Govardhan

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Chhatris of Maharajas of Bharatpur in Govardhan (Mathura)
Location of Govardhan in Mathura district

Govardhan (गोवर्धन) is a village in Mathura tahsil and district Uttar Pradesh. It is also a constituency of Uttar Pradesh Vidhan Sabha.

Variants

Origin

Jat Gotras

History

गोवर्धन

विजयेन्द्र कुमार माथुर[1] ने लेख किया है ...1. गोवर्धन (AS, p.305): जिला नासिक महाराष्ट्र का प्रदेश. इसका उल्लेख शातवाहन नरेश गौतमीपुत्र शातकर्णी तथा पुलोमही (प्रथम द्वितीय शती ई.) के अभिलेखों में है. इसमें 'गोवर्धन अहार पर विष्णुपालित, श्यामक तथा शिवस्कंद दत्त का शासन बताया गया है. महावस्तु (सेनार्ट द्वारा संपादित पृ.363) में दंडकारण्य की राजधानी गोवर्धन कही गई है.

2. गोवर्धन (AS, p.306): गोवर्धन मथुरा नगर, उत्तर प्रदेश के दक्षिण-पश्चिम में लगभग 14 मील की दूरी पर स्थित पर्वत है जिसे, पौराणिक कथाओं के अनुसार, श्री कृष्ण ने उंगली पर उठाकर ब्रज की इंद्र के कोप से रक्षा की थी. गोवर्धन में अरावली पहाड़ की कुछ निचली श्रेणियां फैली हुई है. हरिवंश, विष्णु पर्व अध्याय 37 में उल्लेख है कि इक्ष्वाकु वंश के राजा हर्यश्व ने जिनका राज्य महाभारत काल से भी बहुत पहले मथुरा में था, अपनी राजधानी के समीप पहाड़ी पर एक नगर बसाया था जो संभवत: गोवर्धन ही था. श्रीमद्भागवत में गोवर्धनलीला दशम स्कंध के 25 वें अध्याय में सविस्तार वर्णित है-- ('इत्युक्त्वैकेन हस्तेन कृत्वा गोवर्धनाचलम् दधार लीलया कृष्णश्छत्राकमिव बालक:' आदि). श्रीमद् भागवत 5,19,16 में भी गोवर्धन पर्वत का उल्लेख है--'द्रोणश्चित्रकूटो गोवर्धनो रैवतक:, कुकुभोनीलो गोकामुख इंद्र कील:'. विष्णु पुराण 5,13, 1 तथा 5,10,38 ('तस्माद् गोवर्धनश्शैलो भवदिभर्विविधार्हणै, अर्च्यतां पूज्यतां मेध्यान् पशून हत्वा विधानत:') में कृष्ण की गोवर्धन पूजा का वर्णन है. महाकवि कालिदास ने गोवर्धन को शूरसेनप्रदेश में बताया है--'अध्यास्य चाम्भ: पृषतोक्षितानि शैलेयगंधीन-- शिलातलानि, कलापिनां प्रावृषि पश्य नृत्यं कांतासु गोवर्धनकंदरासु' रघु. 6,51: -- शूरसेन के राजा सुषेण का परिचय इंदुमती को उसके स्वयंवर के समय देती हुई सखी सुनंदा कहती है--'शूरसेननरेश से विवाह करने के पश्चात तू गोवर्धन पर्वत की सुंदर कंदराओं में शैलेयगंध से सुवासित और वर्षा के जल से धुली हुई शिलाओं पर आसीन होकर प्रावृट काल में मयूरों का नृत्य देखना'.

गोवर्धन को घटजातक में गोवद्ध-मान कहा गया है. गोवर्धन में श्री हरिदेव (कृष्ण) का एक प्राचीन मंदिर है जिसे अकबर के मित्र एवं संबंधी आमेर नरेश भगवान दास का बनवाया हुआ कहा जाता है. मानसी गंगा (पौराणिक किंवदंतियों के अनुसार) श्री कृष्ण के मानस से प्रसूत हुई थी. इसके घाट अर्वाचीन हैं (टीप: ऐसा जान पड़ता है कि गोवर्धन की श्रंखला वास्तव में पर्वत नहीं है वरन् एक लंबा चौड़ा बांध है जिसे संभवत श्री कृष्ण ने वर्षा की बाढ़ से ब्रज की रक्षा करने के लिए बनाया था. यह अधिक ऊंचा नहीं है और इसे पर्वत किसी प्रकार भी नहीं कहा जा सकता. इसके पत्थरों को देखने से भी यह प्रतीत होता है कि यह है कृत्रिम रूप से बनाई गई कोई संरचना है. आज भी गोवर्धन के पत्थरों को उठाना या हटाना पाप समझा जाता है. इस बात से भी इसका कृत्रिम रूप से जनसाधारण के हितार्थ बनाया जाना प्रमाणित होता है. इस विषय में अनुसंधान अपेक्षित है.)

