Elaboration of prohibition of same gotra marriage in various Hindu Scriptures

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Author - एस शंकर

सगोत्र विवाह पर प्रतिबंध लगाने की मांग करने वाली एक याचिका पर एक न्यायाधीश ने पूछा, 'किस हिंदू ग्रंथ में एक गोत्र में विवाह को प्रतिबंधित करने की बात लिखी है?' उत्तर में कोई सूची देने से पहले कहना चाहिए कि यह एक निरर्थक प्रश्न था, क्योंकि हिंदू शास्त्रों में लिखे निर्देशों को वर्तमान न्याय प्रणाली में कोई मान्यता ही नहीं है। इसीलिए हमारे कानूनविदों को भारतीय शास्त्र जानने की कभी जरूरत महसूस नहीं होती। तभी वे जब-तब ऐसे विचित्र प्रश्न कर बैठते हैं। यह पूरे विश्व में एक अभूतपूर्व स्थिति है कि किसी देश में विधि निर्माताओं और न्यायकर्मियों को उस देश की अपनी विधि परंपरा की कोई जानकारी न हो, जबकि विदेशी विधानों को अपने लिए स्वत: ही सर्वोपरि मान लिया गया हो। समान गोत्र वाले विवाह के मामलों में भी वही हो रहा है जो पहले से अनेक मामलों में होता रहा है।



दुर्भाग्यवश यह स्वयं एंग्लो-सेक्शन जगत की स्थिति से भी उलटा है। ब्रिटिश-अमेरिकी कानूनों में वहा के धर्म का बहुत अधिक महत्व है। ब्रिटेन में राज्य प्रमुख, 'क्राउन' वहां के धर्म का आधिकारिक संरक्षक होता है। फ्रांस, जर्मनी आदि देशों में भी ईसाइयत को विशेष कानूनी स्थान दिया गया है। जबकि भारतीय संविधान अंग्रेजों द्वारा बनाए इंडिया ऐक्ट, 1935 का संशोधित रूप होते हुए भी उसका यह महत्वपूर्ण हिस्सा हटा दिया गया। इसीलिए भारत का राष्ट्रपति हिंदू धर्म का अधिकृत संरक्षक नहीं बनाया गया है। वह केवल अल्पसंख्यकों के मजहबों का संरक्षक है। यह विचित्र स्थिति दुनिया के और किसी भी देश में कहीं नहीं है।


यही बात कानून के बारे में भी है। ब्रिटेन, अमेरिका तथा अन्य यूरोपीय देशों में न्यायाधीशों के लिए ईसाइयत के विधान की व्यापक और वृहद जानकारी होनी अनिवार्य है। बहुत से देशों में तो सुप्रीम कोर्ट समेत न्यायाधीशों का चयन करने वाली काउंसिलों में निष्ठावान पादरियों, बिशपों का भी स्थान रहता है। जबकि भारत में न्यायाधीशों के लिए न हिंदू धर्म का विशद ज्ञान रखना अनिवार्य किया गया है और न न्यायाधीशों का चयन किए जाने में धर्माचार्यो की कोई विशेष भूमिका रखी गई। उलटे यदि किसी न्यायाधीश या विधायक को हिंदू शास्त्रों की चर्चा करते सुन लिया जाए तो उस पर 'साप्रदायिक' होने का संदेह किया जाता है।


तीन वर्ष पहले भगवद्गीता को राष्ट्रीय ग्रंथ कहने वाले इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक न्यायाधीश पर यही आरोप लगा था। इसी तरह पिछले राष्ट्रपति चुनाव में काग्रेस द्वारा डा. कर्ण सिंह को उम्मीदवार बनाने की चर्चा पर वामपंथियों ने उन्हें 'प्रोनाउंस्ड हिंदू' कह कर ही खारिज किया। कहने का मतलब है कि हिंदू शास्त्रों का विशेष ज्ञान होना भारतीय राजनीतिक जीवन में एक निश्चित अयोग्यता समझी जाती है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि तब फिर ऐसे प्रश्न उछाल कर हिंदू जनता का मजाक क्यों उड़ाया जाता है? यह अन्याय दोहरा-तिहरा है, क्योंकि एक बाहरी मजहब के पैगंबर के निजी व्यवहार को भी उसके अनुयायियों के लिए यहां कानून का दर्जा हासिल है। पर हिंदू अवतारों के कार्य को ऐसी कोई वैधता नहीं प्राप्त है। क्या कोई हिंदू आज यह मांग कर सकता है कि जो श्रीराम या कृष्ण ने किया, उसे हमारे लिए कानून समझा जाए जैसे मुहम्मद का कार्य समझा जाता है?


