Hamir Singh of Faridkot

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Genealogy of the Fridkot rulers

Hamir Singh (b. - d.1782, r.1763 - 1782) (हमीरसिंह) was Barar-Jat Raja of erstwhile Faridkot State.

History

Lepel H. Griffin[1] writes that Kapura was eighty years old at his death in 1708, who left three sons, Sukha, Sajja and Makhu, who determined to avenge their father's murder, and, assembling the clan and obtaining the aid of a strong Imperial force, they attacked Isa Khan, defeated and killed him and plundered his fort.

Sajja, though the second son,* succeeded his father as head of the family, but only survived him twelve years, when his brother Sukha Singh became Chief. He added to his possessions the estates of Rahadatta, Behkbodla, Dharamkot, Karman and Mamdot, and founded the new village of Kot Sukha. To his younger brother, Makhu, the villages Rori and Matta, were assigned from the patrimony, and these are still in the possession of Makhu's descendants.


Sukha died in 1731, aged fifty, leaving three sons, Jodh, Hamir and Vir, who for some time lived together in peace, but at length they quarreled and the two younger wished to divide the estate. To this Jodh, the eldest, would not agree, and Hamir and Vir then asked assistance from some of the Sikh Chiefs then rising to power.


* Sirdar Attar Singh Bhadour, one of the best authorities on early Cis-Satlej history, considers Sukha Singh to have been the second son, and Sajja or Lena Singh the elder. Also that the latter was Chaudhri for only two years, dying in 1710.

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and Krora Singh, founder of the misl of that name. These were ready enough to interfere and, crossing the Satlej in force, compelled Jodh to assign the district of Mari Mustafa to Vir, and Faridkot to Hamir, retaining for himself Kot Kapura, with five villages known as the “Kharch Sirdari”, " the excess usually allowed the eldest son, to support the honor of the Chiefship, in families in which the rule of equal partition ordinarily prevails. The confederate Chiefs then induced the brothers to embrace Sikhism, and having caused them to receive the “pahal” or Sikh baptism, re-crossed the river.

Sirdar Hamir Singh was thus the first independent Chief of Faridkot. His brother Jodh Singh, in 1766, erected a new fort at Kot Kapura and almost rebuilt the town ; but his oppression was so great that the inhabitants left it, and the artizans, who had been renowned for their skill and industry, emigrated to Lahore, Amritsar and Pattiala. With Raja Amar Singh, of this last named State, he was constantly engaged in hostilities ; and, in 1767, the Raja having found at the suggestion of the Chief's brother, a satisfactory pretext for a quarrel, marched to Kot Kapura with a strong force and prepared to invest the fort, when Jodh Singh and his son, advancing too far beyond the walls, fell into an ambuscade laid by the Pattiala troops and was killed, fighting gallantly to the last, his son Jit Singh being mortally wounded. [2]

Death of Sirdar Hamir Singh 1782

[Sirdar Hamir Singh died in 1782, and Mohr Singh succeeded him. The new Chief was an incapable, debauched man, and paid no attention to the administration of his estates, several of which, Abuhar, Karmi and Behkbodla were seized by his neighbours. He married a daughter of Sirdar Sobha Singh of Man in Jhind, by whom he had a son Char Singh, or as he is generally known, Charat Singh, and who, accordingly to the almost invariable practice of the family, rebelled against his father. The origin of the quarrel was as follows. [Page-606]

जाट इतिहास:ठाकुर देशराज

हमीरसिंह फरीदकोट के राजा वराड़ वंशी जाट सिख थे। जाट इतिहास:ठाकुर देशराज से इनका इतिहास नीचे दिया जा रहा है।

