Foolabai

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Author of this article is Laxman Burdak लक्ष्मण बुरड़क
Foolabai

Foolabai (फूलांबाई/फूली बाई) (1568 - 1646) (also Phulabai, Phulibai, Phulabai ) was a famous Jat woman popularly known as Sant Shiromani Bhakt Foolabai.

Introduction

Phulabai was born in 1568 AD in the family of Jat chieftain Hema Ram of Manju gotra in the village Manjhwas situated at a distance of 20 km from Nagaur district Headquarters. She took living samadhi in Manjhwas in 1646 AD. She was fully devoted to Lord Rama right from childhood and spent her most of time in "Bhakti" and "Kirtana" of Shri Ram.

Foolabai was a very brave and strong devotee of God. She was popular in her devotion of God during the ruling period of Emperor Aurangzeb (1618 - 1707). When Aurangzeb sent Raja Jaswant Singh of Jodhpur (1638-1678) to attack Kabul, a group of saints had visited the village Manjhwas. They had discussions on spiritual subjects with Foolabai and they were so much impressed by her discourses that they became her followers. The influence of Foolabai was so much on them that they praised her saintliness to Maharaja Jaswant Singh when they went to Kabul and asked him if he had come from the land of Foolabai. Astonished by the name and fame of Foolabai, Jaswant Singh decided to see her in person. And he went to her village for this purpose. Maharaja was very much influenced by her preachings and brought her to Jodhpur to benefit the maharanis of the royal palace. After some time she came back to Manjhwas and took there living samadhi at the age of 78 years in 1646. She has been very popular subject of folk songs in the Marwar region of Rajasthan.

फूलाबाई का जीवन परिचय

फूलाबाई

फूलाबाई के बारे में ठाकुर देशराज[1] लिखते हैं कि परगना नागौर में गांव माजावास में एक जाट सरदार थे। उनके यहां फूलाबाई नाम की बड़ी प्रसिद्ध बहादुर लड़की थी। ईश्वर भक्ति में दूर-दूर तक उसका नाम फैल गया था। जिन दिनों बादशाह औरंगजेब देहली में शासन करता था, उन्हीं दिनों फूलाबाई की भक्ति का सितारा चमक रहा था। औरंगजेब की आज्ञा से राठौर राजा जसवन्तसिंह जिन दिनों काबुल पर चढ़ाई करने गए थे, उन्हीं दिनों साधुओं


जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठान्त-609


का एक दल माजावास आया। वे फूलाबाई के तेजोमय ईश्वर-भक्ति से पूर्ण मुखमंडल को देखकर उसके भक्त हो गये। बाल-ब्रह्मचारिणी फूला का उनके हृदय पर इतना प्रभाव पड़ा कि उन्होंने काबुल से लौटते हुए जसवन्तसिंह से फूलाबाई की प्रशंसा की। जसवन्तसिंह ने जोधपुर आने पर फूलाबाई के दर्शन उसके गांव में जाकर किये। फूलाबाई एक ऐसे सरदार की लड़की थी, जिसका कि कई गांवों पर अधिकार था। इसलिए जसवन्तसिंह के साथ में आए हुए सारे सैनिकों को भोज दिया। मारवाड़ में फूलाबाई की प्रशंसा के गीत गाए जाते हैं। उसके भव्य जीवन के गीतों की मारवाड़ी भाषा में एक पुस्तक भी छपी है।

संत शिरोमणि फूली बाई

संत शिरोमणी भक्त फूलांबाई

डॉ पेमा राम[2] ने फूली बाई के बारे में विस्तार से लिखा है:

जन्म: राजस्थान की जाट कौम में भक्त शिरोमणि राणा बाई के बाद संत शिरोमणि फूली बाई का नाम बड़ी श्रृद्धा के साथ लिया जाता है। इनका जन्म 1568 ई. में ग्राम मांझवास जिला नागौर में हुआ (p.114)


