जॉर्ज मोनबियोट का कहना है: अगर धन कड़ी मेहनत और उद्यम का अंतिम परिणाम होता तो अफ्रीका की हर महिला करोड़पति होती। यह बात हर जगह के किसानों पर लागू होती है। वर्तमान व्यवस्था में किसान की खून-पसीने की कमाई के मुख्य अपहर्ता प्रायः सामने नहीं होते। वे बदलते रहते हैं। प्रशासन, न्याय, ऋण और व्यापार के पूरे तंत्र पर इस गिरोह का ऑक्टोपसी नियंत्रण कायम है। बाल्जशक के शब्दों में: ‘‘छोटे किसान की त्रासदी यह है कि सामन्ती शोषण से मुक्त होकर वह पूंजीवादी शोषण के जाल में फँस गया है।"

राजनीति की घुसपैठ ने ग्रामीण समाज की समरसता और एकता को नष्ट कर दिया है। सरकार ने पंचायती राज कानून तो लागू किया, पर गांधीजी की कल्पना के अनुसार ग्राम पंचायतों को स्वावलंबी बनाने हेतु कुछ नहीं किया। गांधीजी ने ग्रामसभा से लोकसभा तक के लोकतांत्रिक ढांचे की कल्पना की थी और कहा था कि ‘आजादी नीचे से शुरू होनी चाहिए। वे कहते थे कि ‘भारत अपने चंद शहरों में नहीं बल्कि सात लाख गांवों में बसा हुआ है।’ गांधी का गणतंत्र गांव की सत्ता पर केंद्रित था।

गांववासी जब अपनी कार्य कुशलता से स्वावलंबी बनने की दिशा में सार्थक कदम उठाते हुए उत्पादन करेंगे तभी उन्हें स्वाभिमान, आत्मविश्वास, आत्मनिर्भरता, साहस, आशा, स्वतंत्र सूझ-बूझ और शक्ति प्राप्त होगी। एक वो भी दौर था जब गांव ही शहरों की मुख्य जरूरतें पूरी करते थे। पर अब स्थितियां बदल चुकी हैं। उदाहरण के लिए, दातुन के बदले गाँव में तरह-तरह के दंत मंजन, टूथपेस्ट, टूथब्रश अपनी पैठ जमा चुके हैं। खेत -जोहड़ों के पौधों की टहनियों के रेशों से बुनी डोरियाँ, सन या मूंज की रस्सियों की जगह तार और प्लास्टिक की डोरियां, लकड़ी की खाट की जगह लोहे के पाइप से बनी चारपाई, कपड़े की कतरनों या सूत की कताई से बुनी गई देहाती चटाई के बदले सिंथेटिक धागों से निर्मित चटाइयां, पेड़ों के पत्तों से बनी पत्तल की जगह प्लास्टिक की पत्तलें, कुम्हार द्वारा निर्मित घड़े, सुराही, कुल्हड़ की जगह प्लास्टिक के घड़े, गिलास, थर्मस आदि, लुहार या कसेरे द्वारा हाथों के हुनर से निर्मित जंजीरों की जगह कारखानों में निर्मित जंजीरें, देहाती महिलाओं द्वारा हाथ से गूंथे पंखे, कढ़ाई किए गए आसन, जाज़म, शॉल आदि की जगह कारखानों में निर्मित सिंथेटिक धागों की सामग्री के प्रचलन से दस्तकारी में गाँवों के निपुण लोग बेकार हो गए हैं।