जोधासिंह, हमीरसिंह

शेखासिंह के दो रानियां बताई जाती हैं। बड़ी से जोधासिंह जी और छोटी से हमीरसिंहवीरसिंह जी का जन्म हुआ। नियम के अनुसार कोट कपूरा स्टेट की राजगद्दी जोधासिंह जी को मिली। जोधासिंह जी भाइयों के साथ प्रेम का व्यवहार करते थे, किन्तु दरबारी लोगों ने भाइयों में फूट का बीज बो दिया। इस फूट की बेल को सींचने का दरबारियों को एक और भी मौका मिल गया। ईसाखां के शाही कार्यकर्त्ताओं ने सरदार जोधासिंह जी को बुलावा भेजा था। उन्होंने वीरसिंह जी को ईसाखां के पास भेज दिया। वीरसिंह सैलानी-मिजाज के आदमी थे। शाही कर्मचारियों से मुलाकात करके इधर-उधर घूमते रहे। उन्होंने एक दिन नदी में जर्द रंग का मेंढक देखा। उसकी विचित्रता पर मुग्ध होकर वीरसिंह ने उसे हंडिया में बंद कर लिया और जब राजधानी में वापस आये तो ईसाखां के समाचार सुनाने के बाद जोधासिंह जी से कहा कि मैं आपके लिए एक बढ़िया सौगात लाया हूं। हंडिया खोल कर रखी गई। उसमें से मेंढक निकला। सरदार जौधासिंह ने वीरसिंह को फटकारा - पागल! यह क्या सौगात है? बस, दरबारियों को वीरसिंह के लिए भड़काने का साधन मिल गया। वीरसिंह नालायक दरबारियों की बहक में इतना आया कि खुल्लम-खुल्ला जोधासिंह को मारने की धमकियां देने लगा। इस पर जोधासिंह ने भाई वीरसिंह को कैद में डाल दिया और दरबारियों की राय से हमीरसिंह को आज्ञा दी कि वह दिन भर दरबार में रहा करें और रात को मौजा हरी में चले जाया करें। भाइयों को इस तरह दमन करने के बाद जौधासिंह निश्चिन्त अवश्य हो गये, किन्तु उन्हें अभिमान ने आ घेरा। वह अभिमान इस अनुचित तरीके तक बढ़ा कि पटियाला के राजा आलासिंह को भी वह हेय समझने लगे। अपने घोड़े का नाम आलासिंह और घोड़ी का नाम फत्तो (धर्मपत्नी आलासिंह) रख लिया। आलासिंह इस अनुचित अपमान का शीघ्र ही बदला लेने की चेष्टा करते, किन्तु उनके यहां भी बाप-बेटों में चल रही थी।


जाट इतिहास:ठाकुर देशराज, पृष्ठान्त-447


सरदार जोधसिंह यहां तक राजधर्म से च्युत हुए कि उनकी जनता भी उनसे बिगड़ गई। उनके मुंह जोधसिंह नाम का सरदार लगा हुआ था। वह सर्वेसर्वा था। अन्य लोगों की बढ़ती को देखना यह कभी पसन्द नहीं करता था, न यह चाहता था कि सरदार के पास अन्य किसी की पहुंच हो। सैनिक विभाग में मुहरा नाम का सरदार भी अपनी पहुंच मालिक तक रखता था। नियम उन दिनों ऐसा था कि राजा को सरदार लोग किसी खास अवसर पर भेंट में घोड़ा दिया करते थे। मुहरा ने एक बछेड़ा भेंट के लिए पाल-पोस कर तैयार किया, किन्तु जोन्दा ने मुहरा की अनुपस्थिति में बछेड़े को जोधासिंहजी के वास्ते मंगा लिया। दरबार में जब मुहरा ने इस तरह घोड़ा मंगाने की शिकायत की तो जोन्दा ने मुहरा का और भी अपमान किया। करमां नाम का जाट सरदार भी मुहरा का साथी बन गया। प्रजाजन तंग आकर कोट-कपूरा को छोड़कर भागने लगे। निदान करमां की सलाह से, जोधासिंह को नेस्तनाबूद करने का षड्यन्त्र रचा गया। निर्णय यह हुआ कि हमीरसिंह को साथ मिलाया जाए, और उन्हें ही राज का मालिक बनाया जाए। हमीरसिंह भी इन लोगों के साथ विचार-विमर्श के बाद शामिल हो गये। निश्चय हुआ कि फरीदकोट के किले पर कब्जा कर लिया जाए। कब्जा किस प्रकार हो इसके साधनों को खोज निकालने का काम मुहरा के जिम्मे छोड़ा गया। फरीदकोट में उस समय एक थानेदार और कुछ सिपाही रहते थे। वहां प्रत्येक बृहस्पति को मेला लगता था। थानेदार मेले में आकर किले से बाहर चौसर खेला करता है। इस तरह उस दिन किला खाली रह जाता है। यह बात मुहरा को बैला फकीर से मालूम हो गई। इतनी बातें मालूम करने के बाद मुहरा ने हमीरसिंहजी को सलाह दी कि आप शिकार की तैयारी करके फरीदकोट पहुंचें और हमारे साथी सवार होकर किले के आस-पास जा पहुंचें। निदान ऐसा ही हुआ। मेले में थानेदार को किला दिखाने पर राजी करके हमीरसिंह मय साथियों के किले में घुस गए और अधिकार जमा लिया। लाचार थानेदार ने कोट-कपूरा खबर पहुंचाई कि हमीरसिंह ने धोखा देकर किले पर कब्जा कर लिया है। पहले तो जोधासिंह ने कुछ सेना किला खाली कराने को भेजी, किन्तु यह सेना कामयाब न हुई तो यह कहकर सन्तोष कर लिया - हमीरसिंह भाई है, वह ऐंठ बैठा है तो ऐसा ही करने दो। आखिर एक दिन खर्च-पानी से तंग आकर ठीक हो जायेगा। इधर हमीरसिंह निश्चिन्त होकर अपनी शक्ति बढ़ाने में लगे रहे। साथ ही अलग रियासत बनाने की सनद भी सूबा सरहिन्द से प्राप्त कर ली। इस तरह हमीरसिंह ने फरीदकोट1 की रियासत जोधासिंह से अलग कायम कर ली। कुछ दिन बाद जोधासिंह को पता


