Ramki Chahar

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Ramki Chahar (1732 AD) (रामकी चाहर) (Ramchehara) has been very popular and brave name among Chahars. Ramki Chahar along with Raja Ram Sinsinwar and Khemkaran of Sugreevgarh gave a very tough fight to the Mughal army in late seventeenth century.[1]

रामकी चाहर का सक्षिप्त परिचय

         लेखक:-मानवेन्द्र सिंह तोमर

रामकी चाहर का जन्म आगरा जिले में चाहरवाटी के नाम से प्रसिद्धि फतेहपुर सीकरी ,अकोला क्षेत्र में मुग़ल काल में 17 वी सदी के प्रारंभ में हुआ था| इस समय आगरा ,अकोला ,फतेहपुर सीकरी क्षेत्र पर मुगलों का कब्ज़ा था | लेकिन यहाँ के स्थानीय जाट मुगलो के नियम कायदे को नहीं मानते थे| मुगलों ने इस क्षेत्र के जाटों के डर से यहाँ अपनी राजधानी भी हस्तांतरित कर ली थी| यह क्षेत्र चाहर जाटों की अधिकता और वीरता के कारण चाहरवाटी के नाम से प्रसिद्ध है| यहाँ की मिट्ठी में जन्मे लोगो में पराक्रम संघर्ष और प्रतिरोध का जन्मजात गुण पाया जाता है | रामकी चाहर के समय दिल्ली पर अत्याचारी औरंगजेब का शासन था | रामकी चाहर एक ऐसा योद्धा था जिसके डर से औरंगजेब के सेनापति ने जहर खा लिया था भारतीय इतिहास में यह एक मात्र ऐसी घटना है जब मुग़ल सेनापति ने किसी योद्धा (रामकी चाहर की ) के भय से युद्ध लड़ने के अपेक्षा ज़हर खाकर आत्महत्या करना उचित समझा हो रामकी चाहर को घासी बाबा चाहर की सलाह पर चाहर जाटों का मुखिया चुना गया था|

रामकी चाहर के समय सिनसिनवार जाटों का मुखिया थून सिनसिनी का राजाराम सिनसिनवार और सोगरवार जाटों का मुखिया खेमकरण सिंह थे | सौंख खुटेलापट्टी में कुंतल (तोमर) जाटों का मुखिया सुखपाल सिंह था। इन सभी जाटों ने आपसी सहयोग के लिए एकता करके एक संगठन बना रखा था।

रामकी चाहर की मुगलों के खिलाफ पंचायत

रामकी चाहर ने मुगलों की राजधानी (फतेहपुर सीकरी) के निकट चाहर समेत अन्य सभी स्थानीय सभी गोत्रों खैनवार, छोंकर, मौर, सोलंकी, रावत, कहरवार, जूरेल, इन्दौलिया की एक विशाल पंचायत वैशाख माह में आयोजित की जिसमे सभी गोत्रो के मुखियों ने सर्वसहमति चार प्रस्ताव पारित किए।

  1. कोई भी किसान अपनी फसल का लागन मुगलों को नहीं देगा
  2. सभी पालें अपने अपने स्तर पर सैनिक संगठन तैयार करेगे
  3. मुगलों की चौकियों को चाहरवाटी क्षेत्र से नष्ट करने में आपसी सहयोग देंगे
  4. फतेहपुर सीकरी आगरा क्षेत्र में रामकी चाहर को सर्व पाल का मुखिया स्वीकार किया गया।

इस प्रस्ताव के पारित होने के बाद किसी भी व्यक्ति ने रबी की फसल का कर नही दिया इसके साथ ही रामकी चाहर ने 8 हज़ार जाट की एक फ़ौज भी तैयार कर ली थी | रामकी चाहर के नेतृत्व में जाटों ने स्थानीय मुग़ल सूबेदार की हत्या कर दी जब इस बात की सूचना दिल्ली में मुग़ल बादशाह औरंगजेब के पास पहुँची तो औरंगजेब ने इब्राहीम खान को मुल्तफत खान की उपाधि देकर आगरा भेजा ताकि इब्राहीम खान (मुल्तफत खान) जाटों के विद्रोह को दबा सके ।

इब्राहीम खान (मुल्तफत खान) मई 1681 ईस्वी को दिल्ली से मुग़ल सेना के साथ आगरा पहुंचा। यहाँ पहुँच कर उसने जाटों की ताकत को परखा खुद को उनके सामने कमजोर पाकर जाटों के समीप संधि वार्ता का प्रस्ताव रखा लेकिन जाट वीरों ने उसकी संधि वार्ता को ठुकरा कर उसको युद्ध की चुनोती दे डाली ।