गांधी जी कुटीर उद्योगों के पक्षधर थे, जिसमें गांव के लोगों की बुनियादी जरूरतें पूरी हों, लेकिन हाथ से काम न छिने। वे वैसी मशीनों के पक्ष में थे, जो देशज प्रणाली पर काम करे और कारीगरों की क्षमता को बढ़ाए, उन्हें सुविधा प्रदान करें। अंधाधुंध औद्योगिकरण ने न केवल गांधी परिकल्पित ग्राम-स्वराज्य को, बल्कि गांवों में सदियों से चले आ रहे हस्त-उद्योगों को भी तहस-नहस करके रख दिया। अब गांवों में कुम्हार, बढ़ई, लोहार, बुनकर, ठठेरा (बर्तन बनाने वाले), मोची आदि सभी के हस्त-उद्योग समाप्तप्राय हो चुके हैं और इनकी जगहों पर बड़ी-बड़ी कंपनियों, फैक्टरियों के उत्पादित माल ने कब्जा कर लिया है। गाँवों में काम-धंधे के अवसर समाप्त हो चुके हैं और वहां के युवक रोजगार के अभाव में शहरों की ओर या फिर खाड़ी देशों की ओर रोजगार के लिए पलायन करने को मजबूर हुए हैं।

निःसंदेह कृषि-यंत्रों के चलन ने खेती को सुविधाजनक बनाया, पर इसका अनिष्टकारी पक्ष इस रूप में प्रकट हुआ कि इसके कारण खेतिहर मजदूरों के लिए रोजगार के अवसर कम हो गए हैं। यही नहीं, इससे जुताई के काम आने वाले पशु-धन के अस्तित्व के समक्ष संकट उपस्थित हो गया है। ट्रैक्टर, थ्रेशर आदि ने ऊँटों व बैलों की उपयोगिता खत्म कर दी है।

अब सवाल यह है कि गांवों में युवकों को रोजगार कैसे उपलब्ध कराए जाएं? इसका समाधान यही है कि गांवों के पुराने पारंपरिक उद्योगों, जो शारीरिक श्रम पर आधारित थे, उनका पुनरुद्धार करना पडेगा। साथ ही शिक्षा-पद्धति में शारीरिक श्रम के महत्त्व और गरिमा को प्रतिष्ठित करना होगा। जाहिर है कि जिनके लिए विकास का मतलब सिर्फ मशीनीकरण, शहरीकरण और स्मार्ट सिटी रह गया है, जो डिजिटल इंडिया के पीछे दीवाने हैं, उन्हें ये बातें अटपटी लगती होंगी।

मितव्ययिता कमख़र्ची)

मितव्ययिता या कमख़र्ची (Frugality): बीते ज़माने में लोग देशज ज्ञान परम्परा का लाभ उठाते हुए खानपान के ख़र्चे में ख़ूब किफ़ायत करते थे। गांववासी हर दृष्टि से इकोफ़्रेंडली थे। वे मानते थे कि धरती पर अस्तित्व वाले हरेक जीव और वनस्पति की इस पारस्थितिकीय तंत्र ( ecological system ) में अहमियत है। किसी जंतु या वनस्पति को त्याज्य नहीं समझते थे। किस वनस्पति का क्या उपयोग संभव है, वे ये भलीभांति जानते थे। खेत-जंगल में उगने वाले हर पेड़-पौधे का विभिन्न रूपों में बेहतरीन इस्तेमाल करना वे बख़ूबी जानते थे। ये रहे कुछ उदाहरण जो इस बात को साबित करते हैं।

फसल कटाई के बाद मटकाचर की तरकारी का लगभग तीन महीनों तक भरपूर लुत्फ़ उठाते थे। मरु-प्रदेश में पैदा होने के कारण काचरे को ‘मरुजा ' भी कहते हैं। काचरे के बीज खेत में उगाए नहीं जाते अपितु इसकी बेल वर्षा ऋतु में विशेष रूप से खरीफ की फसल के समय खेतों में स्वतः ही उग जाती है। खेतों में फसल कटाई के समय मटकाचरों से लदी हुई बेलें हर ओर दिखाई देती हैं। कच्चे मटकाचर हरे एवं सफेद- सा रंग लिए हुए चितकबरे प्रतीत होते हैं तथा स्वाद में अत्यन्त कड़वे होते हैं। पकने पर ये पीले पड़ जाते हैं। पके हुए मटकाचरों से अत्यन्त मधुर एवं भीनी-भीनी खुशबू आती रहती है। काचरे कच्ची अवस्था में अत्यन्त कड़वे तथा पक जाने पर खट्टे-मीठे हो जाते हैं। मटकाचरों को छीलकर व काटकर उन्हें सूखा लिया जाता था और फिर इस सूखे शाक का इस्तेमाल कर लेते थे।

