Draupadi

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Draupadi (Sanskrit: द्रौपदी), also referred to as Agnijyotsna (अग्निज्योत्स्ना), Krishna Draupadi (कृष्णा द्रौपदी) ; was the "emerged" daughter of King Drupada (द्रुपद) of Panchala and the wife of Arjuna in the epic Mahabharata. Since she was the daughter of king Drupada, she is popularly known as Draupadi (which means the daughter of Drupada).

When Yudhisthira becomes the king of Hastinapura at the end of the war, Draupadi (again) becomes the queen of Indraprastha. She is also variously referred to as Panchali (पांचाली) (meaning one from the kingdom of Panchala), and Yajnaseni (यज्ञसेनी) (meaning one born from a Yajna or fire-sacrifice), Mahabhaarati (महाभारती) (great wife of the five descendents of Bharata) and Sairandhri (सैरन्ध्री) (literally: an expert maid (her assumed name during her second exile in which she worked as Virat kingdom's queen Sudeshna's hair-stylist).

According to later version of epic Mahabharata, she had five sons, one by each of the Pandavas: Prativindhya (प्रतिविन्ध्य) from Yudhishthira, Sutasoma (सुतसोम) from Bhima, Srutakarma (श्रुतकर्मा) from Arjuna, Satanika (सतनीक) from Nakula, and Srutasena (श्रुतसेन) from Sahadeva. She is described in the Mahabharata as being extraordinarily beautiful, unsurpassed by any other woman of her time. Draupadi is one of the Panch-Kanya (पंचकन्या) (The Five Virgins) of the ancient Hindu epic, as is her Mother-in-Law, Kunti.

Controversy about marriage

Scholars are of the opinion that later versions of epic Mahabharta carry the wrong story about Draupadi's marriage, which mentions that she was the wife of five brothers (Pandavas). This type of polygamy never existed in Indian Vedic culture. Some scholars opine that Draupadi was married to Arjuna only because he had won the Swayamvar organised by King Drupada. Arjuna had hit the eye of the revolving fish with an arrow and Draupadi accepted him as her husband. Other scholars are of the view that although Arjuna had won the Swayamvar, she was ultimately married to Yudhisthira. Pandavas were Chandravanshi Jats and it was the tradition that when the elder brother is unmarried, the younger cannot marry. At the time of the Swayamvar, Yudhisthira was unmarried. King Drupada accepted the plea that marriage should be tied up with Yudhisthira, despite Arjuna had won the Swayamvara. Dhaumya Rishi (धौम्य ऋषि) had performed the marriage ceremony.

क्या द्रौपदी के पांच पति थे?

उद्धरण - पुस्तक का नाम = कौन कहता है दौपदी के पांच पति थे? (पृष्ठ 84-88)
लेखक - श्री अमर स्वामी सरस्वती
प्रकाशक - सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा, नई दिल्ली

वेदादि शास्त्रों में सर्वत्र - एक पति की एक पत्नी और एक पत्नी का एक पति हो,ऐसा ही विधान है। पुरुषों ने कभी-कभी इस विधान के विपरीत एक से अधिक पत्नियां बनाईं हैं, पर एक स्त्री के अनेक पति हों, ऐसी प्रथा प्राचीन काल में कभी नहीं चली। कौरवों और पाण्डवों के वंश में भी यह प्रथा कभी नहीं चली, न इससे पहले कभी यह प्रथा थी, न पीछे इसका कहीं उल्लेख है।

कुछ ठोस प्रमाण (महाभारत ग्रन्थ से) -

द्रुपद उवाच-

भवान वा विधिवत् पाणि, ग्रहणतु दुहितुर्मम।
(महा० आदिपर्व अध्याय 194, श्लोक 22)

राजा द्रुपद बोले - हे वीर! आप ही विधिपूर्वक मेरी पुत्री का पाणिग्रहण करें।

यह प्रथम प्रमाण है जिससे पता चलता है कि द्रौपदी का पति एक ही था, और वह युधिष्ठिर ही था।

