Shahdara Delhi

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Shahdara, or Shahdra (शाहदरा) is a village in east Delhi, situated on the banks of Yamuna River. It is one of the oldest localities of Delhi and integral to what is known as Purani Dilli (Old Delhi).

Shahdara developed around a chhota bazaar (small market) called Chandrawali village dating to the 16th century. During ancient times, it was used as a passage from Meerut to Delhi. After Chandni Chowk, Shahdara is the among the oldest suburbs of Delhi. In the 18th century, Shahdara had grain warehouses and whoIesale grain markets which supplied the Patparganj grain market, across the Yamuna river.

Gotras

To be added

Shahdara tahsil

Shahdara is not a village now. It has got the status of a Tehsil/Block in the North- East Delhi district of Delhi and the old village has become congested and is surrounded by many residential colonies. According to Census 2011 information, the sub-district code of Shahdara block is 00437. There are about two villages in Shahdara block - 1. Babarpur and 2. Jaffarabad. Nearby Towns of Shahdara are Seelampur and Seemapuri.

Shahdara now has a station of Delhi Metro, in its name.

Notable persons

Shahadara in Jat History

महाराजा सूरजमल का अन्तिम युद्ध और मृत्यु

सूरजमल को अच्छी तरह से पता था कि नजीबुद्दौला) मेरे से युद्ध लड़ने से डरता है और उसने अब्दाली को दिल्ली पहुंचने का संदेश भेज दिया है। सूरजमल इस अवसर को खोना नहीं चाहता था। उसने अब्दाली के आने से पहले दिल्ली पर अधिकार करने का निश्चय किया। अतः उसने नजीब खान से मांग की कि, “मेरे को राजधानी के चारों ओर के जिलों की फौजदारी (राज्याधिकार) सौंप दो।” (सियार iv, पृ० 30)।

बयान-ओ-वाका के लेखक अब्दुल करीम कश्मीरी के लेख अनुसार - “सूरजमल ने नजीब खान को दिल्ली राजधानी को छोड़ने तथा दोआब के प्रदेश को उसे सौंप देने को कहा। यद्यपि नजीब ने लाचार होकर सिकन्दरा और दूसरे परगने, सूरजमल को देने का निवेदन किया, किन्तु सूरजमल इससे सन्तुष्ट नहीं हुआ।” (बयान, एम० एस०, 302)। .........

सूरजमल इस समय अपनी सेना के साथ दिल्ली के 16 मील निकट पहुंच चुका था और काला पहाड़ पर उसने अपना शिविर स्थापित किया था। (नूरुद्दीन, पृ० 65 ब)।

नजीब के दूतों ने पीले एवं गुलाबी रंग की मुल्तानी छींट के दो सुन्दर थानों की भेंट के साथ जाट राजा का सम्मान किया। सूरजमल ने दूतों से कहा, “नजीबुद्दौला ने मेरी आशा के विपरीत कार्य किया है। वह एकमात्र अपने सहगोत्री सैन्यदल के गर्व में नजीबाबाद से आया है। अतः मेरे लिये यह आवश्यक है कि एक बार मैं उसकी सेना का सामना करूं।” (नूरुद्दीन, पृ० 65-ब, 66)-ब।

23 दिसम्बर को दूतों ने लौटकर अपने स्वामी नजीब खान को सब बातें बतला दीं। इस प्रकार दोनों पक्षों में युद्ध की तैयारियां तेजी से शुरु हो गईं। .........

24 दिसम्बर को नजीब खान ने लगभग 12,000 घुड़सवार और पैदल सेना के साथ, जिसमें रुहेले एवं मुग़ल सैनिक थे, यमुना नदी को पार किया। उसके साथ उसके सभी पुत्र अफजल खान, सुल्तान खान, जाबेता खान तथा कई सेनापति सादत खान, सिद्दीक खान, मुहम्मद खान बंगश आदि थे। सूरजमल की सेना ने, जो पहले से ही यमुना नदी पार कर चुकी थी, हिण्डन नदी (यमुना की सहायक नदी, दिल्ली से 7 कोस पूर्व में) को पार करके अपने मोर्चे स्थापित कर लिए। 25 दिसम्बर को सूर्योदय से तीन घंटे पूर्व नजीब खान की सेना ने भी हिण्डन नदी के पश्चिमी तट पर अपने डेरे जमाए और मोर्चे कायम किए। (नूरुद्दीन, पृ० 67ब, 68अ; सरकार, पतन 11, पृ० 280)।

