Prithu

From Jatland Wiki
Jump to: navigation, search
Ancestry of Prithu

Prithu (पृथु) is a sovereign (chakravartin), named in the Vedic scriptures and considered an avatar (incarnation) of the preserver god—Vishnu. Pṛthu literally means "large, great, important, abundant". He is also called Pruthu, Prithi and Prithu Vainya, literally, Prithu — the son of Vena. Prithu is "celebrated as the first consecrated king, from whom the earth received her (Sanskrit) name Prithvi."

Birth of Prithu

The birth of Prithu is without female intervention. Thus being a ayonija ("born without the participation of the yoni"), Prithu is untouched by desire and ego and can thus control his senses to rule dutifully upholding Dharma.

Prithu in Puranas

The Bhagavata Purana and Vishnu Purana tells the story of Prithu: King Vena, from the lineage of the pious Dhruva, was an evil king, who neglected Vedic rituals. Thus the rishis (sages) killed him, leaving the kingdom without an heir and in famine due to the anarchy of Vena. So, the sages churned Vena's body, out of which first appeared a dark dwarf hunter, a symbol of Vena's evil. Since the sins of Vena had gone away as the dwarf, the body was now pure. On further churning, Prithu emerged from right arm of the corpse. To end the famine by slaying the earth and getting her fruits, Prithu chased the earth (Prithvi) who fled as a cow. Finally, cornered by Prithu, the earth states that killing her would mean the end of his subjects too. So Prithu lowered his weapons and reasoned with the earth and promised her to be her guardian. Finally, Prithu milked her using Manu as a calf, and received all vegetation and grain as her milk, in his hands for welfare of humanity. Before Prithu's reign, there was "no cultivation, no pasture, no agriculture, no highway for merchants", all civilization emerged in Prithu's rule. By granting life to the earth and being her protector, Prithu became the Earth's father and she accepted the patronymic name "Prithvi". However, the Manu Smriti considers Prithvi as Prithu's wife and not his daughter, and thus suggests the name "Prithvi" is named after her husband, Prithu.

The Vayu Purana records that when born, Prithu stood with a bow, arrows and an armour, ready to destroy the earth, which was devoid of Vedic rituals. Terrified, the earth fled in form of a cow and finally submitted to Prithu's demands, earning him the title chakravartin (sovereign). Prithu is the first king, recorded to earn the title. The creator-god Brahma is described to have recognized Prithu as an avatar of Vishnu, as one of Prithu's birthmark was Vishnu's chakram (discus) on his hand and thus Prithu was "numbered amongst the human gods". According to Oldham, the title Chakravarti may be derived from this birthmark, and may not be indicative of universal dominion. Prithu was worshipped as an incarnation of Vishnu in his lifetime and now is considered a Nāga demi-god. Shatapatha Brahmana (Verse 3.5.4.) calls him the first anointed king and Vayu Purana calls him adiraja ("first king").

In Mahabharata

The epic Mahabharata states that Vishnu crowned Prithu as the sovereign and entered the latter's body so that everyone bows to the king as to god Vishnu. Now, the king was "endowed with Vishnu's greatness on earth". Further, Dharma (righteousness), Shri (goddess of wealth, beauty and good fortune) and Artha (purpose, material prosperity) established themselves in Prithu.

The Atharvaveda credits him of the invention of ploughing and thus, agriculture. He is also described as one who flattened the Earth's rocky surface, thus encouraging agriculture, cattle-breeding, commerence and development of new cities on earth. In a hymn in Rigveda, Prithu is described as a rishi (seer). D. R. Patil suggests that the Rigvedic Prithu was a vegetarian deity, associated with Greek god Dionysus and another Vedic god Soma.

Bhagavata Purana further states that Prithu performed ninety-nine ashwamedha yagnas (horse-sacrifices), but Indra, kings of the demi-gods, disturbed Prithu's hundredth one. The yagya was abandoned, Vishnu gave Prithu his blessings and Prithu forgave Indra for the latter's theft of the ritual-horse. It also states that the Sanatkumaras, the four sage-incarnations of Vishnu, preached Prithu about devotion to Vishnu. After governing his kingdom for a long time, Prithu left with his wife Archi, to perform penance in the forest in his last days. He died in the forest, and Archi went Sati on his funeral pyre.

