Indraprastha

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Author:Laxman Burdak, IFS (Retd.)

Indraprastha (इन्द्रप्रस्थ), meaning the seat of Indra, was the capital of the kingdom led by the Pandavas in the Mahabharata (I.221.25), (II.27.28).

Variants

Mention by Panini

Indraprastha (इन्द्रप्रस्थ) is a term mentioned by Panini in Ashtadhyayi. [1]

History

V. S. Agrawala[2] writes that Panini mentions in category of villages ending Vaha (IV.2.122). To this Kasika adds: Indra-prastha. In Pali text Prastha denotes a place outside the grama, a waste land not used by men either for ploughing or sowing. It may be noted that places ending with the Prastha (Hindi=pat) are confined mostly to Kuru Country, such as Panipat, Sonipat, Baghpat, Tilpat etc. and to the region of Himalayas watered by Ganges.


Ram Sarup Joon[3] writes....According to the Puranas and Mahabharata, King Yayati chose his second son Puru as heir to the throne. This branch, therefore, continued to stay in the same area and ruled Hardwar, Hastinapur and Delhi. King Hasti made Hastinapur and Pandavas Indraprastha as their capital. Porus who fought Alexander belonged to this branch, Poruswal, Phalaswal,Mirhan, Mudgil, Gill and a number of other Jat gotras are of the Puru branch.


Indraprastha is referenced in the Mahabharata, a Sanskrit Indian text compiled over a period of 800 years from around 400BCE. Primarily a story, it does nonetheless describe events that may in fact have happened. The Mahabharata records Indraprastha as being home to the Pandavas, whose wars with the Kauravas it describes.

The location of Indraprastha is uncertain but Purana Qila in present-day New Delhi is frequently cited and has been noted as such in texts as old as the 14th-century CE. Purana Qila is certainly an ancient settlement but archaeological studies performed at there since the 1950s[4] have failed to reveal structures and artefacts that would confirm the architectural grandeur and rich lives in the period that the Mahabharata describes. The historian Upinder Singh notes that despite academic debate, "Ultimately, there is no way of conclusively proving or disproving whether the Pandavas or Kauravas ever lived ...".[5]

D. C. Sircar, an epigraphist, believes Indraprastha was a significant city in the Mauryan period, based on analysis of a stone carving found in the Delhi area at Srinivaspuri which records the reign of the Mauryan emperor Ashoka. Singh has cast doubt on this interpretation because the inscription does not actually refer to Indraprastha and although "... a place of importance must certainly have been located in the vicinity of the rock edit, exactly which one it was and what it was known as, is uncertain." Similarly, remains, such as an iron pillar, that have been associated with Ashoka are not indubitably so: their composition is atypical and the inscriptions are vague.[6]


The Conquest of Dehli : Sir H. M. Elliot [7] writes....After settling the affairs of Ajmer, the conqueror (Muhammad Ghori) marched " towards Dehli which is among the chief (mother) cities of Hind." When he arrived at Dehli, he saw " a fortress which in height and strength had not its equal nor second throughout the length and breadth of the seven climes." The army encamped around the fort. " A torrent of blood flowed on the field of battle, and it became evident to the chiefs that if they did not seek for safety from the sword of the king of the earth, and if they should deliver into the hands of Satan the time of option and the reins of good counsel, the condition of Dehli would be like that of Ajmer ; so from the dread of kingly punishment, the Rai and mukaddams of that country placed their heads upon the line of slavery, and their feet within the circle of obedience, and made firm the conditions of tribute (malguzari) and the usages of service."

The Sultan then returned "towards the capital of Ghazna " but "the army remained encamped within the boundary of Dehli, at the mauza of Indarpat (Indraprastha)."