फसल कटाई के बाद खेत में इधर- उधर फैली तूम्बे की बेल के लगे तूम्बों का भी समुचित उपयोग करना वे जानते थे। स्वाद में तुम्बा बड़ा कड़वा होता है पर इसमें पौष्टिक तत्वों की मौजूदगी से वे परिचित थे। इसलिए खेत से तूम्बे इक्कठे कर उन्हें काटकर पशुओ को खिलाते थे। तूम्बे के बीजों को एकत्रित कर उनके लड्डू बनाने में उन्हें महारत हासिल था। डाइबिटीज के रोगी के लिए तूम्बे के बीज गुणकारी सिद्ध होते हैं।

मतीरे भरपूर मात्रा में खुद भी खाते थे तो पशुओं को भी काटकर खिलाते थे। मतीरे के बीजों को सुखाकर उन्हें भून लेते थे और फिर गुड़ के साथ मिलाकर उनके लड्डू बना लेते थे। इतना ही नहीं मतीरे के बीजों व ग्वारफली को सुखाकर उन्हें नमक-मिर्च के साथ भूनकर नमकीन तैयार कर लेते थे। सब कुछ होम मेड होता था।

ज़ुकाम होने पर रोटियां सेंकने के बाद गर्म तवे पर नमक मिला पानी डालते थे। पानी तत्काल उबल पड़ता था। जब वह गुनगुना हो जाता था तो उसे पीते थे और ज़ुकाम से उन्हें निजात मिल जाती थी। छोटी-मोटी शारीरिक पीड़ा को सहन करने की ताकत रखते थे। छोटी- मोटी बीमारियों के उपचार के लिए जड़ी- बूटियों से बना काढ़ा पीकर शारीरिक पीड़ा से मुक्त होने का प्रयास कर लेते थे। अस्पताल का रुख संकटपूर्ण स्थिति में ही करते थे।

फोड़ा-फुंसी से ग्रस्त होने पर घरेलू नुस्खों से उपचार करते थे। पानी में रांगजड़ (झाड़ी की जड़ें) या नीम की पत्तियां डालकर उसे उबालते थे और फिर उससे घाव व फोड़े-फुंसी को धोते थे। उस दौर का जीरो बज़ट वाला एंटीसेप्टिक यही था। फोड़े -फुंसी पर एंटीबायोटिक क्रीम के रूप में नारियल की जटा या उसके अंदर के कठोर आवरण से बनाई गई हर घर में सर्व सुलभ टोकसी के टुकड़ों को जलाकर उससे जो राख बनती थी उसमें घी मिलाकर एंटीबायोटिक क्रीम तैयार कर लेते थे। कई बार ऊँट के मिंगणों को जलाकर उसकी राख में घी मिलाकर एंटीबायोटिक क्रीम बनाई जाती थी। ख़ास बात यह है कि ये होम मेड जीरो बज़ट वाली क्रीम उस दौर में असरकारक सिद्ध होती थी।

झाड़ियों की कांटेदार टहनियों का उपयोग घर की बाड़ बनाने में लेते थे और उसका पाला ( पत्ते ) पशुओं के लिए पौष्टिक चारा के रूप में इस्तेमाल किया जाता था। झाड़ियों को काटकर उसका पाला झाड़ने के समय बेरों की बोरियां भर लेते थे और बाद में में खाते रहते थे।

जोहड़े व खेतों में बहुतायत में उगने वाले आकड़े व खींप की सूखी टहनियों के ऊपर के रेशे ( सूतिया ) को उतारकर उसकी बँटाई कर मजबूत रस्से-रस्सियां गूंथ लेते थे। खेतों में बहुतायत में उगने वाले कुंचो के तिनकों से तिबारी या झोंपड़े के ऊपर की छान/ छप्पर बना लेते थे। उसी के नरम तिनकों को सिल( चट्टान ) पर रखकर मोगरी से कूट कर उसके रेशों को गूंथ कर मूंज की रस्सियां बना लेते थे।

