Khemkaran

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Khemkaran Sogaria fighting with Tiger

Khemkaran (खेमकरण) (1732 AD) was Jat chieftain of Bharatpur in the Sogaria clan. A Jat king of the Sogariya clan, Rustam, laid the foundation of the modern city of Bharatpur. After him, control passed on to his son, Khemkaran which was then taken over by Maharaja Suraj Mal. Khemkaran was a great warrior. He was awarded with the title of "Faujdar", which is still used by all Sogariyas. [1]

Maharaja Surajmal conquered the site of Bharatpur from Khemkaran Sogaria, the son of Rustam, in the year 1732 and established the Bharatpur town in the year 1743.

A great warrior

Khemkaran was warrior born in Sogarwars. He had stopped all the roads passing by this area for convoys of Aurangzeb. He along with his friend Ramki Chahar created a terror among the Mughal circles in the Agra, Dholpur and Gwalior region. The Mugal sardars were terrified due to their anti-imperialist activities. Bharatpur was part of his state. He is said to be so strong that he could kill two tigers at a time on both sides with a dagger. The Mughal emperor had to award him the title of Faujdar to pacify the Jat and assigned him the duty of ensuring safe passage of the passengers through this area.

He was a kind hearted and charitable person. It is said that he used to take lunch after sounding dhons loudly and had issued instructions to his men that those want to take part in the SAHBHOJ [community kitchen] must be allowed to join him freely. [2]

Death

The Kuntal ruler of Ading state had poisoned him. He knew that the food was poisoned but as he used to consider it as sin to get up after starting taking meals in a kansa [bronze] utensil. immidiately after taking the poisoned food he rode his elephant and moved towards Sugrivgarh. But on the way he died on his elephant. [3]

Statue installed in his Honour

The Chief Minister of Rajasthan Smt Vasundha Raje unveiled a statue (see picture above) of Raja Khemkaran Sogaria, fighting with tiger, on Jaghina turn on Mathura Road in Bharatpur on 5 September 2008.[4]

Raja Khemkaran Jayanti is celebrated on 14 January every year. [5]

जाट जन सेवक

ठाकुर देशराज[6] ने लिखा है .... ठाकुर ब्रजलाल जी - [पृ.68]: डीग में शाहपुरा मोहल्ले में खेमकरण के वंशजों का एक खानदान रहता है। ठाकुर ब्रजलाल उसके सदस्य हैं। आपके पुत्र शिक्षित हैं। आपके पुत्र हैं: 1. कुँवर नन्नू सिंह और 2. जोध सिंह। ठाकुर ब्रजलाल सर्व प्रिय व्यक्ति हैं और कौमी सेवा में प्रसन्न रहने वाले आदमी हैं।

खेमकरण:ठाकुर देशराज

ठाकुर देशराज [7] ने लिखा है ...खेमकरण - यह सुग्रीवगढ़ (सोगर) के अधिपति थे। इनका राज्य सोगर से लगाकर सीकरी तक फैला हुआ था। जिस समय चूड़ामणि जी थून में राज्य करते थे उस समय वह सीकरी को दबाए बैठे थे। सोगर में एक कच्ची गढ़ी बना रखी थी। शरीर के मजबूत और शक्तिमान प्रथम दर्जे के थे। एक बार आगरा में मुगल सूबेदार के सामने आपने एक साथ दो शेरों को केवल कटार से मार दिया था। कहा जाता है कि एक बार आप को राजा चूड़ामणि ने एक रुपया पोटुए से मसल कर दिया कि देखो तो यह तो घिसा हुआ है। वास्तव में पोटुए की रगड़ से उसके अक्षर उखड़ गए थे। खेमकरन ने उससे लेकर पोटुए और अंगुलियों के बीच में दबोच कर लौटाते हुए कहा अजी , यह तो मुड़ा हुआ भी है। खेद है महाराजा सूरजमल के कहने इस वीर का अडिंग के सरदार फोन्दासिंह ने भोजन में विष खिला कर इस संसार से नाम मिटा दिया। सन 1732 महाराजा सूरजमल ने रात्रि में अचानक हमला कर के खेमकरण की फ़तेह गढ़ी पर कब्ज़ा कर लिया जबी उपेन्द्र नाथ शर्मा के अनुसार यह हमला 1726 में किया गया था सूरजमल ने 1733 ईस्वी पर फतेहगढ़ी पर हमला किया [8]