खांडवप्रस्थ

विजयेन्द्र कुमार माथुर[8] ने लेख किया है कि....खांडवप्रस्थ (AS, p.255) हस्तिनापुर के पास एक प्राचीन नगर था जहां महाभारतकाल से पूर्व पुरुरवा, आयु, नहुष तथा ययाति की राजधानी थी. कुरु की यह प्राचीन राजधानी बुधपुत्र के लोभ के कारण मुनियों द्वारा नष्ट कर दी गई. युधिष्ठिर को, जब प्रारंभ में, द्यूत-क्रीडा से पूर्व, आधा राज्य मिला तो धृतराष्ट्र ने पांडवों से खांडवप्रस्थ में अपनी राजधानी बनाने तथा फिर से उस प्राचीन नगर को बसाने के लिए कहा था. (महाभारत आदि पर्व, 206 दक्षिणात्य पाठ) तत्पश्चात पांडवों ने खांडवप्रस्थ पहुंच कर उस प्राचीन नगर के स्थान पर एक घोर वन देखा. (आदि पर्व: 206, 26-27). खांडवप्रस्थ के स्थान पर ही इंद्रप्रस्थ नामक नया नगर बसाया गया जो भावी दिल्ली का केंद्र बना. खांडवप्रस्थ के निकट ही खांडववन स्थित था जिसे श्रीकृष्ण और अर्जुन ने अग्निदेव की प्रेरणा से भस्म कर दिया. खांडवप्रस्थ का उल्लेख अन्यत्र भी है. पंचविंशब्राह्मण 25,3,6 में राजा अभिप्रतारिन् के पुरोहित द्दति खांडवप्रस्थ में किए गए यज्ञ का उल्लेख है. अभिप्रतारिन् जनमेजय का वंशज था. जैसा पूर्व उद्धरणों से स्पष्ट है, खांडवप्रस्थ पांडवों के पुराने किले के निकट बसा हुआ था. (दे. इंद्रप्रस्थ, हस्तिनापुर)

इंद्रप्रस्थ का इतिहास

विजयेन्द्र कुमार माथुर[9] ने लेख किया है कि....इंद्रप्रस्थ वर्तमान नई दिल्ली के निकट पांडवों की बसाई हुई राजधानी थी. महाभारत आदि पर्व में वर्णित कथा के अनुसार प्रारंभ में धृतराष्ट्र से आधा राज्य प्राप्त करने के पश्चात पांडवों ने इंद्रप्रस्थ में अपनी राजधानी बनाई थी. दुर्योधन की राजधानी लगभग 45 मील दूर हस्तिनापुर में ही रही. इंद्रप्रस्थ नगर कोरवों की प्राचीन राजधानी खांडवप्रस्थ के स्थान पर बसाया गया था--

'तस्मातत्वं खांडवप्रस्थं पुरं राष्ट्रं च वर्धय, ब्राह्मणा: क्षत्रिया वैश्या: शूद्राश्च कृत निश्चया:। त्वदभ्क्त्या जंतग्श्चान्ये भजन्त्वेव पुरं शुभम्' महाभारत आदि पर्व 206

अर्थात धृतराष्ट्र ने पांडवों को आधा राज्य देते समय उन्हें कौरवों के प्राचीन नगर वह राष्ट्र खांडवप्रस्थ को विवर्धित करके चारों वर्णों के सहयोग से नई राजधानी बनाने का आदेश दिया. तब पांडवों ने श्री कृष्ण सहित खांडवप्रस्थ पहुंचकर इंद्र की सहायता से इंद्रप्रस्थ नामक नगर विश्वकर्मा द्वारा निर्मित करवाया--'विश्वकर्मन् महाप्राज्ञ अद्यप्रभृति तत् पुरम्, इंद्रप्रस्थमिति ख्यातं दिव्यं रम्य भविष्यति' महाभारत आदि पर्व 206.

इस नगर के चारों ओर समुद्र की भांति जल से पूर्ण खाइयाँ बनी हुई थी जो उस नगर की शोभा बढ़ाती थीं. श्वेत बादलों तथा चंद्रमा के समान उज्ज्वल परकोटा नगर के चारों ओर खींचा हुआ था. इसकी ऊंचाई आकाश को छूती मालूम होती थी--


[पृ.76]: इस नगर को सुंदर और रमणीक बनाने के साथ ही साथ इसकी सुरक्षा का भी पूरा प्रबंध किया गया था तीखे अंकुश और शतघ्नियों और अन्यान्य शास्त्रों से वह नगर सुशोभित था. सब प्रकार की शिल्प कलाओं को जानने वाले लोग भी वहां आकर बस गए थे. नगर के चारों ओर रमणीय उद्यान थे. मनोहर चित्रशालाओं तथा कृत्रिम पर्वतों से तथा जल से भरी-पूरी नदियों और रमणीय झीलों से वह नगर शोभित था.

युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ इंद्रप्रस्थ में ही किया था. महाभारत युद्ध के पश्चात इंद्रप्रस्थ और हस्तिनापुर दोनों ही नगरों पर युधिष्ठिर का शासन स्थापित हो गया. हस्तिनापुर के गंगा की बाढ़ से बह जाने के बाद 900 ई. पू. के लगभग जब पांडवों के वंशज कौशांबी चले गए तो इंद्रप्रस्थ का महत्व भी प्राय समाप्त हो गया. विदुर पंडित जातक में इंद्रप्रस्थ को केवल 7 क्रोश के अंदर घिरा हुआ बताया गया है जबकि बनारस का विस्तार 12 क्रोश तक था. धूमकारी जातक के अनुसार इंद्रप्रस्थ या कुरूप्रदेश में युधिष्ठिर-गोत्र के राजाओं का राज्य था. महाभारत, उद्योगपर्व में इंद्रप्रस्थ को शक्रपुरी भी कहा गया है. विष्णु पुराण में भी इंद्रप्रस्थ का उल्लेख है.

आजकल नई दिल्ली में जहाँ पांडवों का पुराना किला स्थित है उसी स्थान के परवर्ती प्रदेश में इंद्रप्रस्थ की स्थिति मानी गई है. पुराने किले के भीतर कई स्थानों का संबंध पांडवों से बताया जाता है. दिल्ली का सर्वप्रचीन भाग यही है. दिल्ली के निकट इंद्रपत नामक ग्राम अभी तक इंद्रप्रस्थ की स्मृति के अवशेष रूप में स्थित है.


इंडिया-वाटर-पोर्टल वेबसाईट[10] के अनुसार इंद्रप्रस्थ वर्तमान दिल्ली के समीप इंदरपत गाँव का प्राचीन नाम। यह नगर शक्रप्रस्थ, शक्रपुरी, शतक्रतुप्रस्थ तथा खांडवप्रस्थ आदि अन्य नामों से भी अभिहित किया गया है। इसके उदय और अभ्युदय का रोचक वर्णन महाभारत (आदिपर्व, 207अ.) के अनेक स्थलों पर किया गया है। द्रौपदी को स्वयंवर में जीतकर जब पांडव हस्तिनापुर में आने लगे तब धृतराष्ट्र ने अपने पुत्रों के साथ उनके भावी वैमनस्य तथा विद्रोह की आशंका के विदुर के हाथों युधिष्ठिर के पास यह प्रस्ताव भेजा कि वह इद्रंवन या खांडववन को साफ कर वहीं अपनी राजधानी बनाएँ। युधिष्ठिर ने इस प्रस्ताव को मानकर इंद्रवन को जलाकर यह नगर बसाया। महाभारत के अनुसार मय असुर ने 14 महीनों तक परिश्रम कर यहीं पर उस विचित्र लंबी चौंड़ी सभा का निर्माण किया था जिसमें दुर्योधन को जल में स्थल का और स्थल में जल का भ्रम हुआ था। इस सभा के चारों ओर का घेरा 10,000 किस्कु (8,750 गज) था। ऐसी रूपसंपन्न सभा न तो देवों की सुधर्मा ही थी और न अंधक वृष्णियों की सभा ही। इसमें 8,000 किंकर या गुह्यक चारों ओर उत्कीर्ण थे जो अपने मस्तकों पर उसे ऊपर उठाए प्रतीत होते थे। राजा युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ का विधान इसी नगर में किया (महाभारत, सभापर्व, 30-42 अध्याय) जिसमें कौरवों ने भी अपना सहयोग दिया था। ऐसी समृद्ध नगरी पर पांडवों को गर्व तथा प्रेम होना स्वाभाविक था और इसीलिए उन लोगों ने दुर्योधन से अपने लिए जिन पाँच गाँवों को माँगा उनमें इंद्रपस्थ ही प्रथम नगर था : इंद्रप्रस्थं वृक्रप्रस्थं जयंतं वारणावतनम्‌। देहि में चतुरो ग्रामान्‌ पंचमं किंचिदेव तु।।

आज इस महनीय नगरी की राजनीतिक गरिमा फिर से दिल्ली और नई दिल्ली की भारतीय राजधानी में संचित हुई है। पद्मपुराण ने इंद्रप्रस्थ में युमना को अतीव पवित्र तथा पुण्यवती माना है : यमुना सर्वसुलभा त्रिषु स्थानेषु दुर्लभा। इंद्रप्रस्थे प्रयागे च सागरस्य च संगमे।।

