Tegh Singh

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Genealogy of the Fridkot rulers

Tegh Singh (d.1806) was, son of Jodha Singh (d.1767), the Barar-Jat Chief of the erstwhile Faridkot State.

History

Lepel H. Griffin[1] writes that Jodha Singh was succeeded by his son Tegh Singh who appears to have been a man of very small intelligence. He


* Ante, p. 35—36.

[Page-605]

continued the family feud with Pattiala, and avenged his father's death by massacring all the inhabitants, men, women and children of the four Jalal villages who were in the pay of Pattiala and by whom Jodh Singh had been slain. Hamir Singh of Faridkot joined in this expedition, but - shortly afterwards quarreled with his nephew who refused submission to him, and taking him prisoner confined him in the Faridkot fort. The Phulkian Chiefs, however, used all their interest to get him set at liberty, which Hamir Singh only consented to do on condition that he would never leave his town of Kotkapura. The result was the utter disorganization of the estate.

The zamindars, unable to obtain justice, refused to pay revenue, and robbery and violence were everywhere prevalent, while Maha Singh Sarai, brother-in-law of the Pattiala Chief, seized Mudki and eighteen neighbouring villages.

Murder by his sons - The end of Tegh Singh was very tragical He had been for long on the worst of terms with his son Jaggat Singh, who, in 1806, set fire to the house in which his father was residing, and a large quantity of powder having been stored in the vaults beneath, the house was utterly destroyed and the Chief killed by the explosion.

The guilty son did not long enjoy the lands of which he thus became possessed. The next year, 1807, his elder brother, Karam Singh, calling Diwan Mohkam Chand to his assistance, defeated him and took possession of the district.

टेकसिंह

सरदार जोधासिंह के और भी दो पुत्र थे - (1) टेकसिंह और (2) अमरीक सिंह। बाप के मारे जाने पर टेकसिंह कोट-कपूरा का मालिक हुआ। टेकसिंह ने अपने बाप का बदला लेने के लिए जरूरी यही समझा कि अपने चाचा हमीरसिंह से तो मेल रखा जाय और पटियाले के नौकर मुस्लिम राजपूतों को दण्ड दिया जाय जिन्होंने कि उनके पिता को घेरकर मार डाला था। वे लोग जलालकियां के मौजों में रहते थे। दो चाचा-भतीजों ने उनके गांवों पर हमला करके उन्हें बहुत नुकसान पहुंचाया। इसके बाद चचा-भतीजे बड़े प्रेम से रहने लगे। टेकसिंह हफ्तों फरीदकोट में रहता और अपने चचा के साथ पासा खेला करता। मालूम यह होता था मानों इनके दिलों में पिछली बातों का कोई रंज नहीं है। किन्तु हमीरसिंह के दरबारियों को यह मेल-मुहब्बत खटका और उन्होंने हमीरसिंह को सुझाया कि - आपने जिसके बाप के साथ दुश्मनी की, उसी से मेल बढ़ाते हो। याद रखिये आपको टेकसिंह कभी भारी नुकसान पहुंचायेगा। चाहिए तो यह कि उसे कमजोर कर दिया जाय। हमीरसिंह को ये बातें पसन्द आईं। दूसरे दिन उसने पाशा खेलते समय भतीजे को गिरफ्तार करा लिया। जब यह खबर कोट-कपूरा पहुंची तो भाई की गिरफ्तारी से अमरीकसिंह बड़ा नाराज हुआ। उसने किले की मरम्मत कराई और लड़ाई की भी तैयारी करने लगा। इधर हमीरसिंह ने मौके से पहले ही कोट-कपूरा पर चढ़ाई कर दी किन्तु सफलता न मिली और उसे वापस लौटना पड़ा। कुछ दिनों के बाद फुलकियां सरदारों के कहने-सुनने से हमीरसिंह ने टेकसिंह को छोड़ दिया। इन झगड़ों से प्रजा में बेचैनी और बदअमनी भी फैली। टेकसिंह बेचारे के भाग्य में सुख कुछ भी न बदा था। उसके इलाके में दुश्मन आकर लूटमार करते थे, प्रजा लगान देने से इनकार करती थी और सबसे बड़ी घटना जो हुई वह यह थी कि टेकसिंह को उसी के लड़के जगतसिंह ने उसके रहने के मकान में आग लगवा कर जिन्दा जला दिया। यह घटना सन् 1806 ई० की है।