हिंदू धर्म के अवतारी महापुरुषों के मुताबिक आततायियों, व्यभिचारियों का वध करना एक हिंदू का अधिकार और उसका धर्म है? आखिरकार राम ने बालि का वध क्यों किया था? लक्ष्मण ने सूपर्णखा की नाक क्यों काटी थी? कृष्ण ने कंस का वध किस अधिकार से किया? राम, लक्ष्मण या कृष्ण ने यह सब राजा की हैसियत से नहीं, एक सामान्य मनुष्य के रूप में किया था। क्या इस परंपरा को हमारे न्यायाधीश उसी तरह मान्यता देंगे जैसे हदीस को 'पर्सनल ला' की मान्यता दी हुई है? यदि वे ऐसा नहीं कर सकते तो उन्हें हिंदू ग्रंथों में सगोत्र विवाह के विरुद्ध व्यवस्था के संदर्भ बताकर भी क्या होगा? हिंदू ग्रंथों में ऐसे असंख्य संदर्भ हैं जहां एक ही गोत्र में परस्पर विवाह को वर्जित बताया गया है। याज्ञवल्क्य स्मृति में विवाह के लिए शर्त के रूप में लिखा है, 'असमानार्षगोत्रजम' [1.53]। ऐसा नियम जिसके भंग को बौधायन प्रवराध्याय में पाप बताया है। इसके मार्जन के लिए चाद्रायण जैसा कठोर व्रत करना आवश्यक है। गौतम ने इसे गरुतल्पारोहण जैसा महापातक कहा। याज्ञवल्क्य ने भी इसे गुरुपत्नी अभिगमन तुल्य पाप कहा है।


नारद के अनुसार तो सगोत्र विवाह करने वाले पुरुष के लिए शिश्न-उत्कर्णन के अतिरिक्त कोई दंड नहीं है [नारद स्मृति 15.73-75]। धर्मसूत्रों में कई निर्देश हैं। जैसे, आपस्तंब धर्मसूत्र [2.11.15], विष्णु धर्मसूत्र [24.9-10], वशिष्ठ धर्मसूत्र [8.1], बौधायन धर्मसूत्र [2.1.38] तथा गौतम धर्मसूत्र [4.2, 23.12] में इसका स्पष्ट निर्देश है। स्मृतियों में सगोत्र विवाह के विरुद्ध और अधिक कठोर व्यवस्था दी गई है। उदाहरण के लिए, नारद स्मृति [12.7, 15.73-75], मनुस्मृति [3.5], विष्णु स्मृति [24.9], पराशर स्मृति [10.13-14], आदि।


कुछ स्मृतियों में सगोत्र विवाह की संतान को चाडाल कहा गया है। अधिक जानने के लिए पुरुषोत्तम पंडित लिखित 12वीं सदी से पहले की रचना गोत्र प्रवरनिबंधकदम्बम् पढ़ सकते हैं। असगोत्र विवाह की प्रथा भारत में ई.पू. 8वीं शती से चल रही है। आज भी भारत में विवाह में गोत्र प्रतिबंध का पूरा पालन होता है। कई स्थानों पर गोत्रविषयक लौकिक प्रतिबंध शास्त्रीय मर्यादाओं की अपेक्षा अधिक कड़े हैं। कई विदेशी विद्वानों ने भी इसका आकलन किया है। इसलिए हरियाणा की खाप जो कर रही है, वह शास्त्रीय दृष्टि से अनुचित नहीं। चाहे विदेशी विचारों के प्रभाव में उसे कितना ही निंदित क्यों न किया जाए। वस्तुत: 1946 ई. तक यहां अदालतें भी हिंदुओं में इस नियम के सम्मानित स्थान को मान्यता देती थीं। मीनाक्षी बनाम रामनाथ [1888], रामचंद्र बनाम गोपाल [1908] जैसे मामलों में इसे देखा जा सकता है। संभवत: पहली बार सन 1946 में बंबई हाई कोर्ट ने माधव राव बनाम राघवेंद्र राव मामले में सगोत्र विवाह को अनुमति देने वाली एक प्रथा को स्वीकार किया। फिर 1955 के हिंदू विवाह कानून की धारा 29 में यह व्यवस्था दोहराई गई। तब से असगोत्रता के नियम का कानूनी तौर से अंत हो गया। किंतु ध्यान देने वाली बात यह है इससे पहले सगोत्र विवाह की वर्जना को कानूनी मान्यता भी दी गई थी। यानी यहां की जिस परंपरा को ब्रिटिश अदालतें भी मानती थीं, उसे भारतीय सत्ताधीशों ने अमान्य कर दिया। यह स्वतंत्र भारत के नेताओं की दोहरी जबर्दस्ती थी। उन्होंने एक देश में एक नागरिक कानून की संवैधानिक भावना का भी उल्लंघन करते हुए मुस्लिम पर्सनल ला को तो रहने दिया, जबकि हिंदू नियमों को मनमाने रूप से तोड़ा-मरोड़ा गया। इसके लिए न तो शास्त्रों का आदर रखा गया और न ही सदियों से चली आ रही लौकिक परंपरा का।


