Nasir-ud-din Mahmud

From Jatland Wiki
Jump to: navigation, search

Nasir ud din Mahmud or Nasir ud din Firuz Shah (1246–1266) was the eighth sultan of the Mamluk Sultanate (Slave dynasty).

His family

He was the son of Nasiruddin Mahmud (died-1229), who was the youngest son of Shams ud din Iltutmish (1211–1236). He was named after his father, by Shams ud din Iltutmish, for he had grown an intense filial attachment, to the only begot son of his posthumous child. He succeeded Ala ud din Masud after the chiefs replaced Masud when they felt that he began to behave as a tyrant.

It was actually his Deputy Sultan or Naib, Ghiyas ud din Balban, who primarily dealt with the state affairs. After Mahmud's death in 1266, Balban (1266–1287) rose to power as Mahmud had no children to be his heir.

Sultan Ghari

Mahmud's fortified tomb built by Iltutmish, known as Sultan Ghari, lies in the Vasant Kunj area, close to Mehrauli, in New Delhi. Built in 1231 AD, it was the first Islamic Mausoleum built in India.[1] The octagonal tomb chamber, is one of finest examples of Mamluk dynasty architecture, which also include the Qutub Minar.

नासिरुद्दीन और सर्वखाप

सन 1246 से 1266 ई. में गुलाम वंशी नासिरुद्दीन ने शासन किया. उसके विरोधियों की संख्या कम न थी.जब उसे लगा कि उसकी गद्दी कभी भी छिन सकती है तो उसने अपने भतीजे को सहायता के लिए सर्वखाप के मुख्यालय सौरम (मुज़फ्फरनगर) भेजा. इस मांग पर खापों के चौधरियों ने कई दिन तक विचार किया. अंत में नासिरुद्दीन को अपनी कुछ मांगें मानने का प्रस्तान उसके भतीजे के साथ भेजा. नासिरुद्दीन ने पंचायत की सभी मांगे मानली और बदले में पंचायत की सेना ने नसीरुद्दीन के विरोधियों को नष्ट कर उसे निष्कंटक बना दिया. [2]

सरनाऊ कोट पर हमला

संवत 1315 (1258 AD) में दिल्ली के बादशाह नसरुदीन शाह ने गानोड़ा गाँव के ढाका मोमराज को 52000 फ़ौज का सेनापति बनाया. उस समय सरनाऊ कोट, बुरड़कों की राजधानी, चौधरी कालूराम के पुत्र पदम सिंह तथा जगसिंह के अधिकार में थी. इस जागीर में 84 गाँव थे.

बुरड़कों की राजधानी सरनाऊ कोट पर मोमराज ढाका ने 6 बार हमला किया परन्तु उनको लड़ाई में नहीं हरा सका. मोमराज ढाका सभी तरह से निराश हो गया तो पौष बदी 13 संवत 1313 (1256 AD) के बाद उसने दो साल तक स्वयं कोई सीधी लडाई नहीं लडी परन्तु सोचने लगा कि किस तरह से बुरडकों को परास्त किया जाये. जासूसों से पता लगाया कि सभी बुरडक परिवार आसोज माह के अमावस को निशस्त्र हालाणी बावडी पर श्राध के लिये एकत्रित होते हैं, स्नान करते हैं और बडा श्राध निकालते हैं. संवत 1315 (1258 AD) की आसोज माह के अमावस को सभी बुरडक निशस्त्र हालाणी बावडी पर श्राध के लिये एकत्रित हुये और उस समय मोमराज ढाका ने 25000 की फ़ौज लेकर उनपर तोपों से हमला किया. सभी बुरड़क मारे गए और किला नष्ट कर दिया गया. सरनाउ-कोट में कोई भी नहीं बचा.

External links

References

  1. Pankaj Tyagi. "Country’s first tomb is victim of ASI’s neglect". The Indian Muslim’s Leading News Paper Milli Gazette.
  2. डॉ ओमपाल सिंह तुगानिया : जाट समाज की प्रमुख व्यवस्थाएं , आगरा , 2004, पृ . 20

Back to General History