1. कहते हैं कि इस किले को राजा मोकलहर ने बनवाया था। फरीद नाम के फकीर के नाम से इसका नाम फरीदकोट रखा था।


जाट इतिहास:ठाकुर देशराज, पृष्ठान्त-448


चला कि हमीरसिंह बिना झगड़े-रट्टे के काबू में न आयेगा इसलिये खुद सेना लेकर फरीदकोट पर चढ़ाई की। कई महीने तक लड़ाई होती रही। इधर पटियाला वाले राज्य पर छापा मार के लूट-मार कर रहे थे, इसलिए जोधासिंह को वापस लौटना पड़ा। किन्तु लौटते ही उन लोगों के स्त्री-बच्चों को कैद कर दिया जो कि हमीरसिंह के साथ फरीदकोट चले गये थे और उसके साथी बन गए थे।

इस खबर को सुनकर हमीरसिंह और उसके साथी बड़े चिन्तित हुए। सलाह-मशविरा हुआ तो तय पाया कि जेल के अफसर मिट्ठा चूहड़ा से मिल-मिलाकर, कैदियों को छुड़ाया जाये क्योंकि दिल से मिट्ठा जोधासिंहजी का साथी नहीं है। कुछ आदमी मिट्ठासिंह के पास पहुंचे और उसे एक अंधेरी रात में हमीरसिंह के पास ले आए। हमीरसिंह ने प्रलोभन देकर मिट्ठा को इस बात पर राजी कर लिया कि वह अमुक दिन, रात के समय, कैदी स्त्री-बच्चों को बाहर निकाल देगा। उसने किया भी यही, जेल के पीछे की दीवार के सहारे सीढ़ी लगाकर उन कैदी स्त्री-बच्चों को बाहर निकाल दिया, जिनकी हमीरसिंह को जरूरत थी। किन्तु कुछ अभाग्यवश भूल से निकालने से रह भी गए। उनमें से कुछ को फांसी पर लटकाकर, कुछ को भूखा-प्यासा रखकर जोधासिंह ने मरवा डाला। इधर हमीरसिंह भी चुप नहीं बैठे थे। इधर-उधर पेंठ-गोठ मिलाने में कोई कसर बाकी न रख रहे थे। उन दिनों उनके नजदीक में निशानवालिया मिसल का जोर था। उसका एक सरदार मुकाम जीरा में रहता था। हमीरसिंह ने एक लाख रुपया देने का पैगाम सरदार मुहरसिंह जीरा के पास इस आशय से भेजा कि मिसल के लोग उसकी सहायता जोधासिंह के विरुद्ध करें। मुहरसिंह ने हमीरसिंह के साथियों को कन्हैया, Bhangi Mislभंगी और फैजुल्ला-पुरिया मिसल के सरदारों से मिलाया और उनका उद्देश्य भी बता दिया। मिसल वालों ने सहायता देना स्वीकार कर लिया। बहुत से सवार, पैदल तथा तोपखाना मुहरसिंह की कमान में देकर फरीदकोट को रवाना कर दिया। इस जबरदस्त सहायता को पाकर हमीरसिंह ने सरदार जोधासिंह पर चढ़ाई कर दी। उधर जोधासिंह भी अपनी सेना लेकर किले कोटकपूरा से बाहर निकल आया। दोनों भाइयों की फौजों में घमासान लड़ाई हुई। दिन भर हथियार खटकते रहे, दोनों ओर से हजारों आदमी मारे गए। यह युद्ध मौजा सिन्धुवां में हुआ। शाम के समय जोधासिंह की फौज पीछे को हट गई और किले में घुस गई। हमीरसिंह के साथियों ने मौजा सिन्धुवां को जी भर कर लूटा तथा बरबाद किया।