Wives and children of Prithu

Apart from Prithvi who is sometimes considered the daughter or wife of Prithu, Prithu has a wife called Archi and five sons. Archi, emerged from Vena's body, along with Prithu and is considered as an avatar of goddess Lakshmi, the wife of Vishnu. Prithu's son Vijitswa, became the sovereign and controlled the middle of the kingdom. Prithu's other sons, Haryarksha, Dhumrakesha, Vrika and Dravina ruled the east, south, west and north of kingdom respectively.

In history

Chinese scholar Hiuen Tsang (c. 640 AD) records the existence of the town Pehoa, named after Prithu, "who is said to be the first person that obtained the title Raja (king)". Another place associated with Prithu is Prithudaka (lit. "Prithu's pool"), a town on banks of Sarasvati river, where Prithu is believed to have performed the Shraddha of his father. The town is referred as the boundary between Northern and central India and referred to by Patanjali as the modern Pihowa. Pehowa is an ancient pilgrim town, which is tahsil place now and comes under Kurukshetra District in Haryana. Its ancient name was Prithudaka.


पृथु पर एक रोचक लेख

पुस्तक का नाम - हरयाणे के वीर यौधेय - पृष्ठ १६१ - १६९

लेखक - स्वामी ओमानन्द सरस्वती


चाक्षुष मन्वन्तर में वेनपुत्र पृथु


वायु पुराण के तरेसठवें अध्याय में वेनपुत्र पृथु का वर्णन है । यह चाक्षुष मन्वन्तर का वृत्त है ।


चाक्षुषस्यान्तरेऽतीते प्राप्‍ते वैवस्वते पुनः ।

वैन्येनेयं मही दुग्धा यथा ते कीर्तितं मया ॥१९॥


चाक्षुष मन्वन्तर के बीत जाने पर और वैवस्वत मन्वन्तर के प्रारम्भ में वेन ने इस पृथ्वी को भोगा । इसका वर्णन विस्तार से नीचे दिया जाता है ।

देवों की विष्णु से राजा की मांग

अथ देवाः समागम्य विष्णुमूचुः प्रजापतिम् ।

एको योऽर्हति मर्त्येभ्यः श्रैष्ठ्यं वै तं समादिश ॥

(महाभारत शान्तिपर्व ५९-८७)


तदनन्तर देवों ने प्रजापति भगवान् विष्णु से प्रार्थना की - भगवन् ! मनुष्यों में जो पुरुष सर्वश्रेष्ठ (राजा का) पद प्राप्‍त करने योग्य हो, उसका नाम बतायें । तब विष्णु महाराज ने अपने एक मानसपुत्र (शिष्य) विरजा को सुशिक्षित करके सौंप दिया, किन्तु वह विख्यात पुरुष इस कार्य को करने के लिए उद्यत नहीं हुवा ।


विरजास्तु महाभागः प्रभुत्वं भुवि नैच्छत ।

न्यासायेवाभवद्‍बुद्धिः प्रणीता तस्य पाण्डव ॥८९॥

पाण्डुपुत्र ! महाभाग विरजा ने पृथ्वी पर राजा होने की इच्छा नहीं की क्योंकि वैराग्य के कारण उसने संन्यास ले लिया ।


कीर्तिमांस्तस्य पुत्रोऽभूत्सोऽपि पञ्चातिगोऽभवत् ।

कर्दमस्तस्य तु सुतः सोऽप्यतप्यन्महत्तपः ॥९०॥


विरजा का पुत्र कीर्तिमान् था, वह भी पांचों विषयों से ऊपर उठकर मोक्षमार्ग का अवलम्बन करने लगा अर्थात् संन्यासी बन गया । कीर्तिमान् का पुत्र कर्दम भी बड़ा भारी तपस्वी हो गया, अर्थात् विरजा, कीर्तिमान् और कर्दम प्रजापति तीनों ही राजपाट को लात मारकर संन्यासी बन गये । आज हम उन्हीं की सन्तान राज्य की कुर्सियों तथा छोटी-छोटी नौकरियों के लिए मारे-मारे फिरते हैं ।


