Rashtrakuta

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Author:Laxman Burdak, IFS (R)

Rashtrakuta (Hindi: राष्ट्रकूट, IAST: rāṣṭrakūṭa) (r. 753-982 CE) was a royal Indian dynasty ruling large parts of the Indian subcontinent between the sixth and 10th centuries.

Origin

The origin of the Rashtrakuta dynasty has been a controversial topic of Indian history. These issues pertain to the origin of the earliest ancestors of the Rashtrakutas during the time of Emperor Ashoka in the 2nd century BCE,[1] and the connection between the several Rashtrakuta dynasties that ruled small kingdoms in northern and central India and the Deccan between the 6th and 7th centuries.

The relationship of these medieval Rashtrakutas to the most famous later dynasty, the Rashtrakutas of Manyakheta (present-day Malkhed in the Kalaburagi district, Karnataka state), who ruled between the 8th and 10th centuries has also been debated.[2]

Theories about the dynastic lineage (Surya Vamsa—Solar line and Chandra Vamsa—Lunar line), the native region and the ancestral home have been proposed, based on information gleaned from inscriptions, royal emblems, the ancient clan names such as "Rashtrika", epithets (Ratta, Rashtrakuta, Lattalura Puravaradhiswara), the names of princes and princesses of the dynasty, and clues from relics such as coins.[3][4]

Scholars debate over which ethnic/linguistic groups can claim the early Rashtrakutas. Possibilities include the Kannadiga,[5][6][7][8][9] Reddi,[10]the Maratha,[11][12] the tribes (including Jats) from the Punjab region,[13]or other north western ethnic groups of India.[14]

History

The earliest known Rashtrakuta inscription is a 7th-century copper plate grant detailing their rule from Manpur a city in Maharashtra. Manpur was the first capital of Rashtrakuta dynasty.

Other ruling Rashtrakuta clans from the same period mentioned in inscriptions were the kings of Achalapur and the rulers of Kannauj. Several controversies exist regarding the origin of these early Rashtrakutas, their native homeland and their language.

The Elichpur clan was a feudatory of the Badami Chalukyas, and during the rule of Dantidurga, it overthrew Chalukya Kirtivarman II and went on to build an empire with the Gulbarga region in modern Karnataka as its base. This clan came to be known as the Rashtrakutas of Manyakheta, rising to power in South India in 753 AD. At the same time the Pala dynasty of Bengal and the Prathihara dynasty of Malwa were gaining force in eastern and northwestern India respectively.

An Arabic text, Silsilat al-Tawarikh (851), called the Rashtrakutas one of the four principal empires of the world.[15]

This period, between the eighth and the 10th centuries, saw a tripartite struggle for the resources of the rich Gangetic plains, each of these three empires annexing the seat of power at Kannauj for short periods of time. At their peak the Rashtrakutas of Manyakheta ruled a vast empire stretching from the Ganges River and Yamuna River doab in the north to Kanyakumari in the south, a fruitful time of political expansion, architectural achievements and famous literary contributions. The early kings of this dynasty were influenced by Hinduism and the later kings by Jainism.

During their rule, Jain mathematicians and scholars contributed important works in Kannada and Sanskrit. Amoghavarsha I, the most famous king of this dynasty wrote Kavirajamarga, a landmark literary work in the Kannada language. Architecture reached a milestone in the Dravidian style, the finest example of which is seen in the Kailasanatha Temple at Ellora in modern Maharashtra. Other important contributions are the Kashivishvanatha temple and the Jain Narayana temple at Pattadakal in modern Karnataka, both of which are UNESCO World Heritage Sites.

Expansion

During their political expansion into central and northern India in the 8th to the 10th centuries, the Rashtrakutas or their relatives created several kingdoms that either ruled during the reign of the parent empire or continued to rule for centuries after its fall or came to power much later. Well known among these were the

Branches of Rashtrakuta dynasty

Several Branches of the Rashtrakuta dynasty were created by the kings, commanders and relatives of the Rashtrakuta family during their expansion into central and northern India in the eighth to the tenth centuries. These kingdoms ruled during the reign of the parent empire or continued to rule for centuries after its fall or came to power much later.