इस तरह पितृहंता जगतसिंह कोट-कपूरा की रियासत पर काबिज हुआ। जगतसिंह के और भी तीन भाई थे। इसका हकीकी भाई कर्मसिंह इस घृणित कृत्य से बड़ा नाराज हुआ। उसने थोड़े ही दिन के बाद महाराज रणजीतसिंह से लाहौर के पास जाकर सहायता की याचना की। महाराज रणजीतसिंह ने दीवान मुहकमचन्द को कोट-कपूरा के फैसले के लिए करमसिंह के साथ भेजा। बड़ी लड़ाई के बाद विजय महाराज रणजीतसिंहजी की हुई। कोट-कपूरा खास अपने राज्य में मिला लिया। जलालकियां के मौजे रईस नाभा के सुपुर्द कर दिए। सरदार जगतसिंह ने एक बार जोर लगा कर अपने इलाके से महाराज रणजीतसिंह के


जाट इतिहास:ठाकुर देशराज, पृष्ठान्त-451


आदमियों को निकाल दिया, किन्तु संभालना कठिन हुआ और सुलह करनी पड़ी। जगतसिंह ने अपनी लड़की की शादी महाराज रणजीतसिंह के लड़के शेरसिंह के साथ कर दी। इस शादी के बाद जगतसिंह अधिक दिन न जिए। सन् 1825 ई० में उसकी मृत्यु हो गई। निःसन्तान मरने के कारण जोधासिंह खानदान की हुकूमत का अन्त हुआ।

वीरसिंह की हुकूमत माड़ी भी जोधासिंह के इलाके की भांति जाट सरदारों के हाथ से निकल गई। जोधासिंह की हुकूमत फिर भी अपने घर में ही थी यानी महाराज रणजीतसिंह के राज्य में मिल गई, लेकिन वीरसिंह की हुकूमत उसके निःसन्तान मरने पर अंग्रेजी राज्य में शामिल कर ली गई, जो कि इलाका फीरोजपुर में थी।

हमीरसिंह ने जहां अपने राज्य को बढ़ाया, वहां प्रजा को भी अमन से रक्खा किन्तु गृह-युद्ध में फंसे रहने के कारण वह राज्य की वृद्धि इतनी न कर सके, जितनी कि उस समय के इतने बड़े रईस को मुगलों के बिगड़े दिनों में कर लेनी कुछ मुश्किल बात न थी।

हमीरसिंह के दो लड़के थे - (1) मुहरसिंह और (2) दिलसिंह। दिलसिंह कुछ चपल स्वभाव के थे। वैसे थे बड़े वीर और निशानेबाज। एक समय उन्होंने निशाने का कमाल दिखाने के लिए बाप की चारपाई के पाये को गोली से बींध दिया था। मुहरसिंह ने निशाना लगाने से यह कहकर इनकार कर दिया कि निशाना दुश्मन पर लगाया जाता है, अपने पोषक और श्रद्धेय पारिवारिकों पर नहीं। हमीरसिंह इस बात से मुहरसिंह से बहुत खुश हुए। उन्होंने दिलसिंह को आज्ञा दी कि वह मौजा ढोढ़ी में निवास रक्खे। मुहरसिंह युवराज बना दिए गए। मुहरसिंह ने आज्ञा-पूर्वक युवराज-पद के कार्यों को किया। पिता की सेवा-सुश्रूषा भी खूब की। संवत् 1839 विक्रमी में हमीरसिंह का देहान्त हो गया और मुहर राजा हुए।

References


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