प्रजापतेः कर्दमस्य त्वनंगो नाम वै सुतः ।

प्रजारक्षयिता साधुर्दण्डनीतिविशारदः ॥९१॥

अनंगपुत्रोऽतिबलो नीतिमानभिगम्य वै ।

प्रतिपेदे महाराज्यमथेन्द्रियवशोऽभवत् ॥९२॥


प्रजापति कर्दम के पुत्र का नाम अनंग था, जो कालक्रम से प्रजा का संरक्षण करने में समर्थ, साधु, तथा दण्डनीति विद्या में बड़ा निपुण हुवा ॥६१॥

तीन पीढ़ी तो तपस्वी हो गईं । चौथी पीढ़ी में अनंग राजा हुवा । अनंग के पुत्र का नाम अतिबल था । बह भी नीतिशास्‍त्र का विद्वान् था । उसने विशाल राज्य प्राप्‍त किया । राज्य पाकर वह इन्द्रियों का दास हो गया ॥६२॥


अतिबल का विवाह मृत्यु की कन्या सुनीथा से हुवा था । नीतिमान् होने पर भी वह विषयी हो गया । इसके पुत्र का नाम वेन था जो सुनीथा से उत्पन्न हुवा था, जैसे कहा है - सुनीथा ........ वेनमजीजनत् ॥९३॥

यह सुनीथा तीनों लोकों में प्रख्यात थी ।

तं प्रजासु विधर्माणं रागद्वेषवशानुगम् ॥

वेन रागद्वेष के वशीभूत हो प्रजाओं पर अत्याचार करने लगा । ऋषियों ने इस वेन को मरवा डाला । विनयहीन होने से वेन का समूल नाश हुवा । इस तथ्य को मनुस्मृति अध्याय ७ में प्रकट किया गया है -


वेनो विनष्टोऽविनयान्नहुषश्चैव पार्थिव ।

सुदासो यवनश्‍चैव सुमुखो निमिरेव च ॥४१॥

पृथुस्तु विनयाद्राज्यं प्राप्‍तवान् मनुरेव च ।

कुबेरश्‍च धनैश्वर्यं ब्राह्मण्यं चैव गाधिजः ॥४२॥

वेन, नहुष, सुदास, यवन, सुमुख और निमि भी अविनय से नष्ट हो गये । पृथु और मनु विनय से राज्य पा गये और कुबेर ने विनय से धनादिपत्य पाया तथा गाधि के पुत्र विश्वामित्र विनय से ही ब्राह्मण हो गये ।

इसलिये राजनीति के महापंडित मुनिवर चाणक्य ने इस सत्य को निम्न प्रकार से परिपुष्ट किया है । वे कौटिलीय अर्थशास्‍त्रान्तर्गत सूत्रों में लिखते हैं - राज्यस्य मूलमिन्द्रियजयः, इन्द्रियजयस्य मूलं विनयः ॥


राज्य का मूल इन्द्रियजय है । ब्रह्मचर्येण तपसा राजा राष्ट्रं विरक्षति (अथर्व० ११-५-१७) । वेद ने इसी सत्य को - राजा ब्रह्मचर्य और तप (इन्द्रियजय) से राष्ट्र की रक्षा करता है - प्रकट किया है । और इन्द्रियजय की प्राप्‍ति वा ब्रह्मचर्य की साधना का मुख्य साधन विनय है जिसके त्याग से वेन आदि राजा विनष्ट हो गये और इसको धारण करने से पृथु आदि राजा उन्नति के उच्च शिखर पर आरूढ़ हो गये ।


राजा पृथु का अभिषेक

वेन का पुत्र पृथु हुवा, जिसका अभिषेक समस्त ऋषि, महर्षि और देवताओं ने मिलकर किया और राजा को कर्त्तव्यपालन का उपदेश दिया -