Rashtrakuta branches: These branches emerged as a result of Rashtrakuta conquest of North India.

Rashtrakutas of Lata (Gujarat):[25]

  • Indra (807-818) (brother of Govinda III above)
  • Karka and Govinda (818-826)
  • Dhruva II (835-845)
  • Akalavarsha Shubhatunga (867)
  • Dhruva III (-871)
  • Direct rule from Manyakhet by Krishna II

Rashtrakutas of Hastikundi (Hathundi) (Jodhpur)[26][27][28]

  • Harivarma
  • Vidagdha (916-938)
  • Mammata (939)
  • Balaprasada (997)
  • The Hathundi Rathores (descendants)

Rashtrakutas of Dahal (near Jabalpur) (Madhya Pradesh)[29]

Rashtrakutas of Kanauj (11th. century-13th. century)[30]

  • Gopal (4th king)
  • Tribhuvana
  • Madanapala (1119)
  • Devapala (Lost Shravasti to Gahadavalas in 1128)
  • Bhimapala
  • Surapala
  • Amritapala
  • Lakhanpala (In 1202 defeated byQutub-ud-din)
  • Mahasamanta Barahadeva (under Gahadavala Adakkhamalla)

Rashtrakutas of Mandore/Jodhpur

  • The lineage of Rathors 1226 - To date (Mandore/Jodhpur)

According to one theory, the Gahadavalas were an offshoot of the Rashtrakutas of Kannauj, but this theory is contradicted by epigraphic evidence.[31]

राष्ट्रकूट

राष्ट्रकूट दक्षिण भारत, मध्य भारत और उत्तरी भारत के बड़े भूभाग पर राज्य (735-982) करने वाला राजवंश था।

इतिहास: इनका शासनकाल लगभग छठी से तेरहवीं शताब्दी के मध्य था। इस काल में उन्होंने परस्पर घनिष्ठ परन्तु स्वतंत्र जातियों के रूप में राज्य किया, उनके ज्ञात प्राचीनतम शिलालेखों में सातवीं शताब्दी का 'राष्ट्रकूट' ताम्रपत्र मुख्य है, जिसमे उल्लिखित है की, 'मालवा प्रान्त' के मानपुर में उनका साम्राज्य था (जोकि आज मध्य प्रदेश राज्य में स्थित है), इसी काल की अन्य 'राष्ट्रकूट' जातियों में 'अचलपुर'(जो आधुनिक समय में महारास्ट्र में स्थित एलिच्पुर है), के शासक तथा 'कन्नौज' के शासक भी शामिल थे।

मानपुर महाराष्ट्र (AS, p.734) में दक्षिण भारत के प्रसिद्ध राष्ट्रकूट वंश की सर्वप्रथम राजधानी थी. कई विद्वानों का मत है कि यह राजधानी लटूर में थी. [32]

इनके मूलस्थान तथा मूल के बारे में कई भ्रांतियां प्रचलित है। एलिच्पुर में शासन करने वाले 'राष्ट्रकूट' 'बादामी चालुक्यों' के उपनिवेश के रूप में स्थापित हुए थे लेकिन 'दान्तिदुर्ग' के नेतृत्व में उन्होंने चालुक्य शासक 'कीर्तिवर्मन द्वितीय' को वहाँ से उखाड़ फेंका तथा आधुनिक 'कर्णाटक' प्रान्त के 'गुलबर्ग' को अपना मुख्य स्थान बनाया। यह जाति बाद में 'मान्यखेत के राष्ट्रकूटों ' के नाम से विख्यात हो गई, जो 'दक्षिण भारत' में 753 ईसवी में सत्ता में आई, इसी समय पर बंगाल का 'पाल साम्राज्य' एवं 'गुजरात के प्रतिहार साम्राज्य' 'भारतीय उपमहाद्वीप' के पूर्व और उत्तरपश्चिम भूभाग पर तेजी से सत्ता में आ रहे थे।