इनके दादा का नाम थेलाजी और पिता का नाम हेमाराम मांझू (जाट गोत्र) था जो भदाना के चौधरी बरजानजी बाना के यहाँ ब्याहे थे। इनकी माता का नाम नोजा था। फूली बाई के एक छोटा भाई था जिसका नाम डूंगरराम था।[3]

बचपन: फूली बाई का बचपन गायें चराने व खेती के कामों में व्यतीत हुआ। बचपन से ही उसका रुझान भक्ति-भावना की तरफ था। जब फूली बाई के घर कोई साधू-संत आता तो वह बहुत हर्षित होकर उनकी आवभगत करती थी। धीरे-धीरे उसमें भक्ति की भावना दृढ होने लगी थी।

संत ज्ञानीजी से प्रभावित: लगभग बारह वर्ष की उम्र में एक दिन फूली बाई भातो (भोजन) लेकर खेत की तरफ जा रही थी। रस्ते में उसे नागाणा गाँव के प्रसिद्द संत ज्ञानीजी मिले। ज्ञानी जी की सूक्षम दृष्टि के सामने फूली बाई का अध्यात्मिक स्वरुप झलक गया। वे उनमें भक्ति भावना को बढाने के लिए बोले, "बाई मैं भूखा हूँ, मुझे कुछ खाने को दो।" फूली बाई ने भोजन ज्ञानी जी के सामने रखा और उन्हें श्रद्धा पूर्वक भोजन कराया। संत ज्ञानी जी इससे बहुत प्रसन्न हुए और भोजन करने के उपरांत उसके सर पर स्नेह से हाथ फेरते हुए उसे राम-राम का स्मरण करने का उपदेश दिया।

गुरु के उपदेश से फूली बाई की पूर्व जन्म की संचित भक्ति प्रकट हुई और अब उसमें राम-राम के शब्द का गुंजायमान होने लगा। फूली बाई राम-नाम के गुरु-मन्त्र से धन्य हुई। ज्ञानी जी को उसने गुरु मान लिया। अब फूली बाई में भक्ति की लगन लग गयी और वह राम-नाम में लीन हो गयी। उसके अध्यात्मिक जीवन में दिनोदिन उन्नति होने लगी। अब वह अपना समय एकांत चिंतन व भग्वद भजन में व्यतीत करने लगी। वह अब सांसारिक सुख व भोगों से दूर होती गयी।

फूली बाई का विवाह से मना करना: ऐसी स्थिति को देखकर उसके पिता चिंतित हुए और अब उसके लिए योग्य (p.115)


वर की खोज करने लगे। परन्तु फूली बाई ने इसमें किसी प्रकार की कोई रुचि नहीं ली और पिता को कह दिया कि वह विवाह नहीं करेगी। ऐसी स्थिति में पिता ने फूली बाई के नाना से बातचीत की। नाना ने सारी परिसथिति को जानकर 1583 ई. संवत में उसकी सगाई बाडेला गाँव के मानोजी जाणी के पुत्र से करदी और गुप-चुप बारात बुलाली। फूली बाई यह सुन चकित हुई और परेशानी में पड़ गयी। अंत में उसने साफ़ मन कर दिया कि जो चाहे हो वह विवाह नहीं करेगी। फूली ने अपने नाना से कहा कि जिस वर की आप इतनी प्रशंसा कर रहे हैं, वह तो मुर्दे के सामान है जो आज है और कल मृत्यु को प्राप्त हो सकता है और मुझे वैधव्य झेलना पड़ेगा। इस लिए मैनें ऐसे पुरुष से विवाह कर लिया है जो न जन्म होता है और न मरता है। कन्या जो कुंवारी होती है उसका विवाह किया जाता है मैं तो परमेश्वर से विवाह कर चुकी हूँ। फूली की दृढ़ता के सामने नाना को भी झुकना पड़ा और बारात को वापस लौटना पड़ा।