दोनों पक्षों के बीच 25 दिसम्बर को सवेरे ही युद्ध शुरु हो गया जो दिन के तीसरे पहर तक चलता रहा। युद्ध की भीषणता के बीच सूरजमल ने अपनी मुख्य सेना को रुहेलों के विरुद्ध लड़ते हुए छोड़कर स्वयं 5,000 सैनिकों के साथ नदी के ऊपरी बहाव की ओर चार मील की दूरी पर हिण्डन को पार करके, नजीब की सेना के पृष्ठभाग पर आक्रमण कर दिया। नजीब की ओर से मुग़लिया दल, सैय्यद मुहम्मद खान बलूच, जेता गूजर का पुत्र, गुलाबसिंह गूजर, अफजल खान और उस्मान खान ने भीषण युद्ध किया, जिसमें दोनों पक्षों के लगभग एक हजार सैनिक मारे गए। दिन भर के युद्ध में जाटों का पलड़ा भारी रहा।

महाराजा सूरजमल का सैन्यदल इस मुठभेड़ के बाद नए आक्रमण के लिए पीछे लौट गया। सूरजमल अपने सैनिकों में साहस दिलाने के उद्देश्य से छलांगें लगाता हुआ युद्ध के मैदान की जांच करने और घोड़ों से आक्रमण के लिए अपनी पसन्द का स्थान निश्चित करने हेतु एक ऊंचे स्थान पर थोड़े से सैनिकों के साथ खड़ा था, तभी सैय्यद मुहम्मद खान (सैद्दू) बलूच के नेतृत्व में उसके सैनिकों ने अचानक हमला करके सूरजमल को मार दिया (सियार, 6, पृ० 31-32)। नूरुद्दीन लिखता है कि “निरन्तर घाव के कारण सूरजमल अपने घोड़े पर से गिर पड़ा था और उधर से भागते हुए सैद्दू व उसके सैनिकों ने उसे देखा तो वे तुरन्त उस पर टूट पड़े और उसे मार डाला।” (नूरुद्दीन, पृ० 69अ)

कानूनगो के लेख अनुसार “सूरजमल अपने 30 घुड़सवारों के साथ मुगल एवं बलूच सेना के मध्य भाग पर टूट पड़ा और मारा गया।” (रविवार 25 दिसम्बर 1763 ई० को बहवाला, वाका, पृ० 199, कानूनगो, जाट, पृ० 82)

जाट सेना का अनुशासन इतना बढ़िया था कि यद्यपि सूरजमल की मृत्यु की खबर सैनिकों में फैल गई थी, फिर भी एक भी सैनिक विचलित नहीं हुआ। वे अपनी जगह ऐसे जमे रहे जैसे कुछ हुआ ही नहीं है। उधर मुसलमान सेना छिन्न-भिन्न होकर अपने शिविर की ओर भाग खड़ी हुई। इसके बाद जाटसेना विजेताओं की-सी प्रभुता के साथ रणक्षेत्र से लौटी। (सियार-उल-मुतख्खरीन, IV, 32 के हवाले से कानूनगो, जाट, पृ० 82)। ‘बयान-ए-वाकाई’ में ख्वाजा अब्दुलकरीम कश्मीरी लिखता है कि “उसका शव उनके हाथ नहीं आया। उसकी मृत्यु की खबर की पुष्टि उस समय नहीं हो सकी। नजीब खान अपनी सेना की सुरक्षा के लिए सारी रात अपने मोर्चे पर डटा रहा।”

“25 दिसम्बर की आधी रात के समय जाट सेना हिण्डन के परले किनारे से वापस लौट चली। अगले दिन नजीब के सैनिकों को 30 मील तक जाट सेना का कोई निशान तक न मिला और तभी सूरजमल की मृत्यु की खबर पर नजीब व उसकी सेना ने विश्वास किया।” कहा जाता है कि नजीब ने अपनी यह विख्यात उक्ति उसी समय कही थी कि जाट मरा तब जानिये जब तेरहवीं (श्राद्ध) हो जाये। ( कानूनगो, जाट, पृ० 82)।

