Vishnuvardhan

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Vishnuvardhan (372 AD) (विष्णुवर्धन), father of Yashodharman, was a Jat ruler of Malwa. He was son of Vyâghrarâta.

The outsider groups damaged the Malwa republics. These republics of Malwa became monocrats over a period of time. Such people out of these republics (Jats) were Kanishka, Shalendra and Yasodharman. Maharaja Vishnuvardhan was father of Yasodharman. Visnuvardhan was Virk gotra Jat. The inscription of Bayana mentions him as Virk Vishnuvardhan.

CV Vaidya in ‘Hindu Medeival India’ writes about Vishnuvardhan as under:

“The kingdom of Malapo or western Malwa belonged to Yasodharman Vishnuvardhan of the Mandsaur inscription. In our surmise their name ending Vardhan shows that he was a vaisya like Guptas. His great exploit was that he defeated Mihirkula the Hun. Now we already quoted the sentence in Chandr’a Grammer “Ajay Jarto Hunan” meaning the Jats conquered the Huns. If we apply this sentence to Yasodharman and there is none else to whom it can well be applied. We may surmise that he was a jarta or jat from the Punjab. Infact like the Gujars of Bhinmal we may suppose that Jats from Punjab to have migrated to Malwa (which like Rajputana is a favourite land with migrators ) to take refuse from the invasions of the Huns and these Jats in Malwa of getting strong under Yasodharman influence in 528 AD a signal defeat on Huns who had over run their motherland, the Punjab.”

There is an inscription on pillar of Maharaja Vishnuvardhan in Bayana town in Bharatpur district, which is known as ‘Bhim Lat’. This shows the extent of his rule up to Bayana. According to CV Vaidya the period of Jat rulers in Malwa is 500-641 AD. They were rulers in Mandsaur when Guptas were the rulers in Ujjain.

Bijayagadh Stone Pillar Inscription of Vishnuvardhana S.V.428 (372 AD)

From: Fleet, John F. Corpus Inscriptionum Indicarum: Inscriptions of the Early Guptas. Vol. III. Calcutta: Government of India, Central Publications Branch, 1888, 254.[1]

The Bijayagadh Stone Pillar Inscription of Vishnuvardhana, locally known as Bhīm kī Lāţ, was erected at Bayana in Bharatpur district for having perfection been attained in samvat 428 on the fifteenth lunar day of the dark fortnight of (the month) Phâlguna. Bijayagadh Stone Pillar Inscription of Vishnuvardhana reads as[2]:

Perfection has been attained! Four centuries of years, together with the twenty-eighth (year), (or in figures) 400 (ana) 20 (ana) 8, having been accomplished; on the fifteenth lunar day of the dark fortnight of (the month) Phalguna;-on this (lunar day), (specified) as aforesaid: -

(Line 3.)-On the ceremony of the pundar ka-sacrifice (having been performed), this sacrificial post has been caused to be set. up by the Varika, the illustrious Vishnuvardhana whose royalty and name are well established,-who is the excellent son of Yashovardhana; (and) the excellent son s son of Yashôrâta; (and) the excellent son of the son s son of Vyâghrarâta, - for the purpose of increasing (his) splendour, sacrifices, religion, welfare (in the other world), prosperity, fame, family, lineage, good fortune, and enjoyment.

(L. 4.)-Let there be success! Let there be increase! Let there be tranquillity! Let there be the condition of (his) having a son who shall live! Let there be the attainment of desires that are wished for! May there be faith and wealth!

विष्णुवर्द्धन

ठाकुर देशराज लिखते हैं कि मालवे के बाहर से आने वाले जाति-समूहों ने यहां के गणवादी और ज्ञातिवादी राज्यों को बहुत हानि पहुंचाई। अपनी स्वाधीनता की रक्षा के लिए उन्होंने लम्बे अरसे तक लड़ाइयां लड़ीं, किन्तु साम्राज्यवादियों द्वारा वे पराजित और अर्द्धमूर्च्छित कर दिए गए। कई शताब्दियों के पश्चात्, गणवादियों में विवश होकर अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए, एकतंत्र के प्रति रुचि जागी। उनमें से कुछ महामना व्यक्ति आगे बढ़े और अपने राज्य, कई-कई ने अपने साम्राज्य भी स्थापित किए। ज्ञातिवादी (जाट) लोगों में से ऐसे महानुभावों में कनिष्क, शालेन्द्र और यशोधर्मा के नाम विशेष उल्लेखनीय हैं। महाराज विष्णुवर्द्धन सम्राट् यशोधर्मा के पिता थे।

महाराज विष्णुवर्द्धन जिन्हें कि कहीं-कहीं विष्णुधर्मा भी लिखा गया है, वरक् वंश के जाट थेबयाने में जो उनका विजय-स्तम्भ है, उस पर उनका नाम वरिक् विष्णुवर्द्धन लिखा हुआ है।2 आज की स्थिति में वरक् या वरिक् वंश अधिक प्रसिद्ध नहीं है। उसका केवल अस्तित्वमात्र मौजूद है जो कि जाटों के गोत्रों की लम्बी सूची में आ जाता है।3 सी. वी. वैद्य ने अपने ‘हिन्दु मिडिवल इण्डिया’ में


1. भारत का राष्ट्रीय इतिहास। श्री बी. एस. पथिकजी द्वारा लिखित (अप्रकाशित)।
2. ब्रजेन्द्र वंश-भास्कर में बयाने का वर्णन।
3. जाटों की उत्पत्ति और इतिहास, पृ. 48।

जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठान्त-707


विष्णुवर्द्धन के सम्बन्ध में इस प्रकार लिखा है-

The kingdom of Molapo or western Malwas belonged to Yasodharman Vishnuvardhan of the Mandsaur inscription. In our surmise, their name ending Vardhana shows that he was a Vaisya like the Guptas1. His great exploit was that he defeated Mihirgula, the Hun. Now we already quoted the sentence in Chandra's Grammar अजय जर्टो हुणान "The Jats conquered the Huns." If we apply this sentence to Yashodharman and there is none else to whom I can well be applied, we may surmise that he was a Jarta or Jat from the Punjab. In fact, like the Gujars of Bhinwal, we may suppose the Jats from the Punjab to have migrated to Malwa (which like Rajputana is a favourite land with Migrators) to take refuge from the invasions of the Huns and these Jats in Malwa of getting strong under Yasodharman inflicted in 528 A.D. a signal defeat on the Huns who had over-run their motherland, the Punjab.

