Thakur Todar Singh

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Thakur Todar Singh (Tomar) was freedom fighter and companion of Shahid Bhagat Singh. He was from Shadipur Khair (शादीपुर) village in Khair tahsil in Aligarh district in Uttar Pradesh.

History

The Shadipur Khair village has a remarkable place of pride in the Indian freedom struggle where one of the greatest revolutionary Shaheed Bhagat Singh was brought to stay in the village by Thakur Todar Singh in 1927.

Honour

Road between Jattari to Pisawa is named as Todar Singh Marg (टोडर सिंह मार्ग) due to his enormous social works for freedom. Shaheed Bhagat Singh lived in Shadipur Khair village also.

सरदार भगत सिंह स्मारक

शादीपुर खैर, अलीगढ़, उत्तर प्रदेश स्थित एक गाँव है। जहाँ पर नहर के किनारे पर ही शहीद सरदार भगत सिंह जी के नाम का एक स्मारक भी बना हुआ है । जो कि इस गॉव की सौन्दर्य को बड़ा देता है । इस गॉव में बहुत से अच्छे लोगो ने अपने दिनों को व्यतीत किया है। जिसमें सरदार भगत सिंह और माननीय टोडर सिंह जी एक थे । ये गॉव पहलवानों के लिए भी जाना जाता रहा है। यहाँ के लोग बहुत ही मेहनती है।

शादीपुर में वेश बदलकर रहे थे भगत सिंह

अलीगढ़ जनपद में जट्टारी क्षेत्र के गांव शादीपुर में शहीद भगत सिंह ने शिक्षा रूपी पौधा रोपित कर बच्चों को देशभक्ति का पाठ पढ़ाया था। वह अपनी पहचान बदलकर बलवंत सिंह के नाम से शादीपुर गांव में 18 माह तक रुके थे। यहां पर उन्होंने अंग्रेज सैनिकों से मोर्चा लेने के लिए लोगों को बम बनाना भी सिखाया करते थे। हालांकि भगत सिंह की ओर से रोपा गया शिक्षा का पौधा उदासीनता के चलते सूख चुका है।

गांव के निवासी सेवानिवृत्त प्रवक्ता चौधरी लक्ष्मण सिंह और अध्यापक योगेश कुमार के अनुसार सरदार भगत सिंह सन् 1928 में गणेश शंकर विद्यार्थी के पास कानपुर पहुंचे थे। कानपुर क्रांतिकारियों का गढ़ था। शादीपुर गांव के निवासी स्वतंत्रता सेनानी ठाकुर टोडर सिंह भी कानपुर गए थे जहां उनकी उनकी मुलाकात भगत सिंह से हुई थी। कानपुर में पुलिस का खतरा बढ़ता देख स्वतंत्रता सेनानी ठाकुर टोडर सिंह अनुरोध कर भगत सिंह को अपने साथ अलीगढ़ और फिर तकीपुर रजवाहा होते हुए अपने गांव शादीपुर ले आए थे। यहां भगत सिंह ने दाढ़ी, बाल कटवा लिया था और टोडर सिंह ने बलवंत सिंह के रूप में ग्रामीणों का उनका परिचय दिया था।

ठा. टोडर सिंह के यहां रहते हुए गांव से करीब 800 मीटर बाहर एक बगीचे में भगत सिंह बच्चों को पढ़ाते थे। रामशरण उसरह, नत्थन सिंह जलालपुर, रघुवीर सिंह मढ़ा हबीपुर, हरिशंकर आजाद, खैर और गांव के नारायण सिंह आदि ने भगत सिंह से शिक्षा के साथ देशभक्ति का भी पाठ पढ़ा था। वह शाम के समय कुश्ती भी सिखाते थे। 23 मार्च 1931 को फांसी दिए जाने के बाद से शादीपुर गांव के लोग शहीद दिवस मनाते आ रहे हैं। संदर्भ:- 'शादीपुर में वेश बदलकर रहे थे भगत सिंह'-अमर उजाला, 23.3.2019

कैसे भगत सिंह शादीपुर पहुंचे

अंग्रेजों की गुलामी से देश को आजाद कराने के लिए बहुत कम उम्र में ही महान क्रांतिकारी भगत सिंह ने अपना जीवन लुटा दिया। 28 सितंबर 1907 को जन्में इस क्रांतिकारी की जयंती पर देश उन्हें याद कर रहा है। क्रांति के दौरान अंग्रेजों के खिलाफ रणनीति बनाने के लिए भगत सिंह उप्र में अलीगढ़ के गांव शादीपुर में 18 महीने तक रुके थे।