गोवद्धमान

विजयेन्द्र कुमार माथुर[2] ने लेख किया है ...गोवद्धमान (AS, p.307) एक पौराणिक नगर का नाम है। इस नगर का, जो 'गोवर्धन' का रूपांतर जान पड़ता है, 'घटजातक' (सं. 454) में उल्लेख हुआ है। इस नगर को वासुदेव कृष्ण की माता 'देवगब्भा' (देवकी) तथा 'उपसागर' (वासुदेव) का निवास स्थान बताया गया है। वासुदेव कृष्ण का जन्म, इस 'घटजातक' के अनुसार गोवद्धमान नामक स्थान पर ही हुआ था।

दंडक = दंडकवन = दंडकारण्य

विजयेन्द्र कुमार माथुर[3] ने लेख किया है ... दंडक = दंडकवन = दंडकारण्य (AS, p.421): रामायण काल में यह वन विंध्याचल से कृष्णा नदी के कांठे तक विस्तृत था. इसकी पश्चिमी सीमा पर विदर्भ और पूर्वी सीमा पर कलिंग की स्थिति थी. वाल्मीकि रामायण अरण्यकांड 1,1 में श्री राम का दंडकारण्य में प्रवेश करने का उल्लेख है-- 'प्रविश्य तु महारण्यं दंडकारण्यमात्मवान् रामो ददर्श दुर्धर्षस्तापसाश्रममंडलम्'.

लक्ष्मण और सीता के साथ रामचंद्रजी चित्रकूट और अत्रि का आश्रम छोड़ने के पश्चात यहां पहुंचे थे. रामायण में, दंडकारण्य में अनेक तपस्वियों के आश्रमों का वर्णन है. महाभारत में सहदेव की दिग्विजय यात्रा के प्रसंग में दंडक पर उनकी विजय का उल्लेख है--'ततः शूर्पारकं चैव तालकटमथापिच, वशेचक्रे महातेजा दण्डकांश च महाबलः' महा. सभा पर्व 31,36

सरभंगजातक के अनुसार दंडकी या दंडक जनपद की राजधानी कुंभवती थी. वाल्मीकि रामायण उत्तरकांड 92,18 के अनुसार दंडक की राजधानी मधुमंत में थी. महावस्तु (सेनार्ट का संस्करण पृ. 363) में यह राजधानी गोवर्धन या नासिक में बताई है. वाल्मीकि अयोध्या कांड 9,12 में दंडकारण्य के वैजयंत नगर का उल्लेख है. पौराणिक कथाओं तथा कौटिल्य के अर्थशास्त्र में दंडक के राजा दांडक्य की कथा है जिनका एक ब्राह्मण कन्या पर कुदृष्टि डालने से सर्वनाश हो गया था. अन्य कथाओं में कहा गया है भार्गव-कन्या दंडका के नाम पर ही इस वन का नाम दंडक हुआ था.

कालिदास ने रघुवंश में 12,9 में दंडकारण्य का उल्लेख किया है-- 'स सीतालक्ष्मणसख: सतयाद्गुरुमलोपयन्, विवेश-दंडकारण्यं प्रत्येकं च सतांमन:'. कालिदास ने इसके आगे 12,15 में श्रीराम के दंडकारण्य-प्रवेश के पश्चात उनकी भरत से चित्रकूट पर होने वाली भेंट का वर्णन है जिससे कालिदास के अनुसार चित्रकूट की स्थिति भी दंडकारण्य के ही अंतर्गत माननी होगी. रघुवंश 14,25 में वर्णन है कि अयोध्या-निवर्तन के पश्चात राम और सीता को दंडकारण्य के कष्टों की स्मृतियाँ भी बहुत मधुर जान पड़ती थी-- 'तयोर्यथाप्रार्थितमिंद्रियार्थानासेदुषो: सद्मसु चित्रवत्सु, प्राप्तानि दुखान्यपि दंडकेषु संचित्यमानानि सुखान्यभूवन'.