जाट इतिहास:ठाकुर देशराज

ठाकुर देशराज लिखते हैं कि बटेश्वर के आसपास शूर लोगों का राज्य था। कुछ लोगों के मत से सिनसिनी के आसपास शूर लोग राज्य करते थे। एक समय उनका इतना प्रचंड प्रताप था कि सारे देश का नाम ही शौरसैन हो गया। समस्त यादव शौरसैनी कहलाने लगे। मध्यभारत की भाषा का नाम ही उनके नाम पर पड़ गया। आज वे संयुक्त प्रदेश और राजपूताने में सिहोरे (शूरे) सूकरे और सोगरवार कहे जाते हैं। शूरसैनी लोगों की एक शाख पहले सेवर (शिवर) भरतपुर के निकट आबाद थी। आसपास के अनेक गांवों पर उसका प्रभुत्व था। वंशावली रखने वाले भाटों ने सिनसिनवार और सौगरवारों को 10-12 पीढ़ी पर ही कर दिया है। यह गलत है। हां, वे दोनों ही यादव अथवा चन्द्रवंश संभूत हैं। सोगरवार लोगों में सुग्रीव नाम का एक बड़ा प्रसिद्ध योद्धा हुआ है। उसने वर्तमान सोगर को बसाया था। उस स्थान पर एक गढ़ बनाया थ, जो सुग्रीवगढ़ कहलाता था। सुग्रीव गढ़ ही आजकल सोगर कहलाता है जो क्रमशः सुग्रीव गढ़ से सुगढ़, सोगढ़ और सोगर हो गया है। यहां पर सुग्रीव का एक मठ है। सारे सोगरवार पहले उसके नाम पर फसल में से कुछ अन्न निकालते थे। अब भी ब्याह-शादियों में सुग्रीव के मठ पर एक रुपया अवश्य चढ़ाया जाता है। इसी वंश में खेमकरण नाम का एक प्रचंड वीर उत्पन्न हुआ था। वह महाराज सूरजमल से कुछ समय पहले उत्पन्न हुआ था। औरंगजेब की सेना के उसने रास्ते बन्द कर दिये थे। अपने मित्र रामकी चाहर के साथ मिलकर आगरा, धौलपुर और ग्वालियर तक उसने अपना आतंक जमा दिया था। मुगलों के सारे सरदार उसके भय से कांपते थे। कहा जाता है वर्तमान भरतपुर उसी के राज्य में शामिल था। दोपहर को धोंसा बजाकर भोजन करता था। आज्ञा थी कि धोंसे के बजने पर जो भी कोई भाई सहभोज में शामिल होना चाहे, हो जाये। वीर होने के सिवा खेमकरण दानी और उदार भी था। कहा जाता है कि उसके पास हथिनी बड़ी चतुर और स्वामिभक्त थी। यह प्रसिद्ध बात है कि कुंवर सूरजमल के कहने पर अडींग के तत्कालीन खूटेल शासक ने उसे भोजन में विष दे दिया था। जिस समय खेमकरण भोजन पर बैठा था उसे मालूम हो गया था कि भोजन में विष है, किन्तु कांसे पर से उठना उसने पाप समझा। भोजन करते ही हथिनी पर सवार होकर अपने स्थान सुग्रीवगढ़ को चल दिया। कहा जाता है कि विष इतना तीक्षण था कि वह हथिनी पर ही टुकड़े-टुकड़े हो गया। उसके मरने पर उसकी हथिनी भी मर गई। वह बलवान इतना था कि कटार से ही एक साथ दो दिशाओं से छूटे शेरों को मार देता था। मुगल बादशाहों ने उसे फौजदार का खिताब दिया था। सोगर का ध्वंश गढ़ उसके अतीत की स्मृति दिलाता है। यह स्थान संयुक्त-प्रदेश की सीमा के निकट राजस्थान में है।


जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठान्त-557


Khem Karan village in Punjab

Khem Karan is also the name of a place in Taran Taran district of Punjab. This has got historical importance because of a fierce tank battle during Indo-Pak war in 1965 AD when the entire range of American 'Patton Tanks' was destroyed by Indian artillery guns. See the following page of wikipedia for this: http://en.wikipedia.org/wiki/Khemkaran

References

  1. Jat History Thakur Deshraj/Chapter VIII, p. 557
  2. Jat History Thakur Deshraj/Chapter VIII, p. 557
  3. Jat History Thakur Deshraj/Chapter VIII, p. 557
  4. Jat Samaj, Agra, September 2008, p.30
  5. Jat Samaj, Agra, Jan-Feb 2008, p.55
  6. Thakur Deshraj:Jat Jan Sewak, p.68
  7. Thakur Deshraj: Jat Itihas (Utpatti Aur Gaurav Khand)/Parishisht,p.171
  8. गौरव शिखर पुस्तक पृष्ट 40

Author: Laxman Burdak


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