सरदार वीरसिंह भाई की जेल से रिहाई पाकर मुक्राम माड़ी को चला गया। जोधासिंह बड़ी घबराहट में था, कारण कि वह जानता था कि हमीरसिंह के सहायक मिसल वाले लोग बड़े कट्टर व बहादुर हैं। उनसे विजय पाना कठिन है। इसलिए जोधसिंह फिर किले से लड़ने को न निकला। इधर हमीरसिंह भी फरीदकोट को वापस लौट आये और मिसल वालों को काफी धन देकर विदा


जाट इतिहास:ठाकुर देशराज, पृष्ठान्त-449


किया और अपने राज्य के बढ़ाने तथा शक्ति-संपन्न करने में जुट पड़े। वीरसिंह के साथियों ने उधर उसे समझाया कि माड़ी के इलाके को वह अपना मुल्क समझे और भाई उसके साथ छेड़-छाड़ करें तो मिसल वालों से मदद ली जाये। इस तरह से सरदार जोधसिंह तीन ओर से आफतों में फंस गये। पटियाला से शत्रुता, इधर दोनों भाई हमीरसिंह और वीरसिंह का घरेलू युद्ध। लेकिन यह अपनी गलती पर पछताने के बजाय हिम्मत के साथ आपत्तियों का मुकाबला करता रहा। हर ओर कसम-कश थी। हमीरसिंह अधिक उन्नति पर थे। उन्होंने अपने किलों की मरम्मत कराई। जगह-जगह की पुरानी खतरनाक गढ़ियों को मिसमार कराया। कोट करोड़]] को कब्जे में करके उसके गढ़ को तुड़वा-फुड़वा डाला। कहा जाता है कि उसमें 35 तोपें और बहुत सा खजाना मिला, जो फरीदकोट लाये गये। बहुत से इलाके झोक, भक, धर्मकोट आदि अपने राज्य में मिला लिये। आबादी बढ़ाने की भी कोशिश की।

कुछ ही दिनों में सरदार जोधसिंह की शक्ति बहुत कम हो गई। उसके पास कोटकपूरा के अलावा केवल पांच ही गांव रह गये और राज्य तीन हिस्सों में बंट गया जिसमें से अधिकांश हमीरसिंह यानि फरीदकोट के पास रहा। सर लेपिल ग्रिफिन इसका कारण इस तरह से लिखते हैं कि - मिसल के जाट सिखों ने आकर हमीरसिंह और वीरसिंह का पक्ष लिया और रियासत को वे तीन हिस्सों में बांट गये, मांडी के आस-पास के गांवों का सरदार वीरसिंह को बना दिया। तीनों भाइयों को सिख-धर्म की दीक्षा (पोहिल) देकर मिसल वाले चले गये। “आइना वराड़ वंश” का लेखक लिखता है कि - हमीरसिंह ने खुद अपने बाहुबल से फरीदकोट के राज्य को बढ़ाया, जाट सिखों (मिसलों) के बल पर नहीं बढ़ा। बात इतनी अवश्य सही है कि हमीरसिंह को मिसल वालों से सहायता अवश्य लेनी पड़ी।