आठवीं से दसवीं शताब्दी के मध्य के काल में गंगा के उपजाऊ मैदानी भाग पर स्थित 'कन्नौज राज्य' पर नियंत्रण हेतु एक त्रिदलीय संघर्ष चल रहा था, उस वक्त 'कन्नौज' 'उत्तर भारत' की मुख्य सत्ता के रूप में स्थापित था। प्रत्येक साम्राज्य उस पर नियंत्रण करना चाह रहा था। 'मान्यखेत के राष्ट्रकूटों' की सत्ता के उच्चतम शिखर पर उनका साम्राज्य उत्तरदिशा में 'गंगा' और 'यमुना नदी' पर स्थित दोआब से लेकर दक्षिण में कन्याकुमारी तक था। यह उनके राजनीतिक विस्तार, वास्तुकला उपलब्धियों और साहित्यिक योगदान का काल था। इस राजवंश के प्रारंभिक शासक हिंदू धर्म के अनुयायी थे, परन्तु बाद में यह राजवंश जैन धर्म के प्रभाव में आ गया था।

उत्पति: दक्षिण भारत एवं गुजरात में मिले 75 शिलालेख 8 शिलालेख पे इनके वंश के बारे प्रकाश डालता है कि राष्ट्रकूट अपने आपको सात्यकी जो यदुवंशी था महाभारत में नारायणी सेना के प्रमुख सात सेनापतियों में से एक था उसी के वंश का राष्ट्रकुट है विद्वान एवं इतिहासकार समर्थन करते हैं कि राष्ट्रकूट यदुवंशी क्षत्रिय है 860 ई. में उत्कीर्ण एक शिलालेख में बताया गया है कि राष्ट्रकुट शासक दन्तिदुर्ग का जन्म यदुवंशी सात्यकी के वंश में हुआ था गोविंद तृतीय 880 ई में उत्कीर्ण एक शिलालेख में लिखा है कि राष्ट्रकुट शासक वैसे ही अजय हो गए जैसे भगवाण श्री कृष्ण यदुवंशी में जन्म लेकर अजय हो गए थे हलायुद्ध द्वारा लिखी गई किताब कविरहस्य में भी राष्ट्रकुट राजाओं को यदुवंशी सात्यकी का वंशज लिखा गया है अमोघवर्ष प्रथम द्वारा 950 में लिखित एक ताम्रपत्र में अपने आपको यदुवंशी लिखा है 914 ई० में एक ताम्रपत्र में दन्तिदुर्ग को यदुवंशी लिखा गया है.

860 ई० के पूर्व हमें राष्ट्रकूट राजाओं के वंश के बारे में कुछ भी ज्ञात नहीं था। इसके बाद दक्षिण भारत एवं गुजरात से मिले 75 शिलालेखों में से कुछ इनके वंश के बारे में प्रकाश डालते हैं၊ इनमें से 8 शिलालेख बताते हैं कि राष्ट्रकूट राजा यादववंश के थे၊ 860 ई० में उत्कीर्ण एक शिलालेख में बताया गया है कि २ाष्ट्रकूट शासक दंतिदुर्ग का जन्म यदुवंशी सात्यकी के वंश में हुआ था ၊ इसप्रकार राष्ट्रकूट वंश भगवान कृष्ण के सेनापति सात्यिकी यादव का वंश है । ये यदुवंशी क्षत्रिय थे। गोविन्द तृतीय (880 ई०) द्वारा उत्कीर्ण एक शिलालेख में लिखा है कि "इस महान राजा के जन्म से राष्ट्रकूट वंश वैसे ही अजेय हो गया जैसे भगवान कृष्ण के जन्म से यादव वंश हो गया था"। यह शिलालेख इस ओर स्पष्ट रूप से इशारा करते है कि राष्ट्रकूट यादव थे। हलायुध द्वारा लिखी गई किताब 'कविरहस्य' में भी राष्ट्रकूट राजाओं को यदुवंशी सात्यकी का वंशज लिखा गया है। अमोघवर्ष प्रथम द्वारा 950 ई० में लिखित एक ताम्र-पत्र में भी उन्होंने अपने आप को यादव बताया है। 914 ई० के ताम्र-पत्र में भी राष्ट्रकूट राजा'दन्तिदुर्ग' को यादव सात्यकी का वंशज लिखा गया है। इन बातों से सिद्ध होता है कि राष्ट्रकूट राजा यादव थे। ये कन्नड भाषा बोलते थे,लेकिन उन्हें उत्तर-ढक्कनी भाषा की जानकारी भी थी। अपने शत्रु चालुक्य वंश को पराजित करने वाले राष्ट्रकूट वंश के शासन काल में ही ढक्कन साम्राज्य भारत की दूसरी बड़ी राजनीतिक इकाई बन गया,जो मालवा से कांची तक फैला हुआ था । इस काल में राष्ट्रकूटों के महत्व का इस तथ्य से पता चलता है कि एक मुस्लिम यात्री ने यहाँ के राजा को दुनिया के चार महान शासकों में से एक बताया (अन्य शासक खलीफा तथा बाइजंतिया और चीन के सम्राट थे।