खेत में निपजै हरे शाक-सब्जी यथा- सांगरी, टिंडसी, लोये, काकड़िया, मटकाचर आदि-- की बहुतायत होती थी तो हर किसान परिवार में महिलाएं इन्हें आवश्यकतानुसार छिलकर, उबालकर व सूखा कर इनको खेलरा', फोफलिया, फ़ोलरे, सूखी सांगरी आदि सूखे शाक का रूप दे देती थीं। ठालप( फ्री टाइम ) में हर घर में मोठ व मूंग के मंगोड़ी व पापड़ बना लिए जाते थे। ये सब मेहनत व धीरज वाला काम होता था। खेती की ऋतु के बाद के महीनों में इनसे शब्जी पका लेती थीं।

खेती की रुत में घर पर सूखे शाक के संग्रहण हेतु अगर धीरज का दामन थाम कर मेहनत की जाए तो आजकलशहरों के गंदे नाले के पानी से सिंचित और कीटनाशकों के अंधाधुंध प्रयोग से पली- बढ़ी सब्ज़ियों पर निर्भरता काफ़ी हद तक कम की जा सकती है।

'तब' महिलाओं व पुरुषों दोनों में गज़ब की कार्यक्षमता थी, धीरज उनमें कमाल का था। तभी ये सब झुंझलाहट भरे काम बिना सब्र खोए कर पाते थे। सब्र की क़ीमत को समझते थे। सब्र का फल मीठा होता है, ऐसा वो मानते थे। तुरत- फुरत फल की चाहत नहीं रखते थे। धीरज की प्रतिमूर्ति थे 'तब' के लोग। उतावलेपन के ख़तरों को समझते थे। एक कहावत भी है, " तावलो सो बावलो।" कबीर के जीवन दर्शन को आत्मसात करने वाले लोग थे। इसलिए वे कहा करते थे:

धीरे धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय !
माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आये फल होय !!

'अब' हालात बदल चुके हैं। अब गांव में सामान्यतः सूखा शाक तैयार करने की परिपाटी ख़त्म हो चुकी है। घर में किसी आयोजन पर सूखी सांगरी बाज़ार से खरीद कर लाई जाती है। 'तब' और 'अब' की महिलाओं में धीरज का क्षरण किस तेज गति से हुआ है, इसकी एक मिसाल पेश कर रहा हूँ।

पहले घरों में दूध प्रचुर मात्रा में होता था। उसे गर्म करना फिर उसे गुनगुना होने का लंबा इंतज़ार करना ताकि उसमें जावणडालकर उसे दही के रूप में परिवर्तित किया जा सके, इस टाइम टेकिंग टास्क को धीरज धारण कर सम्पन्न करते थे। पर अब ऐसा नहीं है। अब तो गाँवों से शहर में आबाद घरों में मोल लिए गए तीन-चार लीटर दूध को गर्म करने के बाद उसके स्वतः ठंडा होने का इंतज़ार करना गवारा नहीं। गर्म दूध को परात में उड़ेलकर गर्मियों में उसे कूलर के सामने या फ़्रीज़ में रखकर उसे तुरत- फुरत में ठंठा करने की जुगाड़ बिठाई जाती है। कमरों में पौंछा लगाकर उसे तुरत- फुरत में सूखने के लिए मजबूर करने के लिए तेज गति से फैन चलाये जाने की एक प्रथा सी घरों में प्रचलित हो गई है। कितना बदल गया इंसान!