इतने पर भी लड़ाई-झगड़े मिटे नहीं थे। मौजा कोट सेखा पर दोनों भाइयों में फिर लड़ाई हुई किन्तु जोधासिंह को हार कर लौटना पड़ा। इन्हीं दिनों उसको सरदार जोन्दासिंह फरीदकोट वालों ने मार डाला और उसका सिर फरीदकोट में घुमाया गया। कुछ ही दिनों बाद अमरसिंह रईस पटियाला ने हमीरसिंह और वीरसिंह को अपने साथ मिलाकर कोट-कपूरा पर चढ़ाई की। दुर्भाग्य से उस समय जोधासिंह अपने पुत्र रणजीतसिंह या चेतसिंह1 के साथ हवाखोरी के लिए निकला हुआ था। दुश्मनों ने मौका पाकर उन्हें घेर लिया। सरदार जोधासिंह ने बड़ा डटकर मुकाबला किया, बहुतों को खत्म किया। अन्त में अपने लड़के समेत


1. 'वराड़ वंश' का लेखक इस लड़के को मुसलमान औरत के उदर से उत्पन्न लिखता है।


जाट इतिहास:ठाकुर देशराज, पृष्ठान्त-450


युद्धभूमि में सदैव के लिए सो गया। अमरसिंह इस जीत के बाद पटियाला को लौट गया। सरदार जोधासिंह का कोट-कपूरा में संस्कार हुआ, समाधि बनाई गई जो अब तक जोधा बाबा की समाधि के नाम से मशहूर है।

=== टेकसिंह ===

सरदार जोधासिंह के और भी दो पुत्र थे - (1) टेकसिंह और (2) अमरीक सिंह। बाप के मारे जाने पर टेकसिंह कोट-कपूरा का मालिक हुआ। टेकसिंह ने अपने बाप का बदला लेने के लिए जरूरी यही समझा कि अपने चाचा हमीरसिंह से तो मेल रखा जाय और पटियाले के नौकर मुस्लिम राजपूतों को दण्ड दिया जाय जिन्होंने कि उनके पिता को घेरकर मार डाला था। वे लोग जलालकियां के मौजों में रहते थे। दो चाचा-भतीजों ने उनके गांवों पर हमला करके उन्हें बहुत नुकसान पहुंचाया। इसके बाद चचा-भतीजे बड़े प्रेम से रहने लगे। टेकसिंह हफ्तों फरीदकोट में रहता और अपने चचा के साथ पासा खेला करता। मालूम यह होता था मानों इनके दिलों में पिछली बातों का कोई रंज नहीं है। किन्तु हमीरसिंह के दरबारियों को यह मेल-मुहब्बत खटका और उन्होंने हमीरसिंह को सुझाया कि - आपने जिसके बाप के साथ दुश्मनी की, उसी से मेल बढ़ाते हो। याद रखिये आपको टेकसिंह कभी भारी नुकसान पहुंचायेगा। चाहिए तो यह कि उसे कमजोर कर दिया जाय। हमीरसिंह को ये बातें पसन्द आईं। दूसरे दिन उसने पाशा खेलते समय भतीजे को गिरफ्तार करा लिया। जब यह खबर कोट-कपूरा पहुंची तो भाई की गिरफ्तारी से अमरीकसिंह बड़ा नाराज हुआ। उसने किले की मरम्मत कराई और लड़ाई की भी तैयारी करने लगा। इधर हमीरसिंह ने मौके से पहले ही कोट-कपूरा पर चढ़ाई कर दी किन्तु सफलता न मिली और उसे वापस लौटना पड़ा। कुछ दिनों के बाद फुलकियां सरदारों के कहने-सुनने से हमीरसिंह ने टेकसिंह को छोड़ दिया। इन झगड़ों से प्रजा में बेचैनी और बदअमनी भी फैली। टेकसिंह बेचारे के भाग्य में सुख कुछ भी न बदा था। उसके इलाके में दुश्मन आकर लूटमार करते थे, प्रजा लगान देने से इनकार करती थी और सबसे बड़ी घटना जो हुई वह यह थी कि टेकसिंह को उसी के लड़के जगतसिंह ने उसके रहने के मकान में आग लगवा कर जिन्दा जला दिया। यह घटना सन् 1806 ई० की है।