अर्थात्-मालायो या पच्छिमी मालवे का राज मन्दसौर के शिलालेख वाले यशोधर्मा व विष्णुवर्द्धन के अधिकार में था। हमारे अनुमान में नाम के वर्द्धन से यह ज्ञात होता है कि वह गुप्तों की भांति वैश्य था। उसकी महान् वीरता का काम यह था कि उसने मिहिरकुल हूण को जीत लिया था। चन्द्र के व्याकरण के इस वाक्य को ‘अजयज्जर्टो हूणान्’ जाटों ने हूणों को जीत लिया, हम उद्धृत कर ही चुके हैं। अगर हम इस वाक्य का प्रयोग यशोधर्मा पर करें क्योंकि यह किसी अन्य पर प्रयोग भी नहीं हो सकता है तो वह (यशोधर्मा) पंजाब का जर्ता या जाट था। वास्तव में भीनमाल के गूजरों की तरह हम यह अनुमान कर सके हैं कि पंजाब के जाट लोग मालवा में जा बसे,2 (जो कि राजपूताने की तरह बसने वालों के लिए इष्ट देश है) और वह वहां हूणों के धावों से बचने के लिए चले गए और यशोधर्मा के आधिपत्य में 528 ई. में इन जाटों ने हूणों को पूर्ण रूप से हरा दिया


1. वैद्यजी के इस अनुमान की निस्सारता हम दूसरे अघ्याय में सिद्ध कर चुके हैं। वर्द्धन नाम से यदि वैद्यजी विष्णुवर्द्धन को अथवा उसके सजातीय जाटों को वैश्य मानते हैं तो क्या वैदिक-कालीन दिवोदास को दास शब्द साथ आने से शूद्र मानेंगे? (लेखक)।
2. किन्तु अति प्राचीन काल से वहां रहते थे जो दशार्ण और भोज कहलाते थे और आज दसौर, दशपुरिया और भोजू कहलाते हैं। (लेखक)।

जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठान्त-708


था, जो कि उनकी मातृभूमि पंजाब में अत्याचार कर रहे थे।

बयाना जो कि इस समय भरतपुर राज्य का एक प्रसिद्ध नगर गिना जाता है में, महाराज विष्णुवर्द्धन का एक स्तंभ है, जो भीम की लाट के नाम से मशहूर है। इससे पता चलता है कि उनका राज्य इतना विस्तृत था जिसमें बयाना भी आ जाता था। ब्रजेन्द्र-वंश-भास्कर के लेखक ने लिखा है कि वरिक विष्णुवर्द्धन ने संवत् 428 में यहां यज्ञ किया था। हमारे मत से यह समय संवत् 528 के आसपास का है, क्योंकि यशोधर्मा ने संवत् 586 अर्थात् सन् 529 के आसपास हूणों को हराया था। यदि ब्रजेन्द्र-वंश-भास्कर में दिए हुए (संवत् 428) को ही ठीक मानें तो विषणुवर्द्धन का समय संवत् 400 संवत् 550 के बीच का अर्थात् 150 वर्ष के लगभग मानना पड़ता है और यदि हम मान लें कि यशोधर्मा ने लगभग अस्सी वर्ष की आयु में हूणों को हराया तो इस तरह विष्णुवर्द्धन का शासन-समय 90-95 का मानने से भी काम चल जाता है।

जनरल कनिंघम के मत से, काश्मीर के प्रवरसेन का समय 423 ई. है।1 प्रवरसेन यशोधर्मा का समकालीन था, क्योंकि उसने यशोधर्मा के पुत्र शिलादित्य को काश्मीर ले जाकर गद्दी पर बिठाया था। यदि इस मत को सही मान लिया जाए तो ब्रजेन्द्र-वंश भास्कर में दिए हुए विषणुवर्द्धन के यज्ञ संवत् 428 अर्थात् सन् 371 को मानने में कोई आपत्ति नहीं रहती। किन्तु इतिहासवेत्ताओं का एक बड़ा दल इसी मत का पोषक है कि यशोधर्मा ने हूणों को 529 ई. के लगभग हराया। इस तरह विष्णुवर्द्धन के जय (यज्ञ) स्तंभ का समय संवत् 528 के आसपास का मानना ही ठीक है।

श्री सी. वी. वैद्य इन जाट नरेशों का शासनकाल 500 ई. से 641 ई. तक मानते हैं। किन्तु हमें इनका समय सन् 340 ई. से आरम्भ होने का पता चलता है। उस समय इनकी स्थिति यशोधर्मा जैसे सम्राट की जैसी तो न थी, किन्तु मालवे के पश्चिमी हिस्से पर राज्य इनका अवश्य था। जिस समय उज्जैन में गुप्त राजाओं का शासन था, उसी समय मन्दसौर में इनका भी राज था। इनमें से एक-दो नरेश तो गुप्तों के मांडलिक भी रहे थे।

References


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