ब्राहीम खान (मुल्तफत खान ) ने धोखे से अकोला और बाद ग्राम के जाट मुखिया को बंदी बनाने का असफल प्रयास किया। स्वाभिमानी जाट मुखियों ने झुकने के अपेक्षा युद्ध भूमि में मरना स्वीकार किया । जब इस बात (इब्राहीम खान के धोखे का) का समाचार रामकी चाहर को पहुंचा तो उसने चाहरवाटी के आठ हज़ार योद्धाओं को लेकर मुगलों के गढ़ पर हमला कर दिया । इस युद्ध में चाहरवाटी के वीरों के अदम साहस और पराक्रम के आगे मुग़ल परास्त होकर भाग खड़े हुए। रामकी चाहर ने अकोला और बादगाँव के मुखियों को सकुशल अपने अपने गाँव भेज दिया।

इस युद्ध में विजयी होकर रामकी चाहर इब्राहीम खान (मुल्तफत खान) को बंदी बनाकर अकोला गढ़ी ले आया । अकोला गढ़ी में चाहर जाटों ने औरंगजेब के सेनापति इब्राहीम खान (मुल्तफत खान) की जूतियों से अच्छी तरह मरम्मत (पिटाई) की । अंत में मुग़ल सेनापति द्वारा रामकी चाहर के पैर पकड़ कर गिडगिडाना से मुग़ल सेनापति इब्राहीम खान (मुल्तफत खान) को सैनिक की अपेक्षा हिजड़ा समझ कर छोड़ दिया। जब मुगलों के इस तरह अपमान की खबर दिल्ली में औरंगजेब के पास पहुंची तो औरंगजेब ने अपने दूत के हाथों एक संदेश और ज़हर की पुडिया सेनापति इब्राहीम खान (मुल्तफत खान) के पास भेजी। मुग़ल दूत ने सेनापति इब्राहीम खान (मुल्तफत खान) को औरंगजेब का सदेश पढ़कर सुनाया कि यदि तुम मुगलों के अपमान का बदला रामकी चाहर और उसके वीर जाटों से नहीं ले सकते तो यह ज़हर खा लेना। इस ज़हर को आलमगीर का आखरी तोफा समझना।

सेनापति इब्राहीम खान (मुल्तफत खान) ने लाख कोशिश की लेकिन वो जाटों को कभी भी परास्त नहीं कर पाया। मुग़ल सेनापति की ऐसी दुर्दशा आज तक कभी भी नहीं हुई थी। अंत में रामकी चाहर और चाहरवाटी के जाट वीरों के आगे खुद को निर्बल समझ रामकी चाहर द्वारा अपने अपमान के डर से 6 जुलाई 1681 ईस्वी को ज़हर खाकर आत्महत्या कर ली थी। भारत के इतिहास में ऐसी दूसरी कोई भी घटना दर्ज नहीं है जब किसी मुग़ल सेनापति ने भय से युद्ध लड़ने के अपेक्षा ज़हर खाकर मरना उचित समझा।

आखिर अकबर की कब्र क्यों जलाई गई इसके पीछे का इतिहास वीर गोकुला के साथ जुड़ा हुआ है

अकबर की कब्र जलाने में स्थानीय चाहरवाटी के जाटों (चाहर, खैनवार, सोलंकी, रावत, छोंकर, हतिन्जार, इन्दौलिया, गंधार, भगौर, सिकरवार) का सबसे बड़ा योगदान रहा है। औरंगजेब और गोकुला के मध्य हुए संघर्ष में जब हगा पाल के चौधरी वीर गोकुला ने सन् जनवरी 1670 ईस्वी के दिन अपने जीवन का बलिदान दिया था, उसी दिन एक प्रतिशोध की ज्वाला ने जन्म लिया था। गोकुला के बलिदान के बाद तो भारत में औरंगज़ेब के शासन में हिन्दुओं का जीना मुश्किल हो गया था। वीर गोकुला के बलिदान का बदला लेने की एक ज्वाला स्थानीय हिन्दुओं के दिलो में प्रज्वलित थी।

था इस्लाम का दौर जहां, कटते थे सर बागियों के,
मंदिरों के दिये बुझ चुके, सुनते थे कलमें नमाजियों के,
उस काल में हाहाकार मचा, औरंगजेब के तांडव का,