बाडेला के मानोजी जाणी ने विवाह न मांडने पर इसे अपना अपमान समझा और वह जोधपुर महाराजा के पास अपनी शिकायत लेकर पहुंचे। इस पर जोधपुर महाराजा 384 सवारों के साथ आये और मांझवास में अपना डेरा किया। थेलाजी व हेमाजी को बुलाया गया। वहां फूली बाई भी आ गयी और विवाह न कर भगवन की भक्ति पर जोर दिया। वहां फूली बाई ने प्रमाण के तौर पर सवा सेर चावल में महाराजा सहित 384 सवारों को भोजन कराया। तब वहां फूलीबाई के बदले चौधरी सारंगहर जी की बेटी गोरा का विवाह करवाकर मामले को सुलझाया गया।[4]

पशुपति नाथ मंदिर मांझवास

भक्ति में लीन: इस तरह फूली बाई भी मीरा की तरह परमेश्वर को ही अपना पति मान कर उसकी भक्ति में लीन हो गयी। सन 1587 ई. (संवत 1664) में फूली बाई ने पूर्ण भक्ति का मार्ग अपना लिया। (p.116)


फूलीबाई अब निश्चिन्त होकर महादेवजी के मंदिर के पास खेजडा के नीचे अपना सारा समय भजन चिंतन व राम-स्मरण में लगाने लगी। भक्ति करने के दौरान ही 1615 ई. (संवत 1672) में उसके गाँव के उत्तर की तरफ पीलकुड़ी नामक तालाब (नाड़ी) खुदवाया। [5] प्रभु प्रेम में भीगी माँझवास गाँव की जाट खेतिहर परिवार की अशिक्षित इस भक्त महिला की भक्ति सम्बन्धी चर्चा अब चारों और फैलने लगी। दूर-दूर से संत उसके दर्शन करने आने लगे। वह उनका यथोचित आदर-सत्कार करती, उनके साथ सत्संग व भजन-कीर्तन करती। साधुसंत फूली बाई की भक्ति और ज्ञान से प्रभावित होते एवं उनसे मिलने पर अपने को धन्य महसूस करते।

महाराजा जसवंत सिंह फूलीबाई के घर पधारे : एक बार फूली बाई के सत्संग से प्रभावित संतों की एक टोली घूमते फिरते काबुल पहुंची। उस समय जोधपुर के महाराजा जसवंत सिंह (1638-1678) मुग़ल बादशाह की ओर से काबुल में तैनात थे। महाराजा जसवंत सिंह सत्संग प्रेमी और तत्व ज्ञानी थे। महाराजा जसवंत सिंह साधू संतों से मिलकर बड़े प्रसन्न हुए। उनके मन में फूली बाई के दर्शन करने की लालसा पैदा हुई। सन 1640 ई. में काबुल से लौटते हुए वे सीधे जोधपुर न जाकर मांझवास गए।[6] सेना को जंजलाई (जाजोलाई) गाँव में छोड़ कर महाराजा जसवंत सिंह अकेले मांझवास में फूलीबाई के घर गए। फूलीबाई उस समय घर के बाहर गायों के बाड़े में थेपड़ियाँ थाप रही थी। राजा ने पूछा - फूलीबाई कौन है? तब फूली बाई ने उत्तर दिया कि वही फूलीबाई है। यह कहकर उपेक्षा के भाव से गोबर की थेपडी थापने के काम में लगी रही। (p.117)


महाराज वहीँ खड़े रहे। उस दौरान गोबर के छींटे उछलकर राजा जसवंत सिंह के कपड़ों पर लग गए। फूली बाई ने यह देखकर भी अनदेखा कर दिया। राजा अपने कपड़ों को झाड़ते हुए विस्फ़टित नेत्रों से उसे घूरते हुए मन ही मन कहने लगे, "तू बड़ी असभ्य और निर्लज है। मैं तो महाराजा होकर तेरे घर सत्संग करने आया, परन्तु तूने मेरी और ध्यान भी नहीं दिया। उलटे गोबर के छींटे डालकर मेरे कपडे ख़राब किये और मेरा अपमान किया।"