रघुवंश 13 में जनस्थान को राक्षसों के मारे जाने पर 'अपोढ़विघ्न' कहा गया है. जनस्थान को दंडकारण्य का ही एक भाग माना जा सकता है. उत्तररामचरित में भवभूति ने दंडकारण्य का सुंदर वर्णन किया है. भवभूति के अनुसार दंडकारण्य जनस्थान के पश्चिम में था (उत्तररामचरित, अंक-1).

गोवर्धन परिचय

गोवर्धन मथुरा नगर, उत्तर प्रदेश के पश्चिम में लगभग 21 कि.मी. की दूरी पर स्थित है। यहीं पर 'गिरिराज पर्वत' है, जो 4 या 5 मील तक फैला हुआ है। इस पर्वत पर अनेक पवित्र स्थल हैं। पुलस्त्य ऋषि के शाप के कारण यह पर्वत एक मुट्ठी प्रतिदिन कम होता जा रहा है। कहते हैं कि इसी पर्वत को भगवान कृष्ण ने अपनी छोटी अँगुली पर उठा लिया था। गोवर्धन पर्वत को गिरिराज पर्वत भी कहा जाता है। 'गर्ग संहिता' में गोवर्धन पर्वत की वंदना करते हुए इसे वृन्दावन में विराजमान और वृन्दावन की गोद में निवास करने वाला "गोलोक का मुकुटमणि" कहा गया है।

पौराणिक मान्यता अनुसार श्री गिरिराजजी को पुलस्त्य ऋषि द्रौणाचल पर्वत से ब्रज में लाए थे। दूसरी मान्यता यह भी है कि जब राम सेतुबंध का कार्य चल रहा था तो हनुमान इस पर्वत को उत्तराखंड से ला रहे थे, लेकिन तभी देववाणी हुई की सेतुबंध का कार्य पूर्ण हो गया है तो यह सुनकर हनुमानजी इस पर्वत को ब्रज में स्थापित कर दक्षिण की ओर पुन: लौट गए।

पौराणिक उल्लेखों के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण के काल में यह अत्यन्त हरा-भरा रमणीक पर्वत था। इसमें अनेक गुफ़ा अथवा कंदराएँ थीं और उनसे शीतल जल के अनेक झरने झरा करते थे। उस काल के ब्रजवासी उसके निकट अपनी गायें चराया करते थे, अतः वे उक्त पर्वत को बड़ी श्रद्धा की दृष्टि से देखते थे। भगवान श्रीकृष्ण ने इन्द्र की परम्परागत पूजा बन्द कर गोवर्धन की पूजा ब्रज में प्रचलित की थी, जो उसकी उपयोगिता के लिये उनकी श्रद्धांजलि थी।

भगवान श्रीकृष्ण के काल में इन्द्र के प्रकोप से एक बार ब्रज में भयंकर वर्षा हुई। उस समय सम्पूर्ण ब्रज के जलमग्न हो जाने की आशंका उत्पन्न हो गई। भगवान श्रीकृष्ण ने उस समय गोवर्धन के द्वारा समस्त ब्रजवासियों की रक्षा की थी। भक्तों का विश्वास है कि श्रीकृष्ण ने उस समय गोवर्धन को छतरी के समान धारण कर उसके नीचे समस्त ब्रजवासियों को एकत्र कर लिया था, उस अलौकिक घटना का उल्लेख अत्यन्त प्राचीन काल से ही पुराणादि धार्मिक ग्रन्थों में और कलाकृतियों में होता रहा है। ब्रज के भक्त कवियों ने उसका बड़ा उल्लासपूर्ण कथन किया है। आजकल के वैज्ञानिक युग में उस आलौकिक घटना को उसी रूप में मानना संभव नहीं है। उसका बुद्धिगम्य अभिप्राय यह ज्ञात होता है कि श्रीकृष्ण के आदेश अनुसार उस समय ब्रजवासियों ने गोवर्धन की कंदराओं में आश्रय लेकर वर्षा से अपनी जीवन रक्षा की थी।

गोवर्धन के महत्त्व की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण घटना यह है कि यह भगवान कृष्ण के काल का एक मात्र स्थिर रहने वाला चिह्न है। उस काल का दूसरा चिह्न यमुना नदी भी है, किन्तु उसका प्रवाह लगातार परिवर्तित होने से उसे स्थाई चिह्न नहीं कहा जा सकता है। इस पर्वत की परिक्रमा के लिए समूचे विश्व से कृष्णभक्त, वैष्णवजन और 'वल्लभ संप्रदाय' के लोग आते हैं। यह पूरी परिक्रमा सात कोस अर्थात् लगभग 21 किलोमीटर की है। यहाँ लोग दण्डौती परिक्रमा करते हैं। दण्डौती परिक्रमा इस प्रकार की जाती है कि आगे हाथ फैलाकर ज़मीन पर लेट जाते हैं और जहाँ तक हाथ फैलते हैं, वहाँ तक लकीर खींचकर फिर उसके आगे लेटते हैं।