नजीब खान अपनी सेना सहित राजधानी को लौट गया। (बयान-ए-एम० एस०, पृ० 303)

इस प्रकार क्रिसमस एवं रविवार के दिन, 25 दिसम्बर, 1763 ई० को, राजधानी की छांह तले, शाहदरा के निकट, पवित्र नदी के तीर पर “जाट जाति की आंख और ज्योति, गत 15 वर्षों से हिन्दुस्तान का सबसे उग्र व प्रबल राजा, अपने काम को अधूरा छोड़कर जीवन के रंगमंच से लुप्त हो गया। वह एक महान् व्यक्तित्व और एक लोकोत्तर प्रतिभाशाली पुरुष था, जिसे अठारहवीं शताब्दी के प्रत्येक इतिहासकार ने श्रद्धाञ्जलि अर्पित की है।” फादर वैण्डल के शब्दों में “सूरजमल एक दृढ़ निश्चयी, बुद्धिमान्, नीतिचतुर, शूरवीर और महान् राजा था, जिसकी विदेशियों ने भी प्रशंसा की तथा उससे भयभीत थे।” (कालिकारंजन कानूनगो, जाट, पृ० 82)

महाराजा सूरजमल के दाहसंस्कार के लिए उनका शव तो था नहीं, अतः एक रानी के पास उनके दो दांत मिल गये। राजपण्डितों ने कहा कि दांत भी शव के समान ही हैं, अतः कृष्ण जी की पवित्र लीलाभूमि गोवर्धन में महाराजा का अन्त्येष्टि-समारोह सम्पन्न हुआ। बाद में खुदाई करके वहां कुसुम सरोवर ताल बनाया गया और उसके पूर्वी किनारे पर एक छतरी (स्मारक) बनाई गई, जो जाट वास्तु-कला का एक अविस्मरणीय सुन्दर नमूना है।

इस दाहसंस्कार के बाद जवाहरसिंह अपने पिता की राजगद्दी पर बैठ गया। ......

महाराजा सूरजमल का लक्ष्य दिल्ली पर अधिकार करने का था। उसकी शक्तिशाली जाटसेना से साम्राज्यवादी मुस्लिम सेना एवं उनके नेता वजीर नजीबुद्दौला, भयभीत हो चुके थे। यदि सूरजमल की इस युद्ध में मृत्यु न होती तो निःसन्देह जीत जाटों की होती और उनका दिल्ली पर अधिकार होता और मुग़लों का शासन समाप्त हो जाता। लेकिन यह जाटों का दुर्भाग्य था कि महाराजा सूरजमल युद्ध में धोखे से मारे गये। ........

महाराजा सूरजमल के दाह संस्कार की नई खोज

समाचार पत्र ग्राम प्रतिनिधि, प्रगतिशील हिन्दी मासिक, दिनांक 25 दिसम्बर, 1990 ई०, लेख डॉक्टर बलबीरसिंह अहलावत (गांव गोछी, जि० रोहतक), हिन्दू कॉलिज, देहली का लेख निम्न प्रकार से है -

चौधरी हुकमसिंह ने जिनकी आयु 85 वर्ष हो चुकी है, एक भेंट में मुझे बताया कि महाराजा सूरजमल का अन्त 25 दिसम्बर, 1763 ई० को, दिन छिपने से पहले हुआ। यह उन्होंने अपने दादा की जबानी सुना, जिसने यह सब कुछ अपनी आंखों से देखा था। चौ० हुकमसिंह शाहदरा में सूरजमल की समाधि के निकट रहते हैं। उसने बताया कि मुग़ल सेना के सिपाही बड़ी संख्या में इधर-उधर दिखाई दे रहे थे। अतः हमारे लोगों में बड़ा भय था। फिर भी मेरे दादा तथा कुछ लोगों ने सूरजमल के शव को रात के अंधेरे में छिपाए रखा। डर यह भी था कि कोई जासूस मुग़ल सेना से चुगली न कर दे। रात को सुनसान हो जाने पर तथा कोई भी मुग़ल सैनिक नजर न आने पर, उस समय हमारे पूर्वज लोगों ने महाराजा सूरजमल की चिता बनाकर वैदिक मन्त्रों द्वारा दाह संस्कार कर दिया। इसकी सभी रस्में पूरी की गईं।”[1]

External Links


Author of this page -

Dayanand Deswal

References


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