फूली बाई ने राजा को सुनाया कि तुम्हारा रजोगुण तो गया नहीं, राजत्व का अभिमान पूरा बना हुआ है और आये हो मेरे साथ सत्संग करने। फूली बाई ने राजा को चेतावनी देते हुए कहा "ऊँच-नीच का भाव ह्रदय से दूर कर मन को स्थिर करो और यह निश्चित रूप से जानलो कि तुम्हारा राजत्व, राजत्व के चिन्ह वस्त्र, मुकुट आदि और तुम्हारा शरीर सब कुछ एक दिन मिट्टी में मिल जायेंगे। तुम भी मिट्टी से उपजे हो और मिट्टी में ही मिल जाओगे। यदि विनास से बचना चाहते हो तो भजन करो। दूसरा कोई उपाय नहीं। ऐसी देह की इतनी साज-संभाल और एक गोबर का छींटा पड़ जाने पर इतना रोष। महाराज जसवंत सिंह फूली बाई की इन बातों से समझ गए कि यह पहुंची हुई संत है। फिर भी परीक्षा लेते हुए पूछा तुम्हारा नाम फूलीबाई क्यों है ?

फूली बाई ने उत्तर दिया कि जब तक शारीर में सांस है, तब तक फूली नहीं, कई नाम रखे जा सकते हैं।(p.118)


जिस दिन शरीर से छुटकारा मिल जायेगा, उस दिन एक ही नाम रहेगा- पूरण। आत्मा और परमात्मा एक हो जायेंगे। इसलिए मुक्ति का एक ही मार्ग है- राम नाम का स्मरण है। फूली भी उसी परमात्मा का स्मरण करती है और आस-पास कोई दूसरा दिखाई नहीं देता है ।

फूली बाई के मुख से निकले प्रत्येक शब्द में शक्ति थी जिसकी उन्होंने कोई कल्पना भी नहीं की थी। फूली बाई के शब्द तीर की तरह उनके मर्म-स्थल में जा चुभे। वे जैसे सोते से जग उठे। उन्होंने फूली बाई की अध्यात्मिक शक्ति को जानते हुए विनम्रता पूर्वक बोले- फूली बहन, तुमने मेरा बड़ा उपकार किया है। मैं तुम्हें अपनी धर्म-बहन बनाता हूँ। यह कहकर पांच स्वर्ण मुद्राएँ और बागाबेश उन्होंने फूली बाई को भेंट किये।

सेना को भोजन कराया: महाराजा का विनम्र भाव देखकर फूली बाई के भावों में भी परिवर्तन आया। उसने सोचा महाराजा अब उपेक्षा के नहीं, स्नेह के पात्र हैं। स्वर्ण मुद्राओं की और देखते हुए उसने कहा, "महाराज ! यह सब कुछ नहीं। आपका तो भक्ति का सम्बन्ध है। भक्ति के सम्बन्ध में मैं आपकी बहिन हूँ और आप मेरे भाई हैं। आप मेरे घर आये हैं आप मेरा आतिथ्य स्वीकार करें।" परन्तु महाराज ने कहा कि मेरे पास ज्यादा सेना है, उसको तुम कैसे भोजन करा पाओगी। इस पर विचार कर लो। फूली बाई ने कहा कि आप इसकी चिंता न करें। मेरे पास तो कुछ नहीं, परन्तु प्रभु के भंडार में कोई कमी नहीं है। वे सब पूरा करेंगे। फूली बाई के आग्रह पर सेना को भी बुला लिया गया। सब सैनिक भी आकर पंक्तिबद्ध भोजन के लिए बैठ गए। महाराजा व सैनिकों को विस्मय था कि इतने सैनिकों का भोजन बिना पूर्व सूचना व तैयारी के कैसे बनेगा और कहाँ से आएगा और आ भी गया तो अकेली जाटनी भोजन कैसे कराएगी? फूली ने कुछ सोग्रे (बाजरे की मोटी रोटी) तथा राबड़ी बनाई और उसे लेकर जब फूली बाई ने उन्हें भोजन शुरू किया तो जितने फ़ौज के सैनिक थे उतनी ही फूली बाई हो गयी। वह प्रत्येक को मनुहार करके खिलाने लगी।

