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लूद्दी (Luddi or Ludy) चुरू से 38 मील उत्तर-पूर्व में और सीधमुख से 16 मील दक्षिण-पूर्व में राजगढ़ कसबे के पास है. यह पूनिया जाटों की राजधानी थी. [1] इसके तीन बास है - लूद्दी छाजू, लूद्दी खुबा और लूद्दी झावर . किसी समय लूद्दी स्मरद्ध कस्बा रहा होगा, लेकिन अब यह अति साधारण गाँव है. पूनियों के अधीन 360 गाँव थे. [2]
लूद्दी छाजू तो सर्वथा निर्जन है. लुद्दी खूबा और लुद्दी झाबर की जनसंख्या रजिस्टर देहात बीकानेर (19310 के अनुसार 25 और 76 थी, जो बढाकर 1961 में 69 और 190 हो गयी. लुद्दी झाबर के उदमीराम पुनिया ने बताया की बाढ़मेर से बाढ़जी पूनिया पहले पहल यहाँ आए थे. बाढ़जी के 12 बेटे थे जिन्होंने अपने नाम पर 12 गाँव बसाए. लुद्दी में पहले 360 दुकाने तो केवल पटवों की ही थी. यहाँ से माल दिल्ली जाता था. उदमीराम ने बताया कि ११ वीं पीढी पूर्व उसका एक पूर्वज खेमा था. खेमा और उसकी पत्नी की यहाँ छतरी बनी हैं, यहाँ दो और छतरियाँ हैं जो एक तो कुंवारी लड़की की है और एक उस माँ की छतरी बतलाई जाती है जो अपने बेटे की अकाल म्रत्यु पर सती हुई थी.[3] [4]
ठाकुर देशराज ने लिखा है की पूनिया जांगल देश में ईसा के प्रारम्भिक काल में पहुँच गए थे. उन्होने इस भूमि पर 16 वीं सदी के पूर्वार्ध तक राज किया. रठोड़ों के आगमन के समय इनका राजा कान्हादेव था. कान्हा बड़ा स्वाभिमानी योद्धा था. उसने राव बीका की अधीनता स्वीकार नहीं की. अंत में राठोडों ने उसके दमन के लिए उनके एरिया में गढ़ बनाना प्रारंभ किया. दिन में राठोड़ गढ़ बनाते थे और पूनिया जाट रात को आकर गढ़ ढहा देते थे. कहा जाता है की राजगढ़ के बुर्जों में कुछ पूनिया जाटों को चुन दिया गया था. बड़े संघर्ष के बाद ही पूनियों को हराया जा सका था. पूनियों ने राठोड नरेश रामसिंह को मारकर बदला चुकाया. [5] [6]
References
- ↑ ठाकुर देशराज ने पूनिया जाटों की राजधानी झांसल तहसील भाद्रा लिखी है जाट इतिहास, पेज 613
- ↑ Dr Pema Ram, The Jats Vol. 3, ed. Dr Vir Singh,Originals, Delhi, 2007 p. 205
- ↑ गोविन्द अग्रवाल, चुरू मंडल का शोधपूर्ण इतिहास, पेज 118
- ↑ Dr Pema Ram, The Jats Vol. 3, ed. Dr Vir Singh,Originals, Delhi, 2007 p. 211-212
- ↑ ठाकुर देशराज , जाट इतिहास, पेज 613-614
- ↑ Dr Pema Ram, The Jats Vol. 3, ed. Dr Vir Singh,Originals, Delhi, 2007 p. 205
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