युधिष्ठिर का विवाह -

वैशम्पायन जी कहते हैं कि -

ततो‍ऽब्रवीद् भगवान् धर्मराजमद्यैव पुण्याहमुत वः पाण्डवेय।
अद्य पौष्यं योगमुपैति चन्द्रमाः पाणिं कृष्णायास्त्वं गृहाणाद्यपूर्वम्।
ततो राजा यजसेनः सुपुत्रो, जन्मार्थमुक्तं बहु तत् तदग्रयं।
(महाभारत आदिपर्व अध्याय 197, श्लोक 5, 6)

“हे जन्मजेय! तदन्तर भगवान् व्यास ने धर्मराज युधिष्ठिर से कहा - पाण्डुनन्दन! आज ही तुम्हारे लिए पुण्य दिवस है। आज चन्द्रमा भरण पोषण करके पुण्य नक्षत्र पर जा रहा है। इसलिए तुम्हीं कृष्णा का पाणिग्रहण करो।”

व्यास जी का यह आदेश सुनकर पुत्रों सहित राजा द्रुपद ने वर वधू के लिए कथित समस्त उत्तम वस्तुओं को मंगवाया और अपनी पुत्री को स्नान कराकर बहुत से रत्नमय आभूषणों द्वारा विभूषित किया

महर्षि धौम्य द्वारा विवाह संस्कार -

ततः समाधाय स वेदपारगी, जुहाव मन्त्रैर्ज्वलितं हुताशनम्।
युधिष्ठिरं चाप्युपनीय मन्त्रविन्नियोजयामास सवहैव कृष्णया॥
प्रदक्षिण तौ प्रगृहीतापाणी, समानयामास स वेदपारगः।
ततो‍ऽभ्यनुज्ञायतमाजिशोभनं, पुरोहितो राजगृहाद् विनिर्ययौ॥
(महाभारत आदिपर्व अध्याय 197, श्लोक 11, 12)

“तत्पश्चात् वेद के पारंगत विद्वान् मन्त्रज्ञ पुरोहित धौम्य ने (वेदी पर) प्रज्वलित अग्नि की स्थापना करके उसमें मन्त्रों द्वारा आहुति दी, और युधिष्ठिर को बुलाकर कृष्णा (द्रौपदी) के साथ उसका गठबन्धन कर दिया। वेदों के परिपूर्ण विद्वान् पुरोहित ने उस दम्पत्ति का पाणिग्रहण कराकर उनसे अग्नि की परिक्रमा करवाई, फिर (अन्य शास्त्रोक्त विधियों का अनुष्ठान करके) उनका विवाह कार्य सम्पन्न कर दिया। इसके बाद संग्राम में शोभा पाने वाले युधिष्ठिर को छुट्टी देकर पुरोहित जी भी उस राजभवन से बाहर चले गए।”

जैसी विधि विवाह की श्री युधिष्ठिर जी के साथ लिखी हुई है, ऐसी अर्जुन के साथ सारे महाभारत में कहीं भी नहीं लिखी है।

तीसरा प्रमाण - कुन्ती ने जो द्रौपदी को आशीर्वाद दिया, उसमें कहा है -

कुरुजांगलमुख्येषु, राष्ट्रेषु, नगरेषु च।
अनुत्वमभिषिच्य्स्व, नृपतिं धर्म वत्सला॥
(महाभारत आदिपर्व अध्याय 198, श्लोक 9)

“तुम्हारा पति कुरुजांगल देश के प्रधान-प्रधान राष्ट्रों तथा नगरों का राजा हो और उसके साथ ही रानी के पद पर तुम्हारा अभिषेक हो। धर्म के प्रति तुम्हारे हृदय में स्वाभाविक स्नेह हो।”

अब प्रश्न पैदा होता है कि महारानी तो केवल महाराजा की पत्नी ही बन सकती है। पांचों भाई तो महाराजा बन नहीं सकते। एक भाई ही महाराजा बन सकता है, और वह भी अर्जुन महाराजा नहीं बन सकता क्योंकि वह कुन्ती और पाण्डु का तीसरा पुत्र था। प्राचीन प्रथा के अनुसार राजा का बड़ा पुत्र ही राजा बन सकता है। इसलिए युधिष्ठिर की पत्नी ही राज महिर्षी अर्थात् महारानी बन सकती थी। अतः द्रौपदी को महारानी बनने का आशीर्वाद भी यही सिद्ध करता है कि द्रौपदी युधिष्ठिर की ही पत्नी थी, अर्जुन की नहीं।

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References


Writer of this page

Dayanand Deswal


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