इस तरह फूली बाई ने बड़े प्रेम से सारी फ़ौज को भोजन कराया। भोजन के बाद फ़ौज को पानी पिलाने की व्यवस्था के अंतर्गत फूली बाई ने 4 फुट गहरा एक गढा खोद दिया,जिसमें पानी आ गया। (p.119)


और सारी फ़ौज ने उससे पानी पीकर अपने को तृप्त किया। घोड़ों के लिए भी जन्जलाई गाँव में एक गढ़ा खोदकर पानी की व्यवस्था की।

इन चमत्कारों से प्रभावित होकर महाराजा जसवंत सिंह ने फूली बाई को नतमस्तक होकर प्रणाम किया और हाथ जोड़कर निवेदन किया कि बाई ! तुम मेरे साथ चलकर राजमहलों को पवित्र करो तथा रानियों को ज्ञान देकर उनका भी कल्याण करो। फूली बाई ने राजा के आग्रह को स्वीकार करते हुए जोधपुर राजमहलों में चलने के लिए अपनी अनुमति प्रदान की। (p.120)


फूलाबाई मंदिर मांझवास

जीवित समाधी ली: कुछ दिन रानियों व राजा को स्पष्टता के साथ निर्भीकतापूर्वक उपदेश देने के बाद फूली बाई वापस अपने गाँव मंझवास आ गयी और भक्ति में लगी रही। यहीं पर तालाब की पाल पर राम की भक्ति करते हुए 1646 ई. (संवत 1703) में फूली बाई ने 78 वर्ष की आयु में जीवित समाधी ली। महाराजा जसवंत सिंह के शासन काल में ही चौधरी पिथोजी, मेवोजी, घेवरजी ने संत फूली बाई की समाधी पर पक्की छतरी बनवाई। [7]जहाँ आज फूली बाई का एक छोटा सा मंदिर बना हुआ है।

संत फूलीबाई की निर्गुणधारा भक्ति

फूली बाई नारी संतों में निर्गुणधारा की एक प्रमुख संत थी जो आत्मबल व निश्चय की पक्की थी। वह बाल ब्रह्मचारिणी थी जिसने आजीवन कुंवारी रहकर अपना पूरा जीवन ईश्वर भक्ति में व्यतीत कर दिया। फूली बाई के जीवन काल में ही उसकी भक्ति के कई किस्से व चमत्कार प्रसिद्ध हो गए थे। कुछ उदहारण इस प्रकार हैं:

  • फूली बाई की थेपड़ी चुराने पर पहचान के रूप में थेपड़ियों से राम-नाम की ध्वनि निकलना,
  • फूली बाई के विवाह के दौरान बरात आने पर एक फूली के स्थान पर अनेक फूली बाई दिखाई देना।
  • खेत में न जाने पर भी उनके पिताजी को चारे के भारे बाड़े में पड़े मिलना,
  • साधू संतों के बर्तन पीछे छोड़ आने के बावजूद उनके बर्तन मंगवा कर उनमें उन साधू-संतों को भोजन करवाना तथा
  • महाराजा जसवंतसिंह की सारी सेना को बिना तैयारी के भोजन कराना और जितने सैनिक उतनी फूली बाई तथा चार फुट गहरा गढ़ा खोदकर सारी फ़ौज को और उनके घोड़ों को पानी पिलाना आदि उनके जग प्रसिद्ध चमत्कार थे। (p.121)

इन सब चमत्कारों के कारण फूलीबाई अपने समय में ही पहुँचवान संत के रूप में प्रसिद्द हो गयी थी।