1955 के कानून के सिवा वर्तमान न्यायाधीशों के पास सगोत्र विवाह को उचित समझने का कोई आधार नहीं है। एक प्रकार से वे हिंदू समुदाय की पूरी धर्म-परंपरा और मान्य रीति का अनुचित मजाक उड़ा रहे हैं। राजसत्ता की शक्ति के बल पर कोई चीज थोपना एक बात है और किसी गंभीर विधान, तर्क और न्याय की भावना से कुछ व्यवस्था देना दूसरी बात। सगोत्र विवाह ही नहीं, एक गांव के लड़के-लड़की का आपसी विवाह भी हिंदू परंपरा में वर्जित है। अत: हरियाणा की खाप एक गांव के लड़के-लड़की की मुहब्बती शादी को भी अमान्य कर गलती नहीं कर रही है। यद्यपि शास्त्रों में इसका स्पष्ट उल्लेख नहीं, किंतु अनेक संदर्भो में इसकी सत्ता सूचित होने में तनिक भी संदेह नहीं किया जा सकता है। प्रख्यात समाजशास्त्री इरावती कर्वे ने स्थानीय बहिर्विवाह की इस महत्वपूर्ण परंपरा का विशेष उल्लेख किया है [किनशिप आर्गेनाइजेशन इन इंडिया, 1953]।


यह परंपरा एक गांव के व्यक्तियों में विवाह अनुचित समझती है, क्योंकि उन्हें प्राय: एक परिवार का संबंधी सा समझा जाता है। गांव के लड़के-लड़कियां आपस में भाई-बहन और बुजुर्ग लोग उनके चाचा-चाची, दादा-दादी आदि जैसे समझे जाते हैं। नजदीकी संबंधियों की भांति एक गांव वालों में विवाह वर्जित रहा है। इसका शास्त्रीय संकेत यह है कि वैदिक युग से ही वधू को विवाह के बाद अपने ससुराल में आसानी से पहुंचने, मार्ग में कोई कष्ट न होने की अनेक प्रार्थनाएं हैं [ऋग्वेद, 10.85.23, तथा अनेक अन्य संदर्भ]। सारे लोकगीत विवाह के बाद लड़की के विदा होकर दूर चले जाने के संदर्भ से भरे हुए हैं। कहीं स्थानीय विवाह का संकेत तक नहीं मिलता। इसकी अनदेखी करना जानबूझ कर भारतीय परंपरा का तिरस्कार करना है। अत: हिंदू ग्रंथों का संदर्भ ढूंढ़ने से पहले यह समझना चाहिए कि हिंदू धर्म में विवाह कोई निजी मामला नहीं अपितु एक सामाजिक-धार्मिक कार्य है। यह उन सोलह संस्कारों में एक है जो प्रत्येक हिंदू के लिए निर्धारित है। अत: खापों पर बिगड़ने से पहले उनकी भावना को हिंदू दृष्टि से देखें। ईसाई, व्यक्तिवादी, फिल्मी या मात्र कानूनी दृष्टि से देखकर खापों के विरुद्ध होना उचित नहीं माना जा सकता।

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