इसी प्रकार लेटते-लेटते या साष्टांग दण्डवत करते-करते परिक्रमा करते हैं, जो एक सप्ताह से लेकर दो सप्ताह में पूरी हो पाती है। यहाँ 'गोरोचन', 'धर्मरोचन', 'पापमोचन' और 'ऋणमोचन'- ये चार कुण्ड हैं तथा भरतपुर नरेश की बनवाई हुई छतरियां तथा अन्य सुंदर इमारतें हैं। मथुरा से डीग को जाने वाली सड़क गोवर्धन पार करके जहाँ पर निकलती है, वह स्थान 'दानघाटी' कहलाता है। यहाँ भगवान दान लिया करते थे। यहाँ 'दानरायजी का मंदिर' है। इसी गोवर्धन के पास 20 कोस के बीच में सारस्वत कल्प में वृन्दावन था तथा इसी के आसपास यमुना बहती थी।

दर्शनीय स्थल: मार्ग में पड़ने वाले प्रमुख स्थल आन्यौर, जतीपुरा, मुखारविंद मंदिर, राधाकुण्ड, कुसुम सरोवर, मानसी गंगा, गोविन्द कुण्ड, पूंछरी का लौठा, दानघाटी इत्यादि हैं। राधाकुण्ड से तीन मील पर गोवर्धन पर्वत है। पहले यह गिरिराज सात कोस में फैले हुए थे, पर अब धरती में समा गए हैं। यहीं कुसुम सरोवर है, जो बहुत सुंदर बना हुआ है। यहाँ मंदिर में वज्रनाभ के पधराए हरिदेव जी की मूर्ति स्थापित थी, पर औरंगजेब के काल में वह यहाँ से चले गए। पीछे से उनके स्थान पर दूसरी मूर्ति प्रतिष्ठित की गई। यह मंदिर बहुत सुंदर है। यहाँ श्री वज्रनाभ के ही पधराए हुए एकचक्रेश्वर महादेव का मंदिर है। गिरिराज के ऊपर और आसपास गोवर्धन ग्राम बसा है तथा एक मनसा देवी का मंदिर है। मानसी गंगा पर गिरिराज का मुखारविन्द है, जहाँ उनका पूजन होता है तथा आषाढ़ी पूर्णिमा तथा कार्तिक की अमावस्या को मेला लगता है।

गोवर्धन में सुरभि गाय, ऐरावत हाथी तथा एक शिला पर भगवान का चरणचिह्न है। मानसी गंगा पर, जिसे भगवान ने अपने मन से उत्पन्न किया था, दीवाली के दिन जो दीपमालिका होती है, उसमें मनों घी ख़र्च किया जाता है, शोभा दर्शनीय होती है। परिक्रमा की शुरुआत वैष्णवजन जतीपुरा से और सामान्यजन मानसी गंगा से करते हैं और पुन: वहीं पहुँच जाते हैं। पूंछरी का लौठा में दर्शन करना आवश्यक माना गया है, क्योंकि यहाँ आने से इस बात की पुष्टि मानी जाती है कि आप यहाँ परिक्रमा करने आए हैं। परिक्रमा में पड़ने वाले प्रत्येक स्थान से कृष्ण की कथाएँ जुड़ी हैं। मुखारविंद मंदिर वह स्थान है, जहाँ पर श्रीनाथजी का प्राकट्य हुआ था। मानसी गंगा के बारे में मान्यता है कि भगवान कृष्ण ने अपनी बाँसुरी से खोदकर इस गंगा का प्राकट्य किया था। मानसी गंगा के प्राकट्य के बारे में अनेक कथाएँ हैं। यह भी माना जाता है कि इस गंगा को कृष्ण ने अपने मन से प्रकट किया था। गिरिराज पर्वत के ऊपर गोविंदजी का मंदिर है। कहते हैं कि भगवान कृष्ण यहाँ शयन करते हैं। उक्त मंदिर में उनका शयनकक्ष है। यहीं मंदिर में स्थित गुफ़ा है, जिसके बारे में कहा जाता है कि यह राजस्थान स्थित श्रीनाथ द्वारा तक जाती है।