प्रशासन: ये संभवत: मूल रूप से द्रविड़ किसान थे, जो लाततापुर (लातूर, उसमानवाद के निकट) के शाही परिवार के थे। ये कन्नड भाषा बोलते थे, लेकिन उन्हें उत्तर-डाककनी भाषा की जानकारी भी थी। अपने शत्रु चालुक्य वंश को पराजित करने वाले राष्ट्रकूट वंश के शासन काल में ही दक्कन साम्राज्य भारत की दूसरी बड़ी राजनीतिक इकाई बन गया, जो मालवा से कांची तक फैला हुआ था। इस काल में राष्ट्रकूटों के महत्व का इस तथ्य से पता चलता है कि एक मुस्लिम यात्री ने यहाँ के राजा को दुनिया के चार महान शासकों में से एक बताया (अन्य शासक खलीफा तथा बाइजंतीया और चीन के सम्राट थे)।

कला और संस्कृति: कई राष्ट्रकूट राजा अध्ययन और कला के प्रति समर्पित थे। दूसरे राजा, कृष्ण प्रथम (लगभग 756 से 773) ने एलोरा में चट्टान को काटकर कैलाश मंदिर बनवाया। इस राजवंश का प्रसिद्ध शासक अमोघवर्ष प्रथम ने, जिनहोने लगभग 814 से 878 तक शासन किया, सबसे पुरानी ज्ञात कन्नड कविता कविराजमार्ग के कुछ खंडों की रचना की थी। उनके शासन काल में जैन गणितज्ञों और विद्वानों ने 'कन्नड' व 'संस्कृत' भाषाओं के साहित्य में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनी वास्तुकला 'द्रविणन शैली' में आज भी मील का पत्थर मानी जाती है, जिसका एक प्रसिद्ध उदाहरण 'एल्लोरा' का 'कैलाशनाथ मन्दिर' है। अन्य महत्वपूर्ण योगदानों में 'महाराष्ट्र' में स्थित 'एलीफेंटा गुफाओं' की मूर्तिकला तथा 'कर्णाटक' के 'पताद्क्कल' में स्थित 'काशी विश्वनाथ' और 'जैन मन्दिर' आदि आते हैं, यही नहीं यह सभी 'यूनेस्को' की वर्ल्ड हेरिटेज साईट में भी शामिल हैं।