इस तरह पितृहंता जगतसिंह कोट-कपूरा की रियासत पर काबिज हुआ। जगतसिंह के और भी तीन भाई थे। इसका हकीकी भाई कर्मसिंह इस घृणित कृत्य से बड़ा नाराज हुआ। उसने थोड़े ही दिन के बाद महाराज रणजीतसिंह से लाहौर के पास जाकर सहायता की याचना की। महाराज रणजीतसिंह ने दीवान मुहकमचन्द को कोट-कपूरा के फैसले के लिए करमसिंह के साथ भेजा। बड़ी लड़ाई के बाद विजय महाराज रणजीतसिंहजी की हुई। कोट-कपूरा खास अपने राज्य में मिला लिया। जलालकियां के मौजे रईस नाभा के सुपुर्द कर दिए। सरदार जगतसिंह ने एक बार जोर लगा कर अपने इलाके से महाराज रणजीतसिंह के


जाट इतिहास:ठाकुर देशराज, पृष्ठान्त-451


आदमियों को निकाल दिया, किन्तु संभालना कठिन हुआ और सुलह करनी पड़ी। जगतसिंह ने अपनी लड़की की शादी महाराज रणजीतसिंह के लड़के शेरसिंह के साथ कर दी। इस शादी के बाद जगतसिंह अधिक दिन न जिए। सन् 1825 ई० में उसकी मृत्यु हो गई। निःसन्तान मरने के कारण जोधासिंह खानदान की हुकूमत का अन्त हुआ।

वीरसिंह की हुकूमत माड़ी भी जोधासिंह के इलाके की भांति जाट सरदारों के हाथ से निकल गई। जोधासिंह की हुकूमत फिर भी अपने घर में ही थी यानी महाराज रणजीतसिंह के राज्य में मिल गई, लेकिन वीरसिंह की हुकूमत उसके निःसन्तान मरने पर अंग्रेजी राज्य में शामिल कर ली गई, जो कि इलाका फीरोजपुर में थी।

हमीरसिंह ने जहां अपने राज्य को बढ़ाया, वहां प्रजा को भी अमन से रक्खा किन्तु गृह-युद्ध में फंसे रहने के कारण वह राज्य की वृद्धि इतनी न कर सके, जितनी कि उस समय के इतने बड़े रईस को मुगलों के बिगड़े दिनों में कर लेनी कुछ मुश्किल बात न थी।

हमीरसिंह के दो लड़के थे - (1) मुहरसिंह और (2) दिलसिंह। दिलसिंह कुछ चपल स्वभाव के थे। वैसे थे बड़े वीर और निशानेबाज। एक समय उन्होंने निशाने का कमाल दिखाने के लिए बाप की चारपाई के पाये को गोली से बींध दिया था। मुहरसिंह ने निशाना लगाने से यह कहकर इनकार कर दिया कि निशाना दुश्मन पर लगाया जाता है, अपने पोषक और श्रद्धेय पारिवारिकों पर नहीं। हमीरसिंह इस बात से मुहरसिंह से बहुत खुश हुए। उन्होंने दिलसिंह को आज्ञा दी कि वह मौजा ढोढ़ी में निवास रक्खे। मुहरसिंह युवराज बना दिए गए। मुहरसिंह ने आज्ञा-पूर्वक युवराज-पद के कार्यों को किया। पिता की सेवा-सुश्रूषा भी खूब की। संवत् 1839 विक्रमी में हमीरसिंह का देहान्त हो गया और मुहर राजा हुए।

References


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