महत्त्व: गोवर्धन की परिक्रमा का पौराणिक महत्त्व है। प्रत्येक माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी से पूर्णिमा तक लाखों भक्त यहाँ की सप्तकोसी परिक्रमा करते हैं। प्रतिवर्ष 'गुरु पूर्णिमा' पर यहाँ की परिक्रमा लगाने का विशेष महत्त्व है। श्रीगिरिराज पर्वत की तलहटी समस्त 'गौड़ीय सम्प्रदाय', 'अष्टछाप कवि' एवं अनेक वैष्णव रसिक संतों की साधना-स्थली रही है।

संदर्भ: भारतकोश-गोवर्धन

जाट इतिहास

मि. ग्राउस आगे लिखते हैं - जाट पूर्ण वैभवशाली और धनसम्पन्न थे । जाट-शासन-काल में मथुरा पांच भागों में बटा हुआ था - अडींग, सोसा, सांख, फरह और गोवर्धन[4]

कुसुम सरोवर, गोवर्धन (मथुरा)

यहां पर भरतपुर रियासत के सबसे प्रतापी शासक ब्रजराज महाराजा सूरजमल सिंह जी की समाधि है जिसका निर्माण उनके प्रतापी पुत्र महाराजा सवाई जवाहर सिंह जी ने किया था व यहां अन्य यदुवंशी सिनसिनवार शासकों व उनकी रानी,महारानियों की भी समाधि है, स्थानीय लोगों द्वारा यह भी बताया जाता है ,यहांअकूत खजाना छिपा हो सकता है। उसकी रखवाली के लिए महाराज के मृत परिजनों की आत्मा घोड़ों पर सवार होकर इसकी रखवाली करते हैं। यहां के चौकीदार एवं निकट के वासिन्दे इसकी पुष्टी करते हुए बताते हैं कि रात के समय घोड़ों की टाप की आवाज सुनाई देती है।

खजाने का इतिहास: महाराजा सूरजमल ने दिल्ली में मुस्लिम शासक पर आक्रमण किया था और वहां से जीता गया धन को भरतपुर भिजवाया तो उनकी तीन महारानियों ने किशोरी, हंसिया एवं लक्ष्मी ने उस धन को राजघराने के खजाने में रखवाने से इंकार कर दिया तो महाराजा सूरजमल सिहं ने अपने इष्ट गिर्राज महाराज की स्थली गोवर्धन में कुसुम सरोवर का विकास कराने के साथ ही उस दौलत को यहां गुप्त तहखानों में छिपा दिया। युद्ध के दौरान ही मुस्लिम आक्रांताओं के हाथों दिल्ली में महाराजा सूरजमल सिहं को धौखे से शहीद करने के बाद उनके पुत्र महाराजा जवाहर सिंह ने युद्ध की कमान संभाली। उन्होंनेे महाराजा सूरजमल का अंतिम संस्कार तो जरुर दिल्ली में कर दिया जिसे आज सूरज बाग के नाम से जाना जाता है। जवाहर सिंह ने महाराजा सूरजमल २सिंह के चरण चिन्ह कुसुम सरोवर में स्थापित कराने के साथ ही उनकी तीनों रानियों एवं उनके करीब 19 खास सिपहसालारों जिन्होंने उनकी सुरक्षा में अपनी जान गंवाई थी की समाधी भी कुसुम सरोवर में स्थापित कराई। छतरी के रुप में आकर्षक राजस्थानी शैली में बांसी पहाड़पुर के पत्थर से निर्मित इन छतरियों की छटा देखते ही बनती है। यहां छिपे गुप्त खजाने को पाने की लालसा में तीन बार असामाजिक तत्वो द्वारा महाराजा सूरजमल के चरण चिन्हों के लगे पत्थर को तोड़ा भी गया लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली । [5]

Population

गोवर्धन के आसपास के विशाल भू भाग को खूटेल पट्टी तोमरगढ़ के नाम से जाना जाता है। गोवर्धन तहसील के 80% ग्रामो में खुटेल तोमर जाट निवास करते है। इस गोत्र को पाण्डव,पार्थ ,अर्जुनायन, कुन्तल नाम से जाना जाता है। यह क्षेत्र कुन्ती पुत्र अर्जुन के वंशधरों द्वारा आबाद है। अर्जुन के वंशज अर्जुनायन, कुन्तल ,तोमर ,पाण्डव और खूटेला कहलाते हैं। खूटेला कहे जाने के पीछे का इतिहास इस प्रकार से है राजा अनंगपाल तोमर ने सोनोठ गढ़ में एक स्तम्भ (स्थानीय भाषा मे खूंटा) गाड़ कर भारत वर्ष के समस्त राजाओ को चुनोती दी यदि कोई भी राजा उनसे (अनंगपाल) से शक्तिशाली है तो उनके राज्य में प्रवेश करके या इस रण स्तम्भ खूंटे को हिलाकर दिखाए किसी भी राजा ने उनकी इस चुनोती को स्वीकार नही किया था अतः उनके वंशज खूटेला तोमर कहलाते है। खूटेला शब्द का पर्यायवाची दबंग होता है।[6]