Sources

  • Altekar, Anant Sadashiv (1934) [1934]. The Rashtrakutas And Their Times; being a political, administrative, religious, social, economic and literary history of the Deccan during C. 750 A.D. to C. 1000 A.D. Poona: Oriental Book Agency. OCLC 3793499.
  • Jain, K.C. (2001) [2001]. Bharatiya Digambar Jain Abhilekh. Madhya Pradesh: Digambar Jain Sahitya Samrakshan Samiti
  • Kamath, Suryanath U. (2001) [1980]. A concise history of Karnataka : from pre-historic times to the present. Bangalore: Jupiter books. LCCN 80905179. OCLC 7796041.
  • Majumdar, R.C. (1966) [1966]. The Struggle for Empire. Bharatiya Vidya Bhavan.
  • Reu, Pandit Bisheshwar Nath (1997) [1933]. History of the Rashtrakutas (Rathodas). Jaipur: Publication Scheme. ISBN 81-86782-12-5.
  • Singh, Upinder (2008) [2008]. A History of Ancient and Early Medieval India:From the Stone Age to the 12th Century. India: Pearsons Education. ISBN 978-81-317-1120-0.
  • Vaidya, C.V. (1979) [1924]. History of Mediaeval Hindu India (Being a History of India from 600 to 1200 A.D.). Poona: Oriental Book Supply Agency. OCLC 6814734.

References

  1. Reu (1933), pp1–5
  2. Altekar (1934), pp1–32; Reu (1933), pp6–9, pp47–53; Kamath (2001), p72–74
  3. Kamath (2001), p72–74
  4. Reu (1933), pp1–15
  5. Anirudh Kanisetti (2022). Lords of the Deccan: Southern India from the Chalukyas to the Cholas. India: Juggernaut. p. 193. ISBN 978-93-91165-0-55. "It is most likely that they were Kannada-speaking military aristocrats settled at a strategic point in modern-day Maharasthra by the Chalukyas or some other powerful group, perhaps to keep an eye on trade routes and various tribal peoples."
  6. A Kannada dynasty was created in Berar under the rule of Badami Chalukyas (Altekar 1934, p21–26)
  7. Kamath 2001, p72–3
  8. Singh (2008), p556
  9. Shetty, Sadanand Ramakrishna (1994). Banavasi Through the Ages. Banavasi (India): Printwell. p. 121.:"The community of the land tillers or agriculturists was known as Vokkaligas. The importance given to the cultivation of land is amply demonstrated by the fact that numerous tanks were dug and irrigation facilities were provided at various places. Some of the Rashtrakuta inscriptions found in the Banavasi province have the depiction of a plow. It is viewed that the Rashtrakutas were originally prosperous cultivators who later dominated the political scene. Some of the inscriptions refer to them as "Kutumbinah" which is interpreted as cultivators."
  10. A.C. Burnell in Pandit Reu (1933), p4
  11. C.V. Vaidya (1924), p171
  12. D.R.Bhandarkar in Reu, (1933), p1, p7
  13. Hultzsch and Reu in Reu (1933), p2, p4
  14. J. F. Fleet in Reu (1933), p6
  15. Reu (1933), p39
  16. Reu (1933), p93
  17. Reu (1933), p100
  18. Reu (1933), p113
  19. Reu (1933), p110
  20. Jain (2001), pp67–75
  21. Reu (1933), p112
  22. De Bruyne (1968)
  23. Majumdar (1966), pp50–51
  24. Pillay, K. (1963). South India and Ceylon. University of Madras. OCLC 250247191.
  25. The Chronology of Indian History, C.M. Duff, 1972, pp 300-301
  26. The Age of Imperial Kannauj, R. C. Majumdar Ed, Bharatiya Vidya Bhavan, 1964, pp 97, 103
  27. The Rise and Decline of Buddhism in India, K.L. Hazara, Munshiram Manoharlal, 1995, pp 154-155, 103
  28. Pramukh Aitihasik Jain Purush aur Mahilayen, J.P. Jain, Bharatiya Jnanapith, 1975, p217
  29. Bharatiya Digambar Jain Abhilekh: Madhya Pradesh, K. C. Jain, Digambar Jain Sahitya Samrakshan Samiti, 2001, pp 67-75
  30. The Struggle for Empire, R.C. Majumdar Ed, Bharatiya Vidya Bhavan, 1966, pp 50-51
  31. Roma Niyogi (1959). The History of the Gāhaḍavāla Dynasty. Oriental. pp. 29–33. OCLC 5386449.
  32. Aitihasik Sthanavali by Vijayendra Kumar Mathur, p.734

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