संत फूली बाई आजीवन निराकार ब्रह्म की उपासना में रत रही। एन्य संतों की भांति उन्होंने सांसारिक नश्वरता, धार्मिक आडम्बरों और माया का प्रतिकार किया। उन्होंने राम-स्मरण पर बलदिया। उनका कहना था कि मनुष्य जन्म बहुत ही दुर्लभ है। उसे यों ही विषय भोगों में गवां देना मुर्खता है। परमात्मा से भिन्न यह सारा संसार नाशवान है और वह क्षण-क्षण नाश की और दौड़ रहा है। फूली बाई ने जगत को माया का पसारा बताया और कहा कि प्राणी जगत में फंस कर योनियाँ भुगतता है और जन्म-मरण के चक्कर में उलझा रहता है। उसका एक मात्र उपाय राम-स्मरण है। जब तक मन में सांसारिक विषय बसते हैं तब तक उसमें राम का वास नहीं होता। जब मन में राम का वास हो जाता है तब सांसारिक विषय नष्ट हो जाते हैं। संसारिकता से छुटकारा पाने का एक मात्र उपाय साधु-संतों की संगती व राम-स्मरण है। जिस प्रकार सूर्य के प्रकाश से अँधेरा नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार राम की भक्ति से मनुष्य का अज्ञान नष्ट होकर ज्ञान की प्राप्ति हो जाती है। राम की भक्ति ही सच्चा सुख है और इसी में मोक्ष समाहित है। वैराग्य, सत्संग और राम-स्मरण ही फूली बाई की भक्ति के मुख्य साधन थे। उसकी राम में अपार श्रृद्धा और अटल विश्वास था। राम की भक्ति में जैसा समर्पण का भाव फूली बाई में था, वैसा दूसरा उदहारण अन्यत्र दुर्लभ है। उसकी भक्ति राम-प्रेम से परिपूर्ण थी। (p.122)


फूली बाई की भक्ति में किसी तरह का कोई आडम्बर नहीं था। उसने भक्ति का सरल मार्ग ही अपनाया और स्वयं राम की भक्ति में डूबकर राम-मय हो गयी। फूली बाई ने बहुत ही सरल व सीधी भाषा में ज्ञान मार्ग व गूढ़ तथ्यों को जनमानस के सामने रखा जिससे साधारण व बिना पढ़ा व्यक्ति भी मुक्ति के मार्ग को आसानी से समझ और अपना सके। (p.123)


संत फूलीबाई निर्गुण धारा की एक प्रमुख साधिका थी । जिसने राम-नाम स्मरण की साधना को अपनाकर 78 वर्ष की आयु में जीवित समाधी ली । वह महान संतों की श्रेणी में अमर हो गयी तथा मारवाड़ के गौरव को बढाया। आज भी मारवाड़ में संत फूली बाई का नाम बड़े आदर व श्रद्धा के साथ लिया जाता है। मांझवास में स्थित उनकी समाधी पर हजारो लोग जाते हैं और उसके दर्शन कर अपने को धन्य समझते है। (p.124)

अधिक जानकारी के लिये पढ़ें

राजस्थान के जाटों का इतिहास, 2010, पृ.114-142 लेखक: डॉ पेमा राम. उपरोक्त जानकारी के अलावा पुस्तक में फूली बाई की परची, फूली बाई के पद, अनेक दोहे, साखी तथा चौपाईयां दी गयी हैं।

External link

References

  1. Thakur Deshraj: Jat Itihas (Chapter IX (Hindi), Maharaja Suraj Mal Smarak Shiksha Sansthan, Delhi, 1934, pp. 609-610
  2. राजस्थान के जाटों का इतिहास, 2010, पृ.114-142
  3. मांझू गोत्र के राव छत्रसाल की बही
  4. मांझू गोत्र के राव की बही
  5. मांझू गोत्र के राव छत्रसाल की बही
  6. डॉ. निर्मल चन्द्र राय: महाराजा जसवंत सिंह का जीवन व समय, पृ.181-182
  7. मांझू गोत्र के राव की बही

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