यहाँ यमुना के किनारे 'निगमोद्बोध' नामक तीर्थ विशेष प्रसिद्ध था। इस नगर की स्थिति दिल्ली से दो मील दक्षिण की ओर उस स्थान पर थी जहाँ आज हुमायूँ द्वारा बनवाया 'पुराना किला' खड़ा है।

In Mahabharata

Indraprastha (इन्द्रप्रस्थ) is mentioned in Mahabharata (I.221.25), (I.221),(II.27.28),


Adi Parva Mahabharata Book 1 Chapter 211 mentions Raivataka mountain festival of Bhojas, Vrishnis and Andhakas. Indraprastha (इन्द्रप्रस्थ) is mentioned in Mahabharata (I.221.25). [11]....Then Krishna and Arjuna, having thus settled as to what should be done sent some speedy messengers unto Yudhishthira at Indraprastha, informing him of everything. The strong-armed Yudhishthira, as soon as he heard it, gave his assent to it.


Sabha Parva, Mahabharata/Book II Chapter 27 mentions the countries subjugated by Bhimasena. Indraprastha (इन्द्रप्रस्थ) is mentioned in Mahabharata (II.27.28).[12]....Then returning to Indraprastha, Bhima of terrible prowess offered the whole of that wealth unto king Yudhisthira the just.


It was one of five villages demanded by Pandavas. Mahabharata tells that When Pandavas were defeated in chausar they were forced to leave the state for 13 years. During most of this time, they lived at place called Varnavata (modern Bairat) in Jaipur district in Rajasthan. Having lived there for pretty long time, the Pandawas sent a message to the Kauravas that they won't lay their claim to the throne if they were given just five villages. These 5 villages were :

  1. Indraprastha (इन्द्रप्रस्थ) (Indarpat) - Purana Kila (Delhi)
  2. Panaprastha (पणप्रस्थ) (Panipat) - Haryana
  3. Sonaprastha (सोणप्रस्थ) (Sonipat) - Haryana
  4. Tilaprastha (तिलप्रस्थ) (Tilpat) - Haryana
  5. Vyaghraprastha (व्याग्रप्रस्थ) (Bagpat) - Uttar Pradesh

If you study the population of people who lived in all these areas mentioned in Mahabharata it is is found to be the homeland of Jats.

Migration of Yadus

James Tod[13] writes that the tide of Yadu migration during the lapse of thirty centuries, traces them, from Indraprastha, Surapura, Mathura, Prayaga, Dwarica, Jadu Ka Dang (the mountains of Jud), Behera, Ghazni in Zabulistan ; and again refluent into India, at Salivahanpura or Salpura in the Punjab. Tannot, Derawal, Lodorva in the desert, and finally Jaisalmer, founded in S. 1212, or A.D. 1156.

External links

See also

References

  1. V. S. Agrawala: India as Known to Panini, 1953, p.67
  2. V. S. Agrawala: India as Known to Panini, 1953, p.67
  3. History of the Jats/Chapter II,p. 31-32
  4. Archaeological surveys were carried out in 1954-1955 and between 1969 and 1973
  5. Singh, Upinder, ed. (2006). Delhi: Ancient History. Berghahn Books. pp. xvii–xxi, 53–56. ISBN 9788187358299.
  6. Singh, Upinder, ed. (2006). Delhi: Ancient History. Berghahn Books. pp. xvii–xxi, 53–56. ISBN 9788187358299.
  7. The history of India : as told by its own historians. Volume II/V. Taju-l Maasir of Hasan Nizami,p.216
  8. Aitihasik Sthanavali by Vijayendra Kumar Mathur, p.255
  9. Aitihasik Sthanavali by Vijayendra Kumar Mathur, p.75-76
  10. https://hindi.indiawaterportal.org/node/25883
  11. धर्मराजाय तत सर्वम इन्थ्रप्रस्दगताय वै, शरुत्वैव च महाबाहुर अनुजज्ञे पाण्डवः(I.221.25)
  12. इन्थ्रप्रस्दम अदागम्य भीमॊ भीमपराक्रमः, निवेथयाम आस तथा धर्मराजाय तथ धनम (II.27.28)
  13. James Tod: Annals and Antiquities of Rajasthan, Volume II, Annals of Jaisalmer, p.194-195