प्रियाप्रिये परितज्य समः सर्वेषु जन्तुषु ।

कामं क्रोधं च लोभं च मानं चोत्सृज्य दूरतः ॥

(शान्तिपर्व ५९-२०५)

प्रिय और अप्रिय का विचार छोड़कर काम, क्रोध, लोभ और मान को दूर हटाकर समस्त प्राणियों के प्रति समभाव रक्खो ।


यश्‍च धर्मात् प्रविचलेल्लोके कश्‍चन मानवः ।

निग्राह्यस्ते स्वबाहुभ्यां शश्‍वद्‍धर्ममवेक्षता ॥१०५॥


लोक में जो कोई मनुष्य धर्म से विचलित हो, उसे सनातन धर्म पर दृष्टि रखते हुए अपने बाहुबल से परास्त कर दण्ड दो ।


प्रतिज्ञां चाधिरोहस्व मनसा कर्मणा गिरा ।

पालयिष्याम्यहं भौमं ब्रह्म इत्येव चास्कृत् ॥१०६॥

साथ ही यह प्रतिज्ञा करो को मैं मन, वचन और कर्म से भूतलवर्ती वेद का निरन्तर पालन करूंगा ।


ऋषियों के ऐसा कहने के उपरान्त महाराज पृथु ने प्रतिज्ञा की -


यश्‍चात्र धर्मो नित्योक्तो दण्डनीतिव्यपाश्रयः ।

तमशंकः करिष्यामि स्ववशो न कदाचन ॥१०७॥


वेद में दण्डनीति से सम्बन्ध रखने वाला जो नित्य धर्म बताया गया है, उसका मैं निःशंक होकर पालन करूंगा । स्वच्छन्द होकर कभी कोई कार्य सिद्ध नहीं करूंगा ।


पुरोधाश्‍चाभवत्तस्य शुक्रो ब्रह्ममयो निधिः ।

मन्त्रिणो बालखिल्याश्‍च सारस्वत्यो गणस्तथा ॥

महर्षिर्भगवान् गर्गस्तस्य सांवत्सरोऽभवत् ॥११०-१११॥


फिर शुक्राचार्य उनके पुरोहित हुए, जो वैदिक ज्ञान के भण्डार थे । बालखिल्यगण तथा सरस्वती तटवर्ती महर्षियों के समुदाय ने उनके मंत्री के कार्य को सम्भाला । महर्षि भगवान् गर्ग उनकी राजसभा के ज्योतिषी थे ।


आत्मनाष्टम् इत्येव श्रुतिरेषा परा नृषु ।

उत्पन्नौ वन्दिनौ चास्य तत्पूर्वौ सूतमागधौ ॥११२॥

मनुष्यों में यह लोकोक्ति प्रसिद्ध है कि स्वयं राजा पृथु, भगवान् विष्णु से आठवीं पीढ़ी में थे । वह वंशावली इस प्रकार है -


१. विष्णु
२. विरजा
३. कीर्तिमान्
४. कर्दम
५. अनंग
६. अतिबल
७. वेन
८. पृथु


उनके जन्म से पहले ही सूत और मागध नामक दो स्तुति-पाठक उत्पन्न हुए थे । वेन के पुत्र प्रतापी राजा पृथु ने उन दोनों को प्रसन्न होकर पुरस्कार दिया । सूत को अनूप देश (सागरतटवर्ती प्रान्त) और मागध को मगध देश प्रदान किया ।

पृथु के समय तक यह पृथ्वी बहुत उंची नीची थी, उन्होंने इसको समतल बनाकर कृषि के योग्य बनाया । इनके राजतिलक पर देवराज इन्द्र भी पधारे थे । उन्होंने इनको अक्षयधन समर्पित किया था और कुबेर ने भी इनको इतना धन दिया जिससे इनके समस्त कार्य भलीभांति सिद्ध हों । इनकी विशाल सेना में घोड़े, रथ, हाथी आदि पर्याप्‍त संख्या में थे । सभी प्रजा स्वस्थ और सुखी थी । किसी वस्तु का दुर्भिक्ष न पड़ता था । सब प्रकार की आधि व्याधियों के कष्टों से मुक्त थे । राजा की ओर से सुरक्षा का इतना अच्छा प्रबन्ध था कि किसी प्रकार का सर्पादि हिंसक जीवों तथा चोरों का भय प्रजा को न था ।