"खैर तहसील के गांव शादीपुर की माटी में आज भी भगत सिंह की बिखेरी गई खुशबू को महसूस किया जाता है। कोई भी इस गांव में आता है तो माटी को माथे से लगाए बिना नहीं रहता।

कैसे भगत सिंह शादीपुर पहुंचे: बात 1929 की है। शादीपुर के ठाकुर टोडर सिंह भी उन दिनों भारत मां को अंग्रेजों की बेड़ियों से मुक्त कराना चाह रहे थे। वह क्रांतिकारियों की बैठक में कानपुर गए थे। वहां संपादक व क्रांतिकारी गणेश शंकर विद्यार्थी से मुलाकात हुई। सरदार भगत सिंह भी वहीं पर थे। उनके पीछे अंग्रेज पड़े हुए थे। गणेश शंकर विद्यार्थी ने भगत सिंह को कुछ दिनों के लिए टोडर सिंह के साथ अलीगढ़ भेज दिया।

शादीपुर में खोला नेशनल स्कूल: शादीपुर में ही भगत सिंह ने नेशनल स्कूल के नाम से विद्यालय खोला। इसमें 18 महीने तक पढ़ाया। खैर क्षेत्र के अधिकांश लोग यहां पढ़ने आते थे। इनमें से कई बाद में क्रांतिकारी भी निकले। एक दिन भगत सिंह ने गांव वालों से कहा कि वह अब अपने घर जाएंगे। ऐसा बताया जाता है कि पूरा गांव उन्हें रोकने लगा।

भगत सिंह ने टोडर सिंह से कहा कि मेरी मां बीमार हैं, मुझे जाना पड़ेगा। टोडर सिंह ने भगत सिंह के शिष्य व जलालपुर निवासी ठाकुर नत्थन सिंह को बुलाया। उनसे भगत सिंह को खुर्जा जंक्शन तक छोड़ने को कहा। बताया कि पूरब से जो ट्रेन पश्चिम की ओर जाए, उसी में बैठाना। भगत सिंह पश्चिम से आ रही ट्रेन में झट से बैठ गए और नत्थन सिंह से बोले, "अब मैं रुक नहीं सकता, भारत मां मुझे बुला रही हैं।

हालांकि, शादीपुर गांव में भगतसिंह के नाम से कोई स्मारक नहीं बना है। जिस स्थान पर पढ़ाते थे, वह खंडहर में तब्दील हो गया। कुआं जमींदोज हो गया और उसके पास कुंडी अभी है, जिसमें वह नहाया करते थे। टोडर सिंह के पुत्र रामप्रताप सिंह ने कई बार इसका जिक्र किया। वह कहा करते थे कि पिताजी ने भगत सिंह को अपनी कोठी में रखा था। मुझे फख्र है कि मैं ऐसे गांव से हूं, जिसकी धरती पर भगत सिंह का पांव पड़ चुका है।

संदर्भ:-'तब भगत सिंह ने कहा था- "मेरी भारत मां बीमार है, उनके लिए जा रहा हूं"', नई दुनिया, 27.9.2017

ठाकुर नत्थनसिंह

गांव नगला जुझार (मुरवार) के ठाकुर नत्थनसिंह स्वतंत्रता सेनानी थे , वे अपनी ननिहाल , गांव जलालपुर (पिसावा) में रहते थे , तब उनका सम्पर्क क्रान्तिकारी शहीद भगतसिंह जब 18 माह गांव शादीपुर (खैर ) में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी ठाकुर टोडरसिंह के यहां उनके घर पर गांव शादीपुर में रहे थे , तब सतत सम्पर्क रहा था । ठाकुर टोडरसिंह के कहने पर ही भगतसिंह के साथ ठाकुर नत्थनसिंह , जब वे दोनों गांव शादीपुर से खुर्जा जंक्शन रेलवे स्टेशन जिला बुलंन्दशहर गए थे । नत्थनसिंह के चार पुत्र राजपालसिंह (मास्टर - जलालपुर ), राजवीरसिंह ( मास्टर - पिसावा) , राजेन्द्रसिंह और वीरेन्द्रसिंह (मास्टर - मिठ्ठौली) थे । (स्रोत:रणवीरसिंह 9425137463)

External links

References



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