पर्यावरण के प्रति श्रद्धा - गुज़रे ज़माने में लोग अनपढ़ जरूर थे पर पर्यावरण के प्रति उनकी समझ और उनका प्रेम अगाध था। पर्यावरण का संरक्षण उनकी दिनचर्या का अहम हिस्सा था। इसलिए प्राकृतिक संसाधनों की पर्यावरण की फिजूलखर्ची से बचते हुए उनका युक्तिसंगत सदुपयोग करते थे। हर क़दम पर किफायत उनकी जीवन शैली की विशेषता हुआ करती थी। धरती को माँ मानते हुए उसके उपहारों का सदुपयोग करते थे। मान्यता थी कि धरती पर हक़ हमारा नहीं; ख़ुद धरती का मालिकाना हक हम पर है। हम धरती को काबू नहीं कर सकते, लेकिन धरती हमें अपने काबू में रखती है।

'Earth does not belong to us; we belong to Earth. We cannot hold Earth but Earth holds us.'

गांधी जी ने भी तो सदियों से बह रही लोक ज्ञान गंगा में डुबकी लगाकर ही कहा था कि धरती हर आदमी की जरूरतों की पूर्ति करने का पर्याप्त प्रबंध करती है, लेकिन हर आदमी के लालच को तृप्त नहीं कर सकती।"

" Earth provides enough to satisfy every man's needs, but not every man's greed."

---Gandhi

महात्मा गांधी ने अपने कथन के अनुरूप प्राकृतिक संसाधनों के संयमित उपभोग की नीति को अपनाया, जिसमें पर्यावरण के प्रति श्रद्धा की भावना प्रमुख है। उन्होंने युक्तिसंगत खपत का आह्वान किया, ताकि आगामी पीढ़ियों को संसाधनों की कमी का सामना न करना पड़े।

'अब' हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि हर तरफ प्राकृतिक संसाधनों की लूट मची हुई है। हमारा लालच सीमा लांघ चुका है। आधुनिकीकरण की आड़ में प्राकृतिक संसाधनों पर असीम अत्याचार ढाहते हुए उनका दुरुपयोग करने और उन्हें प्रदूषित करने की अंधी दौड़ में शामिल होते जा रहे हैं।

'तब' लोग हर उपलब्ध चीज का विभिन्न रूपों में हर संभव सदुपयोग करते थे। चाहे रिश्ते हों या वस्तुएं उन्हें सहेजने की कला उनको बख़ूबी आती थी। अन्न के एक-एक कण और जल की एक- एक बून्द की क़ीमत समझते थे। थाली में जितना भोजन लेते थे उसे पूरा खाने के बाद थाली में थोड़ा पानी डालकर उसे खंगालकर ( rinse ) उसे पी लेते थे ताकि अन्न का एक कण भी बर्बाद न हो। किसी भी चीज को बिना उसके अंतिम रूप में उपयोग लिए बिना फेंकना उन्हें कतई मंजूर नहीं था।

लोक जीवन पर ये सब लिखने का मेरा मक़सद इस बात को रेखांकित करना है कि कोई भी समाज अपनी भाषा में जीता-जागता है, और आपसी व्यवहार करता है। उसकी उपेक्षा करने से अधूरी समझ ही विकसित हो सकती है। गौर करें तो इन देशज ज्ञान स्रोतों में सामाजिक सोच और उसकी समझ बिखरी पड़ी है।

हाँ, गांव अब बदल गए हैं; शहर अब महानगर और गांव अब शहर बनने की दौड़ में शामिल हैं। गांव का अब गांव के रूप में बचना मुश्किल हो रहा है। इतिहासकार एरिक हाब्स्बाम की मानें तो धीरे-धीरे पूरी दुनिया शहर हुई जा रही है और गाँव व किसान का 'मरना' इतिहास की गति में है।

✍️✍️ प्रोफेसर हनुमाना राम ईसराण
Prof. H. R. Isran
पूर्व प्राचार्य, कॉलेज शिक्षा, राज.

ग्राम्य अर्थव्यवस्था की चित्र-गैलरी

यह भी देखें

राजस्थान के ग्राम्य जीवन की झाँकी

बाहरी कड़ियाँ

संदर्भ