राजा का यथार्थ स्वरूप


तेन धर्मोत्तरश्‍चायं कृतो लोको महात्मना ।

रंजिताश्‍च प्रजाः सर्वास्तेन राजेति शब्दयते ॥

(महाभारत अनुशासन पर्व ५९-१२५)

उस महात्मा ने सम्पूर्ण जगत् में धर्म की प्रधानता स्थापित कर दी थी । उन्होंने समस्त प्रजाओं को प्रसन्न (रंजित) किया था, इसलिए वे राजा कहलाये, उनका राजा नाम सार्थक था ।


सच्चे क्षत्रिय


ब्राह्मणानां क्षतत्राणात् ततः क्षत्रिय उच्यते ।

प्रथिता धर्मतश्‍चेयं पृथिवी बहुभिः स्मृता ॥१२६॥


ब्राह्मणादि को क्षति से बचाने के कारण वे क्षत्रिय कहे जाने लगे । उन्होंने धर्म के द्वारा इस भूमि को प्रथित (विस्तृत) किया और इसकी ख्याति बढ़ाई, इसलिए बहुसंख्य्क मनुष्यों द्वारा पृथ्वी कहलाई ।

राजा का जन्म

सुकृतस्य क्षयाच्चैव स्वर्लोकादेत्य मेदिनीम् ।

पार्थिवो जायते तात दण्डनीतिविशारदः ॥१३३॥

तात ! पुण्य का क्षय होने पर मनुष्य स्वर्गलोक से पृथ्वी पर आता और दण्डनीति विशारद राजा के रूप में जन्म लेता है ।

देवताओं के द्वारा राजा के पद पर पृथु की स्थापना की गई, तथा दैवी गुणों से वह सम्पन्न था, उसकी आज्ञा का कोई उल्लंघन नहीं करता था । यह सारा जगत् उस एक व्यक्ति राजा के वश में रहता था, इसका कारण राजा द्वारा निर्धारित दण्डनीति ही है, जिसका उपदेश विशालाक्ष शिवजी महाराज ने आदि सृष्टि में किया था ।


ततस्तां भगवान् नीतिं पूर्वं जग्राह शंकरः ।

बहुरूपो विशालाक्षः शिवः स्थाणुरुमापतिः ॥८०॥

तदनन्तर सबसे पूर्व भगवान् शंकर ने इस नीतिशास्‍त्र के अनुसार दण्ड के द्वारा जगत् का सन्मार्ग पर स्थापन किया जाता है, अथवा राजा इसके अनुसार प्रजावर्ग में दण्ड की स्थापना करता है । इसलिए यह विद्या दण्डनीति के नाम से विख्यात है । इसका ही तीनों लोकों में विस्तार हुआ तथा होगा ।


दण्डेन संहिता ह्येषा लोकरक्षणकारिका ।

निग्रहानुग्रहरता लोकाननुचरिष्यति ॥७७॥

दण्डविधान के साथ रहने वाली यह नीति सम्पूर्ण जगत् की रक्षा करने वाली है, यह दुष्टों को निग्रह कर अर्थात् दण्ड देकर वश में करती है और श्रेष्ठ पुरुषों के प्रति अनुग्रह करने (आदर पुरस्कार देने) में तत्पर रहकर जगत् में प्रचलित है । इस वेदोक्त दण्डनीति का ग्रहण तथा उपदेश आदि में शिवजी महाराज ने किया । उसके अनुसार आचरण करने से पृथु महाराज प्रथम राजा तथा क्षात्र धर्म का संस्थापक वा क्षत्रियों का पूर्वज कहलाया । महाभारत के अनुसार महाराजा पृथु ही सर्वप्रथम धनुष का आविष्कारक था ।



Back to The Ancient Jats