आगरा चाहरवाटी क्षेत्र की सर्वपाल (खाप ) का अध्यक्ष अकोला का रामकी चाहर था। रामकी चाहर ने मुगलों के खजाने को लूटना शुरू कर रखा था। यह धन गरीब जनता के बीच बाँट दिया जाता था। इसलिए रामकी चाहर आगरा चाहरवाटी क्षेत्र में गरीबों का मसीहा नाम से प्रसिद्ध था| रामकी चाहर के समय सिनसिनवार जाटों का मुखिया थून सिनसिनी का राजाराम सिनसिनवार और सोगरवार जाटों का मुखिया खेमकरण सिंह थे | मुग़ल सेनापति इब्राहीम खान (मुल्तफत खान) को रामकी चाहर से हार के बाद जहर खाना पड़ा था|

अकोला चाहरवाटी थी ब्रज की रानी,
शेरों की जननी कहलाती थी,
जाटों का बाहुबल जाहिर था,
खेतों में तलवारें लहलहाती थी,

हगा चौधरी पाल ने गोकुला की हत्या का बदला लेने के लिए मुगलों के खिलाफ लोगों को संगठित करने का कार्य शुरू कर रखा था। औरंगजेब की हिन्दू विरोधी नीति और अपने पूर्वज गोकुला की हत्या का बदला लेने के लिए जाटों ने औरंगजेब के पूर्वज अकबर की कब्र को निशाना बनाया। इस योजना को पूर्ण करने आगरा सर्वपाल के मुखिया रामकी चाहर ने चाहरवाटी में एक विशाल पंचायत का आयोजन किया। इस आयोजन में सिनसिनी के सिनसिनवार मुखिया राजाराम सिंह भी शामिल हुए थे।

मार्च 1688 ईस्वी में अकबर के मकबरे के निकटवर्ती क्षेत्र के चाहर, खैनवार, सोलंकी, रावत, छोंकर, हतिन्जार, इन्दौलिया, गंधार, भगौर, सिकरवार जाटों की 12 हज़ार की फ़ौज लेकर रामकी चाहर ने अकबर के मकबरे पर हमला कर दिया। मुगलों और जाटों के मध्य घनघोर युद्ध हुआ। मुगल रक्षक मीर अहमद , मुज़फ्फर खान और मुहम्मद बाका जाटों के डर से कुछ बोल ही नहीं सके। देखते देखते जाट वीर राजाराम और वीर रामकी चाहर ने मुगलों के 400 आदमियों को जहन्नुमरशीद कर दिया और अकबर की कब्र (मकबरा) को खोद डाला और उसकी हड्डियों को अग्नि में झोंक दिया था। अकबर की कब्र को जला कर नष्ट कर दिया गया । मुग़ल मुस्लिम बादशाह की कब्र से हड्डी निकालकर अंतिम संस्कार हिन्दू रीतिरिवाज़ से रामकी चाहर और राजाराम जाट ने कर दिया था। अपने पूर्वज गोकुला की हत्या का बदला लेने के लिए जाटों ने औरंगजेब के पूर्वज अकबर की कब्र को निशाना बनाया। ऐसा करके चाहरवाटी के जाट मुगलों को यह सन्देश देना चाहते थे कि यदि उन्होंने हिन्दुओं और किसानों पर अत्याचार बंद नहीं किये तो इसका अंजाम मुगलों के लिए ताबूत की आखिरी कील सिद्ध होगा।

इस घटना के बाद औरंगजेब ने राजा रामसिंह को रामकी चाहर और वीर राजाराम जाट के विरुद्ध अभियान पर ब्रज भेजा लेकिन इस राजा रामसिंह की मृत्यु हो जाने से यह अभियान विफल रहा था। कुछ समय बाद शेखावत राजपूतों का नीमराना के चौहानों से युद्ध हुआ था। इस युद्ध में चौहानों ने राजाराम और रामकी चाहर से सहायता मांगी जबकि शेखावतों ने मुगलों और हाडाओं से सहायता प्राप्त की थी | यह युद्ध 4 जुलाई 1688 ईस्वी के दिन बिंजल नामक स्थान पर हुआ था। इस युद्ध में औरंगजेब का पोता बेदारबख्त (आजम का पुत्र) मुगलों की तरफ से शामिल हुआ था। एक पेड़ के पीछे से छुप कर मारी गई गोली से राजाराम की मृत्यु युद्ध-स्थल पर ही हो गयी थी लेकिन रामकी चाहर की मृत्यु के सम्बन्ध में दो मत प्राप्त होते हैं। प्रथम मत के अनुसार रामकी चाहर को घायल अवस्था में युद्ध स्थल से बंदी बनाकर मुगलों ने आगरा में लाकर फांसी दी थी। दूसरा मत यह है कि रामकी चाहर की मृत्यु युद्ध स्थल पर ही हो गई थी। लेकिन दोनों मतों का निष्कर्ष एक ही निकलता है जुलाई,1688 ईस्वी में रामकी चाहर भी वीरगति को प्राप्त हो गया था।[2]

Further reading

References


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