Village in Govardhan tahsil

Aring Mathura, Ahmal, Anore Bachhgaon, Bhagosa, Bhavanpura Mathura, Borpa, Bhadar, Bhimnagar, Bhogna, Bhudan, Chamarpur, Daulatpur, Devseras, Haripura, Gantholi, Govardhan (NP), Goverdhan Brahmnan, Goverdhan Gorwan, Gopalpur, Jamnavati, Janu, Jatipura, Jhapra, Jiwani Jatwan/nagla Jiwan, Kanchanpura, Kanchanpuri, Konjayara, Kontharaa, Kosi Khurd, Kothara, Kunjera, Lalpur, Loriha Patti, Madaura Madhuri Kund, Magorra, Mahmadpur, Mahroli Mahavan, Malhu, Malsarai, Mudseras, Nainupatti, Nagal Jangli, Nagal Khairo, Nagal Mada, Nagla Adhu, Nagla Ajal, Nagla Ajit Nagla Akatia, Nagla Akha, Nagla Alawal, Nagla Asha, Nagla Bandpura Nagla Bar, Nagla Bari, Nagla Bariu, Nagla Bhau, Nagla Bhuch, Nagla Bhuchan, Nagla Bhura, Nagla Bhuria , Nagla Bhusan Nagla Burabai, Nagla Chahar, Nagla Chandrasarovar, Nagla Chhinga, Nagla Chinta, Nagla Chothaiya, Nagla Dabda, Nagla Dadi, Nagla Dayal, Nagla Devia, Nagla Dham, Nagla Dhania, Nagla Dhannu, Nagla Dompura, Nagla Garhi Vissa, Nagla Gharu, Nagla Girwar/nagla Soan, Nagla Hamla, Nagla Harju, Nagla Hazi , Nagla Jalfa, Nagla Jatav, Nagla Gantholi , Nagla Jhinga, Nagla Kanchula, Nagla Kanja, Nagla Kanku, Nagla Katalia, Nagla Khari, Nagla Khelu, Nagla Khutia, Nagla Kishni, Nagla Kosi, Nagla Kuli, Nagla Lathakuri Nagla Makehara Nagla Muktan Nagla Narayan Nagla Navada Nagla Nehal Nagla Nodra Nagla Panjabi Nagla Patiram Nagla Pipre, Nagla Rajpur, Nagla Ramkishan, Nagla Ramnagar, Nagla Rampur, Nagla Ramru Nagla Rangpur Nagla Rankoli, Nagla Ratti Nagla Ratu, Nagla Sabla, Nagla Saida, Nagla Sajjan, Nagla Sankhi, Nagla Sapera, Nagla Sapera, Nagla Seu, Nagla Shera, Nagla Shisram, Nagla Shoba, Nagla Sitaram, Nagla Sukh, Nagla Tal, Nagla Tashia , Nagla Thakuria , Nagla Tonia , Nagla Tonta, Nagla Tunda, Nagla Udaypur, Nagla Ummed, Nagla Padal, Neemgaon, Odam, Om Nagar, Pali Brahmnan, Palidungara, Palson, Pentha, Phondar, Pura, Radhakund Rural, Rasulpur, Sakarwa, Sakitara, Seeh, Singa Patti, Son, Saunkh, Sonkh Dehat, Sonsa, Seha, Sonoth Janubi, Vitthalnagar,

Notable Persons

External Links

References

  1. Aitihasik Sthanavali by Vijayendra Kumar Mathur, p.305-306
  2. Aitihasik Sthanavali by Vijayendra Kumar Mathur, p.307
  3. Aitihasik Sthanavali by Vijayendra Kumar Mathur, p.421
  4. मथुरा मेमायर्स, पृ. 376
  5. Post credit:- S.S Baliyan ( Admin).Jat Kshatriya Culture
  6. पाण्डव गाथा पेज 39